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Interview छोड़ भागा जेहादी मदनी; ‘सीने पर गोली खाएँगे’ वाला प्रयोग खुद से ही क्यों नहीं शुरू करते मदनी साहब? आम मुस्लिमों को जिहाद के नाम पर भड़काकर कुर्बान करो, फिर इनकी लाशों पर बैठ तिजोरियां भरना

                                             जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी
मुसलमान खुद सोंचे कि अब तक जितने भी दंगे हुए हैं क्या किसी भी नेता के घर के किसी परिंदे तक चोट पहुंची? अयोध्या मुद्दे को लेकर जितने भी धरने और प्रदर्शन हुए सब में हिन्दू नेता आगे रहे और अशोक सिंघल(स्व) तक अपना सिर फुड़वा चुके, लेकिन मुस्लिमों के किसी भी प्रदर्शन में कोई नेता आगे नहीं रहा, पुलिस के हरकत में आते ही भीड़ में भाग खड़े होते थे, मरी कौन पब्लिक फिर उनकी लाशों पर बैठ मालपुए ही नहीं खाए बल्कि तिजोरियां भरी। वही काम आज मदनी कर रहा है। जिहाद के नाम पर मुसलमानों को भड़का रहा है और जब मुसलमान सड़क पर आएगा पुलिस की लाठी खाएगा फिर उस पर चीख-पुकार कर मालपुए खाए जायेंगे। गन्दी सियासत की जाएगी। आम मुसलमानों को बदनाम किया जायेगा।  
  

जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने शनिवार (29 सितंबर 2025) को भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में कहा है कि जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। इसके बाद से ही देश में इस बयान को लेकर बहस शुरू हो गई है, हिंदू और सेक्युलर दलों और नेताओं को तो छोड़ दीजिए कई मौलानाओं को भी मदनी का बयान भड़काने वाला लग रहा है।

बात सिर्फ जिहाद को लेकर बयान तक ही नहीं रुकी, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और वंदे मातरम जैसे राष्ट्रीय प्रतीक को मुसलमानों के खिलाफ बताते हुए यह इशारा दिया कि जो समुदाय इसके दबाव में झुक जाए वह ‘मुर्दा कौम’ कहलाएगा।

एक तरफ जिहाद की परिभाषा, दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायपालिका पर उंगली उठाना और राष्ट्रगीत को ‘धर्म बनाम पहचान’ की बहस में खड़ा करना एक बड़ा संदेश देता है। संदेश साफ है कि मदनी अपने बयान के जरिए केवल व्यवस्था को लेकर नाराजगी नहीं जता रहे बल्कि मुस्लिम समाज में गुस्सा और असुरक्षा की भावना को उकसाने का भी प्रयास कर रहे हैं।

जमीअत के प्रमुख का भड़काऊ संदेश

जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने X पर मदनी का बयान शेयर किया है। मदनी कहते हैं, “गोली खाएँगे तो सीने पर खाएँगे, पीठ पर नहीं। और अगर हमारा जनाजा निकला, तो जमीअत उलमा-ए-हिंद के झंडे में ही निकलेगा – इंशाअल्लाह।”

जमीअत के पोस्ट में लिखा है, “हमारे बुजुर्गों ने जेलों को आबाद किया, फांसी के फंदों को चूमा और कौम के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं। अगर उन्होंने जुल्म के सामने सर नहीं झुकाया, तो हम कैसे उस तसल्सुल को छोड़ दें? डरेंगे नहीं – कभी नहीं। चाहे हालात जैसे भी हों, मुकाबला करेंगे – इंशाअल्लाह।”

अब इस बयान के मायने और असर को समझने की कोशिश करते हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के चीफ मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने मदनी के बयान को ‘समाज को बाँटने वाला और मुस्लिमों को भड़काने वाला’ बताया है। बात सही भी है। जब कोई ऐसा नेता, जिसके पीछे बड़ी संख्या में लोग हों ‘जिहाद’ जैसा शब्द सार्वजनिक मंच से बोलता है तो उसका अर्थ सिर्फ ‘अन्याय के खिलाफ संघर्ष’ तक सीमित नहीं रहता।

इस शब्द का भावनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ इसे कहीं अधिक उग्र बना देता है। आम मुस्लिम युवक यदि इसे मजहबी संदेश समझ ले तो परिणाम केवल वैचारिक असहमति नहीं रहेगा बल्कि वह टकराव का रूप ले लेगा और यही चिंता का विषय भी है। क्या आम मुस्लिमों को लगता है कि अगर गोली की नौबत आएगी तो महमूद मदनी या उनके परिवार के लोग आगे आएँगे। जाहिर है वो ऐसा नहीं करेंगे लेकिन तकरीर कर लोगों को भड़काने का काम करते रहेंगे।

 मदनी के बयान का दूसरा पहलू सुप्रीम कोर्ट पर उनकी टिप्पणी है। यह देश का सर्वोच्च न्यायिक स्तंभ है, जिसके ऊपर जनता का भरोसा ही लोकतंत्र की नींव है। यदि मुस्लिमों का एक बड़ा नेता यह कहता है कि न्यायपालिका संविधान की रक्षा नहीं कर रही या सत्ता के दबाव में काम कर रही है तो यह केवल असहमति नहीं बल्कि अविश्वास फैलाने का प्रयास है।

एक साधारण नागरिक कानून में भरोसा रखता है क्योंकि उसे लगता है कि अंतिम न्यायालय उसके अधिकारों की रक्षा करेगा। परंतु जब नेतृत्व के मंच से कहा जाए कि यह संस्थान न्याय नहीं दे रहा तो इस संदेश से भीड़ के भीतर यह सोच आ जाती है कि न्याय पाने की उम्मीद न्यायालय में नहीं बल्कि टकराव और प्रतिरोध में है। यही प्रतिशोध की भावना टकराव की वजह बन सकती है।

वंदे मातरम को लेकर उनका बयान सच में चिंता बढ़ाने वाला है। वंदे मातरम कोई पार्टी का नारा नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई की याद है और भारत की पहचान है। इसे मानने या न मानने को ‘जिंदा कौम’ और ‘मुर्दा कौम’ जैसे शब्दों में बाँटना गलत दिशा में ले जाता है। इससे ऐसा लगता है कि जो इसके खिलाफ बोलता है वही असली नायक है और जो इसे सम्मान देता है वो जैसे दबा हुआ या कमजोर है।

मदनी लगातार मुसलमानों को यह संदेश दे रहे हैं कि वे हमेशा उत्पीड़ित हैं और उन्हें संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए। सीधी सी बात है कि अगर मुसलमान खुद को उत्पीड़ित समझेंगे तो वे दूसरे समाज को दुश्मन की तरह देखना शुरू कर देंगे और मदनी के बयान की टोन से लगता है कि वो यही करना भी चाहते हैं।

विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने मुस्लिमों से अपील की है कि वे मदनी जैसे मौलानाओं से दूरी बना लें। बंसल ने कहा, “मदनी जैसे कट्टरपंथी मौलानाओं से मुस्लिम युवाओं को तुरंत दूरी बना लेनी चाहिए क्योंकि यही लोग अपनी तकरीरों से एक दिन उन्हें RDX बाँधकर ब्लास्ट करने के लिए मजबूर कर देंगे।”

मदनी इससे पहले भी विवादों में घिरे रहे हैं। UCC के खिलाफ बयानबाजी हो, चाहे इस्लामोफोबिया के खिलाफ कानून लाने की बात हो या वक्फ एक्ट को लेकर हल्ला बोल हो, मदनी ने हर बार उकसाने वाले बयान दिए हैं। अब फिर वही कोशिश मदनी कर रहे हैं, उनके बयान का विरोध होगा और किसी भी प्रतिक्रिया पर मुस्लिमों के कट्टरपंथी तबके को मौका मिल जाएगा कि वो सड़कों पर आ जाए।

एक मजहबी नेता का काम होता है लोगों को जोड़ना, ना कि समाज में दरार डालना। लोकतंत्र में हम न्याय प्रणाली, संविधान और धर्म से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछ सकते है और यह सभी का हक है। लेकिन अगर वास्तव में सवाल हैं तो वो ऐसे होने चाहिए जो समाधान ढूँढें, ना कि सांप्रदायिक तनाव को और युवाओं को भड़काने का काम करें।

मदनी की बातों को सुने तो लगता है कि वो समाज को किसी भी तरह के समाधान के बजाय टकराव की और ले जाना चाहते हैं। उनकी भाषा से ऐसा लगता है कि जैसे मुस्लिम समाज हर तरफ से खतरे में है और बचने का रास्ता सिर्फ ‘जिहाद’ ही है। इस तरह का सोच धीरे-धीरे समाज में दूरी और नफरत बढ़ाता है। मुस्लिम समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि मदनी जैसे लोग असल में आग में घी डाल रहे हैं जो इसमें उनके समाज के लोगों के झुलसने का ही खतरा है।

हलाल सर्टिफिकेट के नाम पर हिंदू एवं अन्य समुदाय के व्यापारियों का बहिष्कार, आतंकियों को फंडिंग की आशंका: FIR में साजिशों का खुलासा

                                                                                                                      साभार- दैनिक जागरण
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 17 नवम्बर 2023 को हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द सहित कुछ अन्य संस्थाओं एवं लोगों पर FIR दर्ज हुई थी। इस FIR में हलाल सर्टिफिकेट को हिन्दू आस्था पर आघात बताते हुए इससे जुड़े लोगों पर कार्रवाई करने की माँग की गई थी। केस दर्ज होने के बाद उत्तर प्रदेश शासन ने अगले दिन 18 नवम्बर को हलाल के बजाय FSSAI (Food Safety and Standards Authority of India) प्रमाण पत्र को मानकों के लिए उचित बताया।

ऑपइंडिया के पास मौजूद इस केस में दर्ज हुई FIR में हलाल इंडिया के चेन्नई और मुंबई कार्यालय के साथ जमीयत उलेमा ए हिन्द के दिल्ली और मुंबई ऑफिस को नामजद किया है। इसके अलावा हलाल सर्टिफिकेट को बढ़ावा देने वाली कुछ अज्ञात कम्पनियाँ, राष्ट्र विरोधी साजिश रचने वाले कुछ अन्य अज्ञात लोग, आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे अज्ञात समूह और जनआस्था से खिलवाड़ करने के साथ दंगे करवाने की साजिश रच रहे कुछ अज्ञात लोगों को नामजद किया गया है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है।

शिकायतकर्ता शैलेन्द्र कुमार ने अपनी शिकायत में बताया है कि हलाल सर्टिफिकेट मजहब के नाम पर मजहब विशेष के लोगों द्वारा जारी किया जा रहा है। इस साजिश में एक मजहब विशेष के लोगों के सामानों की बिक्री बढ़ाने के लिए हलाल के नाम पर छल किया जा रहा है। FIR में कहा गया है कि जिन कंपनियों ने इनसे हलाल सर्टिफिकेट नहीं लिया है, उनकी बिक्री घटाने के लिए आपराधिक कृत्य किया जा रहा है।

शिकायत में हलाल सर्टिफिकेट को मुस्लिमों की अपनी तरफ आकर्षित करने का खास तरीका बताया गया है। FIR में आरोप है कि हलाल सर्टिफिकेट देने वाली कंपनियों ने सरकार के नाम का भी फर्जी कागजातों से दुरूपयोग किया है। हालात सर्टिफिकेट देने वाली कंपनियों के कागजातों में भी गड़बड़ी होने की बात कही गई है। इसके साथ ही गया है कि इसके जरिए समाज में विभाजन पैदा करने की कोशिश की जा रही है।

शिकायतकर्ता ने सभी आरोपितों पर समाज में विद्वेष फैलाने, आपराधिक कृत्य कर के करोड़ों रुपए कमाने, राष्ट्र विरोधी साजिश रचने के साथ हलाल सर्टिफिकेट से मिल रहे पैसे से आतंकियों को फंडिंग होने की आशंका जताई गई है। FIR में कहा गया है कि इससे होने वाले अनुचित लाभ को देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा रहा है।

अवलोकन करें:-

उत्तर प्रदेश : अब जेल भेजवा देगा ‘हलाल’: निर्माण, भंडारण, वितरण, खरीद-बेच सब पर योगी सरकार ने लगा द

FIR में कहा गया है कि तेल, साबुन, टूथपेस्ट, शहद आदि तक के लिए हलाल सर्टिफिकेट दिए जा रहे हैं, जबकि इनके लिए हलाल सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि ये शाकाहारी वस्तुएँ हैं। शाकाहारी वस्तुओं के लिए हलाल सर्टिफिकेट की आवश्कयता नहीं होती। इसमें आगे कहा गया है कि एक विशेष वर्ग द्वारा प्रचार किया जा रहा है कि उन वस्तुओं का इस्तेमाल ना करो, जिन्हें हलाल सर्टिफिकेट नहीं दिया गया हो। इससे दूसरे वर्ग के व्यापारियों के हितों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

2024 आने वाला है! नफरत फैलाकर समाज को बांटने का षडयंत्र ; हिन्दू और भारत विरोधी जमीयत के इतिहास पर एक नज़र

फरवरी 12 को दिल्ली के रामलीला मैदान में ही पुरुषोत्तम श्री राम, कृष्ण और देवों के देव महादेव को नकार ॐ को अल्लाह बताने वाले अरशद मदनी टीवी पर चर्चाओं का दौर चल रहा है, लेकिन इन चर्चाओं में फरवरी 13 एक इस्लाम विद्वान ने मदनी के बचाव में खड़े सारे मौलानाओं को मदनी द्वारा इस्लाम की नई परिभाषा लिखने पर ऑंखें खोलने को कहा। उस विद्वान ने मदनी का बचाव कर रहे मौलानाओं से प्रश्न किया कि 'अगर ॐ ही अल्लाह है, फिर नमाज और अज़ान में ॐ क्यों नहीं बोला जाता? है किसी के पास जवाब? मदनी ने कौन-सा इस्लाम पढ़ा है?' आदि आदि। दूसरे, मदनी द्वारा लिखे हुए भाषण को पढ़ने ने ही जिस संदेह को जन्म दिया था, उसका भी निवारण इन चर्चाओं में उस समय हो गया, जब पैनल में मौजूद एक मेहमान ने इस ठोंगी सदभावना अधिवेशन में उपस्थित मोदी विरोधियों नेताओं को दिखा दिया। जो इस बात को साबित कर रहा है कि 2024 चुनाव में मुस्लिम वोट हथियाने के लिए किये गए  षड्यंत्र का भांडा ही फूट गया।  
भारत को बांटने और कमजोर करने की साजिशें रचने वाले अंतर्राष्ट्रीय गिरोह अभी थमने वाले नहीं हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव तक उनके षडयंत्र सामने आते रहेंगे और भारत में मौजूद देशविरोधी ताकतें अपने निजी लाभ के लिए और समाज को बांटने के लिए उसे उछालते रहेंगे। बीबीसी डॉक्यूमेंट्री, हिंडनबर्ग रिपोर्ट, रामचरितमानस के प्रति नफरत और अब सनातन धर्म को इस्लाम से जोड़ने की साजिश और सनातन के प्रति जहरीले बयान। दारुल उलूम देवबंद के प्रमुख और जमीयत के धर्मगुरु मौलाना अरशद मदनी ने नफरती बयान दिया है। मदनी ने कहा कि ओम और अल्लाह एक ही हैं। उसने कहा- जब धरती पर कोई नहीं था, तब मनु किसे पूजते थे? इतना ही नहीं, उन्होंने आदम को ही हिंदू और मुसलमान का पूर्वज बता दिया। यह भारत को कमजोर करने का और बांटने का नया षडयंत्र है।

दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार को जमीयत उलेमा-ए-हिंद का अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में सभी धर्मों के गुरु और संत महात्मा इकट्ठा हुए। इसी दौरान उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना सैयद अरशद मदनी ने विवादित बयान दिया। सवाल उठ रहा है कि जिस मंच से एक दिन पहले ही मजबही दुश्मनी भुलाकर गले लगने की अपील की गई थी, उसी मंच से इस तरह के विवादास्पद बयान क्यों दिया गया। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह किसी आका के निर्देश पर दिया गया बयान है।

लोकेश मुनि ने दिया करारा जवाब, कहा- मदनी ने कार्यक्रम का लगा दिया पलीता

भरे मंच से लोकेश मुनि ने कहा, “जैन धर्म के 24वें तीर्थंतर भगवान महावीर हुए। उससे पहले भगवान पारस 23वें रहे। पहले भगवान ऋषभ थे। नके पुत्र भरत थे। जिनके आधार पर ही इस देश का नाम भारत पड़ा है। आप इसे मिटा नहीं सकते हैं। आपने जो बात कही है। मैं सहमत नहीं हूं। मेरे सारे सर्वधर्म के लोग कोई इससे सहमत नहीं हैं। हम केवल सहमत हैं। आपस में मिल जुलकर रहें, प्यार से रहें… इसके अलावा ये जो कहानी अल्लाह.. मनु और उसकी औलाद ये सब फालतू की बाते हैं। सारा पलीता लगा दिया।” एकता के सद्भावना के सम्मेलन में यह कहकर वो मंच छोड़कर चले गए।

लोकेश मुनि ने मदनी को शास्त्रार्थ की चुनौती देते हुए कहा- अल्लाह, मनु ये वो.. उससे चार गुना कहानी मैं सुना सकता हूं। मदनी साहब आप मेरे पितातुल्य है। मैं आपको चुनौती देता हूं। आप दिल्ली आईये.. या आप मुझे सहारनपुर बुला लीजिए। मैं सहारनपुर आऊंगा।” इसके बाद लोकेश मुनि ने कहा कि हमने सभी ने प्रेम और सद्भाव की बातें की लेकिन मदनी साहब का जो वक्तव्य आया वह बिल्कुल अलग रहा। उन्होंने अपनी ही कोई कहानी कह दी। हम सभी सर्वसम्मति से मदनी जी की बातों का विरोध करते हैं।
ॐ और अल्लाह एक 
दिल्ली में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दो दिन के अधिवेशन में रविवार को दारुल उलूम देवबंद के प्रमुख और जमीयत के धर्मगुरु मौलाना अरशद मदनी के बयान से विवाद खड़ा हो गया है। मदनी ने कहा- ओम और अल्लाह एक ही हैं। जो लोग घर वापसी के बात करते हैं, उनको पता होना चाहिए कि हम तो अपने घर में ही बैठे हैं। जो सबसे पहला इंसान था वो किसकी इबादत करता था। मदनी ने कहा, “मैंने धर्म गुरु से पूछा जब कोई नहीं था, न श्री राम, न ब्रह्म, तब मनु किसे पूजते थे? कुछ लोग बताते हैं कि वे ओम को पूजते थे तब मैंने कहा कि इन्हें ही तो हम अल्लाह, आप ईश्वर, फारसी बोलने वाले खुदा और अंग्रेजी बोलने वाले गॉड कहते हैं।”
बड़ी चालाकी से हिंदू और मुसलमानों के पूर्वजों को एक बता दिया
मदनी ने कहा- उस वक्त और कोई नहीं था- वो सिर्फ अल्लाह को मानते थे। हमें (मुसलमान) जो बोलते हैं कि अपने पूर्वज की तरफ चले जाओ। इस दुनिया में सबसे पुराना आदमी जन्नत से उतरा, वो हमारे पूर्वज हैं और वो हिंदुस्तान की सरजमीन पर ही उतरे थे। अरशद ने कहा- हमने जमीयत उलेमा ए हिंद में अपनी अपनी बात रखी है कि मुसलमान लड़कियों के लिए अलग स्कूल होना चाहिए, जिसमें उनको इस्लाम की भी पढ़ाई करवाई जाए, ताकि उनको पता हो कि वो मुसलमान हैं।
मदनी ने कहा- अल्लाह ने आदम को आसमान से भारत की धरती पर उतारा
अरशद मदनी ने कहा- ”अल्लाह ने सबसे आखिरी नबी को अरब की सरजमी में उतारा. बिल्कुल उसी तरह हजरत आदम को.. जो नबी थे, उनको भारत की धरती के अंदर उतारा। अगर वो चाहते तो आदम को अफ्रीका, अरब, रूस के अंदर उतार देते। वो भी जानते हैं। हम भी जानते हैं कि आदम को उतारने के लिए भारत की धरती को चुना। आदम सबसे पहले आदमी हैं जिन्हें अल्लाह ने आसमान से उतारा।
कौन हैं जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष अरशद मदनी
मौलाना अरशद मदनी, जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष हैं। 8 फरवरी 2006 को अरशद मदनी को उनके बड़े भाई मौलाना असद मदनी के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिन्द का अध्यक्ष चुना गया था। 2012 में वह मुस्लिम वर्ल्ड लीग, मक्का, केएसए के सदस्य चुने गए। इसके साथ ही मदनी सहारनपुर में दारुल-उलूम देवबंद में हदीस के प्रोफेसर हैं और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य हैं।
जमीयत-ए-उलमा-ए-हिन्द भारत का सबसे धनी इस्लामिक संगठन
जमीयत-ए-उलमा-ए-हिन्द भारत के सबसे धनी इस्लामिक संगठन के रूप में काम करता है जिसे हलाल सर्टिफिकेट, मस्जिदों में इमामों की तैनाती तथा चंदे के रूप में भारी भरकम धन मिलता है। दिल्ली के आईटीओ चौराहे पर इनका विशाल कार्यालय है। देशभर की अधिकांश सुन्नी मस्जिदों में इन्हीं के द्वारा इमाम नियुक्त किये जाते हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द 1919 के खिलाफत मूवमेन्ट से पैदा हुआ इस्लामिक संगठन है। इसका बुनियादी काम मुसलमानों को सच्चा इस्लाम पहुंचाकर उनको ताकतवर बनाना है।
जिस चालाकी से मदनी ने हिंदू और मुसलमानों के पूर्वजों को एक बताया है वह कोई नई बात नहीं है। इस पर एक एजेंडे के तहत दशकों से काम किया जा रहा है-
मदनी ने गढ़ी इस्लाम की नयी परिभाषा
मौलाना अरशद मदनी ने जो बोला है वह इस्लाम की नयी परिभाषा करने जैसा है। मदनी ने प्रमुख रूप से तीन बाते कहीं हैं। पहला, इस्लाम भारत का सबसे प्राचीन मजहब है, दूसरा, मुसलमान कहीं बाहर से नहीं आये बल्कि यहीं के हैं, और तीसरा कि इस्लाम को बाहर का मजहब कहना बंद होना चाहिए। ये तीनों ही बातें इस्लाम की नयी परिभाषा करने जैसी हैं जिसे सुनकर हो सकता है कि कुछ लोगों को हंसी भी आये लेकिन जो इस्लाम को समझते हैं वो मदनी की बातों की गंभीरता को भी जरूर समझेंगे।
इस्लाम की शुरुआत को लेकर प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध नहीं
वनइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लाम की शुरुआत को लेकर ऐतिहासिक रूप से कोई तथ्य उपलब्ध नहीं है। जो कुछ है वह इस्लामिक सोर्स से ही समझा जा सकता है। इस्लाम का सबसे पहला सोर्स है इब्ने हिशाम द्वारा आठवीं सदी में लिखी गयी ‘सीरत उल नबवी।’ ऐसा समझा जाता है कि इब्न ए हिशाम ने सीरत उल नबवी लिखने के लिए इब्न ए इशाक की अल सीरत अल नबवी का सहारा लिया था। इब्न ए इशाक सातवीं सदी के बताये जाते हैं। फिर भी इब्न इशाक की बजाय इब्न ए हिशाम को ही इस्लाम का प्रामाणिक इतिहासकार माना जाता है। उसी के समकालीन तबरी और इब्न ए कतीर भी इस्लाम के इतिहासकार के रूप में माने जाते हैं।
सातवीं सदी में अरब में पैगंबर आये जिन्होंने नया दीन शुरु किया
इब्न ए इशाक, तबरी और कतीर ने आठवीं सदी में जो लिखा वही इस्लाम की बुनियाद बन गया। इसी के आधार पर हदीसें लिखी गयीं। यह सब अब्बासियों के शासनकाल के दौरान किया गया या कराया गया। इस्लाम के इन प्रामाणित स्रोतों में जो कहा गया है उसके मुताबिक सातवीं सदी में अरब में एक पैगंबर आये जिन्होंने एक नया दीन शुरु किया। उनके ऊपर आसमान से बही उतरती थी जो मुसलमानों के लिए कुरान के रूप में आज मौजूद है।
चालाकी से इस्लाम को यहूदियों के अब्राहम से जोड़ दिया
ये सब बातें कितनी सच हैं और कितनी झूठ इसको प्रमाणित करने का कोई जरिया मानव जाति के सामने नहीं हैं। मुसलमान इसी को सच मानते हैं और इसी के मुताबिक जीवन जीते हैं। लेकिन अब्बासियों के समय तारीख, तफ्सीर और हदीसों (इतिहास, विवरण, और प्रमाण) के जरिए जो इस्लाम गढ़ा गया उसमें बहुत चालाकी से उसे यहूदियों के अब्राहम (इब्राहिम) से जोड़ दिया गया। अपने इस नये सेक्ट को प्रामाणिक बनाने के लिए अब्बासियों ने इसे मोजेज (मूसा) और जीसस (ईसा) की निरंतरता वाला मजहब बता दिया। जबकि इस नये मजहब का न तो अब्राहम से दूर दूर तक कोई लेना देना था और न ही मोजेज या जीसस से।
इस्लाम के पास कोई दार्शनिक आधार नहीं
मुसलमानों द्वारा इस्लाम को यहूदियों या ईसाइयों जैसा प्राचीन मजहब साबित करने के लिए यह चाल खेली गयी और कामयाब रही। इस्लाम को जो लोग प्रसारित कर रहे थे, उनके सामने सबसे बड़ा संकट ये था कि इस्लाम के पास कोई दार्शनिक आधार नहीं था। उनके पास अपनी कोई फिलॉसफी नहीं थी इसलिए जहां से जो सुना उसे इस्लाम में मिला लिया। बाइबिल और तोरा के किस्से, गिंजा रब्बा की कहानियां सब कुरान और इस्लाम का हिस्सा बना ली गयीं। और कहा गया कि ये कुरान उनके अपने अल्लाह का कलाम है। यहूदी इतनी बड़ी संख्या में थे नहीं कि वो इसका विरोध कर पाते और कहते कि उनके अब्राहम या मोजेज को मोमिन अपना क्यों बता रहे हैं। गिंजा रब्बा के मानने वाले भी इतने कम थे कि उनके विरोध करने का कोई सवाल ही नहीं था। लेकिन जो लोग इस्लाम को एक दीन के रूप में गढ रहे थे उन्होंने इधर उधर से जुटाई गयी जानकारियों, स्थानीय परंपराओं और कहानियों को इस्लाम बनाकर उसे मुकम्मल घोषित कर दिया।
भारत में भी यह चाल चली गई जब कृष्ण को पैगंबर बताया गया
भारत में भी यह चाल तब दिखी जब आर्य समाज को चुनौती देने तथा हिन्दुओं को मूर्ख बनाने के लिए मिर्जा गुलाम अहमद कादियानी ने कहना शुरु किया कि भारत में पैदा होने वाले कृष्ण भी एक पैगंबर थे और वह खुद इस्लाम का एक पैगंबर है। हिन्दुओं को तो समझ ही नहीं आया कि कादियानी क्या कह रहा है लेकिन मुसलमानों ने उसको गैर मुस्लिम घोषित कर दिया। मुसलमान अपने पैगंबर मोहम्मद को पहला और आखिरी पैगंबर मानते हैं। उन्हीं ने इस्लाम को शुरु किया और उन्हीं के दौर में इस्लाम मुकम्मल हो गया। इसके बाद अब इस्लाम में कोई पैगंबर नहीं आयेगा।
कादियानी ने इस्लाम को सनातन धर्म बताया था
कादियानी की कई झूठी कहानियां इस्लाम में फैल गयी। यह गुलाम अहमद कादियानी ही था जिसने इस्लाम को सनातन धर्म बताया था और इसी को प्रमाणित करने के लिए राम और कृष्ण को भी भारत में पैदा हुए पैगंबर बताया था। उसने यह काम इस्लाम को सनातन धर्म जितना पुराना दिखाने के लिए किया। कादियानी की उस थ्योरी को सही मानने लगे हैं कि इस्लाम असल सनातन धर्म है लेकिन मोहम्मद उसके आखिरी पैगंबर हैं।
इस्लाम को असली सनातन धर्म बताना षड्यंत्र का हिस्सा
मदनी अगर इस्लाम को असली सनातन धर्म बता रहे हैं तो वह बहुत योजनापूर्ण षड्यंत्र रच रहे हैं। ऐसी ही चाल मुस्लिमों ने यहूदियों के खिलाफ चली थी और अपने आप को अब्राहमिक रिलीजन का हिस्सा घोषित कर दिया था। अब वही चाल भारत के सबसे कट्टर इस्लामिक संगठन की ओर से सनातन धर्म के बारे में चली जा रही है ताकि वो भारत के जन और जमीन पर दावा कर सकें। हो सकता है कुछ मूर्ख इस बयान को भाईचारा वाला बयान भी मान लें लेकिन इस्लाम की ताकत तो हमेशा से ही ऐसे सीधे सादे मूर्ख ही रहे हैं जिन्हें खाते पचाते हुए वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी बन गया है।
जमीयत-ए-उलमा-ए-हिन्द की भारत में उत्पत्ति खिलाफत मूवमेन्ट से हुई। यह क्या है, क्यों शुरू हुआ, भारत से इसका क्या संबंध है, इस पर एक नजर-
खिलाफत मूवमेन्ट क्यों शुरू हुआ, भारत से इसका क्या संबंध?
1919-1922 भारत में मुसलमानों द्वारा राजनीतिक-धार्मिक आन्दोलन शुरू किया गया था। इस आंदोलन का नाम था ‘ख़िलाफ़त आन्दोलन’। इस आन्दोलन का उद्देश्य (सुन्नी) इस्लाम के मुखिया माने जाने वाले तुर्की के ख़लीफ़ा के पद की पुन:स्थापना कराने के लिये अंग्रेज़ों पर दबाव बनाना था। यानी खिलाफत मूवमेन्ट का भारत से कोई संबंध नहीं था।
विरोध नहीं, विचारधारा को खिलाफ़त कहते हैं
मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद इस्लाम के प्रमुख को खलीफ़ा कहते थे। इस विचारधारा को खिलाफ़त कहा जाता है। प्रथम चार खलीफाओं को राशिदुन कहते हैं। उम्मयद, अब्बासी और फ़ातिमी खलीफा क्रमशः दमिश्क, बग़दाद और काहिरा से शासन करते थे। इसके बाद उस्मानी (ऑटोमन तुर्क) खिलाफ़त आया। मुहम्मद साहब के नेतृत्व में अरब बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उन्होंने एक बड़े साम्राज्य पर अधिकार कर लिया था जो इससे पहले अरबी इतिहास में शायद ही किसी ने किया हो। खलीफ़ा बनने का अर्थ था – इतने बड़े साम्राज्य का मालिक और खिलाफ़त यानी इस विशाल साम्राज्य की विचारधारा।
खलीफा का काम था इस्लाम का निज़ाम कायम करना
खलीफा का काम होता है युद्ध कर के पूरे विश्व पर इस्लाम का निज़ाम कायम करना। जो कि कश्मीर में बुरहान वानी करना चाहता था। यानी इस्लाम की ऐसी हुकूमत कायम करना जिसमें इस्लामिक यानी शरीया कानून चले और जिसमे इस्लाम के अलावा किसी और धर्म की इजाज़त नहीं होती है, जितने हिस्से या राज्य पर खलीफा राज करता है उसे अरबी भाषा में खिलाफा कहते हैं, खलीफा यानी इस्लामिक सुल्तान और खिलाफा यानी इस्लामिक राज्य।
भारत के मुसलमानों में आजादी की जगह तुर्की में इस्लामिक शासन को बचाने की चिंता थी
1919-22 के दौरान तुर्की में ओटोमन वंश के आखिरी सुन्नी खलीफा अब्दुल हमीद-2 का खिलाफा यानी शासन चल रहा था जो कि जल्दी ही धराशाई होने वाला था, इस आखिरी इस्लामिक खिलाफा (शासन) को बचाने के लिए अब्दुल हमीद-2 ने जिहाद का आवाहन किया ताकि विश्व के मुसलमान एक हो कर इस आखिरी खिलाफा यानी इस्लामिक शासन को बचाने आगे आएं, पूरे विश्व में इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई सिवाए भारत के। भारत के अलावा एशिया का कोई भी दूसरा देश इस मुहिम का हिस्सा नही बना, लेकिन भारत के कुछ मुट्ठी भर मुसलमान इस मुहिम से जुड़ गए और लाखों किलोमीटर दूर सात समंदर पार तुर्की के खिलाफा यानी इस्लामिक शासन को बचाने और अंग्रेज़ों पर दबाव बनाने निकल पड़े, जबकि इस समय भारत खुद गुलाम था और अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, लेकिन अंतः 1922 में तुर्की से सुलतान के इस्लामिक शासन को उखाड़ फेंका गया और वहां सेक्युलर लोकतंत्र राज्य की स्थापना हुई और कट्टर मुसलमानों का पूरे विश्व पर राज करने का सपना टूट गया, इसी सपने को संजोए आजकल ISIS काम कर रहा है।
कांग्रेस ने चतुराई से इसका नाम खिलाफत आंदोलन रख दिया
भारत के चंद मुसलमानों ने अंग्रेज़ी हुकूमत पर दबाव बनाने के लिए बाकायदा एक आंदोलन खड़ा किया जिसका नाम था खिलाफा आंदोलन (Caliphate movement) अब क्योंकि अंग्रेज़ी में लिखे जाने पर इसका हिन्दी उच्चारण खलिफत होता है (अरबी में caliphate को khilafa=खिलाफा लिखते है) तो कांग्रेस ने बड़ी ही चतुराई से इसका नाम खिलाफत आंदोलन रख दिया ताकि देश की जनता को मूर्ख बनाया जा सके और लोगों को लगे कि यह खिलाफत आंदोलन अंग्रेज़ों के खिलाफ है, जबकि इसका असल मकसद यानी पूर्णतः धार्मिक था, इसका भारत की आज़ादी या उसके आंदोलन से कोई लेना देना नहीं थ। कुछ समझ में आया? कैसे शब्दों की बाज़ीगरी से जनता को मूर्ख बनाया जा रहा था, कैसे खलिफत को खिलाफत बताया जा रहा था, (ठीक वैसे ही जैसे Feroze Khan Ghandi (घांदी) को Feroze Gandhi (फ़िरोज़ गांधी) बना दिया गया)।
हेडगेवार ने इस आंदोलन का जमकर विरोध किया था
उस समय गांधी नेहरू की इस चाल को ज्यादा लोग समझ नहीं सके, लेकिन इन सब के बीच कांग्रेस में एक पढ़ा लिखा शख्स मौजूद था जिसका नाम था डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, इस शख्स ने इस आंदोलन का जम कर विरोध किया क्योंकि खिलाफा सिर्फ तुर्की तक सीमित नहीं रहना था, इसका उद्देश्य तो पूरे विश्व पर इस्लाम की हुकूमत कायम करना था जिसमें गज़वा-ए-हिन्द यानी भारत भी शामिल था। डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस के गांधी और नेहरू को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वे नहीं माने, अंततः डॉ हेडगेवार ने कांग्रेस के इस खिलाफत आंदोलन का विरोध किया और कांग्रेस छोड़ दी। तो अब समझ लीजिए कि कांग्रेसी जो कहते हैं कि RSS ने आज़ादी के आंदोलन का विरोध किया था, तो वो असल में किस आंदोलन का विरोध था?
हेडगेवार इसी मुद्दे पर 1920 में कांग्रेस छोड़ दी
अगर आप डॉ हेडगेवार की जगह होते तो क्या करते? क्या आप भारत को गज़वा-ए-हिन्द यानी इस्लामिक देश बनते देखते? या फिर उन्हीं की तरह इसका विरोध करते? 1919 में खिलाफत आंदोलन शुरू हुआ था और 1920 में डॉ हेगड़ेवार ने कांग्रेस छोड़ दी और सभी को इस आंदोलन के बारे में जागरूक किया कि इस आंदोलन का भारत की आज़ादी से कोई लेना देना नहीं है और यह एक इस्लामिक आंदोलन है, जिसका नतीजा यह हुआ कि यह आंदोलन बुरी तरह फ्लॉप साबित हुआ।
इस्लामिक हुकूमत धराशायी होने से बौखलाए मुसलमानों ने केरल के मालाबार में हिन्दुओं पर हमले किए, मारकाट की
1922 में आखिरी इस्लामिक हुकूमत धराशायी हो गयी, मुस्लिम नेता इस से बौखला गए और मन ही मन हिन्दुओं को अपना दुश्मन मानने लगे और इसका बदला उन्होंने 1922-23 में केरल के मालाबार में हिन्दुओं पर हमला कर के लिया और असहाय अनभिज्ञ हिन्दुओ को बेरहमी से काटा गया, हिन्दू लड़कियों की इज़्ज़त लूटी गई, जबकि इस आंदोलन का भारत या उसके पड़ोसी देशों तक से कोई लेना देना नहीं था।
1923 के दंगों में गांधी ने हिन्दुओं को ही दोषी ठहराते हुए कायर और बुजदिल कहा
1923 के दंगों में गांधी ने हिन्दुओ को दोषी ठहराते हुए हिन्दुओ को कायर और बुजदिल कहा था। गांधी ने कहा कि हिन्दू अपनी कायरता के लिए मुसलमानों को दोषी ठहरा रहे हैं, अगर हिन्दू अपने जान माल की सुरक्षा नहीं कर सकता तो इसमें मुसलमानों का क्या दोष? हिन्दुओं की औरतों की इज़्ज़त लूटी जाती है तो इसमें हिन्दू दोषी हैं, कहां थे उसके रिश्तेदार जब उस लड़की की इज़्ज़त लूटी जा रही थी? कुलमिला कर गांधी ने सारा दोष दंगा प्रभावित हिन्दुओ पर मढ़ दिया और कहा कि उन्हें हिन्दू होने पर शर्म आती है, जब हिन्दू कायर होगा तो मुसलमान उस पर अत्याचार करेगा ही।
…तब हेडगेवार ने 1925 में RSS की स्थापना की
डॉ हेडगेवार को अब समझ आ चुका था कि सत्ता के भूखे भेड़िये भारत की जनता की बलि देने से नहीं चूकेंगे, इसलिए उन्होंने हिन्दुओं की रक्षा और उनको एकजुट करने के उद्देश्य से तत्काल एक नया संगठन बनाने का काम शुरू कर दिया और अंततः 1925 में RSS की स्थापना हुई। आज अगर आप होली और दीवाली मानते हैं, आज अगर आप हिन्दू हैं तो सिर्फ उसी खिलाफत आंदोलन के विरोध और RSS की स्थापना की वजह से वरना जाने कब का गज़वा-ए-हिन्द बन चुका होता।

मौलाना अरशद मदनी जब ॐ और अल्लाह एक, फिर अज़ान और नमाज में ॐ क्यों नहीं?

चलो देर आए दुरुस्त आए, अप्रयत्क्ष रूप में इस्लामिक संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद और उसके चीफ मौलाना अरशद महमूद मदनी ने मान गए कि ॐ और अल्लाह एक हैं। अब हिन्दू संगठन यह भी प्रश्न कर रहे है कि जब ॐ और अल्लाह एक है फिर अज़ान और नमाज़ में ॐ का जाप कब? अल्पज्ञानी मदनी को शायद यह नहीं मालूम कि ॐ शब्द में समस्त देवी-देवताओं का समावेश है। कई बार अपने लेखों में 'नमाज', 'अल्लाह' और 786 का हिन्दू धर्म से सम्बन्ध के बारे में लिख चूका हूँ। लेकिन अब मदनी ने तो ॐ और अल्लाह की परिभाषा बता दी। मदनी ने जो जहर उगला है,लोकेश मुनि की तर्ज पर समस्त हिन्दुओं, हिन्दू संगठनों को गंभीरता से लेकर जवाब देना होगा। जमीयत और मदनी के विरुद्ध बिगुल बजाकर स्पष्ट कहा जाए कि "अगर तुम्हारे कहने में सच्चाई है, फिर नमाज और अज़ान की ॐ का उच्चारण करवाओ या जहर फ़ैलाने पर माफ़ी मांगो। महन्त धीरेन्द्र शास्त्री ठीक कहते हैं कि 'हद में रहोगे, ठीक है।'  
मदनी सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहे इस वीडियो को देख, अपनी अवाम को सच्चाई बताओ :
इस जीती जागती सच्चाई पर ध्यान आज तक किसी का क्यों नही जा पाया। इससे अधिक सनातन होने का प्रमाण क्या चाहिए? यह अत्यन्त ही दुर्लभ जानकारी है। जिसको लुप्त करने का प्रयास करने वाले सेक्युलर लोगों पर इतिहास की इस सच्चाई का बडा तमाचा है।  इस छोटे से विडियो का किसी के पास उत्तर नहीं मिल सकता। विडिओ बनाने वाले शोध करता को नमन करते हैं और निवेदन करते हैं ऐसी और छुपी हुई सच्चाईयों को ढूंढें और सनातन विरोधी तत्वों की जुबान पर ताला लगाएं।

इस्लामिक संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद और उसके चीफ मौलाना अरशद महमूद मदनी लगातार चर्चा में बने हुए हैं। पहले भारत को मुस्लिमों की मातृभूमि बताने के बाद अब मौलाना मदनी ने मनु, आदम तथा ॐ और अल्लाह को एक बता दिया है। इसको लेकर जैन आचार्य मुनि लोकेश ने मदनी को लताड़ लेते हुए मंच छोड़ दिया था। हालाँकि अब आचार्य चिदानंद ने मदनी के बयान का समर्थन किया है। वहीं चक्रपाणि महाराज ने मदनी को सनातनी बताया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानंद ने कहा है, “मदनी के बयान में सहमति और असहमति की बात नहीं है। मैंने अपने विचार अपने ढंग से प्रकट किए। उन्होंने अपने विचार अपने ढंग से प्रकट किए हैं। जिसको सुनना होगा वो सुनेगा। मुझे नहीं मालूम लोकेश मुनि जी के मन में क्या था और उन्होंने क्या समझा है। किस रूप में इसे लिया है।” 

आचार्य चिदानंद ने यह भी कहा है, “मैंने मदनी की बात को इस रूप से लिया है कि मैं सब का सम्मान करता हूँ। मेरे लिए सब समान है और मैं सब का सम्मान करता हूँ। यही हमारे देश का संविधान भी है। हालाँकि यदि कोई इस्लाम धर्म को मानता है और उसकी विशेषता बताता है, तो उसको बताना ही चाहिए। यह स्वाभाविक है। वह उसकी विशेषता बताएँगे ही।”

उन्होंने आगे कहा है कि हिंदू धर्म मानने वाला भी हिंदू धर्म की विशेषता बताएगा। लेकिन अपने अपने धर्म की विशेषता को बताते हुए अपने मूल से, अपने मूल्यों से और अपनी जड़ों से अपनी संस्कृति तथा संस्कारों से जुड़े रहना चाहिए। यही आज का संदेश है।

वहीं मदनी के बयान को लेकर अब इस पर अखिल भारत हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चक्रपाणि महाराज ने भी पलटवार किया है। चक्रपाणि महाराज ने कहा है कि मौलाना मदनी ने कहा है वह मनु को मानते हैं तो मनु तो सनातन धर्मी थे। उन्हें भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर बचाया था। इसलिए मौलाना मदनी भी सनातनी हिंदू हुए। अब उन्हें राष्ट्रभक्ति दिखाने, वंदे मातरम बोलने और भारत माता की जय बोलने की आवश्यकता है। क्योंकि हिंदू सनातन धर्मी राष्ट्रभक्त होते हैं।

मनु, आदम तथा ॐ और अल्लाह को बताया था एक

दरअसल, मौलाना अरशद मदनी ने कहा, “मैंने धर्म गुरुओं से पूछा कि जब कोई नहीं था। न श्रीराम थे, न ब्रह्मा थे और न शिव थे, जब कोई नहीं था तो मनु पूजते किसको थे। कोई कहता है कि शिव को पूजते थे। बहुत कम लोग ये बताते हैं कि मनु ॐ को पूजते थे। ॐ कौन है? बहुत से लोगों ने कहा कि उनका कोई रूप-रंग नहीं है। वो दुनिया में हर जगह हैं। अरे बाबा इन्हीं को तो हम अल्लाह कहते हैं। इन्हें ही आप ईश्वर कहते हैं।”
मौलाना ने आगे कहा है, “इन्हें ही तो हम अल्लाह, आप ईश्वर, फारसी बोलने वाले खुदा और अंग्रेजी बोलने वाले गॉड कहते हैं। इसका मतलब यह है कि मनु ही आदम थे। वह ॐ यानी अल्लाह को पूजते थे। हजरत आदम जो नबी थे, सबसे पहले उन्हें भारत की धरती के भीतर उतारा। अगर चाहता तो आदम को अफ्रीका, अरब, रूस में उतार देता। वो भी जानते हैं, हम भी जानते हैं कि आदम को दुनिया में उतारने के लिए भारत की धरती को चुना गया।”
यही नहीं मौलाना ने संघ प्रमुख मोहन भागवत की घर वापसी वाले बयान मदनी ने कहा है कि इस्लाम भारत के लिए कोई नया मज़हब नहीं है। बल्कि अल्लाह ने पैगंबर आदम यानी मनु को यहीं उतारा, उनकी पत्नी हव्वा को उतारा, जिन्हें वे (हिंदू) हमवती कहते हैं और वे सारे नबियों, मुसलमानों, हिंदुओं, ईसाइयों के पूर्वज हैं।

मौलाना मदनी को जैनाचार्य लोकेश मुनि ने लगाई लताड़

जैन आचार्य लोकेश मुनि ने मौलाना मदनी को फटकार लगाते हुए कहा है, “मदनी जो कहा है उससे कोई भी सहमत नहीं है। मैं आपसे निवेदन करता हूँ यदि हमें जोड़ने की बात आपको करनी है तो प्यार-मोहब्बत की बात कीजिए। आपने जितनी कहानी सुनाई है ॐ, अल्लाह, मनु, ये वो उससे कहीं अधिक 4 गुना कहानी मैं सुना सकता हूँ। मदनी साहब को मैं शास्त्रार्थ के लिए बुला रहा हूँ। आप दिल्ली आइये या मुझे सहारनुपर बुलाइये।”
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जमीयत के मंच से मौलाना मदनी को लोकेश मुनि ने दिया मुंह तोड़ जवाब ; जमीयत के मंच पर बवाल
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जमीयत के मंच से मौलाना मदनी को लोकेश मुनि ने दिया मुंह तोड़ जवाब ; जमीयत के मंच पर बवाल
उन्होंने मदनी की बातों का खण्डन करते हुए कहा है, “आपने जो बात कही मैं उससे सहमत नहीं हूँ। चारों धर्म के संत या कोई भी अन्य इससे सहमत नहीं है। आप केवल आपस मे मिलजुलकर रहने को लेकर सहमत हैं। ये जो कहानी है ॐ, मनु अल्लाह, उसकी औलाद ये अब फालतू की बातें हैं। आपने सारा पलीता लगा दिया एकता के सद्भावना के सम्मेलन में।”

जमीयत के मंच से मौलाना मदनी को लोकेश मुनि ने दिया मुंह तोड़ जवाब ; जमीयत के मंच पर बवाल

                                     मौलाना अरशद मदनी ने आदम को बताया हिन्दुओं का भी पूर्वज
इस्लामी संगठन ‘जमीयत उलेमा-ए-हिन्द’ के मुखिया मौलाना अरशद महमूद मदनी ने एक बार फिर से हिन्दुओं को लेकर ज़हर उगला है। दिल्ली में संगठन के अधिवेशन में उन्होंने इस बार कुछ ऐसा बोल दिया, कि जैन और हिन्दू धर्मगुरु मंच से नीचे उतर गए। उन्होंने मनु को ‘आदम’ कह दिया और पूछा कि हमारे मजहब में इतना दखल क्यों दिया जा रहा है? उन्होंने कह दिया, “तुम्हारा पूर्वज हिन्दू नहीं था। तुम्हारा पूर्वज मनु, यानी आदम था।”
धर्म-संसद पर छाती पीट सियापा करने वाले कहाँ है? जमीयत की इस मीटिंग ने खुद ही साबित कर दिया कि जहर घोलने के मकसद से की गयी प्रायोजित मीटिंग थी। मंच से सनातन धर्म के विरुद्ध जो जहर घोला गया है, साबित करता है कि ये लोग कितने अधिक अज्ञानी हैं। दूसरे, अब तक सनातन धर्म पर कुठाराघात करने वालों की दुर्गति ही हुई है। इतिहास साक्षी है। पाकिस्तान इसका जीता-जगता उदाहरण है। इन मौलानाओं को इतना भी ज्ञान नहीं कि ॐ में समस्त देवी-देवताओं का वास होता है। इन मौलानाओं की वजह से ट्विटर पर जो प्रश्नों की बाढ़ लग गयी है, वह इनके मजहब के लिए अच्छी नहीं है। लोग पूछ रहे हैं कि 'अगर ॐ ही अल्लाह है, फिर अजान में ॐ क्यों नहीं बोलते।'   

मौलाना मदनी ने कहा, “मैंने धर्मगुरुओं से पूछा जब कोई नहीं था, न श्री राम, न ब्रह्म, तब मनु किसे पूजते थे? कुछ लोग बताते हैं कि वे ॐ को पूजते थे। तब मैंने कहा कि इन्हें ही तो हम अल्लाह, आप ईश्वर, फारसी बोलने वाले खुदा और अंग्रेजी बोलने वाले गॉड कहते हैं।” इस पर जैन धर्मगुरु लोकेश मुनि ने आपत्ति जताई। ये जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के 34वें अधिवेशन का मौका था, जिसमें मौलाना मदनी ने RSS प्रमुख मोहन भागवत की भी आलोचना की।

लोकेश मुनि ने इस दौरान पूछा कि जब कार्यक्रम जोड़ने के नाम पर किया जा रहा है तो इसमें आपत्तिजनक बातें क्यों की जा रही हैं? उन्होंने मोहन भगवत के बयान को ‘जाहिल’ वाला भी करार दिया। उन्होंने ये भी कहा कि पैगंबर मुहम्मद का अपमान मुस्लिमों को मंजूर नहीं है। मौलाना मदनी ने न्यायपालिका पर भी केंद्र सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगाया। उन्होंने यहाँ तक कह डाला कि मनु की पत्नी हव्वा है, जिसे हिन्दू हेमवती कहते हैं।

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जमीयत प्रमुख मदनी का विवादित बयान : ‘इस्लाम सबसे पुराना मजहब, भारत मुस्लिमों के पहले पैगंबर की ज

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जमीयत प्रमुख मदनी का विवादित बयान : ‘इस्लाम सबसे पुराना मजहब, भारत मुस्लिमों के पहले पैगंबर की ज

उन्होंने कहा कि हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई – इन सभी के पूर्वक आदम और हव्वा ही थे। इससे पहले भी वो इस सम्मेलन में विवादित बयान दे चुके हैं। उन्होंने कहा था, “भारत हमारा देश है। यह देश जितना नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत का है, उतना ही यह देश महमूद का भी है। न तो महमूद उनसे एक इंच आगे है और न ही वे महमूद से एक इंच आगे हैं। भारत खुदा के सबसे पहले पैगंबर अब्दुल बशर सईदाला आलम की जमीन है। भारत मुस्लिमों की पहली मातृभूमि है।”

योगी सरकार के बुलडोजर पर ब्रेक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार


कानपुर दंगे के बाद दंगाइयों के अवैध कब्जों पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा चलाए जा रहे बुलडोजर पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार (16 जून 2022) को अहम फैसला सुनाया। इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन जमीयत-ए-उलेमा हिन्द (Jamiat-Ulema-E-Hind) की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की बुलडोजर कार्रवाई पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

इसके साथ ही कोर्ट ने यूपी सरकार को जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द की याचिका पर अपनी आपत्ति दर्ज करने के लिए तीन दिन का समय दिया है। मामले की सुनवाई जस्टिस AS बोपन्ना और जस्टिस बिक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली पीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वो राज्य सरकार से बुलडोजर एक्शन को रोकने के लिए नहीं कह सकता, लेकिन कोर्ट सरकार को नियम के तहत ऐसा करने को कह सकता है।

ऐसे में कोर्ट ने कोई आदेश जारी नहीं किया, लेकिन अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को जरूर कहा है कि मंगलवार (21 जून) को मामले की अगली सुनवाई होने तक कुछ भी न करें। कोर्ट ने कहा कि वे भी समाज का हिस्सा हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे पैरवी कर रहे थे। उन्होंने दावा किया कि राज्य सरकार की ओर से जो भी विध्वंस किए गए हैं, उनमें सभी तरह की उचित प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। इसके साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से मामले में एफिडेविट फाइल करने का भी समय माँगा था।

क्या है मामला 

भाजपा से निलंबित चल रहीं नूपुर शर्मा के पैगंबर मुहम्मद पर कथित बयान के बाद 3 जून को कानपुर में इस्लामिक कट्टरपंथियों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की। इसके बाद 10 जून को कई जगहों पर कट्टरपंथियों ने जमकर उत्पात मचाया। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने दंगा करने वालों के अवैध ठिकानों को ढहाने का नोटिस जारी किया और बाद में उसे ढहा दिया था।

इन्हीं दंगाइयों के बचाव में उतरते हुए जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने कानपुर दंगे के मुख्य साजिशकर्ता जफर हयात हाशमी का समर्थन किया था। इस्लामिक संगठन ने ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।