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कांग्रेस से हाथ मिलाने से पहले कन्हैया कुमार वामपंथी ऑफिस से AC निकाल कर ले गए

जन सभाओं में अपने आपको ईमानदार और चरित्रवान बताने वाले कितने बड़े चोर और उठाईगिरे हो सकते हैं, यह भारतीय राजनीति में खूब देखने को मिलता रहता है। जो पार्टी का ही माल उड़ाने में लेशमात्र बह संकोच नहीं करता, वह सरकारी खजाने को लूटने में क्यों और किस लिए संकोच करेगा और जनता उसे अपना हितैषी मान फूल बरसाएगी। ये है भावी नेताओं का चरित्र। 
कन्हैया कुमार के कांग्रेस में जाने की अटकलों के बीच उनसे जुड़ी एक और खबर सामने आई है। यह कोई सियासी खबर नहीं है और ना ही उनका कोई बड़ा क्रांतिकारी कदम है। दरअसल, कन्हैया पटना स्थित सीपीआई (CPI) कार्यालय के जिस कमरे में बैठते थे, उससे AC निकालकर ले जाने के कारण सुर्ख़ियों में हैं। सीपीआई के प्रदेश सचिव रामनरेश पांडेय ने लाइव हिंदुस्तान से बातचीत में कन्हैया के CPI कार्यालय से एसी ले जाने की बात कही है। पार्टी के प्रदेश सचिव ने बताया कि कन्हैया ने कहा है कि उन्होंने कहीं और कमरा ले लिया है, इसलिए वह कार्यालय से AC ले जा रहे हैं।

पांडेय ने बताया, ”जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष ने अपने और अपने लोगों के लिए प्रदेश कार्यालय के कमरे में एक एयर कंडीशनर (AC) लगवाया था। उन्होंने एसी ले जाने के लिए ​हमसे अनुमति भी माँगी थी। हमने उनसे कहा कि यह आपकी ही संपत्ति है। आप इसे ले जा सकते हैं।” बताया जा रहा है कि कन्हैया कुमार ने अपने पार्टी प्रमुख से भी यह बात कही है कि उन्होंने कहीं और कमरा ले लिया है। वह एसी लेकर जा रहे हैं, जिसे वहाँ लगाएँगे।

जब से राहुल गाँधी की ‘युवा टीम’ का हिस्सा बन कर कन्हैया कुमार के कांग्रेस में जाने की अटकलें शुरू हुई हैं, तब से उनकी वामपंथी पार्टी CPI की नींद उड़ी हुई है। सभी मीडिया रिपोर्ट्स इसकी पुष्टि कर रहे हैं कि सितम्बर के अंत तक कन्हैया कुमार के अलावा जिग्नेश मेवानी भी कांग्रेस में शामिल होने वाले हैं।

वहीं, CPI के नेताओं और कार्यकर्ताओं के दिल की धड़कन बढ़ाते हुए कन्हैया कुमार ने चुप्पी साधी हुई है। ‘हिंदुस्तान’ की खबर के अनुसार, पिछले सप्ताह दिल्ली स्थित CPI दफ्तर में नेता/कार्यकर्ता कन्हैया कुमार का इंतजार करते रह गए, लेकिन वो नहीं पहुँचे। JNU छात्र संघ के अध्यक्ष रहे कन्हैया कुमार को उस दिन पार्टी ने बयान देने को कहा था। कांग्रेस में जाने को लेकर उन्हें चुप्पी तोड़ने को कहा गया था। 

‘मंदिरों में जाकर देश बर्बाद कर रहे राहुल गाँधी और उनका परिवार’: सीपीआईएम नेता केके शैलजा

केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री शैलजा टीचर ने कॉन्ग्रेस पार्टी पर ‘सॉफ्ट हिन्दुत्व’ के जरिए देश को बर्बाद करने का आरोप लगाया है। केके शैलजा ने इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के समय को याद किया और उसी के आधार पर राहुल गाँधी पर भी आरोप लगाया।

सीपीआईएम नेता शैलजा टीचर ने कहा कि गाँधी मंदिर-मंदिर घूमते हैं, यहाँ तक कि शिव मंदिर भी। जबकि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि भारत एक ‘सेक्युलर’ देश है। शैलजा ने इसे नौटंकी बताया और केरल की प्रदेश कॉन्ग्रेस से यह अपेक्षा की कि वह सेक्युलर केरल बनाए रखने के लिए यह सब नौटंकी नहीं करेगी।

केके शैलजा Covid-19 महामारी के दौरान ‘केरल मॉडल’ को लेकर चर्चा में रहीं। हालाँकि मीडिया ने ही महामारी से निपटने में केरल मॉडल के लिए केके शैलजा को उम्मीद से ज्यादा महत्व दिया लेकिन उनकी खुद की पार्टी ने उन्हें स्वास्थ्य मंत्री के पद से हटा दिया।  

शैलजा के इस बयान के बाद त्रिप्पुनितुरा से कॉन्ग्रेस विधायक के. बाबू ने स्पीकर से यह आदेश जारी करने के लिए कहा कि क्या मंदिर जाना अपराध है? कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी चुनावों के पहले हिन्दू वोट के लिए अक्सर मंदिरों की यात्रा करते रहते हैं। राहुल गाँधी द्वारा अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप से बचने के लिए की जाने वाली मंदिरों की इन यात्राओं को अक्सर चुनावी जानकार नौटंकी कहा करते हैं।

2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान, युवा कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता सार्वजनिक तौर पर गाय के बछड़े को काटते हुए देखे गए थे। बाद में आरोपित ने यह खुलासा किया था कि उसे राज्य कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की अनुमति प्राप्त थी।

CPI मेंबर थे अयोध्या पर झूठ फैलाने वाले ‘इतिहासकार’ डी एन झा : मरने के बाद पार्टी ने खोली पोल

                                       डी एन झा के निधन के बाद उनकी याद में बैठक करते CPI नेता
"सत्यमेव जयते" हमेशा जीतता है, हालाँकि सच्चाई सामने आने में समय जरूर लगता, लेकिन छुपती नहीं। अयोध्या में राममंदिर को लेकर के.के. मोहम्मद, पुरातत्व निदेशक ने सेवानिर्वित उपरांत लिखी इस विषय पर लिखित पुस्तक में स्पष्ट शब्दों में उल्लेख किया था कि वामपंथी इतिहासकारों ने खुदाई में मिले अवशेषों को छुपाकर कोर्ट में झूठ बोलकर इस विवाद का हल नहीं होने दिया। विश्व हिन्दू परिषद एवं वास्तविक इतिहास को बताने वालों को वामपंथियों ने कांग्रेस और दूसरे छद्दम धर्म-निरपेक्षों की मदद से देश को दंगों की आग में झोंकते रहे। 
  

भारत में पाठ्य पुस्तकों के कंटेंट्स से लेकर इतिहास से जुड़े नैरेटिव तैयार करने तक, इन सबमें वामपंथियों का ही रोल रहा है। इतिहासकारों ने वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होकर भारतीय इतिहास से छेड़छाड़ किया और हिन्दू धर्म व हिन्दू राजाओं को नीचा दिखा कर मुगलों को महान बताया। उन्हीं में से एक थे द्विजेन्द्र नारायण (DN) झा, जिन्होंने राम मंदिर को लेकर झूठ फैलाया था। अब पता चला है कि वो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) के सदस्य थे।

CPI की दिल्ली यूनिट के एक ईमेल से भी इसकी पुष्टि होती है। इसका दफ्तर नई दिल्ली स्थित आसफ अली रोड में स्थित है। CPI ने कहा है कि डी एन झा का निधन न सिर्फ इतिहास की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति है, बल्कि इतिहास के ‘वैज्ञानिक लेखन’ के लिए भी बड़ा नुकसान है। पार्टी ने उन्हें अपने-आप में एक संस्था बताते हुए याद दिलाया कि उन्होंने कैसे प्राचीन और मध्ययुगीन भारत पर ढेर सारी पुस्तकें लिखीं।

CPI की बैठक में DN झा को किया गया याद

बकौल CPI, उनके इतिहास लेखन पर कई बार दक्षिणपंथियों ने अपना क्रोध दर्शाया, लेकिन वो अपनी बातों पर अड़े रहे और अपने दिमाग की आवाज़ को बोलने में कभी पीछे नहीं हटे। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के HOD रहे द्विजेन्द्र नारायण झा के बारे में वामपंथी पार्टी ने दावा किया है कि उन्होंने अनुभववाद के आधार पर इतिहास लिखा। साथ ही उन्हें ‘सांप्रदायिक इतिहास के खिलाफ युद्ध लड़ने वाला’ करार दिया।

लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण है कि CPI ने स्वीकार किया है कि उनका जाना पार्टी के लिए भी बड़ी क्षति है क्योंकि बतौर प्रोफेसर रिटायरमेंट से पहले तक वो CPI के सदस्य हुआ करते थे। पार्टी ने लिखा कि CPI दिल्ली उनके परिजनों के साथ खड़ी है। DN झा को श्रद्धांजलि देते हुए CPI ने खुलासा किया कि उनके निधन के बाद पार्टी नेताओं ने उनके मृत शरीर पर पार्टी का झंडा भी डाला। फरवरी 4, 2021 को उनके निधन के बाद कई नेता उनके घर पहुँचे थे।

साथ ही CPI ने डीएन झा के निधन के बाद उन्हें याद करने के लिए ‘मेमोरियल मीटिंग’ भी बुलाई। इस बैठक में कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। इसमें DN झा समेत दो अन्य दिवंगत ‘इतिहासकारों’ को श्रद्धांजलि दी गई। इसमें उन्हें ‘बहुवाद और असहमति’ का चैंपियन बताया गया, जिनका जाना जाति और पंथ विहीन समाज की अवधारणा की लड़ाई में एक शून्य पैदा कर दिया। साथ ही उनके रास्ते पर चलने की बातें भी की गईं।

DN झा के निधन के बाद CPI ने मेमोरियल मीटिंग बुलाई

इतिहासकार डॉ. मीनाक्षी जैन ने भी ऑपइंडिया को बताया था कि 1947 के बाद के भारतीय इतिहास लेखन के “Big Four” – रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब, आरएस शर्मा और डीएन झा ही थे और साथ ही उन्होंने इन सब के प्रपंच की पोल-पट्टी भी खोली थी। उन्होंने बताया कि कैसे ये चारों खुद अदालत में अपने झूठ की लानत-मलालमत से बचने के लिए अपने छात्रों को भेजते रहे, और खुद ‘निष्पक्षता’ का चोला ओढ़ कर अख़बारों के कॉलम से लेकर किताबें तक लिख-लिख कर बिना पाँव के झूठ की पालकी ढोते रहे।

अयोध्या पर डीएन झा व उनके साथी इतिहासकारों द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘प्रख्यात इतिहासकारों’ द्वारा लिखी गई चीजों को सिर्फ़ उनका विचार माना जा सकता है, कोई सबूत नहीं। ‘Historians’ Report To The Indian Nation’ नामक इस रिपोर्ट को अयोध्या में हुए पुरातात्विक उत्खनन से निकले निष्कर्ष का अध्ययन किए बिना ही तैयार किया गया था। इनमें से एकाध को तो बाबर के बारे में भी कुछ नहीं पता था।

 अब आप समझ सकते हैं कि किस तरह खास एजेंडा वाले राजनीतिक दलों के नेता इतिहासकार का चोला पहन कर इस देश का इतिहास लिखते रहे हैं। क्या इनसे उम्मीद की जा सकती है कि ये रामायण और महाभारत पर निष्पक्ष रिसर्च करेंगे? तभी हमें आज तक प्राचीन मंदिरों की आश्चर्यजनक संरचनाओं से दूर रख कर ताजमहल के बारे में पढ़ाया जाता रहा और अशोक व मौर्य जैसे सम्राटों की जगह मुगलों के गुणगान से पाठ्य पुस्तकों को भर दिया गया।

केरल : माकपा के गुंडों ने धमकी दी: मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं को मार दिया जाएगा, शरीर पर हरे झंडे गाड़ दिए जाएँगे

                                     केरल में माकपा कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम लीग को दी धमकी
मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (CPM) ने इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) कैडर को मौत की धमकी जारी करते हुए कन्नूर जिले में एक जुलूस निकाला है। CPM कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम लीग को यह धमकी जनवरी 18, 2021 शाम के समय तब दी। दरअसल, स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान हिंसा के मामले में कुछ CPM कार्यकर्ताओं के एक समूह को गिरफ्तार कर लिया गया था। जेल से रिहाई के समय उनके द्वारा यह नारेबाजी की गई।

मलयालम समाचार पोर्टल ‘मातृभूमि’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के कन्नूर जिले के तेलीपारंबा विधानसभा (Taliparamba assembly) क्षेत्र में मय्यल कस्बे में एक जुलूस निकाला गया, जिसमें CPM कार्यकर्ताओं ने चिल्लाते हुए कहा कि मुस्लिम लीग के कार्यकर्ता मारे जाएँगे।

मार्क्सवादी पार्टी के नेताओं ने यह भी कहा कि ‘CPM एक ऐसा संगठन है जिसने उन लोगों को ख़त्म कर दिया, जिनको पार्टी मारना चाहती थी और फिर से उन लोगों की हत्या करेगी, जिसे पार्टी मारने को कहेगी।’

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी करते हुए धमकी दी और कहा कि मुस्लिम लीग के कार्यकर्ताओं को मार दिया जाएगा और उनके शरीर पर हरे झंडे गाड़ दिए जाएँगे।

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन समेत वामपंथी पार्टी के कई बड़े नेता कन्नूर जिले से ही हैं। इस जिले में कई हत्याएँ हुई हैं, जिसमें सीपीएम हमेशा एक तरफ ही नजर आई है जबकि, पीड़ित या तो मुस्लिम लीग, आरएसएस या फिर कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता थे। इस राजनीतिक रूप से अस्थिर जिले में 300 से अधिक लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।

वहीं, CPM द्वारा मुस्लिम लीग को दी गई धमकियों के बाद केरल पुलिस हाई अलर्ट पर है। मुस्लिम लीग के राष्ट्रीय आयोजन सचिव, ईटी मोहम्मद बशीर ने कहा, “कन्नूर जिले में सीपीएम द्वारा जारी किए गए इन मौत के खतरों पर पुलिस को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। कन्नूर में सीपीएम हमेशा से सभी राजनीतिक हत्याओं में एक पक्ष रही है।”

महिला CPI-M कैडर ने की आत्महत्या: दो माकपा कार्यकर्ताओं पर उत्पीड़न का आरोप

CPI (M)
केरल में 41 वर्षीय महिला CPI-M कैडर ने पार्टी कार्यालय के अंदर फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मृत माकपा कार्यकर्ता का नाम आशा बताया जा रहा है। पुलिस ने मौके पर से आशा द्वारा लिखा गया सुसाइड नोट बरामद किया है। इसमें आशा ने दो सीपीआई (एम) सदस्यों पर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। इसके साथ ही आशा ने सुसाइड नोट में पार्टी को उसकी शिकायत पर ध्यान नहीं देने के लिए दोषी ठहराया है।
आशा के परिवार वालों का कहना है कि वो आशा कार्यकर्ता के रूप में काम करने के साथ ही माकपा की सदस्य भी थीं। उसने कुछ दिन पहले भी पार्टी की एक समिति की बैठक में हिस्सा लिया था। हालाँकि, पार्टी ने आशा के सदस्य होने की बात से इनकार किया है। फिलहाल पुलिस यह पुष्टि नहीं कर पा रही है कि वह पार्टी की सदस्य थी या फिर सिर्फ समर्थक।
सितंबर 10, 2020 को वह कभी वापस न आने की बात कहकर पार्टी ऑफिस के लिए निकली थी। इससे चिंतित परिजन जब आशा की खोज में पार्टी ऑफिस पहुँचे तो वहाँ उसे फाँसी के फंदे से लटकते पाया। 
बरामद किए गए सुसाइड नोट में, आशा ने उल्लेख किया कि पार्टी के दो नेता – स्थानीय समिति के सदस्य कोट्टमन राजन और शाखा सचिव अनाथारविलाकम जॉय, उसे लंबे समय से उसे मानसिक रूप से परेशान कर रहा था, जिसके कारण वह डिप्रेशन का शिकार हो गई। सुसाइड नोट में यह भी कहा गया है कि उसने इस मामले को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने कई बार उठाया, मगर हर बार उसे अनसुना कर दिया गया।
आशा की मौत से खलबली मच गई। आशा के परिजनों ने शव लेने से इनकार कर दिया और कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। बाद में, पुलिस ने उन्हें शांत करा दिया और शव को पोस्टमार्टम के लिए तिरुवंतपुरम मेडिकल कॉलेज भेज दिया।
कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने कहा कि सीपीआई-एम पार्टी में महिलाएँ सुक्षित नहीं है। उन्होंने डीजीपी से निष्पक्ष जाँच के लिए कहा है। उन्होंने यह भी सवाल किया कि जब महिला ने राजन और जॉय द्वारा प्रताड़ित किए जाने का मामला उठाया गया था, तो ‘वरिष्ठ कॉमरेड’ कार्रवाई करने में विफल क्यों हैं। बता दें कि राजन और जॉय के खिलाफ अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है।
पुलिस प्रथम दृष्टया मानती है कि यह आत्महत्या का मामला है। सीनियर इंस्पेक्टर रतीश कुमार ने TNM से कहा कि राजन और जॉय के खिलाफ अब तक कोई मामला दर्ज नहीं किया गया है। उन्होंने कहा, “सुसाइड नोट के आधार पर उनके खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया जा सकता है। हम जाँच कर रहे हैं कि क्या आत्महत्या में उनकी कोई भूमिका थी। अगर ऐसा पाया जाता है तो उनके खिलाफ मामला दर्ज किया जाएगा।”

वामपंथी यौन शोषण : वाह, मार्क्स पर चर्चा के बहाने कौमार्य की बात… तो किसी ने शराब पिला किया सेक्स

वामपंथी गैंग में हलचल मची हुई है क्योंकि एक के बाद एक मामले सामने आ रहे हैं – यौन उत्पीड़न के मामले, गंभीर मामले। सीपीआई के छात्र संगठन एसएफआई ने लड़कियों का यौन शोषण किया, उन्हें प्रताड़ित किया या फिर उन्हें परेशान किया। ऐसे ही एक मामला प्रियंका दास का था, जिसे मायाबन गांगुली ने प्रताड़ित किया था। अब ऐसी कई घटनाओं के बारे में पता चला है, जिसे विभिन्न पीड़ित युवतियों के बयान के आधार पर हम आपके सामने रख रहे हैं।
सबसे पहले बात देबद्रीता साहा की, जिन्हें उनके एक क्लासमेट ने ही प्रताड़ित किया। वो एक कॉमरेड भी था। साहा ने एसएफआई के ही एक व्यक्ति का बिना नाम लिए बताया कि वो उन्हें लेकर एक व्यक्ति के फ्लैट पर गया, जहाँ उसने उनके साथ सेक्स करने की साज़िश रच रखी थी। इसके बाद उसने पूछा कि क्या देबद्रीता का हाइमेन अभी भी सुरक्षित है? देबद्रीता के शरीर को लेकर उसने तरह-तरह की बातें पूछनी शुरू कर दी। दरअसल वो उसे वहाँ मार्क्स के बारे में बात करने ले गया था और वामपंथ के बारे में ज्ञान देना चाहता था। जब साहा ने उसे बताया कि वो पहले से ही रिलेशनशिप में हैं तो उस वामपंथी ने कहा कि थोड़ी-मोड़ी चीटिंग तो चलती है।
वहीं मयाबन गांगुली को लेकर एक युवती ने बिना पहचान जाहिर किए हुए एक घटना के बारे में बताया, जब वो दूसरे सेमेस्टर में थी। वो किसी आंदोलन की वजह से रात में कॉलेज में ही रुकी थीं। मयाबन भी वहीं पर था। जब उसने देखा कि वहाँ और कोई नहीं है तो उसने आपत्तिजनक रूप से युवती के शरीर को इधर-उधर छूना शुरू कर दिया। बाद में वो वहाँ से किसी तरह भाग निकली। मयाबन ने अफवाह फैलाई थी कि उसने उस युवती के साथ सेक्स किया है। पूरे कॉलेज ये अफवाह फैला दी गई थी लेकिन पीड़िता शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई
बनाश्री दास ने भी एक घटना शेयर की है, जब वो तीसरे सेमेस्टर में थीं। वो कॉमरेड सत्यव्रत पॉल के साथ एक प्राइवेट ट्यूशन करने जाती थीं। एक दिन वो उनके पीछे लग गया। स्टडी मटेरियल के बारे में बात करते-करते उसने बनाश्री को किस करने का प्रयास किया। फिर लिफ्ट में जाते समय उसने ड्रामा शुरू कर दिया और कहने लगा कि वो बनाश्री से प्यार करता है। बनाश्री ने बताया कि उसने अपनी गर्लफ्रेंड के साथ ब्रेकअप की बात कह के उनके साथ ‘काफी क़रीबी संबंध’ बना लिया, जिसका उन्हें अब पछतावा है।
मयाबन गांगुली के बारे में एक अन्य युवती ने भी अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया कि जब वो नशे में थीं, तब मयाबन ने उसे किस किया। रोकने के बावजूद वो लगातार किस करता रहा। एक अन्य एक छात्रा ने अपना अनुभव शेयर करते हुए बताया कि मयाबन दारु पीकर उसके पास आ गया और उसकी गोद में सोने की माँग करने लगा। उसने इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए उसके हाथ पकड़ लिए और रोने लगा। कौशिकी दत्ताचौधरी ने बताया कि मयाबन ने शराब पी कर अपने हाथ को उनके कंधे पर रख दिया था। बाद में उसने अपने होठों को कौशिकी के कंधे और गर्दन पर रगड़ना शुरू कर दिया।
एक अन्य छात्रा ने कॉमरेड सुमित मंडल पर प्रताड़ना का आरोप लगाया। अर्चिता पॉल ने बताया कि सुमित ने उसे खूब शराब पिलाई और फिर उसके स्तनों को छूने लगा और किस करने लगा। अर्चिता के पेट में बहुत दर्द हो रहा था और जब वो सुबह उठी तो वो एक हॉस्पिटल में थीं। सुमित ने रात को उसके साथ जो कुछ भी किया था, उसने उसे रिकॉर्ड कर लिया था और साथ ही कहा कि सब कुछ सहमति से हुआ है। हॉस्पिटल के डॉक्टर ने अर्चिता का इलाज करते समय उन्हें कॉलेज बदल लेने की सलाह दी।

‘घायल जवानों के लिए रक्तदान करना पार्टी विरोधी’ – कम्युनिस्ट पार्टियाँ

Communist Party of India - Wikipedia
Bank recapitalization is amnesty to corporate defaulters: CPI-Mदुनिया भर में कम्युनिस्ट अथवा वामपंथी एक ऐसी प्रजाति है, जो लोकतान्त्रिक देशों में लोकतंत्र ख़त्म होने की बात करते हैं लेकिन जहाँ उन्हें सत्ता मिल जाती है वहाँ वो लोकतंत्र का गला घोंट देते हैं। भारत-चीन तनाव के बीच भारतीय वामपंथियों का भी चेहरा बेनकाब हुआ है, जिन्होंने चीन की निंदा में अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा। इन कम्युनिस्टों ने उलटा अमेरिका और भाजपा को इस विवाद के लिए दोषी ठहरा दिया।
भारतीय कम्युनिस्टों की एक ख़ास बात यह है कि ये अपने धर्म और मातृभूमि के नहीं होते। ये चीन, क्यूबा और उत्तर कोरिया को अपना देश मानते हैं, जहाँ लोकतंत्र नाम की कोई चीज है ही नहीं। ये अपने देश की सेना का सम्मान नहीं करते। ये कम्युनिस्ट समस्याओं के समय अपनी सरकार के साथ खड़े नहीं होते। कुछ ऐसा ही इन्होने इस बार भी किया है। सीपीआई व अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों के रुख को देख कर तो ऐसा ही लगता है।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सिस्ट) के बांग्ला मुखपत्र ‘गणशक्ति’ ने क्या लिखा है। ‘गणशक्ति’ ने अपने पहले ही पन्ने पर भारतीय सेना के बलिदान का मखौल उड़ाते हुए उन्हें ही दोषी ठहराया है। इसके लिए किसी भारतीय नहीं बल्कि चीनी प्रवक्ता का बयान छापा गया है। वही चीन, जिसने सरहद पर हमारे 20 सैनिकों की जान ले ली। चीनी प्रवक्ता के हवाले से दावा किया गया है कि भारतीय सेना ने न सिर्फ़ सीमा सम्बन्धी नियमों का उल्लंघन किया बल्कि गलवान घाटी में भी स्थिति से छेड़छाड़ किया।
Jyoti basu – bkumarauthor
देश की सीमा पर हमारे लिए सुरक्षा करते हुए चीनी सैनिकों की धोखेबाजी भरे हमले में जान गँवाने वाले हमारे ही सैनिकों पर सवाल उठाया जा रहा है और वो भी उनके बयान को आधार बना कर, जिनकी सेना ने ये घिनौना कृत्य किया है। ऐसा काम वामपंथी ही कर सकते हैं। हालाँकि, सीपीआई का कहना है कि वो हमेशा से भारत और चीन, दोनों ही का पक्ष रखता रहा है। लेकिन अभी तक ऐसा दिख तो नहीं रहा है।
इसी ‘गणशक्ति’ में चीनी प्रवक्ता के उस बयान को भी पेश किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनका कोई सैनिक हताहत नहीं हुआ है। हालाँकि, केंद्रीय मंत्री जनरल वीके सिंह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि 43 चीनी सैनिकों की मौत हुई है। लेकिन, वामपंथी दलों के लिए आधिकारिक वर्जन चीन वाला है, भारत का नहीं। घुसपैठ की चीनियों ने, धोखा देकर हमला किया चीनियों ने लेकिन वामपंथी उन्हीं चीनियों के महिमामंडन में लगे हुए हैं।

सीपीआई लाख सफाई दे कि उसने दोनों पक्षों को दिखाया है, वो पत्रकारिता के नियमों का पालन कर रहा है या फिर वो चीन का एजेंट नहीं है लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि वो प्रो-इंडिया तो नहीं ही हैं। उसे भारत का पक्ष दिखाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। जहाँ बात सेना और देश की सुरक्षा की आती है, वहाँ संवेदनशीलता से काम लिया जाता है। ये ठीक उसी तरह है, जैसे कश्मीर का कोई इस्लामी आतंकी संगठन हमेशा पाकिस्तान के लिए काम करता है।

यहाँ सीपीएम व अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों के इस व्यवहार को समझने के लिए 1962 के युद्ध की चर्चा भी ज़रूरी है। उस समय जब युद्ध छिड़ा था और चेयरमैन माओ ने भारत की पीठ में छुरी घोंपते हुए हमला कर दिया था, तब वामपंथियों ने केंद्र सरकार का समर्थन नहीं किया था। नेहरू सरकार की गलतियों को नज़रअंदाज़ कर लगभग सभी पार्टियाँ उस युद्ध में सरकार के साथ खड़ी थीं लेकिन वामपंथी चीन के समर्थन में थे।
इस दौरान नीचे संलग्न किए गए इस पोस्टर को देखिए, जो वामपंथियों द्वारा 70 के दशक में डिजाइन किया हुआ बताया जाता है। हालाँकि, इसका सीपीआई से आधिकारिक लिंक क्या है ये तो सामने नहीं आया है लेकिन बांग्ला में यही लिखा हुआ है कि चेयरमैन माओ हमारे चेयरमैन हैं। कइयों ने सीताराम येचुरी और प्रकाश करात से इस सम्बन्ध में सवाल पूछे लेकिन वामपंथी नेताओं ने कोई जवाब नहीं दिया।
1962 में चीन भारत को इतना बड़ा घाव देता है और उसके कुछ ही सालों बाद हमारे ही देश के वामपंथी कहते हैं कि भारत पर हमला करने वाले माओ उनके भी चेयरमैन हैं। कम्युनिस्टों ने 16 जून को पूरे भारत में देशव्यापी बंद का आह्वान किया। जगह-जगह प्रदर्शन किए गए। कहा गया कि मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों के विरोध में ये प्रदर्शन हो रहे हैं। क्या भारत-चीन तनाव के बीच इस तरह की हरकत उन्हें चीन की प्रॉक्सी नहीं बनाती?
हालिया भारत-चीन विवाद को लेकर सीपीएम के बयान को ही देख लीजिए, इसने न तो चीन की आलोचना की है और न ही भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाने वाला एक भी शब्द कहा। उसने उलटा भारत सरकार से ही सवाल दागा कि वो बताए कि सीमा पर क्या हुआ है? उसने दोनों देशों को मिल-बैठ कर मामला सुलझाने की सलाह तो दी लेकिन कहीं भी चीन की अप्रत्यक्ष आलोचना नहीं की। क्या ऐसी पार्टियों को भारत में चुनाव लड़ने का अधिकार होना चाहिए?

डोकलाम विवाद भी देश अभी तक भूला नहीं है। अगर आप याद कीजिए तो उस समय भी ये वामपंथी पार्टियाँ सरकार के साथ खड़ी नहीं हुई थी। उनका रवैया तब भी देशविरोधी ही था। उसने दावा किया था कि सीमा विवाद के विषय में भूटान 1984 से ही चीन के साथ सीधे बातचीत करता रहा है, इसीलिए अच्छा यही होगा कि भारत अब भूटान को ही बातचीत करने दे और ख़ुद पीछे हट जाए। क्या ये वामपंथी चाहते थे कि भारत पर चीन थोड़ा-थोड़ा कर के कब्जा करते जाए?
साथ ही वामपंथी पार्टियाँ दलाई लामा को भारत द्वारा शरण देने से भी नाराजगी जताती रहती है। सीपीएम ने तब ये भी आरोप लगाया था कि मोदी सरकार ने दलाई लामा को एक केंद्रीय मंत्री के साथ अरुणाचल का दौरा करा कर स्थिति बिगाड़ी है और चीन को गुस्सा दिलाया है। दलाई लामा से जिस तरह से चीन चिढ़ता है, ठीक उसी तरह वामपंथी भी चिढ़ते हैं। लेकिन क्या भारत चीन के आगे झुक कर दलाई लामा को प्रताड़ित करे?
1962 के युद्ध में तो सीपीआई ने देशद्रोह का खुलेआम प्रदर्शन करते हुए यहाँ तक कहा था कि घायल जवानों को रक्तदान करना पार्टी विरोधी गतिविधियों में गिना जाएगा। वीएस अच्युतानंदम तब पार्टी की पोलित ब्यूरो के सदस्य थे लेकिन उन्हें सिर्फ़ इसीलिए हटा दिया गया था क्योंकि उन्होंने जवानों के लिए रक्तदान करने की योजना बनाई थी। अच्युतानंदम ने भी पार्टी की इमेज बदलने किए लिए ही ऐसी अपील की थी, जो दिखावा ही थी।

पूर्व राज्यसभा सांसद 7 बार ट्रेन में चढ़े, 63 टिकट का पैसा माँगा : सरकारी खजाने को वामपंथी चपत

रेलवे, राज्यसभा
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
सियासत भी क्या सफ़ेदपोश लुटेरों की जमात है, जिन्हें जनता अपना सेवक समझ आगे-पीछे भागती है, फूलों की मालाएं पहनाती है, वह कितने बड़े लुटेरे हैं। सदस्य बनने पर संविधान की कसम खाते हैं, ईमानदारी से देश की सेवा करने की शपथ लेते हैं, लेकिन घोटाले कर देश को ही चूना लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। सदस्य न होने पर लुटेरों को पेंशन भी चाहिए। और सदस्य रहते जनसेवा के नाम पर की गयी लूट भी। वाह जनसेवा के नाम पर सफेदपोशी लुटेरों। यदि यही लूट किसी कर्मचारी अथवा अधिकारी ने की होती, क्या सरकार उसे सजा दिए बिना छोड़ती?
मुफ़्त रेल टिकटों की सुविधा की आड़ में कुछ सांसद एवं पूर्व सांसद किस तरह सरकारी पैसों की बर्बादी करते हैं, इसका उदाहरण CPI (M) के एक पूर्व राज्यसभा सांसद की करतूत से सामने आया है।
इस पूर्व राज्यसभा सदस्य ने जनवरी 2019 में 63 ट्रेन टिकट बुक की। लेकिन इनमें से केवल 7 ट्रेन टिकट का ही उन्होंने लाभ लिया। बावजूद इसके बाकी टिकट कैंसिल नहीं कारवाई। बाद में सभी 63 टिकट के रिम्बरस्मेंट यानी, बिल भुगतान की माँग की। इसके कारण रेल मंत्रालय को संसद सचिवालय द्वारा ₹1,46,920 का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा।
इस पूर्व वामपंथी सांसद का नाम सार्वजानिक नहीं किया गया है। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि वे पश्चिम बंगाल से सीपीआई (एम) के पूर्व राज्यसभा सदस्य थे।
दरअसल राज्यसभा सांसदों को और पूर्व राज्यसभा सांसदों को रेलवे में नि:शुल्क असीमित यात्रा की सुविधा मिलती है। इसके पूरा भार राज्यसभा सचिवालय को उठाना होता है।
संसद के प्रत्येक सदस्य को नियमानुसार पत्नी सहित AC-1 में मुफ़्त यात्रा की सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावा, इनके साथ यात्रा करने वाले एक अटेंडेंट को भी सेकेंड क्लास AC कोच या एग्जीक्यूटिव क्लास में किसी भी समय पूरे भारत में मुफ्त टिकट अथवा पास प्राप्त है।
सीपीआई (एम) के इस पूर्व राज्यसभा सांसद ने जिन सात टिकटों का इस्तेमाल किया उसकी लागत केवल ₹22,085 है। लेकिन उन्होंने उन्होंने अन्य टिकट कैंसिल नहीं कराया जिसकी वजह से सरकारी खजाने पर ₹1,46,920 का अतिरिक्त भर पड़ा। साल 2019-20 में ऐसे टिकटों जिन पर यात्रा नहीं हुई, लेकिन वो कैंसिल भी नहीं कराए गए, रेलवे ने राज्यसभा सचिवालय को ₹7.8 करोड़ रुपए का बिल भेजा है। ये सभी टिकट माननीय राज्यसभा सांसदों के हैं।
इसी तरह एक वर्तमान राज्यसभा सांसद ने जितने टिकट बुक कराए, उनमें से सिर्फ़ 15% टिकटों पर ही यात्रा की। इस तरह उनके द्वारा बर्बाद किए गए 85% टिकटों का भुगतान अब राज्यसभा सचिवालय को करना है।
टिकट कैंसिल न करवाने पर खुद करना होता है भुगतान 
राज्यसभा सचिवालय को कई सांसदों और पूर्व सांसदों को कई टिकट बुक करने और अभी तक भुगतान की माँग नहीं करने के कई उदाहरण मिले हैं। लेकिन अब यदि राज्यसभा का कोई सदस्य ट्रेन का टिकट बुक करने के बाद यात्रा नहीं करता है, तो उसे खुद किराए का भुगतान करना होगा।
राज्यसभा के महासचिव दीपक वर्मा की ओर से सदस्यों को जारी परामर्श में दी गई जानकारी में यह स्पष्ट किया गया है कि वे यात्रा नहीं करने की स्थिति में ट्रेन बुकिंग को कैंसल करें और अगर ऐसा नहीं करते हैं तो किराया उनसे वसूला जाएगा।
परामर्श में कहा गया है कि रेल मंत्रालय ने भुगतान के दावे का जो ब्यौरा दिया है उसके मुताबिक कुछ सदस्यों ने एक ही दिन एक ही अथवा दूसरे स्टेशनों से जाने वाली कई ट्रेनों में टिकट बुक कराए। उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने राज्यसभा सचिवालय को निर्देश दिया था कि इस मुद्दे को उनके संज्ञान में लाया जाए।
फ़िलहाल राज्यसभा सचिवालय ने सांसदों के ये बिल भुगतान अदा करने से मना कर दिया है। राज्यसभा सचिवालय ने रेलवे से आग्रह किया है कि वो सिर्फ उन्हीं टिकटों का किराया वसूल करे, जिन पर सांसदों ने वास्तव में यात्रा भी की हो, लेकिन रेलवे नियमों का हवाला देते हुए इस बात पर क़ायम है कि जो टिकट कैंसिल नहीं कराए गए, उनका पैसा राज्यसभा सचिवालय को देना ही होगा।
इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि वर्तमान में रेलवे के पास अपनी ओर से आम नागरिक और सांसदों में भेद करने का कोई नियम नहीं है। सम्भव है कि रेलवे जल्द ही लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों द्वारा ट्रेन बुकिंग के बीच अंतर करने के लिए अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव करे।

30 अप्रैल 1982 : 16 भिक्षुओं और एक साध्वी को गाड़ी से निकाला, मारा, आग में फेंक दिया: वामपंथियों के कोलकाता में हुई थी बिजोन सेतु नरसंहार

बिजोन सेतु नरसंहार
जब आनंद मार्ग के 16 भिक्षुओं और एक साध्वी को दिनदहाड़े
 मार डाला गया था!
पालघर में दो साधुओं की हत्या ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जिस निर्मम तरीके से साधुओं को पीटा गया और पुलिस ने उनकी मदद करने से इनकार कर दिया, उससे पूरा देश अचंभित है। जिस क्रूरता के साथ इस भयानक घटना को अंजाम दिया गया, ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि जब देश को इस तरह की दुखद घटना देखने को मजबूर किया गया हो। आज से 38 साल पहले पालघर से भी अधिक एक क्रूर घटना घटी थी। उस घटना को वर्षों से बिजोन सेतु नरसंहार (Bijon Setu Massacre) के रूप में जाना जाता रहा है।
30 अप्रैल 1982 को कोलकाता में बॉलीगंज (Ballygunge) के निकट दिनदहाड़े हिंदू संगठन आनंद मार्ग के 16 भिक्षुओं और एक साध्वी की निर्मम तरीके से हत्या कर उन्हें आग में फेंक दिया गया था। उन्हें उनकी टैक्सियों से उस समय बाहर खींच लिया गया था, जब वे कोलकाता के तिलजला स्थित अपने मुख्यालय में आयोजित एक शैक्षिक सम्मलेन में भाग लेने जा रहे थे।
हत्याओं को तीन अलग-अलग स्थानों पर अंजाम दिया गया था। इतना ही नहीं, इन घटनाओं को अपनी आँखों से एक दो नहीं बल्कि हजारों लोगों ने देखा था, इसके बावजूद भी आज तक एक की भी गिरफ्तारी नहीं हो सकी। जबकि 2012 में ही पश्चिम बंगाल सरकार ने इन हत्याओं की जाँच के लिए एकल सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया था।
इन हत्याओं के तत्काल बाद के वर्षों में माकपा सरकार ने इस मामले से संबंधित तथ्यों को छिपाना जारी रखा। वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 1996 के अंत में इस मामले की जाँच बिठाई थी, लेकिन ज्योति बसु और उनकी सरकार के सहयोग न मिलने के कारण यह जाँच आगे नहीं बढ़ सकी। इतना ही नहीं, मई 1999 तक दो रिमांडर भेजे गए, लेकिन राज्य सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया।
इस बीच पश्चिम बंगाल के एक आईएएस अधिकारी शेर सिंह ने इस मामले से संबंधित दस्तावेजों के साथ तथ्यों को सामने लाने की पेशकश की थी। दरअसल भिक्षुओं के नरसंहार के समय शेर सिंह 24 परगना के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट थे। सिंह ने केंद्रीय प्रशासन न्यायाधिकरण (CAT) में लगाई अपनी याचिका (1994 की संख्या-1108) में आरोप लगाया था कि उन्हें इस बात के लिए निलंबित कर दिया गया था, क्योंकि उन्होंने मामले पर कम्युनिस्ट सरकार की बातों को मानने से इनकार कर दिया था।
शेर सिंह ने कैट को सूचित किया था कि वह आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम से बंधे हुए हैं, इसलिए यदि किसी सक्षम अधिकारी द्वारा कहा जाता है तो वे केवल रहस्यों का खुलासा कर सकते हैं, लेकिन उनकी याचिका ने पर्याप्त संकेत दिए थे कि कम्युनिस्टों के साथ भूमि विवाद को लेकर आनंद मार्गियों की हत्या की गई थी। माकपा को डर था कि आनंद मार्गी कस्बा बेल्ट में अपना वर्चस्व बना सकते हैं, जो कि उस समय कम्युनिस्टों का एक गढ़ था।
आनंद मार्ग के जनसंपर्क सचिव आचार्य त्रंबकेश्वरानंद अवधूत ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि “बसु सरकार की एक मात्र सफलता राज्य के सबसे बड़े नरसंहार मामले में अपने शामिल होने को छिपाने की रही है।” उनके अनुसार कम्युनिस्ट आनंद मार्ग के शीर्ष नेतृत्व को खत्म करना चाहते थे, लेकिन उनके गुंडों ने गलतफहमी में संगठन से जुड़े साधारण भिक्षुओं की हत्या कर दी।
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया था कि भिक्षुओं की हत्या इसलिए कर दी गई थी, क्योंकि लोगों को उन पर बच्चों के अपहरण का संदेह था, लेकिन वे इस बात को भी स्वीकार करते हैं कि यह स्पष्ट नहीं था कि उन्हें इस तरह का संदेह क्यों था। पुलिस ने कहा था कि भीड़ ने लकड़ियों के जलते हुए ढेर में उन्हें फेंक दिया था।
आनंद मार्ग प्रचारक सभा ने 1999 में इस मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जाँच की माँग की थी। तब केंद्र सरकार की ओर से ओडिशा में ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों की हत्या की जाँच के लिए एक जाँच बिठाई गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लिखे 66 पन्नों के एक पत्र में सरकार से आग्रह किया गया था कि वे कलकत्ता में दिनदहाड़े 17 आनंद मार्गियों की हत्याओं की जाँच के लिए एक समान पैनल गठित करे। पत्र में कहा गया था, “कलकत्ता शहर या हमारे देश के किसी भी हिस्से में इस तरह के अमानवीय, क्रूर और व्यवस्थित हत्याकांड को अंजाम नहीं दिया गया, जिसमें डेढ़ घंटे तक पुलिस द्वारा कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया, जबकि पुलिस स्टेशन घटना स्थल से कुछ ही दूरी पर था।”
पत्र में जोर देकर कहा गया था कि अगर इस मामले की सही समय पर सही तरीके से जाँच की गई होती तो, अल्पसंख्यक समुदाय (आनंद मार्ग के मानने वाले) पर पिछले 17 वर्षों में लगातार इस तरह हमले नहीं हुए होते।” आनंद मार्ग यह दावा करता है कि वह हिंदू धर्म से जुड़ा नहीं है। इसने एक बार तो खुद को एक अलग धर्म के रूप में नामित करने की माँग की थी, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि आनंद मार्ग अलग धर्म नहीं है, यह हिंदू धर्म का केवल एक ‘धार्मिक संप्रदाय’ है।” हालाँकि आनंद मार्गी लगातार दावा करते रहे हैं कि ‘तंत्र’ कभी हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं माने गए।”
इसके बाद 2012 में ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में निर्वाचित किया गया था, तब राज्य सरकार ने लिंचिंग की घटनाओं की जाँच के लिए एक सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया था। कानून मंत्री मलय घटक ने तब कहा था कि मुख्यमंत्री ने जाँच आयोग के गठन पर सहमति दे दी है।
न्यायमूर्ति अमिताव लाला के न्यायिक आयोग की जाँच में पाया गया कि 6 फरवरी 1982 को कस्बा-जादवपुर क्षेत्र के CPI(M)के महत्वपूर्ण नेताओं ने आनंद मार्गियों से चर्चा करने के लिए पिकनिक गार्डन के कॉलोनी बाजार में मुलाकात की थी। कथित तौर पर बैठक में पिछले वाम मोर्चा मंत्रिमंडल में मंत्री रहे कांति गांगुली, CPM के पूर्व विधायक सचिन सेन, जिनकी अब मौत हो चुकी है, स्थानीय CPM नेता निर्मल हलदर, वार्ड नंबर 108 (तिलजला-कस्बा) के पूर्व पार्षद अमल मजूमदार और सोमनाथ चटर्जी, जो उस समय जादवपुर से सांसद और बाद में लोकसभा अध्यक्ष बनाए गए, शामिल थे।
आनंद मार्गियों को कम्युनिस्टों के गुस्से का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे वैचारिक रूप से उनके विरोध में थे। आनंद मार्गियों पर पहला हमला 1967 में उनके पुरुलिया स्थित ग्लोबल मुख्यालय में हुआ था, जिसमें CPI(M) के कैडरों द्वारा कथित तौर पर पाँच सेवकों की हत्या कर दी गई थी। इसके दो साल बाद आनंद मार्गियों की कूचबिहार मण्डली पर हमला किया गया था।
बिजोन सेतु हत्याकांड के बाद भी अप्रैल 1990 में CPI(M) के कैडरों द्वारा कथित तौर पर आनंद मार्ग के पाँच सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। 1982 की जघन्य हत्याओं के बारे में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने बड़ी ही बेशर्मी से कहा था, “क्या किया जा सकता है? ऐसी बातें होती रहती हैं।” बंगाल में माकपा के दशकों के शासनकाल के दौरान इन घटनाओं पर कोई न्याय नहीं हुआ, न ही अब तक हुआ है।
ऐसे और भी लोग हैं, जिन्हें कम्युनिस्टों के नरसंहार वाले रास्ते पर चलने से इनकार करने की बदौलत मुश्किलें झेलनी पड़ीं। अप्रैल 2017 में न्यायमूर्ति अमिताव लाला आयोग ने तिलहला थाने के ओसी गंगाधर भट्टाचार्य की पत्नी ममता भट्टाचार्य के घर का दौरा किया था। आपको बता दें कि गंगाधर भट्टाचार्य को 31 अक्टूबर 1983 को बेहाला में बयान रिकॉर्ड करने को लेकर गोली मार दी गई थी।
ममता के मुताबिक, उनके पति एक ईमानदार अधिकारी थे। उन्हें आनंद मार्ग के भिक्षुओं के नरसंहार का समर्थन न करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी। ममता भट्टाचार्य के अनुसार उन्होंने ज्योति बसु से मदद माँगते हुए अपने पति को आवंटित किडरपोर में पुलिस क्वार्टर पर ही अपना निवास जारी रखने की माँग की थी, लेकिन इसके लिए इनकार कर दिया गया।
तब से आज तक हर साल 30 अप्रैल को आनंद मार्गियों के नरसंहार की सालगिरह पर आनंद मार्गी जुलूस निकालते हैं और उन भिक्षुओं को श्रद्धांजलि देते हैं, जिन्हें दिनदहाड़े मारने के बाद आग में फेंक दिया गया था। उन्हें घटना के चार दशक बीत जाने के बाद भी आज तक न्याय नहीं मिल सका है। कभी माओ ने कहा था, “राजनीतिक शक्ति बंदूक की नोंक से बढ़ती है।” वर्षों से ये लोग दूसरों के सिर पर बंदूक रखकर राजनीतिक सत्ता हासिल करने में कामयाब रहे हैं। हालाँकि उन्हें राजनीतिक रूप से अलग कर दिया गया है, फिर भी उन्हें न्याय की बारीकियों का अनुभव करना बाकी है।(साभार)

CAA-NRC : कांग्रेस और लेफ्ट गंदी राजनीति कर रहे, मैं उनके साथ नहीं: ममता बनर्जी

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 13 जनवरी को दिल्ली में होने वाली विपक्षी पार्टियों की बैठक का बहिष्कार कर दिया है। उन्होंने गुरुवार (जनवरी 8, 2020) को आरोप लगाया है कि कांग्रेस और वामदल पश्चिम बंगाल में गंदी राजनीति कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वह अब अकेले नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगी।
गौरतलब है कि इससे पहले दक्षिण परगना में हुई एक सभा में ममता बनर्जी ने भारत बंद बुलाए जाने के लिए लेफ्ट पार्टियों पर सीधा हमला बोला था। उन्होंने लेफ्ट पर निशाना साधते हुए कहा था कि वामपंथ की कोई विचारधारा नहीं है। वे केवल बंद बुलाकर और बसों में बम फेंककर सस्ता प्रचार करना चाहते हैं। मुख्यमंत्री के मुताबिक लेफ्ट द्वारा राज्य में की गई हिंसा सब ‘दादागिरी’ में आती है न कि आंदोलन में। इससे तो बेहतर है कि उनकी राजनीतिक मौत हो जाए।
कांग्रेस और वामपंथियों की राजनीति की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था, “वामपंथी पार्टियों की कोई विचारधारा नहीं हैं। रेलवे पटरियों पर बम बिछाना गुंडागर्दी में आता है। आंदोलन के नाम पर रास्ते में चलने वालों को मारा जा रहा है और उन पर पथराव हो रहा है। ये दादागिरी है, न कि आंदोलन। मैं इस भारतबंद की निंदा करती हूँ।”

इसके अलावा उन्होंने दावा किया कि लेफ्ट पार्टियों द्वारा बुलाए बंद को खारिज कर दिया गया है। क्योंकि वे बंद का आह्वान करके और बसों में बम फेंककर सस्ता प्रचार करना चाहते हैं, इस प्रचार को हासिल करने के बजाय राजनीतिक मौत बेहतर है।
लेफ्ट पर हमलावर होते हुए बंगाल मुख्यमंत्री केरल की माकपा की तारीफ़ कर चुकी हैं। उन्होंने कहा कि केरल में माकपा की सरकार है और वह बंगाल में वामपंथियों से बहुत बेहतर है क्योंकि कम से कम वे अपनी विचारधारा में विश्वास करते हैं। वामियों के पास मानवता का मूल्य मात्र शेष नहीं बचा है। कहीं ट्रेन के नीचे बम रख दिया गया, कहीं पत्थर फेंके जा रहे हैं, कहीं ट्रेनें तो कहीं बसें रोकी जा रही हैं तो कहीं बाइक सवारों के साथ मारपीट की गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि यह दादागिरी नहीं तो और क्या है? क्या इसे आंदोलन कहा जा सकता है?
इसके बाद उन्होंने सिंगूर आंदोलन की बात उठाई और कहा, “मैंने 26 दिनों तक आंदोलन किया था, लेकिन एक बस तक में किसी ने हाथ नहीं लगाया। आंदोलन एक दिन का नहीं, बल्कि निरंतर चलता है। आंदोलन करना कठिन होता है क्योंकि इसके लिए रास्ते पर पड़े रहना पड़ता है।”

जामिया की इस्लामी कट्टरपंथी आयशा पर टूट पड़े वामपंथी

आयशा रेना, केरल, पिनरई विजयन
आर.बी.एल.निगम 
जामिया मिलिया से शुरू हुई नागरिकता संशोधन कानून की लड़ाई भारत के अन्य प्रांतों में पहुँच लगता है पद-भ्रष्ट हो गयी है। अब लड़ाई CAA की बजाए भीम आर्मी के चंद्रशेखर की रिहाई की ओर मुड़ गयी है। 
जामिया मिलिया इस्लामिया की इस्लामी कट्टरपंथी छात्रा आयशा रेना अपने साथियों की रिहाई की माँग लिए केरल पहुँच गई हैं। केरल में वामपंथी नेताओं ने आयशा का कड़ा विरोध किया। बता दें कि जामिया हिंसा के कारण गिरफ़्तार किए गए उपद्रवियों की रिहाई के लिए आयशा लगातार विरोध प्रदर्शन में लगी हुई हैं। उनकी माँग है कि भीम आर्मी के चंद्रशेखर उर्फ़ रावण को जेल से रिहा किया जाए। लेकिन, जगह-जगह घूम-घूम कर विरोध प्रदर्शन करने वाली आयशा को अपनी ही दवा का स्वाद तब चखना पड़ा, जब केरल में सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने उनका ही विरोध किया।
दरअसल, आयशा ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पर गंभीर आरोप लगाए थे। आतंकी याकूब मेमन की समर्थक आयशा ने केरल के मलप्पुरम में प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वो देश में अल्पसंख्यक राजनीति को उभरते हुए देखना चाहती हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक राजनीति का अर्थ समझाते हुए बताया कि इसका आशय ‘मुस्लिम-बहुजन पॉलिटिक्स’ से है। उन्होंने माँग करते हुए कहा कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद को तुरंत रिहा किया जाए।


इस दौरान आयशा ने मुख्यमंत्री विजयन को लपेटे में लेते हुए कहा कि पिछले 2 हफ़्तों में केरल की सीपीएम सरकार ने बड़ी संख्या में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया है। उन्होंने केरल पुलिस पर भी आरोप लगाया। आयशा ने कहा कि वो इन सभी छात्रों को रिहा किए जाने की माँग करती हैं। आयशा के इस बयान से भड़के सीपीएम कार्यकर्ताओं ने विरोध में नारेबाजी की और माफ़ी माँगने को कहा। सीपीएम कार्यकर्ताओं ने आयशा को घेर कर नारेबाजी की।
आयशा और लदीदा वही युवतियाँ हैं, जिन्हें जामिया हिंसा के दौरान पोस्टर गर्ल बना कर उभारने की कोशिश की गई थी। बरखा दत्त सहित कई पत्रकारों ने उन दोनों को हाइलाइट किया था। इसके लिए पूरा का पूरा ड्रामा रचा गया था, जिसमें एक उपद्रवी को बसाने के लिए दोनों युवतियों ने पुलिस से झड़प की थी। पूरी घटना को हाई क्वालिटी के कैमरे से शूट किया गया था।

CPI(M) दुनिया का छठा सबसे खूँखार आतंकी संगठन : अमेरिकी विदेश रिपोर्ट

वामपंथी हिंसामार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) दुनिया का छठा सबसे खूॅंखार आतंकी संगठन है। अमेरिकी विदेश विभाग की एक रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आया है। आतंकवाद पर य​ह रिपोर्ट नवम्बर 7 को जारी की गई। ‘कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म 2018’ के आँकड़े बताते हैं कि सीपीआई (एम) ने पिछले साल 177 आतंकी घटनाओं में करीब 311 लोगों की हत्या की। हालॉंकि केंद्रीय गृह-मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि 2018 में वामपंथी हिंसा की 833 वारदातें हुई। इनमें 240 लोगों ने अपनी जान गँवाई थी।
पिछले साल की ‘कंट्री रिपोर्ट ऑन टेररिज्म-2017’ में अमेरिका ने माओवादियों को दुनिया का चौथा सबसे खतरनाक संगठन बताया था। ताजा रिपोर्ट में सीपीआई (एम) खूँखार आतंकी संगठनों की श्रेणी में छठे स्थान पर रखा गया है। उससे पहले इस सूची में तालिबान, इस्लामिक स्टेट, अल शबाब (अफ्रीका), बोको हरम (अफ्रीका) और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ फिलिपीन्स है।
जैश और लश्कर से भी ज्यादा बहाए खून
सीपीआई (एम) का मकसद गुरिल्ला वार के जरिए सरकार को उखाड़ फेंकना है। 21 सितंबर 2004 को इसकी स्थापना कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी)), पीपुल्स वार ग्रुप और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) के विलय से हुई थी। यूएपीए कानून के तहत भारत सरकार ने भी सीपीआई (माओवादी) को आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।
रिपोर्ट में अमेरिकी ख़ुफ़िया विभाग ने अफगानिस्तान, सीरिया और ईराक के बाद विश्व में भारत को आतंकवाद से प्रभावित चौथा देश बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल भारत में घटित 57 प्रतिशत आतंकवादी घटनाएँ जम्मू-कश्मीर में हुई थीं। मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स की मानें तो अमेरिका की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2018 के दौरान भारत में घटित होने वाली अधिकांश घटनाओं के पीछे सीपीआई (माओवादी) के नक्सली शामिल रहे हैं। वे करीब 176 ऐसी घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार हैं जोकि कुल आतंकी घटनाओं का 26 फ़ीसदी है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक जैश-ए-मोहम्मद ने 60 और हिज्बुल मुजाहिद्दीन ने 59 आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया। ऐसी घटनाओं में इनकी हिस्सेदारी 9-9 फीसदी है। लश्कर-ए-तैय्यबा को 55 वारदातों के साथ करीब 8 फीसदी घटनाओं का ज़िम्मेदार बताया गया है।
मुंबई हमलों में पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा की सक्रिय भूमिका होने का दावा करने वाली इस लिस्ट में भारत के राज्यों में सक्रिय कुछ अन्य संगठनों के भी नाम शामिल हैं। इनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम, नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ़ नागालैंड-इसाक मुइवा और आईएसआईएस की जम्मू-कश्मीर इकाई शामिल है। भारत और अमेरिका के आँकड़ों में फर्क को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने टिप्पणी से इनकार किया है।

स्वरा भास्कर जिसके चुनाव प्रचार में गईं वही हार गया

स्वरा भास्कर
हमेशा अपनी बयानबाज़ी को लेकर सुर्खियाँ बटोरने वाली अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने एक बार बयान देते हुए कहा है कि बॉलीवुड में मुख्यधारा के लोगों को किसी भी मुद्दे को लेकर बोलते हुए, अपनी राय रखते वक़्त उन्हें संवेदनशील होना चाहिए साथ ही उन्हें इसका भी ध्यान रखना चाहिए कि वे मुद्दे का प्रतिनिधित्व कैसे करते हैं। भले यह अनुभव मेरा अपना नहीं भी हो तो इसका मतलब यह नहीं कि ऐसा गलत है। यही हमारी धार्मिक, जातिगत और लैंगिक पहचान के लिए भी सही है।
कुछ समय बाद स्वरा की एक नई फिल्म आने वाली है जो कि समलैंगिकता पर आधारित है। इस फिल्म में स्वरा भास्कर एक समलैंगिक के रोल में नज़र आएँगी। इस फिल्म में शबाना आज़मी के होने की भी बात कही जा रही है। अपनी इस फिल्म से पहले सुर्खियाँ बटोरने के लिए स्वरा ने एक बार फिर से राग अलापना शुरू कर दिया है। मगर इस बार उनके राग में एक ऐसा दर्द भी शामिल है जिसे समझने के लिए लोकसभा चुनाव में भाजपा को उखाड़ फेंकने का सपना देखने वाली स्वरा के जीवन की एक झलक देखनी पड़ेगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि कई मुद्दों पर मुखर होकर बोलने वाली स्वरा कभी झुकती नहीं हों लेकिन इसके चलते उन्हें कितनी बार मुसीबत का सामना करना पड़ता है।
स्वरा यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने कहा कि एक सार्वजानिक जीवन में आपको इस बात का ख़याल रखना चाहिए कि आप जितना लोकप्रिय होते हैं उतना ही आप विनाशकारी नकारात्मकता का भी शिकार होते हैं, अगर हम चाहते हैं कि ऐसे लोग ज़िम्मेदारी से किसी भी मुद्दे पर अपनी बात मुखर होकर सबके बीच रखें तो यह ज़रूरी है कि उसे लोग भी सपोर्ट करें, इसके लिए ज़रूरी है कि हमें अपने समाज को ऐसा बनाना होगा जो किसी को जिम्मेवारी लेने के लिए कटघरे में खड़ा न करे।
अपना असल दुःख बयाँ करते हुए स्वरा ने कहा कि उन्हें 2019 लोकसभा चुनाव के दौरान बेगुसराय में कन्हैया कुमार, एमपी में दिग्विजय सिंह, दिल्ली में आम आदमी पार्टी के राघव चढ्ढा और आतिशी मार्लेना और सीपीएम के अम्र राम के लिए प्रचार करने पर चार नामी गिरामी ब्रांड्स ने स्वरा भास्कर से नाता तोड़ दिया। इसके चलते हुए नुकसान पर अपना दुःख बयाँ करते हुए कहा कि मैं खुद को महान नहीं कह रही लेकिन इस सब के दौरान से गुज़र कर मैं इतना ज़रूर कह सकती हूँ कभी कभी अगर आप बड़ा रिस्क लेने की हिम्मत करते हैं तो उसका खामियाज़ा भी भुगतना पड़ता है क्योंकि अपनी राय रखने की एवज में शूट के दौरान कार पथराव भी हो सकता है। शायद यही वजह है कि हम देखते हैं कि क्यों सार्वजानिक जीवन में कोई भी व्यक्ति खुलकर किसी भी मुद्दे पर बोलने से क्यों बचता है।
यह किसी से छुपा नहीं है कि लोकसभा चुनाव में भाजपा को हटाने के लिए स्वरा भास्कर ने सारी हदें पार कर दी थीं, ट्विटर पर लोगों ने स्वरा को टारगेट करके पनौती तक लिख दिया था।