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CAA : क्या सोनिया और राहुल गाँधी की खतरे में नागरिकता?

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी खो सकते हैं अपनी भारत की नागरिकता
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
देश की बड़ी और सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी और पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी जल्द ही भारत की नागरिकता खो सकते हैं। इस बात का खुलासा बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने अपने दिए एक भाषण में किया है।
दूसरे, काफी समय से चर्चा है कि इटली में जन्मे कोई भी व्यक्ति यदि किसी अन्य देश में रहने पर वहां की नागरिकता ले लेता है, उस स्थिति में उसकी इटली की नागरिकता समाप्त नहीं होती। लेकिन कांग्रेस का बोलबाला होने के कारण सोनिया के विरुद्ध उठती आवाज़ों का असर नहीं हुआ। क्योकि उस समय किसी में सोनिया के विरुद्ध बोलने अथवा कार्यवाही करने का साहस नहीं था। कांग्रेस और इसके समर्थक दल विरोधी स्वरों को "देश की बहु" कह कर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था, परन्तु दोहरी नागरिकता को ठंठे बस्ते में डाल दिया जाता था। लेकिन नागरिकता संशोधक कानून ने उस दोहरी नागरिकता मुद्दे को पुनः जीवित कर दिया है और अपनी नागरिकता को बचाने मुसलमानों को मोहरा बना कर, नागरिकता संशोधक कानून का विरोध करवाया जा रहा है। जबकि भारत में रह रहे किसी मुसलमान की नागरिकता प्रभावित नहीं होने वाली।  
हैदराबाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित एक सेमिनार में मुख्य वक्ता के रूप में पहुँचे बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा, “फाइल गृह मंत्री अमित शाह की मेज पर है और जल्द ही वे अपनी नागरिकता खो देंगे।” संविधान की बात करते हुए स्वामी ने कहा कि भारतीय नागरिक होने के दौरान दूसरे देश की नागरिकता लेने वाले लोग स्वतः ही अपनी भारतीय नागरिकता खो देंगे।

दरअसल बीजेपी सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी हैदराबाद विश्वविद्यालय में आयोजित “सीएए– एक समकालीन राजनीति से परे एक ऐतिहासिक अनिवार्यता” विषय पर छात्रों को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान स्वामी ने दावा किया कि राहुल गाँधी ने इंग्लैंड में व्यवसाय शुरू करने के लिए ब्रिटिश नागरिकता का विकल्प चुना था। हालाँकि, राहुल गाँधी नागरिकता के लिए नए सिरे से आवेदन कर सकते हैं, क्योंकि उनके पिता राजीव गाँधी एक भारतीय थे। लेकिन वह अपनी माँ सोनिया गाँधी की साख का इस्तेमाल करते हुए आवेदन नहीं कर सकते, क्योंकि वह भारतीय नागरिक नहीं थीं।
वहीं, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पर बोलते हुए स्वामी ने कहा, “सीएए को ठीक से समझा नहीं गया है, यहाँ तक कि इसका विरोध करने वालों ने भी खुद इस अधिनियम को नहीं पढ़ा है। इस कानून से भारतीय मुसलमानों को कोई प्रभाव नहीं पढ़ने वाला है। रही बात यह तर्क देने की कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों को भी नागरिकता दी जानी चाहिए, तो यह हास्यापद है।” उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक उत्पीड़न झेल रहे अल्पसंख्यकों के बचने के लिए एकमात्र स्थान भारत है। वहीं पाकिस्तान रोहिंग्या मुसलमानों को अपने देश में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे रहा है और यहाँ कुछ लोग चाहते हैं कि पाकिस्तानी यहाँ आएँ।

शरजील इमाम को हीरो बनाने के लिए ‘लिबरल गिरोह’ अब क्या-क्या करेगा कमाल

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
किसी आदमी की प्रसिद्धि और बर्बादी में 3W यानि Wealth, Wine & Woman का बड़ा योगदान रहा है। दूसरे, 60 के दशक में देव आनन्द अभिनीत फिल्म का एक चर्चित गीत "तेरी ज़ुल्फ़ों से कैद मांगी थी, रिहाई तो नहीं मांगी थी...", वर्तमान परिवेश में ज़ाकिर मूसा, बुरहानी वानी और शरजील की गिरफ़्तारी में शत-प्रतिशत चरितार्थ हो रही है। इतिहास में जाने पर तो एक लम्बी सूची सामने आ जाएगी। 
गत मई को जब कश्मीर के वांटेड आतंकी जाकिर मूसा भारतीय सेना ने मार गिराया था, तब मूसा की ही एक तत्कालीन प्रेमिका ने उसे पकड़वाने में सेना की मदद की थी। इससे पहले आतंकवादी बुरहानी वानी भी अपनी प्रेमिका की वजह से ही मारा गया था। इस बार मामला राजद्रोह के आरोप में फँसे हुए शाहीन बाग़ के मास्टर माइंड शरजील इमाम का है। शरजील इमाम की गिरफ्तारी के बाद उसके पकड़े जाने की कहानी के पीछे भी उसकी प्रेमिका का हाथ बताया जा रहा है।
दरअसल, जब CAA विरोध प्रदर्शनों और धरनों में हिन्दू विरोधी और अलगाववादी नारे लगने शुरू हो गए थे, तभी शंका व्यक्त की जा रही थी कि विरोध की आड़ में कोई खतरनाक खेल खेला जा रहा है, जिसे आम जनमानस समझ नहीं पा रहा था। लेकिन वास्तविकता बहुत जल्दी उजागर हो गयी। 
आतंकी जाकिर मूसा की तरह शरजील इमाम को भी जानेमन ने ही करवाया गिरफ्तार
रिपोर्ट्स के अनुसार, क्राइम ब्रांच दिल्ली पुलिस शरजील को लेकर बुधवार (जनवरी 29, 2019) दोपहर नई दिल्ली पहुँची। राजद्रोह के केस होने के बाद दो दिन से बिहार में छापेमारी करने पहुँचे पाँच सदस्यों के पुलिस दल को यह बात पता चली की शरजील अपनी प्रेमिका के संपर्क में है। जिसके बाद पुलिस ने शरजील की प्रेमिका से संपर्क किया और उसकी मदद से शरजील इमाम गिरफ्तार हो पाया।
दिल्ली क्राइम ब्रांच और बिहार पुलिस ने सोमवार (जनवरी 27, 2019) को शरजील के जहानाबाद स्थित पैतृक घर पर छापा मारकर उसके छोटे भाई को हिरासत में ले लिया था। भाई से पूछताछ के दौरान पुलिस को शरजील के किसी दोस्त इमरान का पता चला था। जब इमरान को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई तो शरजील की प्रेमिका के बारे में जानकारी मिली।
इसके बाद पुलिस ने शरजील की प्रेमिका पर दबाव डालकर उससे शरजील को मलिक टोला स्थित इमामबाड़े में मिलने के लिये बुलाया। जैसे ही शरजील इमामबाड़े में अपनी प्रेमिका से मिलने पहुँचा, वैसे ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस द्वारा पूछताछ के बाद शरजील इमाम अपने भाषण को लेकर पछतावा ना होने की बात स्वीकार की है। साथ ही, उसने कहा कि वह अपना विरोध जारी रखेगा। दिल्ली पुलिस ने खुलासा किया है कि शरजील इमाम घोर कट्टरपंथी है और उसका मानना है कि भारत को एक इस्लामी राज्य होना चाहिए। पूछताछ में उसने यह भी माना है कि उसके अलग-अलग भाषणों के वीडियो के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है।
देश के विभिन्न हिस्सों में राजद्रोह का मुकदमा दर्ज होने के तुरंत बाद से ही भारत को तोड़ने की बात करने वाला चिंगारी छोड़कर शरजील इमाम फरार हो गया था। शरजील ने अपने भाषणों में देश को बाँटने, असम को भारत से काट देने जैसी बातें कही थी। उसने दिल्ली, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय समेत पटना में भी भाषण दिए। ऐसे में पुलिस अब शरजील को जामिया और अलीगढ़ ले जाने की तैयारी कर रही है जिससे वीडियो में दिखाई दे रही जगहों को चिह्नित किया जा सके। 
Image result for शरजील इमामशर्जील इमाम को हीरो बनाने के लिए ‘लिबरल गिरोह’ अब क्या-क्या करेगा कमाल?
देश से असम को काटकर अलग कर देने की बात करने वाले शर्जील इमाम की गिरफ्तारी के साथ ही सोशल मीडिया पर #ISUPPORTSHARJEEL ट्रेंड कराने की कोशिश शुरू हो चुकी है। एक समुदाय विशेष के लोगों के साथ मीडिया गिरोह के कुछ पत्रकार भी बढ़-चढ़कर शर्जील का समर्थन कर रहे हैं। अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर रहे हैं। तर्क-कुतर्क करके ये साबित किया जा रहा है कि शर्जील ने जो कहा वो सही है और मोदी सरकार व उनके समर्थक जानबूझकर उसे देशद्रोही बता रहे हैं।
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि ये सब पहली बार नहीं हो रहा। जिस तरह से देश के ख़िलाफ़ बयानबाजी करने वालों को अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में छिपाया जाता रहा है। उनके प्रति संवेदना दिखाई जाती रही है। एक तय क्रम के साथ उनके विवादों में आने के बाद उन्हें हीरो बनाने की कोशिश हुई। उससे पहले के घटनाक्रमों और इन गिरोहों के एजेंडे को देखते हुए ये स्पष्ट हो चुका है कि शर्जील इमाम के मामले में अब आगे क्या-क्या हो सकता है? पूरी तत्परता के साथ कार्य शुरू हो चुका है जिस पर आप सबकी नजर पड़ी होगी। अब जरा ध्यान से नीचे दी गई टाइमलाइन पर नजर डालिए।
क्या याकूब मेमन, अफ़ज़ल गुरु और बुरहान वानी का समर्थन कर चुके लोग शरजील इमाम को उसके हाल पर छोड़ देंगे? नहीं ऐसा नहीं होगा तो क्या होने की संभावना है इसके लिए पूरी क्रोनोलॉजी समझिए।
  1. आज बड़ी चालाकी से उसे “जेएनयू का छात्र” लिखा जा रहा है, “द वायर का पत्रकार” नहीं।
  2. एक-दो दिन में उसके लिए सहानुभूति पैदा करने का काम शुरू होगा, जिसके लिए यही छात्र शब्द बुनियाद बनेगा।
  3. बताया जाएगा कि वो तो चिकेन नेक पर चक्का जाम की बात कर रहा था। जैसाकि न्यूज़ चैनलों पर परिचर्चा के दौरान कहा भी गया था। अब और तेजी पकड़ेगा।  वैसे दो दिन से देखा जा रहा है कि कोई न कोई कट्टरपंथी परिचर्चा छोड़ भाग रहा है। 
  4. सेक्युलर मीडिया उसके पक्ष में संपादकीय लिखेगा, संपादक ट्वीट करेंगे।
  5. बताया जाएगा कि जेएनयू के नकाबपोशों को तो पुलिस अब तक नहीं पकड़ पाई।
  6. मानो कैंपस में मारपीट करना और असम को देश से अलग करना एक जैसा अपराध है।
  7. धीरे-धीरे उसे ब्रांड बनाया जाएगा। यूएन का ह्यूमन राइट्स कमीशन उसकी गिरफ़्तारी पर चिंता जताएगा।
  8. प्रियंका वाड्रा शरजील इमाम की माँ से मिलने जाएगी। उनसे लिपटकर फ़ोटो खिचवाएँगी।
  9. दिल्ली में चुनाव का दौर है, कुछ नेताओं की उसके माता-पिता की सहानुभूति की आड़ में अपने वोटबैंक को साधने में लग जाएंगे। 
  10. “विराट हिन्दू ” नाम के फ़ेसबुक अकाउंट से शरजील को ग़द्दार कहा जाएगा, जिसका स्क्रीनशॉट दिखाकर राहुल कँवर और रवीश जी प्राइम टाइम करेंगे कि क्या भीड़ तय करेगी कि कौन ग़द्दार है।
  11. मेरठ में  कोई  “हिन्दू सेना” शरजील इमाम की गर्दन काटने पर 5 लाख रुपये इनाम घोषित करेगी। 3 दिन तक चैनलों पर ख़बर चलेगी।
  12. PFI बड़े वकीलों के अकाउंट में 50-60 लाख रुपए भेजेगा, ताकि वो उसका मुकदमा लड़ें।
  13. मुक़दमा ट्रायल कोर्ट में नहीं, सीधे सुप्रीम कोर्ट में चलेगा।
  14. अदालत पर “जनभावनाओं” का दबाव बनेगा और उसे ज़मानत पर रिहा कर दिया जाएगा।
  15. इसके बाद वो देशभर के चैनलों में नागरिक अधिकारों के प्रवक्ता के तौर पर बुलाया जाएगा।
  16. लिट्रेचर फ़ेस्टिवल में उसके सेशन में सबसे ज़्यादा भीड़ होगी। जहां बुर्के वालियां उसके साथ सेल्फ़ी खिचवाएँगी।
  17. धीरे-धीरे आम लोगों को भी को लगने लगेगा कि स्टूडेंट ही तो है। ग़लती हो गई। क्या फ़र्क़ पड़ता है?
  18. अगली बार कोई तमिलनाडु, केरल, बंगाल को देश से तोड़ने की बात करेगा। हम चुप रहेंगे छोड़ो जाने दो, हमको क्या फ़र्क़ पड़ता है। 
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार शाहीन बाग का मास्टरमाइंड शरजील इमाम भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता था। दिल्ली पु...
इन सब बातों का अनुमान कर पहले से व्यक्त कर देना इतना भी मुश्किल नहीं है। क्योंकि लिबरल गिरोह कैसे संचालित होता रहा है, अब लोग उनके चालों और छल-कपट-धूर्तता से भली भाँति परिचित होने लगे हैं। हो सकता है कि पैटर्न में थोड़ा बदलाव भी नजर आए लेकिन मूल भावना शाहीन बाग़ के मास्टरमाइंड शरजील को पाक-साफ साबित कर एक नए युवा क्रान्तिकारी नेता के रूप में स्थापित करने की होगी। क्योंकि कन्हैया पर लगाया गया दाव वामपंथी गिरोह को फेल होता नज़र आ रहा है और उसकी मुस्लिम समुदाय में उतनी पैठ भी नहीं है।

CAA-NRC: क्या हिन्दू घृणा वाला सेकुलर ज़हर बाहर रिस रहा है ?

मुनव्वर राणा, शेहला रशीद, आरफा खानम, राहत इंदौरी
मुनव्वर राणा, शेहला रशीद, आरफा खानम, राहत इंदौरी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जो हिन्दू लोग आदम में यकीन नहीं करते क्योंकि कोई मतलब नहीं है। उनका फंडा अलग है। सोंच अलग है। ऐसे लोग कभी हिन्दू-मुसलमान की गन्दी सोंच से बाहर आ ही नहीं सकते। और इसी गन्दी सोंच के सहारे ये लोग अपनी जीविका चलाते हैं। जिस कारण राष्ट्रीयता की सोंच इन लोगों से कोसों मील दूर है। आदमी आज के दौर में व्यक्ति को कहते हैं, मानव को कहते हैं। देश के लिए नागरिक की अवधारणा होती है जहाँ लोगों के पहचान मिट जाते हैं, और बस राष्ट्रीय पहचान होती है कि हम भारतीय है, जापानी हैं, चीनी हैं, अरबी हैं।
भारत एक सेकुलर देश माना जाता है। माना इसलिए जाता है क्योंकि इस शब्द विशेष को नेता अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। वैसे सेकुलर का मतलब गैर हिन्दू या गैर दक्षिणपंथी होता है।  शब्दों के अर्थ काल, परिस्थिति,  देश और संदर्भ में बदल जाते हैं।
सेकुलर के नाम पर आप हिन्दुओं के देवी-देवताओं का अपमान कर सकते हैं, उनकी मूर्तियाँ तोड़ सकते हैं, मंदिरों को गिरा सकते हैं, उनके प्रतीक चिह्नों का उपहास कर सकते हैं, और न तो हिन्दू, न ही भारत का कोई कानून आपका कुछ कर पाएगा। उसे हमारे सेकुलर संविधान में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ कहा गया है। यही आज़ादी किसी भी गैर हिन्दू (या हिन्दू के अंग-प्रत्यंग) वाले मजहबों के ऊपर नहीं है। अगर आपने गलत संदर्भ में भी कुछ भी कह दिया, कुछ भी मतलब कुछ भी, तो दो-दो साल से घात लगा कर बैठा मुसलमान आपको ऐसे रेत देगा कि लाश देखने वालों की आत्मा काँप जाएगी।
सेकुलर मुसलमान वहीं तक नहीं रुकता। वो आपको कमेंट में, उसके ख़िलाफ़, उसके दंगों के ख़िलाफ़ लिखने पर, आपको याद दिलाएगा कि ‘तुझे भी काटेंगे साले कमलेश तिवारी की तरह, इंशाअल्लाह’। लगभग तीन दशक पूर्व, शायद केरल के एक प्रोफेसर जोसेफ ने प्रश्न-पत्र में इस्लाम सम्बन्धित प्रश्न क्या पूछ लिया, कट्टरपंथियों ने उस प्रोफेसर का हाथ ही काट दिया था। देखिए कोई #mob lynching, #intolerance और #award vapsi आदि गैंग नहीं बोला। ऐसा मुसलमान ऐसे दुष्कृत्यों को सम्मान की तरह देखता है। ऐसा मुसलमान आतंकियों को, जिसने उसके पूर्वजों की बस्तियों को आग लगाया था, उनकी लड़कियों का बलात्कार किया था, उनके मंदिर तोड़े थे, और अंत में तलवार की नोक पर मुसलमान बना दिया था, बस इसलिए महान समझता है क्योंकि वो भी मुसलमान हैं।
आज इसलिए उनकी चर्चा हो रही है क्योंकि आमतौर पर जिन लोगों को पूरा भारत कवि, शायर, इतिहासकार, पत्रकार, धर्महीन वामपंथी समझता रहा, वो CAA और NRC के विरोध के नाम पर हो रहे दंगों को न सिर्फ सहमति दे रहे हैं, बल्कि उकसा रहे हैं "मरना ही है तो लड़ कर मर जाओ"। ये लोग अब रंगरेज के नीले रंग वाले नाँद से जितना दूर जा रहे हैं, इनका हरा रंग उतना ही बाहर आता जा रहा है। 
इन लोगों को आरिफ मोहम्मद खान के इस वीडियो को बार-बार देखना और इस पर मंथन भी करना चाहिए:-
हरे रंग में समस्या नहीं है, समस्या तब है जब तुम दिख तो हरे रहे हो, लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हो कि ‘हम तो नीले हैं।’ ये सारे कवि, शायर, पत्रकार, इतिहासकार, वामपंथन अचानक से आदमी से मुसलमान हो गए हैं। और मुसलमान नहीं, वैसे मुसलमान हो गए हैं जो सेकुलर होने की परिभाषा से कहीं बहुत दूर, भारत को ये बता रहे हैं कि इनके बापों ने भारत पर राज किया था, ये लिख रहे हैं कि तिलकधारियाँ नहीं चलतीं, ये कह रहे हैं कि भारत माता की जय साम्प्रदायिक है, और ला इलाहा इल्लल्लाह बिलकुल भी साम्प्रदायिक नहीं, ये चिल्ला रहे हैं कि मुसलमानों के साथियों को मुसलमान नारे का सम्मान करना ही होगा
ये सारी इस्लामी बातें किस बात के विरोध में? एक कानून के विरोध में जिसका भारत के मुसलमानों से कोई वास्ता नहीं। तो सवाल यह है कि ये जो मुनव्वर राणा अचानक से मुसलमान हो कर ‘मरना ही मुकद्दर है तो फिर लड़ के मरेंगे’ की बात करने लगे हैं, वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? आखिर इनको दर्द किस बात का है कि ये अभिजात्य अल्फ़ाज़ में दंगाइयों को उकसा रहे हैं कि ‘लड़ के मरो’?
आखिर ‘माँ’ के नाम पर शायरी करने वाले मुनव्वर राणा किस बात से इतने दुखी हो गए कि टिक-टॉक विडियो पर “800 वर्षों तक हमने देश पर राज किया, लेकिन हमारी हड्डी में उबाल नहीं आया, लेकिन पाँच साल से तुम्हें सत्ता मिल गई है तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! बहुत ज्यादे सनक में मत रहो, वरना अगर हम अपने पर आ गए तो भागने का रास्ता नहीं रहेगा…” बोलने वाले मुसलमान लम्पट का परिष्कृत संस्करण बन कर ‘यही वो मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था’ लिख रहे हैं?
आखिर राहत इंदौरी ‘ये तिलकधारियाँ नहीं चलती’ कह कर ‘तिलक करने वाले हिन्दुओं को इतने घृणित लहजे में क्यों ललकार रहा है? इस आदमी को क्या समस्या हो गई है जिसकी महफिलों में मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू ही हुआ करते हैं? वो तिलकधारियों को मक्कार क्यों कह रहा है? आखिर एक शायर, जिसे संवेदनशील और ग़ैर राजनीतिक माना जाता है, वो किसी पार्टी और देश के प्रधानमंत्री, और उन्हें वोट देने वालों पर शब्दों की मदद से ऐसे निशाने क्यों लगा रहा है?
आख़िर फ़ैज अहमद फ़ैज के उस नज़्म को गाने की ज़रूरत आज के भारत में क्यों पड़ती है, जहाँ लगातार दो बार, पूर्ण बहुमत से चुन कर एक प्रधानमंत्री आया है, जो नज़्म एक पाकिस्तानी तानाशाह के लिए गाई गई थी? मैं क्या संदर्भ भूल जाऊँ कि तुमने मेरे चुने हुए, लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री को पहले तो तानाशाह कहा और फिर, इस्लामी शायरी से लेकर तमाम तरीक़ों में काफिरों के लिए एक अंतर्निहित, स्थायित्व लिए हुए घृणा ली हुई बातों को दोहराया जहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ का मतलब सीधा इस बात से है कि भाजपा को ‘हिन्दुओं की पार्टी’ कहा जाता है। क्या हम इतने मूर्ख हैं कि बिम्बों को न समझ सकें?
‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है?
क्या हम ये कह कर तुम्हारी बात मान लें कि वो बस एक नज़्म थी, जो गाई गई IIT कानपुर में? क्या वो नज़्म किसी ने ट्विटर पर डाली थी, एक रैंडम दिन में किसी ने अपनी प्रेमिका को भेजी थी वो नज़्म, या फिर किसी तानाशाह के लिए लिखी गई और आज के दौर में गाई गई उस नज़्म में तानाशाह मोदी है, और ‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है? हम क्या इतने मूर्ख हैं कि इस्लामी शायरी के भीतर की हिन्दू घृणा के ज़हर को समझ न सकें? तुम मोदी को हिटलर से प्रतीकात्मक तौर पर तौलते रहो, तुम नाज़ियो के चिह्न से हमारा पवित्र ‘ॐ’ बना दो, नीचे ‘फक हिन्दुत्व’ लिखो, और हम ये मान लें कि ये तो विरोध का एक तरीका है, हिन्दुत्व से मतलब हिन्दुओं से नहीं राजनैतिक विचारधारा से है!
इसी नज़्म पर एक और नौटंकी जो दिखी वो यह थी कि सारे वामपंथी और हिन्दुओं से घृणा करने वाले एक फर्जी खबर बना कर फैलाने लगे कि IIT कानपुर ने इस बात की जाँच पर एक कमिटी बिठा दी है कि ‘ये नज्म हिन्दू विरोधी है या नहीं’। जबकि सच्चाई इससे अलग यह है कि कमिटी इस बात की जाँच करेगी कि जो आयोजन हुआ वो संस्थान के नियमों के हिसाब से हुआ या नहीं, उसके बाद सोशल मीडिया पर जो बातें कही गईं, वो सही थीं, या गलत। लेकिन इरफान हबीब जैसे लोग अपना एजेंडा ठेलने से बाज नहीं आए।
इन कट्टरपंथियों साम्प्रदायिकतों को शायद नहीं मालूम कि जितना आराम से मुसलमान भारत में है, उतना किसी मुस्लिम देश में नहीं। इस तरह की शायरी अगर किसी मुस्लिम देश में की होती, ऐसे शायरों को सलाखों के पीछे फेंक दिया होता। चीन ही को ले लो, जहाँ रोजा अथवा ईद को तो छोड़ो, घर में कुरान रखने के साथ नमाज़ तक पढ़ने पर पाबन्दी है। अगर जिगर वाले हैं, चीन जाओ, और वहां की संस्कृति अथवा कानून के विरुद्ध ऐसी शायरी कर के दिखाएं, कोई बचाने वाला नहीं मिलेगा।  
जिस वामपंथ में धर्म-मजहब की कोई पहचान है ही नहीं, वो शेहला रशीद, मुसलमानों के मजहबी उन्मादी नारों की बात करते हुए कहती है कि अगर आप उनसे शर्मिंदा हैं तो आप हमारे सहयोगी नहीं हैं। अगर आपको इन नारों से दिक्कत है, तो आप भी समस्या का ही हिस्सा हैं। और जनाब इनके वो मजहबी नारे क्या हैं? वो नारे हैं: हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर, तेरा मेरा रिश्ता क्या ला इलाहा इल्लल्लाह…
ये हैं वो नारे जो एक मजहबहीन वामपंथन ‘नॉन-नेगोशिएबल मानती है। और आप फिर सोचेंगे कि एक राजनैतिक विरोध-प्रदर्शन में ‘मजहबी नारों की क्या ज़रूरत है’ तो आपको जवाब नहीं मिलेगा। शेहला रशीद यह मान कर चल रही है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही सेकुलरिज्म तेल लेने चला गया था। ये बात और है कि जब इनका सेकुलरिज्म तेल ले कर वापस लौटा तो पहले जामिया में आग लगाई, फिर सीलमपुर में पेट्रोल बम फेंका, फिर लखनऊ के परिवर्तन चौक में आग लगाई, फिर बंगाल में ट्रेन फूँक दिया, बिजनौर में आग लगाई, मेरठ और अलीगढ़ को लहका दिया। वाकई, सेकुलरिज्म तेल तो बार-बार लेने गया है मोदी के आने के बाद, खास कर मुसलमानों का सेकुलरिज्म जहाँ वामपंथन भी खुल कर मुसलमान हुई जा रही है!
शशि थरूर ने लम्बे समय के बाद कुछ ढंग की बात कही कि मुसलमानों को समझना चाहिए कि CAA/NRC के प्रदर्शन में ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ जैसे नारों की जगह नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह को लाया जा रहा है। ये बात कई मुसलमानों को नहीं पची क्योंकि उनके लिए हर प्रदर्शन विशुद्ध रूप से मजहबी है क्योंकि उनके लिए पहचान का मतलब भारतीयता, नागरिकता और सामान्य बातों से परे सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है, उम्माह है, कौम है।
स्वयं को पत्रकार कहने वाली आरफ़ा खानम ने कुछ समय पहले ट्वीट किया था कि ‘हाँ, भारत माता की जय एक साम्प्रदायिक नारा है’, उसने आज पत्रकारिता को ढोंग त्यागते हुए, खुल कर सामने आ कर कहा कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, इंशाअल्लाह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक, इस्लामी कट्टरपंथी नारे नहीं हैं। इन सारे नारों को या तो आप सीधा ‘शब्दों को झुंड’ के रूप में देख सकते हैं, या फिर आप इन्हें संदर्भ में देखेंगे।
‘भारत माता की जय’ कहने से हम किसी देवी की पूजा नहीं करते, हम अपनी मातृभूमि की जय-जयकार करते हैं। यहाँ किसी का मुसलमान होना तब तक प्रभावित नहीं होता जब तक वो इस भाव से जय-जयकार न करे जहाँ वो यह मानने लगे कि ‘अल्लाह के अलावा भी कोई है जिसे वो पूजनीय मानता है’। दूसरी बात, साम्प्रदायिक मानने के लिए किसी भी बात में नकारात्मकता आवश्यक है, वहाँ शाब्दिक या और तरह की हिंसा होनी चाहिए, मंशा होनी चाहिए नीचा दिखाने की।
मुझे नहीं लगता कि ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए कोई किसी को नीचा दिखाना चाहता है, या किसी भी प्रकार के हिंसक भाव रखता है। लेकिन, उसके उलट एक राजनैतिक कानून के विरोध में, जब हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, फक हिन्दुत्व आदि के साथ-साथ, उसी समय-काल में, उन्हीं परिस्थितियों में, उसी संदर्भ में जब ‘नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर’ गूँजता है, तो वो विशुद्ध मजहबी उन्माद है क्योंकि ये नारा तुम सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और एक दूसरे धर्म को नीचा दिखाने के लिए लगा रहे होते हो। तुम ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहो, कोई समस्या नहीं, लेकिन ये सिर्फ मजहबी जमावड़े में बोलो, राजनैतिक में घुसाओगे तो हमें याद आएगा कि तुम्हारा लक्ष्य तो गजवा-ए-हिन्द और ख़िलाफ़त तक का है।
धर्म निरपेक्ष होने का ढोंग 
इन लोगों की ही तरह दसियों मुसलमान ऐसे मिलेंगे आपको जो बिना इस कानून को पढ़े, बिना ये जाने कि NRC के ड्राफ्ट तक अभी बाहर नहीं आया है, इन दंगाइयों को अपनी सहमति ये कह कर दे रहे हैं कि मुसलमानों के अस्तित्व पर संकट आ गया है। सामने से पूछे जाने पर ये बार-बार यह भी कह रहे हैं कि आम लोगों को सरकार समझाने में असफल रही है, जबकि सत्य यह है कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है, लेकिन यही लोग आम लोगों में डर भरते जा रहे हैं।
मुनव्वर राणा की, राहत इंदौरी की, इरफान हबीब की, शेहला रशीद की, आरफा खानम की और उन हजारों दंगाई मुसलमानों की समस्या CAA या NRC नहीं है। इनकी समस्या यह है कि इनके भीतर का घमंड, एक विशेष होने का भाव जो पिछली सरकारों ने इनमें गहरे भर दिया था, वो अचानक से छिन-सा गया है। वो, जिनके मजहब के लोगों के आतंकी होने पर, 22 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी, रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवा लिए जाते थे, उनकी बात की अब कोई वैल्यू नहीं रही।
वो जो यह चिल्लाते थे कि ‘तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निगलेगा’, आज दंगा करने के बाद योगी सरकार को अपने समुदाय द्वारा किए गए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे लौटा रहे हैं। वो, जो मजहब की आड़ में भारत का झंडा, राष्ट्रीय गीत और जय बोलने से कतराते थे, आज, भले ही दंगा करने और आग लगाने के लिए ही सही, भीड़ में तिरंगा लिए घूम रहे हैं। इनके घमंड के गुब्बारे में जो हवा भरी जाती रही थी, उसमें इस सरकार ने पहले तो हवा भरना बंद किया, और दूसरे चरण में पिन मारना भी शुरू कर दिया है, तो फटे गुब्बारे से कुछ आवाज तो आएगी ही।
वो, जो सोचते थे कि कश्मीर से पंडितों के भगा देने के बाद, कश्मीर को अलग देश बना लेंगे और उसी चक्कर में कश्मीर को नक्शे पर भी न पहचान सकने वाले मुसलमान भी खुश हो जाते थे, आज परेशान हैं कि कश्मीर में अब भारत का संविधान लागू है, और उसका झंडा भी तिरंगा है। वो, जो सोचते थे कि संविधान से ऊपर कोई मुसलमानी पर्सनल लॉ बोर्ड है, तीन तलाक के ग़ैर क़ानूनी करार दे दिए जाने से इसे मजहब पर हुए हमले के रूप में देख रहे हैं।
वो, जिन्होंने सोचा था कि इरफान हबीब जैसा चिरकुट उपन्यासकार, अपने चेलों को कोर्ट में भेज कर, भारत को यह समझा देगा कि भारत का इतिहास मुसलमान आतंकवादी बाबर के आने के बाद से ही शुरू होता है, वो राम मंदिर के गगनचुम्बी शिखरध्वज को कैसे देख पाएँगे? वो, जो सोचते हैं कि बौद्धों को हथियार उठाने पर मजबूर कर देने वाले आतंकी रोहिंग्या और बांग्लादेश से भारत में घुसे घुसपैठियों को भारत में इसलिए जगह मिल जानी चाहिए क्योंकि वो उनके उम्माह का हिस्सा हैं, उनके हकूक हैं, उन्हें भारतीय नागरिकों के रजिस्टर बनने से तो समस्या होनी ही है।
इसीलिए, केंचुली उतार कर ये पूरा विरोध अब ‘हम बनाम वो’ का हो गया है। इस पूरे विरोध का लहजा ‘मुसलमान बनाम काफिर’ का हो चुका है। वो खुल कर कह रहे हैं कि ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’, वो चिल्ला कर जामिया की गलियों में कह रहे हैं कि उन्हें ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ चाहिए। वो दिन के उजाले में दीवारों पर हमें ‘कैलाश जाओ’ लिख कर बता रहे हैं। वो एक राजनैतिक प्रदर्शन में हजारों की भीड़ जुटाते हैं और पूछते हैं कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और आवाज आती है ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’। वो ख़िलाफ़त 2.0 के ख्वाब AMU की दीवारों पर लिख रहे हैं और हिन्दुत्व, यानी हिन्दुओं से जुड़ी हर बात, विचार, पूजा, व्यक्ति, ग्रंथ आदि की कब्र खोदने की बातें कर रहे हैं।
हिन्दू आज भी पॉलिटिकली करेक्ट होना चाह रहा है। वो ये मान रहा है कि ये लोग भटके हुए, गुमराह लोग हैं, इनके नारों का कोई मतलब नहीं, ये तो बस ऐसे ही है। ये लड़ाई अब खुले में सुनाई पड़ रही है। अब दिख रहा है कि इनका लक्ष्य कोई कानून या संविधान नहीं, इनकी आँखें शिथिल हो कर ‘गजवा-ए-हिन्द’ का आस देख रही है, और दाहिने-बाएँ इन्हें कुछ नहीं दिख रहा। ये नारे सीढ़ियाँ हैं, ये वो चरण है प्रयोग का जहाँ देखा जा रहा है कि पूरे भारत का मुसलमान बाहर आ सकता है क्या?
अभी आँकने का मौका है कि जब महत्वपूर्ण जगहों पर बैठे मुसलमान, एक पहचान पा चुके मुसलमान, वैसे मुसलमान जो वैचारिक स्तर पर नेतृत्व दे सकते हैं, उनके खुल कर बाहर आने पर कितने मुसलमान उनकी बातें मानेंगे। इसीलिए, आज पढ़ा-लिखा, कॉलेज जाता मुसलमान भी NRC के आए बिना ही कह रहा है कि उसके कागज तो बाढ़ में बह गए, 90 साल की बुजुर्ग असमा कह रही है कि दसवीं फेल मोदी अपने सात पुश्तों के नाम गिनाए। जब आम आदमी गृहमंत्री की अपील को सीधे कह दे कि वो तो झूठ बोल रहा है, एक चुनी हुई सरकार के सासंदों द्वारा पारित कानून को यह कह कर नकार दे कि सासंद तो बस 300 ही हैं, हम तो हजारों में हैं, तब आप समझ जाइए रंग उतरा ही नहीं, रंग दिखाया जा रहा है कि पहचानो, हम कौन हैं!

मजहबी नारे, इतिहास के आतंकियों के शासक होने के दिन, और हिन्दुओं से घृणा की बातें खुल कर हो रही हैं। बाकी का काम मीडिया गिरोह सक्रिय हो कर कर ही रहा है जहाँ बीस दिन की नवजात बच्ची को विरोध-प्रदर्शन की नायिका के रूप में भुनाया जा रहा है। अचानक से भीम-मीम में इसलिए दरार पड़ती दिख रही है कि भीम वालों को मजहबी नारे अनुचित लगते हैं। अब भीम सोच रहा है कि मीम वाले तो उनको पागल बना रहे हैं, इनका एजेंडा तो कुछ और ही है। बाकी का काम इस उम्मीद ने कर दिया जहाँ शेहला रशीद कहती है कि अगर तुम हमारे साथ हो तो आरक्षण में हमें भी हिस्सा दे दो!
भीम वाला आज भी जोगेंद्र नाथ मंडल को नहीं जानता कि मीम के झंडाबरदारों ने उनका क्या हश्र किया था। भीम वालों की लड़ाई राजनैतिक है, वो अपने हक के लिए बार-बार उठते रहे हैं। उनकी लड़ाई शोषण से है, बराबरी की है, और अब अचानक से उनसे कहा जा रहा कि ‘बोलो भाई तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और भीम वाला सोच में पड़ जाता है कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कैसे बोल दे!
आप भी इस मजहबी उन्माद को समझिए। आप भी यह समझिए कि सेकुलर होने का मतलब मुसलमानों के लिए अलग है, हिन्दुओं के लिए अलग। एक सेकुलरिज्म की आड़ में आपके देवी-देवता का उपहास करता है, और आप हैं कि ईद की सेवइयाँ खाने के लिए पागल हुए जा रहे हैं। हिन्दुओं के लिए सेकुलर होने का मतलब है ‘सहना’। इसलिए, वो आज भी इन मजहबी उन्मादियों को आग लगाता देख रहा है और यह मान कर चल रहा है कि ये आग उसके घर तक नहीं पहुँचेगी।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आज देश में जिस प्रकार #CAA को लेकर शांति के नाम पर उग्र एवं हिंसात्मक प्रदर्शन हो रहे हैं,...
हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके ‘जय श्री राम’ नारे को आतंकी नारा बना कर एक महीने में कम से कम दस बार झूठ बोला गया ताकि उसके धर्म को बदनाम किया जा सके। यही हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके दसियों भाइयों को मुसलमानों की भीड़ ने लिंच किया है। हिन्दू यह भी भूल जाता है कि सैकड़ों साल पहले भी उसके मंदिर तोड़े जाते थे, आज भी हौज काजी समेत कई जगहों पर वही हो रहा है। हिन्दुओं को यह भी याद नहीं कि उनके काँवड़ यात्रा पर इस साल सावन के महीने में कितने जगहों पर पत्थरबाजी हुई है।
मुसलमानों के बीच की हस्तियाँ अब मुसलमान बन कर ही सामने आ रही हैं। उनके लिए इस्लाम ही एकमात्र पहचान है। उन्हें राजनैतिक विरोध प्रदर्शन में ‘नारा ए तकबीर’ और ‘हिन्दुओं से आजादी’ कहने में कोई समस्या नहीं दिख रही। मैं चाहता हूँ कि हिन्दू इस बात को बस दूर से देखे, दिमाग में बिठाए और अकेले में जा कर सोचे कि ये ‘सेकुलर’ शब्द जो है, उसका मतलब आखिर होता क्या है।

'शाहीन बाग प्रोटेस्‍ट प्रायोजित है... सारा कांग्रेस का खेल है' : अमित मालवीय, भाजपा नेता

'शाहीन बाग प्रोटेस्‍ट प्रायोजित है... सारा कांग्रेस का खेल है'- BJP नेता ने VIDEO ट्वीट कर लिखा
क्या यह जमावड़ा  शिफ्ट आधार पर दैनिक भत्ते पर हो रहा है?
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली शाहीन बाग़ में जमा बिकाऊ भीड़ से यदि यह पूछा जाए "क्या इस कानून को पढ़ा है?" अधिकतर का जवाब नहीं में मिलने के साथ यह बात उजागर होगी, जो अपना नाम भी ठीक से लिख पाएंगे/पाएंगी। प्राप्त समाचारों के अनुसार, शाहीन बाग़ पर विरोध करने असली आयोजक मुद्दे का राजनीतिकरण होते देख, अलग हो चुके हैं। समाचार चैनलों पर होनी वाली परिचर्चाओं में अप्रत्यक्ष रूप से इस समाचार की पुष्टि हो रही है। अपनी खोई जमीन को हासिल करने वामपंथी और कांग्रेस इसे 6 फरवरी(दिल्ली में चुनाव प्रचार का अंतिम दिन) तक जीवित रखने रूपए देकर हंगामा भड़पा रही है। 
काफी दिनों से सोशल मीडिया पर इस सम्बंधित वीडिओ खूब चर्चा में हैं, जिसमे विरोध बनाम घोटाले का पर्दाफाश हो रहा है। लेकिन पुष्टि न होने के कारण लिखने का साहस नहीं हुआ, लेकिन जब वही वीडियो भाजपा नेताओं द्वारा ट्वीट करने उपरान्त ही साहस कर पाया। 
इतना ही नहीं, CAA के विरोध में अपनी कविता से सुर्खियां बटोरने वाले वरुण ग्रोवर अमेरिका जाने के लिए कागज तो क्या सबकुछ खोलकर दिखाने जा रहे हैं, लेकिन भारत में कुछ नहीं दिखाएंगे। अब जनता को भी ऐसे षडयंत्रकारियों से सावधान होकर, देश में अराजकता फ़ैलाने के लिए ठोकर मार भगा देना चाहिए। मुसलमानों के सबसे दुश्मन कोई नहीं, ये ही लोग हैं, जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए जनता को बलि का बकरा बनाने से नहीं चूकते। विश्व में भारत में रहने वाला शांतिप्रिय मुसलमान को भी एक आतंकवादी की लाइन में खड़े करने वाले भी यही लोग है। देश में हिन्दू-मुसलमान कर दंगे करवाने वाले भी ये ही लोग हैं। बस इस कटु सच्चाई को समझने की जरुरत है। वरना विरोध में भाग लेने वाले और विरोध का आयोजन करने वाले किसी भी नेता से पूछा जाए कि "किसी एक ऐसे देश का नाम बताएं, जहाँ यह कानून नहीं है।" फिर इस बिल को बनाने वाले कौन थे? कपिल सिबल ने बिल बनने पर यहाँ तक कहा था कि "मुसलमानों को नागरिकता नहीं दो।"    
नागरिकता कानून (Citizenship Amended Act) एवं राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के खिलाफ दिल्‍ली के शाहीन बाग (Shaheen Bagh) में करीब महीने भर से धरने पर बैठी महिलाओं को लेकर बीजेपी नेता अमित मालवीय (Amit Malaviya) ने ट्वीट किया है, जिसमें एक युवक यह बता रहा है कि इस धरने में बैठने के लिए महिलाओं की शिफ्ट लगी है और इसके लिए उन्‍हें 500 से लेकर 700 रुपए भी मिल रहे हैं। बीजेपी नेता ने इस ट्वीट में लिखा, शाहीन बाग विरोध का पर्दाफाश... इसके आगे उन्‍होंने लिखा, सब पैसे के लिए है

बीजेपी नेता मालवीय ने ट्वीट करते हुए लिखा, 'शाहीन बाग प्रोटेस्‍ट प्रायोजित है... सारा कांग्रेस का खेल है'

दरअसल, CAA और NRC के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में धरने पर बैठी महिलाओं का कहना है कि नागरिकता को लेकर केंद्र सरकार द्वारा लिए गए हालिया फैसले संविधान के खिलाफ हैं। और इसकी कारण वे नागरिकता संबंधी प्रमाण नहीं दिखाएंगी
अगर इस वीडियो की बात करें तो इसमें दो लोग आपस में बात करते दिख रहे हैं, जिसमें एक युवक बता रहा है कि इस धरने में औरतों को शामिल होने के लिए 500-700 रुपये दिए जा रहे हैं और ये शिफ्ट में धरने पर बैठती हैं। वह कह रहा है कि जैसे 100 महिलाएं धरने पर बैठी हैं तो उनके जाने पर 100 ही महिलाएं तुरंत धरने में शामिल हो जाती हैं, यानि उनकी संख्‍या कम नहीं होनी चाहिए। 
साथ ही वीडियो में यह युवक आगे कह रहा है कि इस धरने में बैठी महिलाओं के लिए चार-बिरयानी सभी चीजों का इंतजाम किया गया है। वह युवक आगे कह रहा है कि ये लोग बस पैसा कमा रहे हैं, ये विरोध वगैरह कुछ नहीं हो रहा
वहीं, बीजेपी प्रवक्‍ता संबित पात्रा ने भी यह ट्वीट करते हुए लिखा, कश्मीर में 500 रुपये में पत्थरबाज़ी कराते थे, शाहीन बाग में 500 रुपये में बग़ावत कराते हैं। ये कौन हैं, जो चंद रुपयों के लिए बेबस हिन्दुओं, सिखों, जैनियों, बौध और ईसाइयों की पीड़ा को नज़रअंदाज कर केवल अपनी जेबों की चिंता करते है?
सोशल मीडिया पर चल रही इन वीडियोज को देख यही आंकलन निकलता है, कि शाहीन बाग़ विरोध केंद्र कम रोजगार केंद्र बन गया है, वरना छोटे बच्चे जिन्हे नाक पोंछने की तमीज तक नहीं, विरोध में शामिल हो रहे हैं, वो भी इतनी ठंठ में, दाल में कुछ काला नहीं, सारी की सारी काली कर रहे हैं।  
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पिकनिक मनाते प्रदर्शनकारी दिल्ली हाईकोर्ट ने शाहीन बाग़ में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर पुलिस से कहा है कि वो ज...
वरुण ग्रोवर
काग़ज़ नहीं दिखाने वाले वरूण चले अमरीका, सब कुछ ‘खोलकर’ दिखाएंगे
हाल ही में ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ नामक कथित कविता से चर्चा में आने वाले वरुण ग्रोवर अब अमेरिका में एक शो करने जा रहे हैं। कथित कॉमेडियन वरुण ग्रोवर ने नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) का विरोध करने के लिए एनआरसी (NRC) का मुद्दा उठाया और वाह-वाही लूटने का प्रयास किया था।
CAA के विरोध के लिए वरुण ग्रोवर ने ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ नामक एक कथित कविता भी लिखी, जिसे सोशल मीडिया पर वामपंथियों के गिरोह का खुला समर्थन भी मिला। मोदी विरोधी गैंग ने इस कविता को सोशल मीडिया में वायरल करने में जान लगा दी।
आज ट्विटर पर वरुण ग्रोवर ने एक ट्वीट करते हुए जानकारी दी कि वो मई-जून 2020 में स्टैंडअप कॉमेडी के लिए मशहूर ‘ऐसी-तैसी डेमोक्रेसी’ के साथ मिलकर अमेरिका में एक टूर करने जा रहे हैं। वरुण ने ट्वीट में लिखा है कि टिकट बुकिंग की जानकारी वो बाद में देंगे लेकिन अभी यह पोस्टर शेयर किया जाना ज्यादा जरुरी था।
वरुण ग्रोवर के इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उनसे सवाल किया है कि क्या वो अमेरिका में कागज दिखाएँगे या नहीं? ज्ञात हो कि अक्सर बॉलीवुड एक्टर और एक्ट्रेस विदेशों में एयरपोर्ट पर होने वाली चेकिंग का रोना रोते हैं और यह दलीलें भी देते नजर आते हैं कि उनसे उनके ‘कागज़’ माँगे गए।
वरुण ग्रोवर के सोशल मीडिया पर निशाने पर आने की यह एक बड़ी वजह मानी जा सकती है क्योंकि अपने देश में सरकार, कानून एवं कानून निर्माताओं का खुला विरोध करने वाले वरुण ग्रोवर अब अमेरिका में चुपचाप बुत की तरह खड़े होकर अपने कागज़ दिखाने जा रहे हैं।


CAA और NRC के विरोध में ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ नामक कथित कविता के बाद ही वरुण ग्रोवर ने अपने एक शो की जानकारी ट्वीट करते हुए टिकट और पहचान के साथ ही शो में आने की भी फ़रियाद की थी। इसके लिए भी सोशल मीडिया पर वरुण ग्रोवर की खूब खिंचाई की गई थी।
वरुण ग्रोवर की इस अमेरिका ट्रिप पर एक सज्जन की कविता ट्विटर पर पढ़ने को मिल रही है-
“अमेरिका अब हम जाएँगे
पैसे बहुत कमाएँगे
कौंसुलेट में लाइन लगाएँगे
पर कागज़ नहीं दिखाएँगे
मोदी तुझे कागज नहीं दिखाएँगे

वीएफएस में फोटो खिंचवाएँगे
डीएस 160 भी भर जाएँगे
पर कागज़ नहीं दिखाएँगे
मोदी तुझे कागज नहीं दिखाएँगे

सोशल मीडिया हैंडल भी बताएँगे
अमेरिका से कुछ न छिपाएँगे
फ़ोन ईमेल पता दे जाएँगे
पर कागज़ नहीं दिखाएँगे
मोदी तुझे कागज नहीं दिखाएँगे”