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अवार्ड वापसी गैंग : बजरंग पूनिया - केवल पद्मश्री क्यों ? अगर आत्मसम्मान है, बाकी माल भी वापस करना होगा

जो अवार्ड को जमीन पर रख दे, क्या अवार्ड के कारण मिली
किसी सुविधा का अधिकारी होना चाहिए?
सुभाष चन्द्र

ढोंगी पहलवानों ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आंदोलन चला कर उस पर मुक़दमे चलवा दिए लेकिन फिर भी उसके करीबी संजय सिंह के WFI के अध्यक्ष चुने जाने पर हाय तौबा मचा रहे है। चुनाव में जीत कर वो अध्यक्ष बना है, किसी ने जबरदस्ती नहीं बनाया है उसे अध्यक्ष। अभी प्राप्त समाचारों के अनुसार, सरकार ने चुनाव रद्द कर संजय सिंह को अध्यक्ष पद से हटा दिया है, इसे कोई अपनी जीत न समझे। 

लेखक 
लेकिन इस प्रश्न का भी उत्तर देना होगा कि जब बृजभूषण ने यौन शोषण किया था, तब क्यों नहीं शोर मचाया, धरना दिया? इस छिपे रहस्य से पर्दा हटाना होगा। 

बजरंग पूनिया - केवल पद्मश्री क्यों? बाकी माल भी वापस करना होगा फिर विरोध किस बात का जो साक्षी मलिक ने संन्यास ले लिया और बजरंग पूनिया ने पद्मश्री लौटाने के लिए प्रधानमंत्री को X पर चिट्ठी लिख दी

बजरंग पूनिया, भाई इतने श्याणा क्यों बन रहे हो? अगर इतना ही आत्मसम्मान की चिंता है तो हरियाणा सरकार ने तुम्हें ओलम्पिक में Bronze मैडल जीतने पर ढाई करोड़ रुपए की इनाम राशि भी थी, सरकारी नौकरी दी थी और 50% रियायत पर जमीन का प्लाट भी दिया था इतना ही नहीं तुम्हारे गांव के नजदीक स्टेडियम भी बनवाया था इन सब चीज़ों से भी तुम्हारा कोई मतलब नहीं होना चाहिए, केवल पद्मश्री वापस करने से बात नहीं बनेगी ढाई करोड़ रुपया भी वापस करो, नौकरी से त्यागपत्र दो और जमीन वापस करो हरियाणा सरकार को वरना बर्खास्त भी किए जा सकते हो इसी तरह साक्षी मलिक को भी सरकारी नौकरी मिली थी, उसे भी त्यागपत्र देना चाहिए। अगर वापसी नहीं करते हो, खुद ही साबित कर रहे हैं कि ये सब ड्रामा किसी की कठपुतली बनकर किया गया है। 

बजरंग पूनिया में कितना दम बचा है वह लोगों ने पिछले एशियाई खेलों में देख लिया और कोई भी “आन्दोलन जीवी” कुछ नहीं कर सका ये लोग केवल कांग्रेस के लिए चुनावी पिच तैयार करने में लगे रहे हैं

प्रियंका वाड्रा दौड़ कर इनके पास गई है टसुए बहाने के लिए जैसे इन बुझे हुए पहलवानों में ही कांग्रेस को सहारा मिल गया हो कांग्रेस के भड़काए हुए इन पहलवानों को याद होना चाहिए कि जो किसान नेता उछल कूद मचा कर पंजाब चुनाव में खड़े हुए थे उनमे कोई अपनी जमानत भीं नहीं बचा पाया था और अब अगर ये पहलवान भी चुनाव में कांग्रेस की तरफ से जोर आजमाना चाहते हैं तो इनकी भी वैसी ही दुर्गति होगी

सरकार ने खिलाड़ियों को उत्तम सुविधाएं दी हैं जिसका परिणाम है कि खिलाड़ी हर प्रतियोगिता में अपना कौशल दिखा सके हैं लेकिन बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक, विनेश फोगट और उनके तमाम चमचों ने खेलों को राजनीति का अखाड़ा बना कर अन्य खिलाड़ियों के साथ भद्दा मज़ाक किया है लेकिन अधिकांश खिलाड़ी इनके बहकाए में नहीं आए और उन्होंने अपनी प्रतिभा को दाव पर नहीं लगाया

सरकार को चाहिए बजरंग पूनिया, साक्षी मलिक और अन्य खिलाड़ियों को सरकारी नौकरी से तुरंत प्रभाव से बर्खास्त करे पद्मश्री के साथ मिला धन और सुविधाओं को भी तुरंत वापस ले। वापस न करने पर कानूनी कार्यवाही करे। ताकि भविष्य में अवार्ड वापसी गैंग अवार्ड वापस करने से पहले अपने दिमाग से काम ले। 

‘भारत में 100 करोड़ जानवर और 35 करोड़ इंसान’ – तथाकथित शायर मुनव्वर राना


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
चाहे नसीरुद्दीन शाह हो, मुनव्वर राना हो या फिर राहत इंदौरी हो, इन सबने खुद ही अपने आप को बेनकाब करने का काम किया है।
मुनव्वर राना की जमात विटामिन-C यानी, विटामिन-कांग्रेस की कमी से जूझ रही है। उनके अन्नदाता स्वयं हर तरह से बेनक़ाब हो चुके हैं। उनकी अपनी ही झोली में अब लुटाने के लिए पुरस्कारों का अकाल है।
उर्दू के मशहूर और विवादित शायर मुनव्वर राना ने फिर से एक ट्वीट किया है। ट्वीट इस बार भी विवादित ही है। मुनव्वर राणा ने लिखा है कि भारत में 35 करोड़ इंसान और 100 करोड़ जानवर रहते हैं।
मुनव्वर राणा ने यह ट्वीट भाजपा नेता संबित पात्रा को सम्बोधित करते हुए भारत में रहने वाले लोगों को लेकर लिखा है। शायर मुनव्वर ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से लिखा:

“डियर संबित, कांग्रेस की जवानी में तो आप गब्हे पे रहे होंगे (गब्हे का मतलब आप उड़ीसा में नहीं, यूपी में पूछना)। लेकिन कोरोना पर सरकार की नाकामी ने मेरी इस बात को सही साबित किया कि भारत में 35 करोड़ इंसान और 100 करोड़ जानवर रहते हैं, जो सिर्फ वोट देने के काम आते हैं।”
अपने इस ट्वीट पर एक कमेंट में मुनव्वर राना ने लिखा – “मैं झूठ के दरबार में सच बोल रहा हूँ, हैरत है कि सर मेरा क़लम क्यूँ नहीं होता।”

सोशल मीडिया पर जिस तरह से आप लिखने को स्वतंत्र हैं, ठीक उसी तरह से लोग कॉमेंट करने को। मुनव्वर राना के विवादित ट्वीट के जवाब में एक यूजर ने रिप्लाई कर लिखा:
“जितनी ज़हालत पेलने की आजादी हिन्दुस्तान में मिली है, यदि इतनी जहालत किसी शरिया कानून वाले मुल्क में करते तो तेरी सर कलम वाली ख्वाहिश भी पूरी हो जाती! शुक्र मना तू दुनिया के सबसे सहिष्णु हिन्दुओं के बीच रह रहा है, जिन्होंने कुत्तों को भी भौंकने की आजादी दे रखी है!”
इस विवादित ट्वीट के प्रकाश में आते ही अब मुनव्वर राना सफाई देते हुए भी नजर आ रहे हैं। 100 करोड़ इंसानों को जानवर (शायद हिंदुओं को) बताकर निशाना बनाने की कोशिश करने के बाद अब शायर मुनव्वर ने एक और ट्वीट करते हुए लिखा है:
“जिस तरह से हमारे ट्वीट को तोड़-मरोड़ कर हव्वा बनाया जा रहा है, वो सरासर ग़लत है। यहाँ 35 करोड़ वो लोग हैं जो ख़ुशहाल हैं, और 100 करोड़ लोगों से मुराद वो भारतवासी हैं, जो खाने-पीने और ओढ़ने-बिछाने जैसे हर बुनियादी हुक़ूक़ से महरूम हैं।”


मुनव्वर राना के इस ट्वीट पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।
मुनव्वर राना हिंदू जानवर
सस्ती लोकप्रियता के लिए भटकते लोग 
अवॉर्ड वापसी के कुछ समय बाद ही मुनव्वर राना ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि अच्छा शासक वो है, जो 60 साल की खराबियों को पाँच साल में ठीक कर दे, तो ही इतिहास में अकबर की तरह मोदी द ग्रेट लिखा जाएगा।
मुनव्वर राना ने दादरी की घटना के बाद भी हिन्दुओं को निशाना बनाते हुए कहा था कि देश ने अभी तक यह फैसला नहीं किया है कि आतंक शब्द का मतलब क्या है। उन्होंने कहा कि जिस दिन आतंक की परिभाषा तय हो गई, बहुत सारी पार्टियाँ प्रतिबंधित हो जाएँगी।
राहत इंदौरी से लेकर मुनव्वर राना, अनुराग कश्यप और ऐसे ही अन्य कथित उदारवादियों की जमात को आखिर पिछले कुछ सालों से ही ऐसे स्टंट की जरूरत क्यों पड़ गई? इन सब के जरिए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना क्यों आखिरी विकल्प हो गया?
यह सब घटनाक्रम अवॉर्ड वापसी की नौटंकी के बाद से अचानक शुरू हुआ था। कुछ ऐसे लोग थे, जिन्होंने तय कर लिया था कि अब अवॉर्ड वापसी ही इस देश में एकमात्र विपक्ष कहलाएगा। इसके लिए समय-समय पर नव-उदारवादियों द्वारा अभिव्यक्ति की आजादी को बलि का बकरा बनाया गया।
लेकिन इनके ‘अच्छे दिन’ नहीं आए और उदारवादियों की चहेती पार्टी फिर सरकार बनाने से चूक गई। 2019 में एक बार फिर दक्षिणपंथी भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र में स्थापित हो गई।
मुनव्वर राना वर्तमान सरकार और उसके क्रियाकलापों को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि वह जानते हैं कि वो चाहें तब भी यह सरकार उन्हें कोई ऐसा कदम नहीं उठाने देगी।
इसके बेहद दूरगामी परिणाम सामने आए। हुआ यह कि वामपंथी और नव-उदारवादी अब अपनी बेचैनी पर नियंत्रण कर पाने में पूरी तरह असमर्थ हो चुके हैं।
यही वजह है कि मुनव्वर राना ने एक ही ट्वीट के ज़रिए अपनी मंशा स्पष्ट करते हुए हिन्दुओं को जानवर और वोट बैंक बता दिया। मुनव्वर राणा ने यह ट्वीट भाजपा नेता संबित पात्रा को सम्बोधित करते हुए भारत में रहने वाले लोगों को लेकर लिखा है।
कल (मई 13)शाम ही मुनव्वर राना ने अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर लिखा है –
“डियर संबित, कांग्रेस की जवानी में तो आप गब्हे पे रहे होंगे (गब्हे का मतलब आप उड़ीसा में नहीं यूपी में पूछना)। लेकिन कोरोना पर सरकार की नाकामी ने मेरी इस बात को सही साबित किया कि भारत में 35 करोड़ इंसान और 100 करोड़ जानवर रहते हैं, जो सिर्फ वोट देने के काम आते हैं।”
अपने इस ट्वीट पर एक कमेंट में मुनव्वर राना ने लिखा है – “मैं झूठ के दरबार में सच बोल रहा हूँ, हैरत है कि सर मेरा क़लम क्यूँ नहीं होता।”
अवॉर्ड वापसी के कुछ समय बाद ही मुनव्वर राना ने PM मोदी पर निशाना साधते हुए कहा था कि अच्छा शासक वो है, जो 60 साल की खराबियों को पाँच साल में ठीक कर दे, तो ही इतिहास में अकबर की तरह मोदी द ग्रेट लिखा जाएगा।
शब्दों की कंगाली से जूझता शायर 
आप यदि 2015 के मुनव्वर राना के बयान और 2020, यानी कल के बयान में अंतर तलाशेंगे तो सबसे खास बात उनके शब्दों को इस्तेमाल करने की तरकीब में आया खुलापन है। 2015 में वो सिर्फ इशारों में ही हिन्दुओं के खिलाफ बयान देने में सक्षम नजर आते हैं जबकि 2020 तक उनकी बौखलाहट इतनी बढ़ गई कि उन्होंने ‘बुद्धिजीवी’ वाले सारे मुखौटे त्यागकर स्पष्ट शब्दों में हिन्दुओं की आबादी को जानवर घोषित कर दिया।
इन कलाकारों को ऐसी क्या दिक्कत आ गई कि ये अपनी अभिव्यक्ति के प्रकटन के लिए इतने निम्नस्तरीय और घृणित शब्दों का इस्तेमाल करने पर विवश हो गए?
गत वर्ष दिसम्बर माह में नागरिकता कानून के विरोध में भी मुनव्वर राना परिवार सहित फन फैलाते देखे गए। लखनऊ में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में प्रदर्शन करने को दौरान मुनव्वर राना की बेटियों के खिलाफ धारा-144 के उल्लंघन का मामला दर्ज होने के बाद उन्होंने सरकार के खिलाफ जहर उगला था।
कारण है कि अब स्टेज पर उन्हें जो मौके नहीं मिलते, उनकी पूर्ति वो ट्विटर और सोशल मीडिया पर अपने मजहबी जहर को उगलकर करने को मजबूर हैं।
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मुनव्वर राना की 2 बेटियों के खिलाफ UP पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज करने पर राणा ने दी सरकार को चेतावनी

मुनव्वर राना
आर.बी.एल.निगम 
जिस प्रकार पानी बिन मछली तड़पती है, ठीक वही स्थिति नागरिकता कानून बनने के बाद मोदी विरोधियों की होने के कारण धरने एवं प्रदर्शन से देश में अराजकता फैला रहे हैं। 
सच्चाई यह है कि इस कानून बनने के बाद से मोदी ने इनके बैंक को तिरसनस कर दिया है। इन्हीं लोगों के दम पर नगर निगम से लेकर संसद तक पहुँचते थे। यही कारण है कि जिस पाकिस्तान ने विश्व में अलग-थलग कर दिया, उसी के चरणों में जाकर माथा टेक रहे हैं, जो इन नेताओं और उनकी पार्टियों के बहुत ही शर्म की बात है। दूसरे, ये लोग चाहते हैं कि भारतीय धरती बेगुनाहों के खून से लाल हो। ताकि बेगुनाहों की लाशों पर मालपुए खाने के साथ-साथ अपनी तिजोरियां भरते रहे।  
Image may contain: text that says 'NOCAB MB CAA का विरोध करने वालो जवाब दो जब में 35A के तहत सिर्फ पाकिस्तानी मुस्लिम को नागरिकता मिलती थी भारतीय मुस्लिम को नही तब तुम्हें संविधान खतरे में नजर नहीं आया'
Image may contain: 4 people, text that says 'आंसू बहाने वाली कांग्रेस तब क्यों चुप थी जब पंडितों का बेरहमी से कत्लेआम हुआ जब उनके घरों को आग के हवाले किया गया जब उनकी बेटियों के साथ अत्याचार किया गया 1990 में कांग्रेस अगर कश्मीरी पंडितों का साथ देती तो उन्हें अपने ही देश में शरणार्थी की तरह नहीं रहना पड़ता'लखनऊ में धारा 144 लागू होने के बाद भी घंटाघर के पास सीएए के ख़िलाफ़ चल रहे प्रदर्शन मामले में पुलिस ने मंगलवार (जनवरी 21, 2019) को 3 मामले दर्ज किए। इनमें उर्दू शायर मुनव्वर राना की दो बेटियों के ख़िलाफ़ भी मुकदमा दर्ज हुआ। जानकारी के अनुसार पुलिस ने सुमैया राना और फौज़िया राना के साथ 100 से ज्यादा महिलाओं को धारा 144 का उल्लंघन करने, लोगों को भड़काने जैसे आरोपों में हिरासत में लिया। जिसके बाद मुनव्वर राना ने मीडिया के सामने आकर सरकार को चेतावनी दी और कहा कि प्रदर्शनकारियों पर पुलिस का रवैया बेहद गलत है।
Image may contain: 1 person, smiling, suit, text that says '"पाकिस्तान की असली ताकत ISI नहीं बल्कि भारतीय मुसलमान हैं जो आतंकवाद, बम धमाके, मदरसे, जनसंख्या विस्फोट से भारत को अंदरसे खोखला कर रहे हैं I भारत को पाकिस्तान से ज्यादा खतरा भारतीय मुसलमानों से हैं फतेह'मुनव्वर राना ने कहा, “एक तरफ तो सरकार तीन तलाक के मामले में कहती है कि ये हमारी बेटियाँ हैं। दूसरी ओर जब वे अपना हक माँग रही हैं, प्रदर्शन कर रही हैं तो कभी उन्हें कंबल नहीं दिया जाता, खाने को छीन लिया जाता है। बच्चे दूध से बिलख रहे हैं।” मुनव्वर राना ने कहा, “मैं सरकार को चेतावनी देते हुए अपना एक शेर फिर से कहता हूँ कि एक आँसू भी हुकूमत के लिए खतरा है, तुमने देखा नहीं आँखों का समंदर होना।”
मुनव्वर राणा वही व्यक्ति है जिसने #award vapsi गैंग अपना अवार्ड वापस किया था, लेकिन ईमानदार इतने थे, कि पुरस्कार के साथ मिली राशि नहीं, धन अपनी जेब के रख लिया और अवार्ड वापस कर जनता को भ्रमित किया। क्या ऐसे व्यक्तियों को सम्मानित कहा जा सकता है? 
पुलिस ने इस मामले के संबंध में जिन लोगों खिलाफ तीन मामले दर्ज किए हैं। उनमें से 24 लोग नामजद व 140 अज्ञात हैं। एडीसीपी पश्चिमी विकास चंद्र त्रिपाठी ने बताया कि धारा 144 के चलते प्रदर्शन पूरी तरह असंवैधानिक है। घंटाघर के सामने पिछले चार दिनों से महिलाएँ अपने बच्चों के साथ नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं।

मंगलवार (जनवरी 21, 2020) को ठाकुरगंज थाने में दर्ज हुई पहले एफआईआर में दारोगा सेठ पाल सिंह ने मोईनउद्दीन, रसूक अहमद, शबी फातिमा, साफिया, हफीजा और 138 अज्ञात महिलाओं के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 145, 188 और 283 के तहत रिपोर्ट दर्ज की है। साथ ही इस एफआईआर में 20 वाहनों का भी जिक्र हैं। जिनके कारण घंटाघर के आसपास जाम लगा।
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CAA का विरोध कर रही मुस्लिम महिलाओं को सम्बोधित करते एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार की सांसद ब....
इस मामले में दूसरी एफआईआर ठाकुरगंज थाने में तैनात दारोगा कैलाश नारायण त्रिवेदी ने लईस हसन और नसरीन जावेद के खिलाफ आईपीसी की धारा 188, 505 1बी के तहत दर्ज करवाई है। वहीं , तीसरी एफआईआर में थाने में तैनात महिला सिपाही ज्योति कुमारी ने शायर मुनव्वर राना की बेटी सुमैय्या राना, फौजिया राना, रुखसाना, शबी फातिमा और 10 अज्ञात महिलाओं के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 145, 188 और 352 के तहत ठाकुरगंज थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है।

CAA-NRC: क्या हिन्दू घृणा वाला सेकुलर ज़हर बाहर रिस रहा है ?

मुनव्वर राणा, शेहला रशीद, आरफा खानम, राहत इंदौरी
मुनव्वर राणा, शेहला रशीद, आरफा खानम, राहत इंदौरी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जो हिन्दू लोग आदम में यकीन नहीं करते क्योंकि कोई मतलब नहीं है। उनका फंडा अलग है। सोंच अलग है। ऐसे लोग कभी हिन्दू-मुसलमान की गन्दी सोंच से बाहर आ ही नहीं सकते। और इसी गन्दी सोंच के सहारे ये लोग अपनी जीविका चलाते हैं। जिस कारण राष्ट्रीयता की सोंच इन लोगों से कोसों मील दूर है। आदमी आज के दौर में व्यक्ति को कहते हैं, मानव को कहते हैं। देश के लिए नागरिक की अवधारणा होती है जहाँ लोगों के पहचान मिट जाते हैं, और बस राष्ट्रीय पहचान होती है कि हम भारतीय है, जापानी हैं, चीनी हैं, अरबी हैं।
भारत एक सेकुलर देश माना जाता है। माना इसलिए जाता है क्योंकि इस शब्द विशेष को नेता अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। वैसे सेकुलर का मतलब गैर हिन्दू या गैर दक्षिणपंथी होता है।  शब्दों के अर्थ काल, परिस्थिति,  देश और संदर्भ में बदल जाते हैं।
सेकुलर के नाम पर आप हिन्दुओं के देवी-देवताओं का अपमान कर सकते हैं, उनकी मूर्तियाँ तोड़ सकते हैं, मंदिरों को गिरा सकते हैं, उनके प्रतीक चिह्नों का उपहास कर सकते हैं, और न तो हिन्दू, न ही भारत का कोई कानून आपका कुछ कर पाएगा। उसे हमारे सेकुलर संविधान में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ कहा गया है। यही आज़ादी किसी भी गैर हिन्दू (या हिन्दू के अंग-प्रत्यंग) वाले मजहबों के ऊपर नहीं है। अगर आपने गलत संदर्भ में भी कुछ भी कह दिया, कुछ भी मतलब कुछ भी, तो दो-दो साल से घात लगा कर बैठा मुसलमान आपको ऐसे रेत देगा कि लाश देखने वालों की आत्मा काँप जाएगी।
सेकुलर मुसलमान वहीं तक नहीं रुकता। वो आपको कमेंट में, उसके ख़िलाफ़, उसके दंगों के ख़िलाफ़ लिखने पर, आपको याद दिलाएगा कि ‘तुझे भी काटेंगे साले कमलेश तिवारी की तरह, इंशाअल्लाह’। लगभग तीन दशक पूर्व, शायद केरल के एक प्रोफेसर जोसेफ ने प्रश्न-पत्र में इस्लाम सम्बन्धित प्रश्न क्या पूछ लिया, कट्टरपंथियों ने उस प्रोफेसर का हाथ ही काट दिया था। देखिए कोई #mob lynching, #intolerance और #award vapsi आदि गैंग नहीं बोला। ऐसा मुसलमान ऐसे दुष्कृत्यों को सम्मान की तरह देखता है। ऐसा मुसलमान आतंकियों को, जिसने उसके पूर्वजों की बस्तियों को आग लगाया था, उनकी लड़कियों का बलात्कार किया था, उनके मंदिर तोड़े थे, और अंत में तलवार की नोक पर मुसलमान बना दिया था, बस इसलिए महान समझता है क्योंकि वो भी मुसलमान हैं।
आज इसलिए उनकी चर्चा हो रही है क्योंकि आमतौर पर जिन लोगों को पूरा भारत कवि, शायर, इतिहासकार, पत्रकार, धर्महीन वामपंथी समझता रहा, वो CAA और NRC के विरोध के नाम पर हो रहे दंगों को न सिर्फ सहमति दे रहे हैं, बल्कि उकसा रहे हैं "मरना ही है तो लड़ कर मर जाओ"। ये लोग अब रंगरेज के नीले रंग वाले नाँद से जितना दूर जा रहे हैं, इनका हरा रंग उतना ही बाहर आता जा रहा है। 
इन लोगों को आरिफ मोहम्मद खान के इस वीडियो को बार-बार देखना और इस पर मंथन भी करना चाहिए:-
हरे रंग में समस्या नहीं है, समस्या तब है जब तुम दिख तो हरे रहे हो, लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हो कि ‘हम तो नीले हैं।’ ये सारे कवि, शायर, पत्रकार, इतिहासकार, वामपंथन अचानक से आदमी से मुसलमान हो गए हैं। और मुसलमान नहीं, वैसे मुसलमान हो गए हैं जो सेकुलर होने की परिभाषा से कहीं बहुत दूर, भारत को ये बता रहे हैं कि इनके बापों ने भारत पर राज किया था, ये लिख रहे हैं कि तिलकधारियाँ नहीं चलतीं, ये कह रहे हैं कि भारत माता की जय साम्प्रदायिक है, और ला इलाहा इल्लल्लाह बिलकुल भी साम्प्रदायिक नहीं, ये चिल्ला रहे हैं कि मुसलमानों के साथियों को मुसलमान नारे का सम्मान करना ही होगा
ये सारी इस्लामी बातें किस बात के विरोध में? एक कानून के विरोध में जिसका भारत के मुसलमानों से कोई वास्ता नहीं। तो सवाल यह है कि ये जो मुनव्वर राणा अचानक से मुसलमान हो कर ‘मरना ही मुकद्दर है तो फिर लड़ के मरेंगे’ की बात करने लगे हैं, वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? आखिर इनको दर्द किस बात का है कि ये अभिजात्य अल्फ़ाज़ में दंगाइयों को उकसा रहे हैं कि ‘लड़ के मरो’?
आखिर ‘माँ’ के नाम पर शायरी करने वाले मुनव्वर राणा किस बात से इतने दुखी हो गए कि टिक-टॉक विडियो पर “800 वर्षों तक हमने देश पर राज किया, लेकिन हमारी हड्डी में उबाल नहीं आया, लेकिन पाँच साल से तुम्हें सत्ता मिल गई है तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! बहुत ज्यादे सनक में मत रहो, वरना अगर हम अपने पर आ गए तो भागने का रास्ता नहीं रहेगा…” बोलने वाले मुसलमान लम्पट का परिष्कृत संस्करण बन कर ‘यही वो मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था’ लिख रहे हैं?
आखिर राहत इंदौरी ‘ये तिलकधारियाँ नहीं चलती’ कह कर ‘तिलक करने वाले हिन्दुओं को इतने घृणित लहजे में क्यों ललकार रहा है? इस आदमी को क्या समस्या हो गई है जिसकी महफिलों में मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू ही हुआ करते हैं? वो तिलकधारियों को मक्कार क्यों कह रहा है? आखिर एक शायर, जिसे संवेदनशील और ग़ैर राजनीतिक माना जाता है, वो किसी पार्टी और देश के प्रधानमंत्री, और उन्हें वोट देने वालों पर शब्दों की मदद से ऐसे निशाने क्यों लगा रहा है?
आख़िर फ़ैज अहमद फ़ैज के उस नज़्म को गाने की ज़रूरत आज के भारत में क्यों पड़ती है, जहाँ लगातार दो बार, पूर्ण बहुमत से चुन कर एक प्रधानमंत्री आया है, जो नज़्म एक पाकिस्तानी तानाशाह के लिए गाई गई थी? मैं क्या संदर्भ भूल जाऊँ कि तुमने मेरे चुने हुए, लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री को पहले तो तानाशाह कहा और फिर, इस्लामी शायरी से लेकर तमाम तरीक़ों में काफिरों के लिए एक अंतर्निहित, स्थायित्व लिए हुए घृणा ली हुई बातों को दोहराया जहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ का मतलब सीधा इस बात से है कि भाजपा को ‘हिन्दुओं की पार्टी’ कहा जाता है। क्या हम इतने मूर्ख हैं कि बिम्बों को न समझ सकें?
‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है?
क्या हम ये कह कर तुम्हारी बात मान लें कि वो बस एक नज़्म थी, जो गाई गई IIT कानपुर में? क्या वो नज़्म किसी ने ट्विटर पर डाली थी, एक रैंडम दिन में किसी ने अपनी प्रेमिका को भेजी थी वो नज़्म, या फिर किसी तानाशाह के लिए लिखी गई और आज के दौर में गाई गई उस नज़्म में तानाशाह मोदी है, और ‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है? हम क्या इतने मूर्ख हैं कि इस्लामी शायरी के भीतर की हिन्दू घृणा के ज़हर को समझ न सकें? तुम मोदी को हिटलर से प्रतीकात्मक तौर पर तौलते रहो, तुम नाज़ियो के चिह्न से हमारा पवित्र ‘ॐ’ बना दो, नीचे ‘फक हिन्दुत्व’ लिखो, और हम ये मान लें कि ये तो विरोध का एक तरीका है, हिन्दुत्व से मतलब हिन्दुओं से नहीं राजनैतिक विचारधारा से है!
इसी नज़्म पर एक और नौटंकी जो दिखी वो यह थी कि सारे वामपंथी और हिन्दुओं से घृणा करने वाले एक फर्जी खबर बना कर फैलाने लगे कि IIT कानपुर ने इस बात की जाँच पर एक कमिटी बिठा दी है कि ‘ये नज्म हिन्दू विरोधी है या नहीं’। जबकि सच्चाई इससे अलग यह है कि कमिटी इस बात की जाँच करेगी कि जो आयोजन हुआ वो संस्थान के नियमों के हिसाब से हुआ या नहीं, उसके बाद सोशल मीडिया पर जो बातें कही गईं, वो सही थीं, या गलत। लेकिन इरफान हबीब जैसे लोग अपना एजेंडा ठेलने से बाज नहीं आए।
इन कट्टरपंथियों साम्प्रदायिकतों को शायद नहीं मालूम कि जितना आराम से मुसलमान भारत में है, उतना किसी मुस्लिम देश में नहीं। इस तरह की शायरी अगर किसी मुस्लिम देश में की होती, ऐसे शायरों को सलाखों के पीछे फेंक दिया होता। चीन ही को ले लो, जहाँ रोजा अथवा ईद को तो छोड़ो, घर में कुरान रखने के साथ नमाज़ तक पढ़ने पर पाबन्दी है। अगर जिगर वाले हैं, चीन जाओ, और वहां की संस्कृति अथवा कानून के विरुद्ध ऐसी शायरी कर के दिखाएं, कोई बचाने वाला नहीं मिलेगा।  
जिस वामपंथ में धर्म-मजहब की कोई पहचान है ही नहीं, वो शेहला रशीद, मुसलमानों के मजहबी उन्मादी नारों की बात करते हुए कहती है कि अगर आप उनसे शर्मिंदा हैं तो आप हमारे सहयोगी नहीं हैं। अगर आपको इन नारों से दिक्कत है, तो आप भी समस्या का ही हिस्सा हैं। और जनाब इनके वो मजहबी नारे क्या हैं? वो नारे हैं: हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर, तेरा मेरा रिश्ता क्या ला इलाहा इल्लल्लाह…
ये हैं वो नारे जो एक मजहबहीन वामपंथन ‘नॉन-नेगोशिएबल मानती है। और आप फिर सोचेंगे कि एक राजनैतिक विरोध-प्रदर्शन में ‘मजहबी नारों की क्या ज़रूरत है’ तो आपको जवाब नहीं मिलेगा। शेहला रशीद यह मान कर चल रही है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही सेकुलरिज्म तेल लेने चला गया था। ये बात और है कि जब इनका सेकुलरिज्म तेल ले कर वापस लौटा तो पहले जामिया में आग लगाई, फिर सीलमपुर में पेट्रोल बम फेंका, फिर लखनऊ के परिवर्तन चौक में आग लगाई, फिर बंगाल में ट्रेन फूँक दिया, बिजनौर में आग लगाई, मेरठ और अलीगढ़ को लहका दिया। वाकई, सेकुलरिज्म तेल तो बार-बार लेने गया है मोदी के आने के बाद, खास कर मुसलमानों का सेकुलरिज्म जहाँ वामपंथन भी खुल कर मुसलमान हुई जा रही है!
शशि थरूर ने लम्बे समय के बाद कुछ ढंग की बात कही कि मुसलमानों को समझना चाहिए कि CAA/NRC के प्रदर्शन में ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ जैसे नारों की जगह नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह को लाया जा रहा है। ये बात कई मुसलमानों को नहीं पची क्योंकि उनके लिए हर प्रदर्शन विशुद्ध रूप से मजहबी है क्योंकि उनके लिए पहचान का मतलब भारतीयता, नागरिकता और सामान्य बातों से परे सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है, उम्माह है, कौम है।
स्वयं को पत्रकार कहने वाली आरफ़ा खानम ने कुछ समय पहले ट्वीट किया था कि ‘हाँ, भारत माता की जय एक साम्प्रदायिक नारा है’, उसने आज पत्रकारिता को ढोंग त्यागते हुए, खुल कर सामने आ कर कहा कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, इंशाअल्लाह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक, इस्लामी कट्टरपंथी नारे नहीं हैं। इन सारे नारों को या तो आप सीधा ‘शब्दों को झुंड’ के रूप में देख सकते हैं, या फिर आप इन्हें संदर्भ में देखेंगे।
‘भारत माता की जय’ कहने से हम किसी देवी की पूजा नहीं करते, हम अपनी मातृभूमि की जय-जयकार करते हैं। यहाँ किसी का मुसलमान होना तब तक प्रभावित नहीं होता जब तक वो इस भाव से जय-जयकार न करे जहाँ वो यह मानने लगे कि ‘अल्लाह के अलावा भी कोई है जिसे वो पूजनीय मानता है’। दूसरी बात, साम्प्रदायिक मानने के लिए किसी भी बात में नकारात्मकता आवश्यक है, वहाँ शाब्दिक या और तरह की हिंसा होनी चाहिए, मंशा होनी चाहिए नीचा दिखाने की।
मुझे नहीं लगता कि ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए कोई किसी को नीचा दिखाना चाहता है, या किसी भी प्रकार के हिंसक भाव रखता है। लेकिन, उसके उलट एक राजनैतिक कानून के विरोध में, जब हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, फक हिन्दुत्व आदि के साथ-साथ, उसी समय-काल में, उन्हीं परिस्थितियों में, उसी संदर्भ में जब ‘नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर’ गूँजता है, तो वो विशुद्ध मजहबी उन्माद है क्योंकि ये नारा तुम सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और एक दूसरे धर्म को नीचा दिखाने के लिए लगा रहे होते हो। तुम ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहो, कोई समस्या नहीं, लेकिन ये सिर्फ मजहबी जमावड़े में बोलो, राजनैतिक में घुसाओगे तो हमें याद आएगा कि तुम्हारा लक्ष्य तो गजवा-ए-हिन्द और ख़िलाफ़त तक का है।
धर्म निरपेक्ष होने का ढोंग 
इन लोगों की ही तरह दसियों मुसलमान ऐसे मिलेंगे आपको जो बिना इस कानून को पढ़े, बिना ये जाने कि NRC के ड्राफ्ट तक अभी बाहर नहीं आया है, इन दंगाइयों को अपनी सहमति ये कह कर दे रहे हैं कि मुसलमानों के अस्तित्व पर संकट आ गया है। सामने से पूछे जाने पर ये बार-बार यह भी कह रहे हैं कि आम लोगों को सरकार समझाने में असफल रही है, जबकि सत्य यह है कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है, लेकिन यही लोग आम लोगों में डर भरते जा रहे हैं।
मुनव्वर राणा की, राहत इंदौरी की, इरफान हबीब की, शेहला रशीद की, आरफा खानम की और उन हजारों दंगाई मुसलमानों की समस्या CAA या NRC नहीं है। इनकी समस्या यह है कि इनके भीतर का घमंड, एक विशेष होने का भाव जो पिछली सरकारों ने इनमें गहरे भर दिया था, वो अचानक से छिन-सा गया है। वो, जिनके मजहब के लोगों के आतंकी होने पर, 22 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी, रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवा लिए जाते थे, उनकी बात की अब कोई वैल्यू नहीं रही।
वो जो यह चिल्लाते थे कि ‘तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निगलेगा’, आज दंगा करने के बाद योगी सरकार को अपने समुदाय द्वारा किए गए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे लौटा रहे हैं। वो, जो मजहब की आड़ में भारत का झंडा, राष्ट्रीय गीत और जय बोलने से कतराते थे, आज, भले ही दंगा करने और आग लगाने के लिए ही सही, भीड़ में तिरंगा लिए घूम रहे हैं। इनके घमंड के गुब्बारे में जो हवा भरी जाती रही थी, उसमें इस सरकार ने पहले तो हवा भरना बंद किया, और दूसरे चरण में पिन मारना भी शुरू कर दिया है, तो फटे गुब्बारे से कुछ आवाज तो आएगी ही।
वो, जो सोचते थे कि कश्मीर से पंडितों के भगा देने के बाद, कश्मीर को अलग देश बना लेंगे और उसी चक्कर में कश्मीर को नक्शे पर भी न पहचान सकने वाले मुसलमान भी खुश हो जाते थे, आज परेशान हैं कि कश्मीर में अब भारत का संविधान लागू है, और उसका झंडा भी तिरंगा है। वो, जो सोचते थे कि संविधान से ऊपर कोई मुसलमानी पर्सनल लॉ बोर्ड है, तीन तलाक के ग़ैर क़ानूनी करार दे दिए जाने से इसे मजहब पर हुए हमले के रूप में देख रहे हैं।
वो, जिन्होंने सोचा था कि इरफान हबीब जैसा चिरकुट उपन्यासकार, अपने चेलों को कोर्ट में भेज कर, भारत को यह समझा देगा कि भारत का इतिहास मुसलमान आतंकवादी बाबर के आने के बाद से ही शुरू होता है, वो राम मंदिर के गगनचुम्बी शिखरध्वज को कैसे देख पाएँगे? वो, जो सोचते हैं कि बौद्धों को हथियार उठाने पर मजबूर कर देने वाले आतंकी रोहिंग्या और बांग्लादेश से भारत में घुसे घुसपैठियों को भारत में इसलिए जगह मिल जानी चाहिए क्योंकि वो उनके उम्माह का हिस्सा हैं, उनके हकूक हैं, उन्हें भारतीय नागरिकों के रजिस्टर बनने से तो समस्या होनी ही है।
इसीलिए, केंचुली उतार कर ये पूरा विरोध अब ‘हम बनाम वो’ का हो गया है। इस पूरे विरोध का लहजा ‘मुसलमान बनाम काफिर’ का हो चुका है। वो खुल कर कह रहे हैं कि ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’, वो चिल्ला कर जामिया की गलियों में कह रहे हैं कि उन्हें ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ चाहिए। वो दिन के उजाले में दीवारों पर हमें ‘कैलाश जाओ’ लिख कर बता रहे हैं। वो एक राजनैतिक प्रदर्शन में हजारों की भीड़ जुटाते हैं और पूछते हैं कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और आवाज आती है ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’। वो ख़िलाफ़त 2.0 के ख्वाब AMU की दीवारों पर लिख रहे हैं और हिन्दुत्व, यानी हिन्दुओं से जुड़ी हर बात, विचार, पूजा, व्यक्ति, ग्रंथ आदि की कब्र खोदने की बातें कर रहे हैं।
हिन्दू आज भी पॉलिटिकली करेक्ट होना चाह रहा है। वो ये मान रहा है कि ये लोग भटके हुए, गुमराह लोग हैं, इनके नारों का कोई मतलब नहीं, ये तो बस ऐसे ही है। ये लड़ाई अब खुले में सुनाई पड़ रही है। अब दिख रहा है कि इनका लक्ष्य कोई कानून या संविधान नहीं, इनकी आँखें शिथिल हो कर ‘गजवा-ए-हिन्द’ का आस देख रही है, और दाहिने-बाएँ इन्हें कुछ नहीं दिख रहा। ये नारे सीढ़ियाँ हैं, ये वो चरण है प्रयोग का जहाँ देखा जा रहा है कि पूरे भारत का मुसलमान बाहर आ सकता है क्या?
अभी आँकने का मौका है कि जब महत्वपूर्ण जगहों पर बैठे मुसलमान, एक पहचान पा चुके मुसलमान, वैसे मुसलमान जो वैचारिक स्तर पर नेतृत्व दे सकते हैं, उनके खुल कर बाहर आने पर कितने मुसलमान उनकी बातें मानेंगे। इसीलिए, आज पढ़ा-लिखा, कॉलेज जाता मुसलमान भी NRC के आए बिना ही कह रहा है कि उसके कागज तो बाढ़ में बह गए, 90 साल की बुजुर्ग असमा कह रही है कि दसवीं फेल मोदी अपने सात पुश्तों के नाम गिनाए। जब आम आदमी गृहमंत्री की अपील को सीधे कह दे कि वो तो झूठ बोल रहा है, एक चुनी हुई सरकार के सासंदों द्वारा पारित कानून को यह कह कर नकार दे कि सासंद तो बस 300 ही हैं, हम तो हजारों में हैं, तब आप समझ जाइए रंग उतरा ही नहीं, रंग दिखाया जा रहा है कि पहचानो, हम कौन हैं!

मजहबी नारे, इतिहास के आतंकियों के शासक होने के दिन, और हिन्दुओं से घृणा की बातें खुल कर हो रही हैं। बाकी का काम मीडिया गिरोह सक्रिय हो कर कर ही रहा है जहाँ बीस दिन की नवजात बच्ची को विरोध-प्रदर्शन की नायिका के रूप में भुनाया जा रहा है। अचानक से भीम-मीम में इसलिए दरार पड़ती दिख रही है कि भीम वालों को मजहबी नारे अनुचित लगते हैं। अब भीम सोच रहा है कि मीम वाले तो उनको पागल बना रहे हैं, इनका एजेंडा तो कुछ और ही है। बाकी का काम इस उम्मीद ने कर दिया जहाँ शेहला रशीद कहती है कि अगर तुम हमारे साथ हो तो आरक्षण में हमें भी हिस्सा दे दो!
भीम वाला आज भी जोगेंद्र नाथ मंडल को नहीं जानता कि मीम के झंडाबरदारों ने उनका क्या हश्र किया था। भीम वालों की लड़ाई राजनैतिक है, वो अपने हक के लिए बार-बार उठते रहे हैं। उनकी लड़ाई शोषण से है, बराबरी की है, और अब अचानक से उनसे कहा जा रहा कि ‘बोलो भाई तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और भीम वाला सोच में पड़ जाता है कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कैसे बोल दे!
आप भी इस मजहबी उन्माद को समझिए। आप भी यह समझिए कि सेकुलर होने का मतलब मुसलमानों के लिए अलग है, हिन्दुओं के लिए अलग। एक सेकुलरिज्म की आड़ में आपके देवी-देवता का उपहास करता है, और आप हैं कि ईद की सेवइयाँ खाने के लिए पागल हुए जा रहे हैं। हिन्दुओं के लिए सेकुलर होने का मतलब है ‘सहना’। इसलिए, वो आज भी इन मजहबी उन्मादियों को आग लगाता देख रहा है और यह मान कर चल रहा है कि ये आग उसके घर तक नहीं पहुँचेगी।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आज देश में जिस प्रकार #CAA को लेकर शांति के नाम पर उग्र एवं हिंसात्मक प्रदर्शन हो रहे हैं,...
हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके ‘जय श्री राम’ नारे को आतंकी नारा बना कर एक महीने में कम से कम दस बार झूठ बोला गया ताकि उसके धर्म को बदनाम किया जा सके। यही हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके दसियों भाइयों को मुसलमानों की भीड़ ने लिंच किया है। हिन्दू यह भी भूल जाता है कि सैकड़ों साल पहले भी उसके मंदिर तोड़े जाते थे, आज भी हौज काजी समेत कई जगहों पर वही हो रहा है। हिन्दुओं को यह भी याद नहीं कि उनके काँवड़ यात्रा पर इस साल सावन के महीने में कितने जगहों पर पत्थरबाजी हुई है।
मुसलमानों के बीच की हस्तियाँ अब मुसलमान बन कर ही सामने आ रही हैं। उनके लिए इस्लाम ही एकमात्र पहचान है। उन्हें राजनैतिक विरोध प्रदर्शन में ‘नारा ए तकबीर’ और ‘हिन्दुओं से आजादी’ कहने में कोई समस्या नहीं दिख रही। मैं चाहता हूँ कि हिन्दू इस बात को बस दूर से देखे, दिमाग में बिठाए और अकेले में जा कर सोचे कि ये ‘सेकुलर’ शब्द जो है, उसका मतलब आखिर होता क्या है।