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मोदी विरोधियों का क्राउड फंडिंग वेबसाइट ‘रहस्यमय’ ढंग से गायब: शेहला से लेकर साकेत गोखले तक ने किया इस्तेमाल

                 साकेत गोखले, कन्हैया कुमार और डॉ. कफील खान ने क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया
तृणमूल कांग्रेस नेता (TMC) साकेत गोखले अपनी जीविका चलाने के लिए जिन क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करते थे उनमें से एक ourdemocracy.in है और यह अब इस प्लेफॉर्म का कोई अता-पता नहीं है। चूँकि, गोखले पूर्णकालिक नौकरी छोड़कर 10 रुपए खर्च करके आरटीआई डालने का काम करते थे, इसलिए उन्हें धन जुटाने के लिए क्राउडफंडिंग का सहारा लेना पड़ता था। नवंबर 2019 में गोखले ने क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म का एक लिंक ट्वीट कहा था कि उन्होंने ‘बीजेपी/आरएसएस से लड़ने’ के लिए अपनी नौकरी छोड़ने का फैसला किया है। उन्होंने मोदी से नफरत करने लोगों से इकट्ठा होने और उन्हें पैसे देने का आग्रह किया था, इस लड़ाई के खर्चों का वे वहन कर सकें और इसके लिए उन्हें नौकरी ना करनी पड़े।

दरअसल, व्यक्तिगत जरूरतों के लिए भी क्राउडफंडिंग का सहारा लिया जाता है। क्राउडफंडिंग एक ऐसा तरीका है, जिसमें किसी काम के लिए पैसा इकट्ठा करने के लिए लोगों के समूह से मदद माँगी जाती है। क्राउडफंडिंग में जो भी लोग अपने पैसे देते हैं उन्हें मालूम होता है कि वह कहाँ और किस उद्देश्य के लिए फंड दे रहे हैं। हालाँकि, अब ना केवल क्राउडफंडिंग कैंपन, बल्कि ये पूरी वेबसाइट ही गायब है।

                                                                   यह वेबसाइट अब अस्तित्व में नहीं है

कैंपन शुरू करने के बमुश्किल 3 महीने बाद यानी फरवरी 2020 तक गोखले ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नफरत करने वालों से 20 लाख रुपए से अधिक की राशि इकट्ठा कर ली थी।

                                                               क्राउडफंडिंग पर गोखले

गोखले ने स्वीकार किया था कि उन्होंने इस तरह 22 लाख रुपए से अधिक की राशि एकत्रित की थी। उन्होंने उस समय कहा था कि वह अपने व्यक्तिगत खर्चों को पूरा करने के लिए और लोगों को भी शामिल करेंगे। उस समय पता चला कि OurDemocracy crowdfunding platform जुटाई गई राशि का कुल आँकड़ा नहीं दिखा रहा था। ऐसे में जिन लोगों ने योगदान दिया था, उन्हें यह नहीं पता चल पा रहा था कि गोखले कितना धन जुटा चुके हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह प्लेटफॉर्म अब रहस्यमय तरीके से गायब हो गया है। इसका इस्तेमाल पूर्व सीपीआई नेता और अब कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार, आम आदमी पार्टी की नेता आतिशी मार्लेना और यहाँ तक ​​कि डॉ. कफील खान द्वारा भी किया गया था, जो 2017 में गोरखपुर ऑक्सीजन मामले का मुख्य आरोपित हैं।

आवर डेमोक्रेसी, क्राउडन्यूज़िंग और कॉन्ग्रेस कनेक्शन

ऑपइंडिया ने क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म की थोड़ी गहराई से पड़ताल की। इस दौरान पता चला कि टाइम्स नाउ और WION जैसे चैनलों के साथ काम कर चुके एनडीटीवी के पूर्व पत्रकार बिलाल जैदी ने आनंद मंगनाले (Anand Mangnale) के साथ मिलकर 2017 में स्वतंत्र पत्रकारों के लिए ऑनलाइन क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म ‘क्राउडन्यूजिंग’ की शुरुआत की थी।
हालाँकि, 2019 के आम चुनावों से ठीक पहले उन्होंने इस प्लेटफॉर्म का विस्तार करने का फैसला किया और इसे ‘ourdemocracy’ में बदल दिया। इस पर कन्हैया कुमार, आतिशी मार्लेना जैसे नेताओं और साकेत गोखले जैसे बेरोजगार लोगों का स्वागत किया, जिन्होंने आरटीआई भरने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी थी। जब साकेत टीएमसी में शामिल हुए थे तब OurDemocracy प्लेटफॉर्म के को-फाउंडर ने उनकी सराहना की थी।
OurDemocracy प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वालों में गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवानी, दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और जेएनयू की पूर्व छात्रा और प्रदर्शनकारी शेहला रशीद भी शामिल हैं। इन्होंने OurDemocracy के पायलट (pilot) वर्जन क्राउडन्यूजिंग का इस्तेमाल किया था।
अब, क्राउडन्यूज़िंग के साथ-साथ OurDemocracy प्लेटफॉर्म बंद हो चुका है। लगभग एक महीने हो चुके हैं, लेकिन OurDemocracy के सोशल मीडिया हैंडल ने अभी तक इसकी कोई सार्वजनिक सूचना नहीं दी है। OurDemocracy के वैरिफाइड ट्विटर अकाउंट पर आखिरी ट्वीट 24 जून 2021 को डॉ. कफील खान के एक कैंपन में दान करने के लिए किया गया था। वहीं, क्राउडन्यूज़िंग का आखिरी ट्वीट 10 जून 2019 को किया गया था, जिसमें धन के दुरुपयोग के पुराने विवाद को लेकर एक खुद को और शेहला राशिद को क्लीन-चिट दी थी।
जिस प्लेटफॉर्म को बाद में गोखले ने इस्तेमाल किया, उसको लेकर शेहला राशिद पर कठुआ सामूहिक बलात्कार और हत्या के नाम पर एकत्रित किए गए धन का दुरुपयोग करने का आरोप लगा था। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि पीड़ित परिवार की मदद के नाम पर लाखों रुपए जमा किए गए, लेकिन फंड उन तक नहीं पहुँचा ही नहीं था। वहीं, राशिद ने इन आरोपों से इनकार किया था और बाद में कहा था कि पैसे देने में इसलिए देरी हुई, क्योंकि परिवार के पास ज्वॉइंट बैंक अकाउंट और पैन नहीं था। ध्यान दें कि क्राउडन्यूज़िंग के साथ-साथ OurDemocracy के सह-संस्थापक Anand Mangnale ने जनवरी 2020 में जेएनयू में हुई हिंसा के दौरान व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल थे, जहाँ कैंपस हिंसा को लेकर अपना कुतर्क रख रहे थे।
ग्रुप के सदस्यों से आनंद पूछ रहे थे कि जेएनयू के समर्थन में कुछ लोग मेन गेट पर आ रहे हैं, क्या उन्हें भी वहाँ कुछ करना चाहिए? यह मैसेज ‘यूनिटी अगेंस्ट लेफ्ट’ नामक समूह का था। बरखा दत्त ने अनजाने में ट्विटर पर जो नंबर शेयर किया वह आनंद (Anand Mangnale) का था। उस नंबर को Google पर खोजने से पता चला कि यह वही नंबर था, जिसे कॉन्ग्रेस ने क्राउडफंडिंग अभियान के लिए इस्तेमाल किया था।
                                                    कांग्रेस के कैंपन पर आनंद का नंबर
इस पेज को अब हटा लिया गया है। आनंद ने टीएमसी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ पहले काम किया था। प्रशांत किशोर पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए भी रणनीतिकार के रूप में काम चुके हैं। हालाँकि, ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं कर सका कि आनंद मंगनाले राहुल गाँधी की छवि बदलने के लिए उस टीम का हिस्सा थे या नहीं।
                                                                      आनंद मंगनाले
आनंद ने तब छात्रों को सुरक्षित रखने के लिए एक व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल होने की बात स्वीकार की थी। अंत में, एक पत्रकार बिलाल जैदी आनंद मंगनाले से मिलते हैं और दोनों ने 2017 में ‘क्राउडफंडिंग’ वेबसाइट क्राउडन्यूज़िंग शुरुआत की और 2019 में इसका विस्तार कर इसे ‘ourdemocracy.in’ बनाया।
क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल साकेत गोखले, जिग्नेश मेवानी, कन्हैया कुमार, शेहला राशिद, मनीष सिसोदिया, आतिशी मार्लेना, डॉ. कफील खान द्वारा किया गया। इनमें से कम-से-कम दो लोगों पर यहाँ से जुटाए गए पैसों को लेकर जानकारी साझा नहीं करने का आरोप लगा था। अब ये दोनों प्लेटफॉर्म गूगल पर नहीं हैं। ऑपइंडिया ने क्राउडन्यूजिंग के सह-संस्थापक और OurDemocracy के बिलाल जैदी से भी संपर्क किया है। उनसे जवाब मिलने के बाद हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

JNU के ‘पढ़ाकू’ वामपंथियों को फसाद की नई वजह मिली, आइशी घोष पर जुर्माना

                                                           शेहला रशीद और आइशी घोष
जेएनयू में हुई हिंसा का चेहरा रही आइशी घोष फिर से चर्चा में हैं। उनके चर्चा में आते ही शेहला रशीद ने भी खुद को सुर्खियों में रखने का तरीका खोज निकाला है। इससे लगता है कि जेएनयू में पढ़ने वाले वामपंथी ‘कार्यकर्ताओं’ और कथित छात्रों को विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने की नई वजह मिल गई है। यह वजह है कैंपस के अंदर हॉस्टल के कमरों में अवैध रूप से प्रवेश करके कोविड-19 प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने पर कई छात्रों पर जुर्माना लगाया जाना।

रिपोर्टों के अनुसार, जेएनयू प्रशासन ने पिछले साल दिसंबर में कोरोना वायरस महामारी के बीच कई छात्रों को परिसर में हॉस्टल के कमरों में अवैध रूप से रहने के लिए जुर्माना देने के लिए कहा था। JNU के कुछ ‘छात्रों’ ने यूनिवर्सिटी में आधिकारिक रूप से दोबारा प्रवेश की अनुमति देने से पहले ही छात्रावास में प्रवेश किया था।

वर्तमान में केवल अंतिम वर्ष के पीएचडी, एमफिल और साइंस स्ट्रीम से एमटेक छात्रों को ही परिसर के अंदर रहने की अनुमति है। लॉकडाउन के दौरान, छात्रों को कैंपस में कोरोना वायरस मामलों की बढ़ती संख्या के कारण अपने घर लौटने के लिए कहा गया था। विश्वविद्यालय ने अभी तक परिसर में छात्रावासों के खुलने की सूचना नहीं दी है। केवल कुछ छात्रों को ही छात्रावास में रहने की अनुमति दी गई है।

JNUSU अध्यक्ष आइशी घोष अवैध रूप से हॉस्टल में रह रही

JNUSU अध्यक्ष और JNU दंगा मामले में आरोपित आइशी घोष और कुछ अन्य छात्रों ने हॉस्टल के कमरों पर अवैध तरीके से कब्जा कर लिया। इसके बाद यूनिवर्सिटी के अधिकारियों ने नोटिस भेजकर उन्हें अवैध रूप से रहने के लिए जुर्माना भरने को कहा है।
कोयना छात्रावास में रहने वाली आइशी घोष को हाल ही में अवैध रूप से रहने के लिए नोटिस भेजा गया और 2,000 रुपए का जुर्माना देने को कहा गया। वरिष्ठ वार्डन द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस में कहा गया है, “सुरक्षा गार्ड द्वारा हमारे संज्ञान में लाया गया कि आइशी घोष को कोयना हॉस्टल में 5 नवंबर को सुबह 4.30 बजे देखा गया। इसलिए समिति घोष पर 2,000 रुपए का जुर्माना लगाने का फैसला करती है।”
उन्होंने कहा, ”आपको 2,000 रुपए का जुर्माना (सात दिनों के भीतर) जमा करना होगा। इस जुर्माने को जमा करने में असफल रहने पर आपसे प्रति सप्ताह 2,000 रुपए और शुल्क लिया जाएगा।”
सपना रतन शाह के अनुसार, कोयना हॉस्टल के एक वरिष्ठ वार्डन ने कहा कि छात्रों ने कमरों के ताले तोड़े और अवैध रूप से हॉस्टल में घुस गए। इसलिए, वार्डन समिति ने उन पर जुर्माना लगाने का फैसला किया, क्योंकि इंटर-हॉल एडमिनिस्ट्रेशन (IHA) का दिशा-निर्देश बताता है कि जुर्माना उन छात्रों पर लगाया जाएगा जो अनधिकृत प्रविष्टि में संलग्न हैं। बता दें कि IHA एक निकाय है, जो 18 JNU छात्रावासों का प्रबंधन करता है।
आइशी घोष और उनके समर्थकों को परेशान करने का 
इस बीच, विवादास्पद जेएनयूएसयू अध्यक्ष आइशी घोष ने ट्विटर पर कहा कि उन्हें 2,000 रुपए का भुगतान करने के लिए कहा गया है। दावा किया है कि छात्रों को परेशान किया जा रहा है, क्योंकि ‘वे छात्रावास में वापस आना चाहते हैं और फिर से शैक्षणिक गतिविधियों को शुरू कर रहे हैं।’ आइशी घोष ने जेएनयू के अधिकारियों से प्राप्त नोटिस को भी साझा किया, जिसमें उसे अवैध रूप से हॉस्टल में रहने के लिए जुर्माना भरने के लिए कहा गया है।
उसने कहा, “हम में से कई 30 सितंबर के बाद आए, प्रशासन ने 8 अक्टूबर तक एक सर्कुलर नहीं निकाला कि क्या छात्र वापस लौट सकते हैं। हमने वार्डन और हमारे अन्य अधिकारियों को अपनी वापसी के बारे में सूचित किया, लेकिन हमें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।”
शेहला रशीद भी कूदी 
फ्रीलांस प्रदर्शनकारी और अपने ही ‘बायलॉजिकल’ पिता को धमकी देने की आरोपित शेहला रशीद ने मामले में कूदकर विश्वविद्यालय परिसर के अंदर और अराजकता पैदा करने की स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश की।
जेएनयू में एक लंबे समय तक रहने वाली रशीद ने झूठे दावे करने के लिए ट्विटर का सहारा लिया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “उड़ानें, शादी, चुनाव, क्रिकेट टूर्नामेंट, धार्मिक कार्य, संगीत कार्यक्रम- सब कुछ हो सकता है, लेकिन छात्र अपने स्वयं के छात्रावास के कमरों में प्रवेश नहीं कर सकते हैं! घोर कलयुग।” शेहला रशीद ने विश्वविद्यालय के अधिकारियों से छात्र जुर्माना वापस करने की माँग की।
प्रदर्शनकारी से नेता बनी शेहला रशीद ने यह दावा करने के लिए कुछ कथित शोध-पत्र भी जारी किए कि महामारी के दौरान महिला शिक्षाविदों को यह महसूस करना पड़ा कि विश्वविद्यालय को महामारी प्रोटोकॉल को दरकिनार कर छात्रावास खोलना चाहिए।
इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश में शेहला रशीद ने ट्विटर पर लिखा, “दुर्भाग्य से, जेएनयू प्रशासन के विचार केवल राजनीतिक हैं। छात्रों को परिसर से बाहर रखने का कदम विशुद्ध रूप से राजनीतिक है। ऐसा लगता है जैसे COVID केवल JNU में मौजूद है, जबकि शेष विश्व प्रतिरक्षात्मक है।”
हालाँकि, शेहला राशिद के दावों के विपरीत, अधिकारियों ने महामारी के दौरान कुछ गतिविधियों पर कई प्रतिबंध लगाए हैं, जिसमें निजी और सार्वजनिक गतिविधियाँ शामिल हैं। राज्य और केंद्र दोनों ने समय-समय पर सार्वजनिक डोमेन में कई अधिसूचनाएँ जारी की हैं, जिसमें जनता को ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’ के बारे में विस्तार से बताया गया, ताकि वे सामूहिक रूप से चीनी महामारी से लड़ सकें।
इसी तरह से, जेएनयू के अधिकारियों ने भी अपने छात्रों को महामारी के खिलाफ एहतियाती कदम उठाने के लिए परिसर के अंदर कुछ प्रोटोकॉल का पालन करने के लिए कहा है और इसे सख्ती से लागू कर रहे हैं। हालाँकि, शेहला रशीद बेशर्मी से महामारी के कठिन समय में भी एक राजनीतिक एंगल खोजने की कोशिश करते हुए अपने फर्जी प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ा रही है।

अब्बू ने खोली शेहला रशीद की पोल, देश विरोधी गतिविधि में शामिल होने का किया दावा

भारतीय सेना पर आरोप लगाने वाली और टुकड़े-टुकड़े गैंग की सदस्य शेहला रशीद के अब्बू ने उनकी पोल खोल दी है। शेहला रशीद के खिलाफ उनके पिता अब्दुल शोरा ने शिकायत दर्ज कराई है। अब्दुल शोरा का कहना है कि बेटी शेहला उन्हें जान से मारने की धमकी दे रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि ‘शेहला कुख्यात गतिविधियों में शामिल है।’

ऐसे में चर्चा यह भी है कि इतने समय बाद एक बाप अपनी ही बेटी के विरुद्ध पुलिस को सूचित कर रहा है? क्या शेहला के बाप को बेटी पर जाँच एजेंसीज के हाथ पहुँचने की खबर लग गयी थी, जिससे घबरा कर बाप अपना दामन बचाकर अपनी बेटी शेहला पर सारा दोष डाल अपने आपको बचा रहा है? देश की इतनी चिंता थी, तो जब घर में चांदी के सिक्कों की बारिश हो रही थी, तब क्यों नहीं बेटी से पूछा और पुलिस को सूचना दी?चलो देर आए, दुरुस्त आए। 

जम्मू-कश्मीर के डीजीपी को दी अपनी शिकायत में उन्होंने शेहला की कुख्यात गतिविधियों को उजागर किया है। साथ ही शेहला की बैंक अकाउंट की जांच की मांग की है।

अब इस पर प्रश्न उठने लाजमी हैं, देखो इन प्रश्नों का जवाब देने कौन आगे आता है:-  शिकायत पत्र में अब्दुल रशीद शोरा ने दावा किया कि शेहला ने कश्मीर की राजनीति में शामिल होने के लिए कुख्यात लोगों से तीन करोड़ रुपये लिए हैं। उन्होंने मांग की है कि फिरोज पीरजादा, जहूर वटाली (एनआईए द्वारा गिरफ्तार) और रशीद इंजीनियर के बीच वित्तीय डील की जांच की जाए।

जाहिर है कि पिछले दिनों शेहला रशीद के खिलाफ दिल्‍ली पुलिस की स्‍पेशल सेल ने देशद्रोह के साथ कई अन्‍य धाराओं में एफआईआर दर्ज की थी। शेहला रशीद पर जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाए जाने के बाद मौजूदा हालात को लेकर भारतीय सेना के खिलाफ झूठी खबरें फैलाने का आरोप था। शेहला ने भारतीय सेना पर कश्मीर के लोगों को प्रताड़ित करने और दहशत फैलाने जैसे कई आरोप लगाए थे।

‘बिक गई है शेहला, मोदी ने सस्ते में खरीदा’

शेहला रशीद
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
मोदी विरोधियों को शेहला रशीद द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोरोना वायरस गंभीर संक्रामक बीमारी पर देश से एकजुट रहकर इससे लड़ने के आव्हान का समर्थन करना वामपंथियों को हजम नहीं हो रहा। 
सोशल मीडिया पर अक्सर सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए जानी जाने वाली कुछ चुनिन्दा ‘हस्तियों’ से ज्यादातर लोग अच्छे से वाकिफ हैं। इन चेहरों ने राजनीतिक कारणों से कम और सोशल मीडिया पर लेफ्ट-लिबरल गिरोह का मुखिया बनकर ज्यादा पहचान हासिल की है। इनमें जेएनयू की पूर्व छात्र नेता शेहला रशीद, स्वरा भास्कर, राणा अयूब, खुद को कॉमेडियन कहने वाले कुनाल कामरा, आदि प्रमुख हैं।
लेकिन कोरना वायरस के समय जब देशवासियों के एकजुट होने की बात आई तो देश के कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों से लेकर सोशल मीडिया के लेफ्ट-लिबरल गिरोह के चेहरों ने इस बात को स्वीकार किया कि विचारधारा के मतभेद के लिए देशहित के साथ इस बार समझौता नहीं किया जा सकता है।
कोरोना वायरस पर केंद्र सरकार द्वारा अपनाए गए कुछ सख्त फैसलों का शेहला रशीद ने स्वागत किया है, जिसने कई लोगों को हैरानी में डाल दिया है। लेकिन इसके कारण वो कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी और लेफ्ट-लिबरल ट्रोल्स के निशाने पर भी आ गई हैं। कुछ दिन पहले ही शेहला ने ट्वीट के जारी नरेन्द्र मोदी के समर्थन में चंद शब्द लिखे थे, लेकिन अब ऐसे ट्वीट्स की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिसने लिबरल्स की परेशानियाँ बढ़ा दी हैं।
शेहला रशीद ने पीएम मोदी के जनता कर्फ्यू के आह्वान के फैसले का स्वागत किया था और आज शाम पाँच बजे देशवासियों की सक्रीय भागीदारी पर भी शेहला ने ट्वीट के माध्यम से स्वीकार करते हुए कहा कि वास्तव में नरेन्द्र मोदी देश में कानून बन चुके हैं और लोग उनकी बात मानने से इनकार नहीं करते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि नरेन्द्र मोदी को अपनी इस शक्ति का उपयोग कोरोना के प्रति दी जा रहे स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने के लिए भी संदेश देने में करना चाहिए।
लेकिन एक ओर जहाँ शेहला के इस बदले हुए अंदाज ने सोशल मीडिया पर सक्रिय दक्षिणपंथी लोगों के बीच कुछ हद तक लोकप्रिय बना दिया है, वहीं उन्हें इसके लिए लेफ्ट-लिबरल गिरोह की गालियों का सामना भी करना पड़ रहा है।
शेहला के ट्वीट के जवाब में @kinginthewest77 ट्विटर यूजर ने लिखा- “हर किसी की एक कीमत होती है, मोदी ने इसे सस्ते में खरीद लिया।”
शेहला के बदले हुए सुरों पर काफी लोग आश्चर्यचकित हैं। एक ट्विटर यूजर ने लिखा- “मुझे आश्चर्य है कि आखिर शेहला को क्या हो गया है? कुछ तो हैरान करने वाला है।”
इसके जवाब में शेहला रशीद ने लिखा – “मुझे कुछ नहीं हुआ है। मैं हमेशा की ही तरह हूँ- तार्किक, पूर्वग्रहों से मुक्त और लेफ्ट-राईट की आलोचना से परे अपनी बातों को कहने के लिए साहसी। हम लोग एक बड़े संकट से गुजर रहे हैं, जो कि दंगों से ज्यादा जानें ले सकता है। हमें एकजुट होकर सामंजस्य स्थापित करना होगा।”
शेहला के इस ट्वीट पर एक ट्विटर यूजर ने लिखा- “इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भूल जाए कि शासन और अधिकारी तबाही के दौरान चुप थे और यह उनकी मिलीभगत थी। [:)] इसके अलावा, एकरूपता में शामिल होने का यह मतलब भी नहीं है कि कोई व्यक्ति उस तंत्र के साथ अंधे होकर खड़ा हो जाए और ऐसे सवाल करना बंद कर दे जो ताली बजाने से ज्यादा जरुरी हैं।”
शेहला ने इसके जवाब में लिखा है- “हाँ। आँख मूंदकर समर्थन करना अंध-विरोध जितना ही बुरा है। मोदी ने कोरोना वायरस का आविष्कार नहीं किया। कोई भी देश इसके लिए तैयार नहीं था। हाँ, हमें सही सवाल पूछना चाहिए, जैसे कि हम हैं। सरकार को इस लड़ाई में अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कर सब कुछ करना चाहिए और साथ ही नागरिकों को भी।”

CAA-NRC: क्या हिन्दू घृणा वाला सेकुलर ज़हर बाहर रिस रहा है ?

मुनव्वर राणा, शेहला रशीद, आरफा खानम, राहत इंदौरी
मुनव्वर राणा, शेहला रशीद, आरफा खानम, राहत इंदौरी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जो हिन्दू लोग आदम में यकीन नहीं करते क्योंकि कोई मतलब नहीं है। उनका फंडा अलग है। सोंच अलग है। ऐसे लोग कभी हिन्दू-मुसलमान की गन्दी सोंच से बाहर आ ही नहीं सकते। और इसी गन्दी सोंच के सहारे ये लोग अपनी जीविका चलाते हैं। जिस कारण राष्ट्रीयता की सोंच इन लोगों से कोसों मील दूर है। आदमी आज के दौर में व्यक्ति को कहते हैं, मानव को कहते हैं। देश के लिए नागरिक की अवधारणा होती है जहाँ लोगों के पहचान मिट जाते हैं, और बस राष्ट्रीय पहचान होती है कि हम भारतीय है, जापानी हैं, चीनी हैं, अरबी हैं।
भारत एक सेकुलर देश माना जाता है। माना इसलिए जाता है क्योंकि इस शब्द विशेष को नेता अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल करते हैं। वैसे सेकुलर का मतलब गैर हिन्दू या गैर दक्षिणपंथी होता है।  शब्दों के अर्थ काल, परिस्थिति,  देश और संदर्भ में बदल जाते हैं।
सेकुलर के नाम पर आप हिन्दुओं के देवी-देवताओं का अपमान कर सकते हैं, उनकी मूर्तियाँ तोड़ सकते हैं, मंदिरों को गिरा सकते हैं, उनके प्रतीक चिह्नों का उपहास कर सकते हैं, और न तो हिन्दू, न ही भारत का कोई कानून आपका कुछ कर पाएगा। उसे हमारे सेकुलर संविधान में ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ कहा गया है। यही आज़ादी किसी भी गैर हिन्दू (या हिन्दू के अंग-प्रत्यंग) वाले मजहबों के ऊपर नहीं है। अगर आपने गलत संदर्भ में भी कुछ भी कह दिया, कुछ भी मतलब कुछ भी, तो दो-दो साल से घात लगा कर बैठा मुसलमान आपको ऐसे रेत देगा कि लाश देखने वालों की आत्मा काँप जाएगी।
सेकुलर मुसलमान वहीं तक नहीं रुकता। वो आपको कमेंट में, उसके ख़िलाफ़, उसके दंगों के ख़िलाफ़ लिखने पर, आपको याद दिलाएगा कि ‘तुझे भी काटेंगे साले कमलेश तिवारी की तरह, इंशाअल्लाह’। लगभग तीन दशक पूर्व, शायद केरल के एक प्रोफेसर जोसेफ ने प्रश्न-पत्र में इस्लाम सम्बन्धित प्रश्न क्या पूछ लिया, कट्टरपंथियों ने उस प्रोफेसर का हाथ ही काट दिया था। देखिए कोई #mob lynching, #intolerance और #award vapsi आदि गैंग नहीं बोला। ऐसा मुसलमान ऐसे दुष्कृत्यों को सम्मान की तरह देखता है। ऐसा मुसलमान आतंकियों को, जिसने उसके पूर्वजों की बस्तियों को आग लगाया था, उनकी लड़कियों का बलात्कार किया था, उनके मंदिर तोड़े थे, और अंत में तलवार की नोक पर मुसलमान बना दिया था, बस इसलिए महान समझता है क्योंकि वो भी मुसलमान हैं।
आज इसलिए उनकी चर्चा हो रही है क्योंकि आमतौर पर जिन लोगों को पूरा भारत कवि, शायर, इतिहासकार, पत्रकार, धर्महीन वामपंथी समझता रहा, वो CAA और NRC के विरोध के नाम पर हो रहे दंगों को न सिर्फ सहमति दे रहे हैं, बल्कि उकसा रहे हैं "मरना ही है तो लड़ कर मर जाओ"। ये लोग अब रंगरेज के नीले रंग वाले नाँद से जितना दूर जा रहे हैं, इनका हरा रंग उतना ही बाहर आता जा रहा है। 
इन लोगों को आरिफ मोहम्मद खान के इस वीडियो को बार-बार देखना और इस पर मंथन भी करना चाहिए:-
हरे रंग में समस्या नहीं है, समस्या तब है जब तुम दिख तो हरे रहे हो, लेकिन चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हो कि ‘हम तो नीले हैं।’ ये सारे कवि, शायर, पत्रकार, इतिहासकार, वामपंथन अचानक से आदमी से मुसलमान हो गए हैं। और मुसलमान नहीं, वैसे मुसलमान हो गए हैं जो सेकुलर होने की परिभाषा से कहीं बहुत दूर, भारत को ये बता रहे हैं कि इनके बापों ने भारत पर राज किया था, ये लिख रहे हैं कि तिलकधारियाँ नहीं चलतीं, ये कह रहे हैं कि भारत माता की जय साम्प्रदायिक है, और ला इलाहा इल्लल्लाह बिलकुल भी साम्प्रदायिक नहीं, ये चिल्ला रहे हैं कि मुसलमानों के साथियों को मुसलमान नारे का सम्मान करना ही होगा
ये सारी इस्लामी बातें किस बात के विरोध में? एक कानून के विरोध में जिसका भारत के मुसलमानों से कोई वास्ता नहीं। तो सवाल यह है कि ये जो मुनव्वर राणा अचानक से मुसलमान हो कर ‘मरना ही मुकद्दर है तो फिर लड़ के मरेंगे’ की बात करने लगे हैं, वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? आखिर इनको दर्द किस बात का है कि ये अभिजात्य अल्फ़ाज़ में दंगाइयों को उकसा रहे हैं कि ‘लड़ के मरो’?
आखिर ‘माँ’ के नाम पर शायरी करने वाले मुनव्वर राणा किस बात से इतने दुखी हो गए कि टिक-टॉक विडियो पर “800 वर्षों तक हमने देश पर राज किया, लेकिन हमारी हड्डी में उबाल नहीं आया, लेकिन पाँच साल से तुम्हें सत्ता मिल गई है तो तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है! बहुत ज्यादे सनक में मत रहो, वरना अगर हम अपने पर आ गए तो भागने का रास्ता नहीं रहेगा…” बोलने वाले मुसलमान लम्पट का परिष्कृत संस्करण बन कर ‘यही वो मुल्क है जिसकी मैं सरकारें बनाता था’ लिख रहे हैं?
आखिर राहत इंदौरी ‘ये तिलकधारियाँ नहीं चलती’ कह कर ‘तिलक करने वाले हिन्दुओं को इतने घृणित लहजे में क्यों ललकार रहा है? इस आदमी को क्या समस्या हो गई है जिसकी महफिलों में मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू ही हुआ करते हैं? वो तिलकधारियों को मक्कार क्यों कह रहा है? आखिर एक शायर, जिसे संवेदनशील और ग़ैर राजनीतिक माना जाता है, वो किसी पार्टी और देश के प्रधानमंत्री, और उन्हें वोट देने वालों पर शब्दों की मदद से ऐसे निशाने क्यों लगा रहा है?
आख़िर फ़ैज अहमद फ़ैज के उस नज़्म को गाने की ज़रूरत आज के भारत में क्यों पड़ती है, जहाँ लगातार दो बार, पूर्ण बहुमत से चुन कर एक प्रधानमंत्री आया है, जो नज़्म एक पाकिस्तानी तानाशाह के लिए गाई गई थी? मैं क्या संदर्भ भूल जाऊँ कि तुमने मेरे चुने हुए, लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री को पहले तो तानाशाह कहा और फिर, इस्लामी शायरी से लेकर तमाम तरीक़ों में काफिरों के लिए एक अंतर्निहित, स्थायित्व लिए हुए घृणा ली हुई बातों को दोहराया जहाँ ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ का मतलब सीधा इस बात से है कि भाजपा को ‘हिन्दुओं की पार्टी’ कहा जाता है। क्या हम इतने मूर्ख हैं कि बिम्बों को न समझ सकें?
‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है?
क्या हम ये कह कर तुम्हारी बात मान लें कि वो बस एक नज़्म थी, जो गाई गई IIT कानपुर में? क्या वो नज़्म किसी ने ट्विटर पर डाली थी, एक रैंडम दिन में किसी ने अपनी प्रेमिका को भेजी थी वो नज़्म, या फिर किसी तानाशाह के लिए लिखी गई और आज के दौर में गाई गई उस नज़्म में तानाशाह मोदी है, और ‘बुत उठवाए जाएँगे’ में सीधा निशाना हिन्दुओं की मूर्तिपूजा से है? हम क्या इतने मूर्ख हैं कि इस्लामी शायरी के भीतर की हिन्दू घृणा के ज़हर को समझ न सकें? तुम मोदी को हिटलर से प्रतीकात्मक तौर पर तौलते रहो, तुम नाज़ियो के चिह्न से हमारा पवित्र ‘ॐ’ बना दो, नीचे ‘फक हिन्दुत्व’ लिखो, और हम ये मान लें कि ये तो विरोध का एक तरीका है, हिन्दुत्व से मतलब हिन्दुओं से नहीं राजनैतिक विचारधारा से है!
इसी नज़्म पर एक और नौटंकी जो दिखी वो यह थी कि सारे वामपंथी और हिन्दुओं से घृणा करने वाले एक फर्जी खबर बना कर फैलाने लगे कि IIT कानपुर ने इस बात की जाँच पर एक कमिटी बिठा दी है कि ‘ये नज्म हिन्दू विरोधी है या नहीं’। जबकि सच्चाई इससे अलग यह है कि कमिटी इस बात की जाँच करेगी कि जो आयोजन हुआ वो संस्थान के नियमों के हिसाब से हुआ या नहीं, उसके बाद सोशल मीडिया पर जो बातें कही गईं, वो सही थीं, या गलत। लेकिन इरफान हबीब जैसे लोग अपना एजेंडा ठेलने से बाज नहीं आए।
इन कट्टरपंथियों साम्प्रदायिकतों को शायद नहीं मालूम कि जितना आराम से मुसलमान भारत में है, उतना किसी मुस्लिम देश में नहीं। इस तरह की शायरी अगर किसी मुस्लिम देश में की होती, ऐसे शायरों को सलाखों के पीछे फेंक दिया होता। चीन ही को ले लो, जहाँ रोजा अथवा ईद को तो छोड़ो, घर में कुरान रखने के साथ नमाज़ तक पढ़ने पर पाबन्दी है। अगर जिगर वाले हैं, चीन जाओ, और वहां की संस्कृति अथवा कानून के विरुद्ध ऐसी शायरी कर के दिखाएं, कोई बचाने वाला नहीं मिलेगा।  
जिस वामपंथ में धर्म-मजहब की कोई पहचान है ही नहीं, वो शेहला रशीद, मुसलमानों के मजहबी उन्मादी नारों की बात करते हुए कहती है कि अगर आप उनसे शर्मिंदा हैं तो आप हमारे सहयोगी नहीं हैं। अगर आपको इन नारों से दिक्कत है, तो आप भी समस्या का ही हिस्सा हैं। और जनाब इनके वो मजहबी नारे क्या हैं? वो नारे हैं: हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, AMU की छाती पर, नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर, तेरा मेरा रिश्ता क्या ला इलाहा इल्लल्लाह…
ये हैं वो नारे जो एक मजहबहीन वामपंथन ‘नॉन-नेगोशिएबल मानती है। और आप फिर सोचेंगे कि एक राजनैतिक विरोध-प्रदर्शन में ‘मजहबी नारों की क्या ज़रूरत है’ तो आपको जवाब नहीं मिलेगा। शेहला रशीद यह मान कर चल रही है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही सेकुलरिज्म तेल लेने चला गया था। ये बात और है कि जब इनका सेकुलरिज्म तेल ले कर वापस लौटा तो पहले जामिया में आग लगाई, फिर सीलमपुर में पेट्रोल बम फेंका, फिर लखनऊ के परिवर्तन चौक में आग लगाई, फिर बंगाल में ट्रेन फूँक दिया, बिजनौर में आग लगाई, मेरठ और अलीगढ़ को लहका दिया। वाकई, सेकुलरिज्म तेल तो बार-बार लेने गया है मोदी के आने के बाद, खास कर मुसलमानों का सेकुलरिज्म जहाँ वामपंथन भी खुल कर मुसलमान हुई जा रही है!
शशि थरूर ने लम्बे समय के बाद कुछ ढंग की बात कही कि मुसलमानों को समझना चाहिए कि CAA/NRC के प्रदर्शन में ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’ जैसे नारों की जगह नहीं है क्योंकि वहाँ अल्लाह को लाया जा रहा है। ये बात कई मुसलमानों को नहीं पची क्योंकि उनके लिए हर प्रदर्शन विशुद्ध रूप से मजहबी है क्योंकि उनके लिए पहचान का मतलब भारतीयता, नागरिकता और सामान्य बातों से परे सिर्फ और सिर्फ इस्लाम है, उम्माह है, कौम है।
स्वयं को पत्रकार कहने वाली आरफ़ा खानम ने कुछ समय पहले ट्वीट किया था कि ‘हाँ, भारत माता की जय एक साम्प्रदायिक नारा है’, उसने आज पत्रकारिता को ढोंग त्यागते हुए, खुल कर सामने आ कर कहा कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह, अल्लाहु अकबर, इंशाअल्लाह किसी भी तरह से साम्प्रदायिक, इस्लामी कट्टरपंथी नारे नहीं हैं। इन सारे नारों को या तो आप सीधा ‘शब्दों को झुंड’ के रूप में देख सकते हैं, या फिर आप इन्हें संदर्भ में देखेंगे।
‘भारत माता की जय’ कहने से हम किसी देवी की पूजा नहीं करते, हम अपनी मातृभूमि की जय-जयकार करते हैं। यहाँ किसी का मुसलमान होना तब तक प्रभावित नहीं होता जब तक वो इस भाव से जय-जयकार न करे जहाँ वो यह मानने लगे कि ‘अल्लाह के अलावा भी कोई है जिसे वो पूजनीय मानता है’। दूसरी बात, साम्प्रदायिक मानने के लिए किसी भी बात में नकारात्मकता आवश्यक है, वहाँ शाब्दिक या और तरह की हिंसा होनी चाहिए, मंशा होनी चाहिए नीचा दिखाने की।
मुझे नहीं लगता कि ‘भारत माता की जय’ बोलते हुए कोई किसी को नीचा दिखाना चाहता है, या किसी भी प्रकार के हिंसक भाव रखता है। लेकिन, उसके उलट एक राजनैतिक कानून के विरोध में, जब हिन्दुओं से आजादी, हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी, फक हिन्दुत्व आदि के साथ-साथ, उसी समय-काल में, उन्हीं परिस्थितियों में, उसी संदर्भ में जब ‘नारा ए तकबीर अल्लाहु अकबर’ गूँजता है, तो वो विशुद्ध मजहबी उन्माद है क्योंकि ये नारा तुम सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और एक दूसरे धर्म को नीचा दिखाने के लिए लगा रहे होते हो। तुम ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहो, कोई समस्या नहीं, लेकिन ये सिर्फ मजहबी जमावड़े में बोलो, राजनैतिक में घुसाओगे तो हमें याद आएगा कि तुम्हारा लक्ष्य तो गजवा-ए-हिन्द और ख़िलाफ़त तक का है।
धर्म निरपेक्ष होने का ढोंग 
इन लोगों की ही तरह दसियों मुसलमान ऐसे मिलेंगे आपको जो बिना इस कानून को पढ़े, बिना ये जाने कि NRC के ड्राफ्ट तक अभी बाहर नहीं आया है, इन दंगाइयों को अपनी सहमति ये कह कर दे रहे हैं कि मुसलमानों के अस्तित्व पर संकट आ गया है। सामने से पूछे जाने पर ये बार-बार यह भी कह रहे हैं कि आम लोगों को सरकार समझाने में असफल रही है, जबकि सत्य यह है कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है, लेकिन यही लोग आम लोगों में डर भरते जा रहे हैं।
मुनव्वर राणा की, राहत इंदौरी की, इरफान हबीब की, शेहला रशीद की, आरफा खानम की और उन हजारों दंगाई मुसलमानों की समस्या CAA या NRC नहीं है। इनकी समस्या यह है कि इनके भीतर का घमंड, एक विशेष होने का भाव जो पिछली सरकारों ने इनमें गहरे भर दिया था, वो अचानक से छिन-सा गया है। वो, जिनके मजहब के लोगों के आतंकी होने पर, 22 साल की न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी, रात के दो बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवा लिए जाते थे, उनकी बात की अब कोई वैल्यू नहीं रही।
वो जो यह चिल्लाते थे कि ‘तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निगलेगा’, आज दंगा करने के बाद योगी सरकार को अपने समुदाय द्वारा किए गए नुकसान की भरपाई के लिए पैसे लौटा रहे हैं। वो, जो मजहब की आड़ में भारत का झंडा, राष्ट्रीय गीत और जय बोलने से कतराते थे, आज, भले ही दंगा करने और आग लगाने के लिए ही सही, भीड़ में तिरंगा लिए घूम रहे हैं। इनके घमंड के गुब्बारे में जो हवा भरी जाती रही थी, उसमें इस सरकार ने पहले तो हवा भरना बंद किया, और दूसरे चरण में पिन मारना भी शुरू कर दिया है, तो फटे गुब्बारे से कुछ आवाज तो आएगी ही।
वो, जो सोचते थे कि कश्मीर से पंडितों के भगा देने के बाद, कश्मीर को अलग देश बना लेंगे और उसी चक्कर में कश्मीर को नक्शे पर भी न पहचान सकने वाले मुसलमान भी खुश हो जाते थे, आज परेशान हैं कि कश्मीर में अब भारत का संविधान लागू है, और उसका झंडा भी तिरंगा है। वो, जो सोचते थे कि संविधान से ऊपर कोई मुसलमानी पर्सनल लॉ बोर्ड है, तीन तलाक के ग़ैर क़ानूनी करार दे दिए जाने से इसे मजहब पर हुए हमले के रूप में देख रहे हैं।
वो, जिन्होंने सोचा था कि इरफान हबीब जैसा चिरकुट उपन्यासकार, अपने चेलों को कोर्ट में भेज कर, भारत को यह समझा देगा कि भारत का इतिहास मुसलमान आतंकवादी बाबर के आने के बाद से ही शुरू होता है, वो राम मंदिर के गगनचुम्बी शिखरध्वज को कैसे देख पाएँगे? वो, जो सोचते हैं कि बौद्धों को हथियार उठाने पर मजबूर कर देने वाले आतंकी रोहिंग्या और बांग्लादेश से भारत में घुसे घुसपैठियों को भारत में इसलिए जगह मिल जानी चाहिए क्योंकि वो उनके उम्माह का हिस्सा हैं, उनके हकूक हैं, उन्हें भारतीय नागरिकों के रजिस्टर बनने से तो समस्या होनी ही है।
इसीलिए, केंचुली उतार कर ये पूरा विरोध अब ‘हम बनाम वो’ का हो गया है। इस पूरे विरोध का लहजा ‘मुसलमान बनाम काफिर’ का हो चुका है। वो खुल कर कह रहे हैं कि ‘गलियों में निकलने का वक्त आ गया है’, वो चिल्ला कर जामिया की गलियों में कह रहे हैं कि उन्हें ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ चाहिए। वो दिन के उजाले में दीवारों पर हमें ‘कैलाश जाओ’ लिख कर बता रहे हैं। वो एक राजनैतिक प्रदर्शन में हजारों की भीड़ जुटाते हैं और पूछते हैं कि ‘तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और आवाज आती है ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’। वो ख़िलाफ़त 2.0 के ख्वाब AMU की दीवारों पर लिख रहे हैं और हिन्दुत्व, यानी हिन्दुओं से जुड़ी हर बात, विचार, पूजा, व्यक्ति, ग्रंथ आदि की कब्र खोदने की बातें कर रहे हैं।
हिन्दू आज भी पॉलिटिकली करेक्ट होना चाह रहा है। वो ये मान रहा है कि ये लोग भटके हुए, गुमराह लोग हैं, इनके नारों का कोई मतलब नहीं, ये तो बस ऐसे ही है। ये लड़ाई अब खुले में सुनाई पड़ रही है। अब दिख रहा है कि इनका लक्ष्य कोई कानून या संविधान नहीं, इनकी आँखें शिथिल हो कर ‘गजवा-ए-हिन्द’ का आस देख रही है, और दाहिने-बाएँ इन्हें कुछ नहीं दिख रहा। ये नारे सीढ़ियाँ हैं, ये वो चरण है प्रयोग का जहाँ देखा जा रहा है कि पूरे भारत का मुसलमान बाहर आ सकता है क्या?
अभी आँकने का मौका है कि जब महत्वपूर्ण जगहों पर बैठे मुसलमान, एक पहचान पा चुके मुसलमान, वैसे मुसलमान जो वैचारिक स्तर पर नेतृत्व दे सकते हैं, उनके खुल कर बाहर आने पर कितने मुसलमान उनकी बातें मानेंगे। इसीलिए, आज पढ़ा-लिखा, कॉलेज जाता मुसलमान भी NRC के आए बिना ही कह रहा है कि उसके कागज तो बाढ़ में बह गए, 90 साल की बुजुर्ग असमा कह रही है कि दसवीं फेल मोदी अपने सात पुश्तों के नाम गिनाए। जब आम आदमी गृहमंत्री की अपील को सीधे कह दे कि वो तो झूठ बोल रहा है, एक चुनी हुई सरकार के सासंदों द्वारा पारित कानून को यह कह कर नकार दे कि सासंद तो बस 300 ही हैं, हम तो हजारों में हैं, तब आप समझ जाइए रंग उतरा ही नहीं, रंग दिखाया जा रहा है कि पहचानो, हम कौन हैं!

मजहबी नारे, इतिहास के आतंकियों के शासक होने के दिन, और हिन्दुओं से घृणा की बातें खुल कर हो रही हैं। बाकी का काम मीडिया गिरोह सक्रिय हो कर कर ही रहा है जहाँ बीस दिन की नवजात बच्ची को विरोध-प्रदर्शन की नायिका के रूप में भुनाया जा रहा है। अचानक से भीम-मीम में इसलिए दरार पड़ती दिख रही है कि भीम वालों को मजहबी नारे अनुचित लगते हैं। अब भीम सोच रहा है कि मीम वाले तो उनको पागल बना रहे हैं, इनका एजेंडा तो कुछ और ही है। बाकी का काम इस उम्मीद ने कर दिया जहाँ शेहला रशीद कहती है कि अगर तुम हमारे साथ हो तो आरक्षण में हमें भी हिस्सा दे दो!
भीम वाला आज भी जोगेंद्र नाथ मंडल को नहीं जानता कि मीम के झंडाबरदारों ने उनका क्या हश्र किया था। भीम वालों की लड़ाई राजनैतिक है, वो अपने हक के लिए बार-बार उठते रहे हैं। उनकी लड़ाई शोषण से है, बराबरी की है, और अब अचानक से उनसे कहा जा रहा कि ‘बोलो भाई तेरा मेरा रिश्ता क्या’, और भीम वाला सोच में पड़ जाता है कि ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ कैसे बोल दे!
आप भी इस मजहबी उन्माद को समझिए। आप भी यह समझिए कि सेकुलर होने का मतलब मुसलमानों के लिए अलग है, हिन्दुओं के लिए अलग। एक सेकुलरिज्म की आड़ में आपके देवी-देवता का उपहास करता है, और आप हैं कि ईद की सेवइयाँ खाने के लिए पागल हुए जा रहे हैं। हिन्दुओं के लिए सेकुलर होने का मतलब है ‘सहना’। इसलिए, वो आज भी इन मजहबी उन्मादियों को आग लगाता देख रहा है और यह मान कर चल रहा है कि ये आग उसके घर तक नहीं पहुँचेगी।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आज देश में जिस प्रकार #CAA को लेकर शांति के नाम पर उग्र एवं हिंसात्मक प्रदर्शन हो रहे हैं,...
हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके ‘जय श्री राम’ नारे को आतंकी नारा बना कर एक महीने में कम से कम दस बार झूठ बोला गया ताकि उसके धर्म को बदनाम किया जा सके। यही हिन्दू यह भूल जाता है कि उसके दसियों भाइयों को मुसलमानों की भीड़ ने लिंच किया है। हिन्दू यह भी भूल जाता है कि सैकड़ों साल पहले भी उसके मंदिर तोड़े जाते थे, आज भी हौज काजी समेत कई जगहों पर वही हो रहा है। हिन्दुओं को यह भी याद नहीं कि उनके काँवड़ यात्रा पर इस साल सावन के महीने में कितने जगहों पर पत्थरबाजी हुई है।
मुसलमानों के बीच की हस्तियाँ अब मुसलमान बन कर ही सामने आ रही हैं। उनके लिए इस्लाम ही एकमात्र पहचान है। उन्हें राजनैतिक विरोध प्रदर्शन में ‘नारा ए तकबीर’ और ‘हिन्दुओं से आजादी’ कहने में कोई समस्या नहीं दिख रही। मैं चाहता हूँ कि हिन्दू इस बात को बस दूर से देखे, दिमाग में बिठाए और अकेले में जा कर सोचे कि ये ‘सेकुलर’ शब्द जो है, उसका मतलब आखिर होता क्या है।