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यात्रा से पूर्व भगवान जगन्नाथ बीमार क्यों होते हैं? जब अपने परमभक्त माधव दास के बचे बुखार को अपने ऊपर ले लिया ; मन्दिर का ध्वज वायु की विपरीत दिशा में लहराता है; 5 रहस्य जो अब तक अनसुलझे


यह कथा सनातन विरोधियों को शायद रास नहीं आए, क्योकि अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने पुरुषोत्तम श्रीराम को और उनके निर्मित रामसेतु को ही काल्पनिक बताने का दुस्साहस कर सकते हैं, हो सकता है कभी माता-पिता को ही काल्पनिक न कह दें।

ओडिशा में स्थित जगन्नाथ मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को धरती के बैकुंठ स्वरूप रूप में माना जाता है। माना जाता है कि पुरी का ये पौराणिक मंदिर काफी पुराना है। इस मंदिर से जुड़ा इतिहास काफी हैरान कर देने वाला है। धार्मिक मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर की मूर्तियों में आज भी भगवान श्रीकृष्ण का दिल धड़कता है।

सनातन परंपरा में जगन्नाथ मंदिर को वैष्णव परंपरा का सबसे बड़ा तीर्थ स्थान माना जाता है। आस्था के इस धाम पर प्रतिदिन देश-विदेश से हजारों की संख्या में तीर्थयात्री भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पुरी का यह मंदिर भगवान ​कृष्ण को समर्पित है, लेकिन वहां पर उन्हें जगन्नाथ धाम के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म से जुड़े चार प्रमुख तीर्थ में से एक पुरी के इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की मूर्ति के दर्शन होते हैं।

ॐज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार होकर एकांतवास में चले जाते हैं। इसे अनासरा या ज्वर लीला कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के पट बंद रहते हैं और केवल दायित्वगण ही भगवान की सेवा में रहते हैं।

यह परंपरा भगवान जगन्नाथ के भक्त माधव दास से जुड़ी है। एक बार माधव दास बहुत बीमार थे और भगवान जगन्नाथ ने स्वयं उनकी सेवा कर रहें थे यह बात भक्त माधव दास समझ गए उनकी सेवा प्रभु हीं कर रहें हैं फिर भक्त माधव दास ने प्रभु से कहा आप मेरी सेवा कर रहें हैं यह ठीक नहीं हैं आप तो भगवान हैं मुझे ठीक क्यों नहीं कर देते जो आप मेरे लिए कष्ट सह रहें हैं।
भगवान ने कहा कि तुम्हारे भाग्य में 15 दिन की बीमारी और बची है 15 दिन में ठीक हो जाओगे लेकिन माधव दास ठीक करने की हठ करने लगे प्रभु ने बहुत समझाया लेकिन माधव दास नहीं माने तब प्रभु ने माधव दास को तो ठीक कर दिए लेकिन अपने भक्त की बीमारी को अपने ऊपर ले लिए क्योकि कर्म के फल में परमात्मा भी हस्तक्षेप नहीं करते यहीं विधि का विधान हैं।
तभी से, हर साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ 15 दिनों के लिए बीमार होकर एकांतवास में चले जाते हैं अपने प्रिय भक्त की पीड़ा को अपने ऊपर ले लेते हैं फिर रथ यात्रा से पहले स्वस्थ होकर भक्तों के दर्शन के लिए निकलते हैं।
भगवान जगन्नाथ 26 जून को पूर्ण स्वस्थ होकर रथ यात्रा के दौरान अपने प्रिय भक्तों को दर्शन देंगे।
प्रतिमा बनाने में स्वर्ण औजारों का प्रयोग
प्रभु की प्रतिमा में उस वृक्ष की लकड़ी का प्रयोग होता है, जिस वृक्ष पर ॐ अंकित होता है। उस वृक्ष को केवल उसी व्यक्ति को काटने की अनुमति होती है, जिसे स्वप्न में जगह और वृक्ष दिखाया जाता है। उसे उस वृक्ष पर पहुँचने पर स्वर्ण कुल्हाड़ी प्राप्त होती है। उस वृक्ष की लकड़ी को निर्धारित स्थल(प्रतिमा बनाने का स्थल) तक ठेले को उसे और उसके परिवार को ही आज्ञा होती है। कोई अन्य व्यक्ति ठेला खींचने में तनिक भी सहायता नहीं सकता।
कहते हैं कि भगवान विश्वकर्मा स्वयं अपने प्रभु की प्रतिमा बनाने निर्धारित स्थल पर एक बंद कक्ष में स्वर्ण छेनी एवं हथोड़ी आदि से बनाते है। और पुरानी प्रतिमा से नवनिर्मित प्रतिमा में हृदय परिवर्तित करते समय मूर्तिकार की दोनों आँखों पर पट्टी बंधी होती है। यही कारण है कि यात्रा से पहले इनके स्वास्थ्य की जाँच होती रहती है। ज्वर होने पर दवाई आदि दी जाती है। ठंठ लगने की स्थिति में गर्म वस्त्र, शाल और रात्रि शयन में लिहाफ आदि प्रदान किये जाते हैं।

जगन्नाथ पुरी मंदिर के ऐसे 5 रहस्य जो अब तक अनसुलझे

  1. मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तनों को एक के ऊपर एक क्रम में रखा जाता है, जिसमें सबसे ऊपर रखे बर्तन का प्रसाद सबसे पहले पकता है, जबकि, नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। जोकि अपने आप में हैरान कर देने वाला है।
  2. मान्यता है कि मंदिर में दिन के समय हवा समुद्र से जमीन की ओर चलती है। जबकि शाम के समय हवा जमीन से समुद्र की ओर चलती है। जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगा झंडा हमेशा हवा के विपरीत लहराता है।
  3. मान्यता है कि जगन्नाथ मंदिर की ऊंचाई करीब 214 फीट है। ऐसे में पशु पक्षियों की परछाई तो बननी चाहिए, मगर इस मंदिर के शिखर की छाया हमेशा गायब ही रहती है।
  4. पुरी में समुद्र तट पर स्थित जगन्नाथ मंदिर के ऊपर से न ही कभी कोई हवाई जहाज उड़ता है और न ही कोई पक्षी मंदिर के शिखर पर बैठता है। ऐसा भारत के किसी भी मंदिर में नहीं देखा गया है।
  5. मंदिर में हर 12 साल के भीतर भगवान जगन्नाथ समेत तीनों मूर्तियों को बदला जाता है। जिसके बाद वहां पर नई मूर्तियां स्थापित की जाती हैं। भगवान की मूर्तियों को बदलते समय शहर की बिजली को काट दिया जाता है। इसके साथ ही मंदिर के बाहर भारी सुरक्षा बलों को तैनात कर दिया जाता है। उस दौरान सिर्फ पुजारी को ही मंदिर में जाने की परमिशन होती है।
हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के बाद 56 भोग का महाप्रसाद खाने के लिए यहां आते हैं। मान्यताओं के अनुसार यहां की रसोई दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है, जो प्रतिदिन हजारों लोगों को सेवा प्रदान की जाती है। लेकिन आपको बता दें कि जगन्नाथ पुरी के इस रहस्यों से भरे मंदिर की रसोई में जो प्रसाद बनाया जाता है उसमें टमाटर का उपयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है। लेकिन क्यों? तो आइए इस बारे में जानते हैं:-
क्यों नहीं किया जाता टमाटर का उपयोग
दरअसल, उड़िया में टमाटर को बिलाती (जो कि एक विदेशी नाम है) के नाम से जाना जाता है। इसलिए जगन्नाथ पुरी मंदिर में बनने वाले प्रसाद में टमाटर का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। क्योंकि मान्यताओं के अनुसार, भारत में टमाटर को पहले के समय में विदेशियों के द्वारा उगाया जाता था और उन्हीं के द्वारा ही इसे भारत में भी लाया गया था। इसलिए इसे जगन्नाथ पुरी मंदिर में उपयोग करने पर बैन है। हालांकि यहां सिर्फ टमाटर ही नहीं। बल्कि आलू सहित कई अन्य सब्जियों पर भी बैन है।
जगन्नाथ पुरी मंदिर के प्रसाद में ये सब्जियां भी हैं प्रतिबंधित
भोग में टमाटर सहित आलू, फूलगोभी, पत्तागोभी, चुकंदर, मक्का, हरी मटर, गाजर, शलजम, बेल मिर्च, धनिया, बीन्स, मिर्च, हरी बीन्स, करेला, भिंडी और खीरे जैसी सब्जियों को भी महाप्रसाद में शामिल करने से रोक दिया गया है।
क्यों प्रतिबंधित हैं विदेशी सब्जियां
दरअसल, माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में जो महाप्रसाद भगवान को चढ़ाने के लिए तैयार किया जाता है, उसकी पूरी सामग्रियां लोकल होती हैं। इसमें स्थानीय फूड का इस्तेमाल किया जाता है। इतना ही नहीं, यहां मंदिर में भोग को बनाने के लिए भी मिट्टी और ईंट से बने बर्तनों का इस्तेमाल किया जाता है।
जानकारी के अनुसार, यह महाप्रसाद बनाने के लिए मिट्टी और ईंट से बने 240 स्टोव हैं। जिनमें भोग तैयार किया जाता है। प्रत्येक चूल्हे पर 9 बर्तनों को एक के ऊपर एक रखकर खाना पकाया जाता है। बताया जाता है कि ये 9 बर्तन का अंक 9 नवग्रह, 9 धान्य और 9 दुर्गाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जहाँ "खुदा" वहीं मूर्तियां निकली; पश्चिम बंगाल में मिली भगवान विष्णु की 12 हाथ वाली प्रतिमा, द्वारकेश्वर नदी में खनन के दौरान निकली: हिन्दुओं ने चालू की पूजा, पुरातत्वविद बोले- इस्लामी आक्रान्ताओं से बचाने को दबाई होगी

कहीं भी खुदाई की मांग होने पर मुग़ल आक्रांताओं के वंशज मुस्लिम कट्टरपंथी क्यों बिलबिलाते हैं? इसका कारण है। क्योकि जहाँ भी खुदाई होती मंदिर के अवशेष या खंडित मूर्तियां निकलती हैं। दबे हुए भगवान चीख-चीखकर कह रहे हैं यहाँ खोदो। वास्तव में जहाँ "खुदा" वहीँ मूर्तियां, मंदिरों के अवशेष या खंडित मूर्तियां निकल रही है। अयोध्या विवाद के समय कोर्ट के आदेश पर सच्चाई जानने खुदाई के लिए राममंदिर विरोधी गैंग तैयार तो हो गया लेकिन खुदाई में मिले मंदिर के अवशेषों को देख मातम छा गया था। कोर्ट में झूठ बोल दिया कि "बस एक खम्बा मिला" कोर्ट ने भी सच मान लिया। लेकिन पुरातत्व विभाग के तत्कालीन निदेशक के के मोहम्मद, जिनकी मौजूदगी में खुदाई हुई थी, ने सेवानिर्वित होने पर अपनी पुस्तक में सच्चाई सामने रखने से जितने भी मंदिर विरोधी थे सब में मातम पसर गया। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा कि "मन्दिर कभी का बन गया होता अगर वामपंथियों और कांग्रेस ने खुदाई में मिले राममन्दिर के अनगिनत सबूतों को कोर्ट से नहीं छुपाया होता।" किसी भी कोर्ट ने सच्चाई छुपाने के आरोप में मंदिर विरोधियों को दण्डित नहीं किया, क्यों? क्या मजबूरी थी अदालत की?        
पश्चिम बंगाल के बाँकुड़ा में भगवान विष्णु की एक मूर्ति मिली है। यह मूर्ति यहाँ द्वारकेश्वर नदी से शनिवार (7 जून, 2025) को बरामद हुई है। भगवान विष्णु की यह मूर्ति करीब 3 फीट की है। इस मूर्ति में भगवान विष्णु का 12 भुजाओं वाला रूप है। पुरातत्वविदों ने कहा है कि यह भगवान विष्णु का लोकेश्वर रूप है।

यहाँ कई बार जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ भी मिल चुकी हैं। बाँकुड़ा की द्वारकेश्वर और कांगसावाती नदी की सभ्यता काफी प्राचीन बताई जाती है। वहीं इस बार नदी से रेत निकालते समय भगवान विष्णु की यह मूर्ति प्राप्त हुई है। यह मूर्ति एकदम सही अवस्था में है, इसमें कोई भी टूट-फूट नहीं हुई है।

लोगों ने कहा है कि इस इस्लामी आक्रान्ताओं से बचाने के लिए नदी में रखा गया होगा। पुरातत्वविद सुकुमार बनर्जी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि यह मूर्ति असाधारण होने के साथ-साथ शिल्पकला का बेहतरीन उदाहरण भी है।

उनका कहना है कि अखंड अवस्था में मिली यह प्रतिमा ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक मूल्यवान भी है। बताया गया है कि स्थानीय हिंदुओं ने भगवान विष्णु की मूर्ति को मंदिर में स्थापित भी कर दिया है।

गुजरात : रावण की एक गलती और भगवान विष्णु का बालक रूप… कच्छ के कोटेश्वर मंदिर की क्यों है इतनी मान्यता, विराजमान हैं यहाँ स्वयं ‘संपत्ति के ईश्वर’

                                            कोटेश्वर मंदिर (साभार : kiaayo.com)
गुजरात के कच्छ जिले में रेगिस्तान के रास्ते जब थकने लगते हैं तब समुद्र की गोद में बैठा एक प्राचीन शिव मंदिर दिखता है। जिसका नाम है कोटेश्वर महादेव मंदिर। यहाँ भगवान शिव स्वयं कोटेश्वर रूप में विराजमान हैं, जिन्हें ‘संपत्ति के ईश्वर’ भी कहा जाता है। कोटेश्वर मंदिर भारत की आखिरी सीमा पर स्थित है। इसके आगे सिर्फ पानी है और पाकिस्तान की सरहद।
                                         कोटेश्वर मंदिर का गर्भग्रह (साभार : Gujarat Tourism)

मान्यताओं के अनुसार, कोटेश्वर मंदिर का संबंध रावण से भी है। कहा जाता है कि रावण ने भगवान शिव से खुश होकर शिवलिंग माँगा था, जिसे वह लंका ले जाना चाहता था। शिव जी ने उसे एक शर्त के साथ शिवलिंग दिया कि रास्ते में उसे कहीं भी ज़मीन पर नहीं रखना है, लेकिन रावण रास्ते में थक गया और उसने एक चरवाहे बालक (जो स्वयं भगवान विष्णु थे) से मदद माँगी। उस बालक ने शिवलिंग को ज़मीन पर रख दिया। फिर वो बालक भी वहीं बैठ गया। आज उसी स्थान को कोटेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है।

मंदिर का इतिहास

  • कोटेश्वर मंदिर का जिक्र सबसे पहले ‘स्कंद पुराण’ में मिलता है। मंदिर का विस्तार मौर्यकाल (लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, ये स्थान पहले बौद्ध धर्म का केंद्र भी रहा है, लेकिन धीरे-धीरे यह शिव उपासना का बड़ा स्थल बन गया। 10वीं शताब्दी में सोलंकी वंश के शासकों ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और इसे गुजरात के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल किया। वहीं, 1819 में आए भूकंप से इस क्षेत्र को काफी नुकसान हुआ था लेकिन इसके बाद ब्रिटिश शासन में मंदिर का आंशिक पुनर्निर्माण किया गया।

मंदिर की संरचना

मंदिर की संरचना बहुत ही साधारण लेकिन प्रभावशाली है। यह पूरी तरह से पत्थरों से बना हुआ है और इसकी बनावट पारंपरिक नागर शैली में है। जो गुजरात के मंदिरों की खास पहचान होती है। मंदिर का गर्भगृह छोटा है लेकिन बेहद पवित्र माना जाता है। इसके ऊपर ऊँचा शिखर है जो दूर से ही दिखाई देता है।
             कोटेश्वर मंदिर का मुख्य द्वार और मंदिर के भीतर स्थापित नंदी की मूर्ति (साभार : Gujarat Tourism)
मंदिर की दीवारों पर नजर आने वाली सादगी ही इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबसूरती है। समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण यहाँ हमेशा ठंडी हवा बहती रहती है जो मंदिर के वातावरण को और भी पवित्र बना देती है।

मंदिर तक कैसे पहुँचे ?
                                  समुद्र तट पर स्थापित कोटेश्वर महादेव मंदिर (साभार : kiaayo)

  • कोटेश्वर मंदिर तक पहुँचने के लिए पहले भुज आना होगा। भुज से यहाँ की दूरी करीब 150 किलोमीटर है, जिसे सड़क के रास्ते से आराम से तय किया जा सकता है। भुज रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट से यहाँ के लिए टैक्सी और बसें उपलब्ध हैं। मंदिर तक जाने वाली सड़कें अब काफी बेहतर हो चुकी हैं। रास्ते में नारायण सरोवर  और लखपत जैसे अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल भी पड़ते हैं, जिनका दर्शन करते हुए कोटेश्वर पहुँचा जा सकते है।

महाराष्ट्र : कोपेश्वर मंदिर, जहाँ शांत हुआ था शिव का क्रोध


अपने आपको हिन्दू कहने वाले नेताओं और पार्टियों ने अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए तुष्टिकरण करते भारतीय संस्कृति और इतिहास से खिलवाड़ कर भारतीयों को उनके वास्तविक इतिहास से अज्ञान बना दिया। 2014 चुनावों के बाद से समय ने जो करवट बदली, इन सभी पाखंडियों ने चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया है। वास्तविक इतिहास के पृष्ठ धीरे-धीरे खुलने हो चुके हैं, जिनसे जनता को दूर रखा हुआ था। 
यह किसी 3D फ़िल्म का चित्र नहीं बल्कि हमारे प्राचीन मंदिर परिसर का एक हिस्सा है, प्रत्येक वर्ष में एक या दो बार ऐसा होता है जब चंद्रमा इस मंडप के एकदम बीच में आता है । हैरान करने वाली बात है कि ऐसा केवल कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही होता है।

ऐसे हज़ारों चमत्कारी मंदिर हैं, जिन्हें प्रकाश में लाने का समय आ गया है। 31 दिसम्बर 2023 की सुबह Zee News पर एक महिला ज्योतिष ने अयोध्या में जीणोद्धार हो रहे राम मन्दिर के विषय पर संक्षेप में जो अति महत्वपूर्ण बात कही, देखना है Zee News ही उस बात को कितना प्रसारित करता है या अपनी TRP के मकड़जाल में फंस छद्दम धर्म-निरपेक्ष बन जायेगा। भावार्थ यह है कि अयोध्या में राम मन्दिर नहीं बन रहा है, बल्कि भारत विश्व गुरु बनने तेजी से बढ़ेगा। 
कोपेश्वर मंदिर का इतिहास व वास्तुकला
कहते हैं भारत का प्राचीन नाम अखंड भारत था, ये बिल्कुल सही बात है। इसका प्रमाण आज भी देखा जा सकता है। आज भी प्राचीन समय की कई ऐसी सरंचना देखी जा सकती है, जो इस बात का प्रमाण देती है कि भारत से श्रेष्ठ न कोई था और न कोई रहेगा। इन संरचनाओं को देखकर आज भी शोधकर्ता यही सोचते हैं कि आखिर कैसे इतनी जटिल वास्तुकला से ये संरचना बनाई गई है, जबकि हजारों साल पहले मशीन का तो जमाना ही नहीं था, सिर्फ हाथ से ही कारीगरी की जाती थी।
इसका जीता जागता प्रमाण है- महाराष्ट्र के कोल्हापुर के समीप खिद्रापुर में स्थित कोपेश्वर मंदिर। जी हां, इस मंदिर की वास्तुकला कोई साधारण डिजाइन नहीं है बल्कि इसमें कई रहस्य छिपे हैं, जो आज भी रहस्य ही बने हुए है। इन्हें देखने पर आपको 3D फिल्मों की याद आ जाएगी, जैसे लग रहा हो कोई सीन बस करीब से होकर गुजरा हो। इसकी भव्यता आज भी किसी मामले में कम नहीं हुई है। 
खिद्रापुर का कोपेश्वर मंदिर चालुक्य वंश की उत्कृष्ट वास्तुकला को दर्शाती है। यह मंदिर चालुक्यों द्वारा बनाए बाकी इमारतों की तरह प्रसिद्ध तो नहीं हो पाया लेकिन इसकी वास्तुकला ही इसे देखने पर मजबूर कर देती है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के सीमा पर स्थित यह मंदिर 12वीं शाताब्दी (1109-78 ईस्वी के बीच) में शैलाहार वंश के राजा गंधारादित्य द्वारा बनवाया गया था। कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।
मंदिर परिसर में आपको कई शिलालेख (करीब 12) दिख जाएंगे, जो प्राचीन इतिहास से रूबरू करवाते हैं। हालांकि, अब इसमें से सिर्फ कुछ ही शिलालेख (शायद 2 या 3) बचे हैं, जिनकी स्थिति अभी भी ठीक है। इनमें कुछ राजाओं और उनके अधिकारियों के नाम अंकित है। एक (संस्कृत - देवनागरी) को छोड़ बाकी सभी शिलालेख कन्नड़ भाषा में लिखित हैं। मंदिर में स्थित दो शिवलिंग है, इनमें एक भगवान शिव और दूसरा भगवान विष्णु को समर्पित है। मंदिर का ऊपरी छत खुला है, जिससे सूर्य की किरणें हर रोज महादेव का सूर्याभिषेक करती हैं।
कोपेश्वर मंदिर के निर्माण को लेकर विभिन्न मत 
मंदिर के निर्माण को लेकर कई विभिन्न मत है, जिसमें 7वीं शाताब्दी में बादामी चालुक्य वंश के राजाओं, 9वीं शाताब्दी में कल्याणी चालुक्य वंश के राजाओं, 12वीं शाताब्दी में शैलहार वंश के राजाओं ने करवाया था। मंदिर में स्थित एक शिलालेख के मुताबिक, इस मंदिर का पुनरुद्धार 1204 ईस्वी में देवगिरी के यादव राजाओं ने करवाई थी।
कोपेश्वर मंदिर पर औरंगजेब का आक्रमण 
इतिहास की मानें तो 1702 ईस्वी में मुगल शासक औरंगजेब ने कोपेश्वर मंदिर पर आक्रमण किया था, जिसका प्रमाण मंदिर परिसर के खंडित भागों को देखने से मिलता है। इनमें से अधिकतर प्रतिमाओं से मुख और हाथ खंडित नजर आते हैं।
कोपेश्वर मंदिर को लेकर पौराणिक कथा 
कोपेश्वर मंदिर को लेकर एक पौराणिक किवदंती भी प्रचलित है। किवदंती के अनुसार, जब माता सती ने अग्नि कुंड में कूद कर अपनी देह का त्याग किया था, तब शिव जी अत्यंत क्रोधित हो गए थे और माता सती के जलते हुए शरीर को लेकर नृत्य करने लगे थे। ऐसे में विष्णु जी को उनका क्रोध शांत करने के लिए पृथ्वी पर आना पड़ा था। यह वही जगह है, जहां महादेव का क्रोध शांत हुआ था, ...
महाराष्ट्र का सबसे अमीर मंदिर है कोपेश्वर मंदिर
कहा जाता है कि यह मंदिर महाराष्ट्र का सबसे अमीर मंदिर है। इस मंदिर में उपयोग किया जाने वाला पत्थर कठोर बेसाल्ट चट्टान है, जो सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में पाई जाती है। यह चट्टान मंदिर से 100 किमी के अंदर में ही स्थित है, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि पंच गंगा और कृष्णा नदियों के माध्यम से पत्थर को यहां लाया गया होगा। क्योंकि प्राचीन समय में हमारे अखंड भारत में जलमार्ग का उपयोग किया जाता था। 
कोपेश्वर मंदिर में दर्शन करने का समय - सुबह 05:00 बजे से रात 09:00 तक।