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ममता के तुष्टिकरण पर भारी पड़ेगा राष्ट्रवाद: इधर तारिक रहमान को मिठाई, उधर SIR में अड़ंगा बने अफसरों पर आयोग का डंडा


पश्चिम बंगाल मैं जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा खुलकर सामने आने लगा है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग, इन सबने मिलकर बंगाल की जनता को भीतर तक झकझोर दिया है। बांग्लादेशी में जीते रहमान को मिठाई भेजने से लेकर SIR जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अड़ंगा डालने तक, ममता सरकार के कदम साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ता बचाने के लिए राज्य की सुरक्षा और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी गिरवी रखा जा सकता है। यही वजह है कि अब बंगाल का आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती और सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी ने ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद हिला दी है। चुनाव आयोग ने एसआईआर के काम में लापरवाही बरतने पर ममता सरकार से सात अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। यह सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि उस अहंकार पर प्रहार है, जो खुद को संविधान से ऊपर समझ बैठे हैं।

अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और सुशासन की मांग
ममता सरकार की इन्हीं कारगुजारियों से बंगाल में बदलाव का आहट सुनाई देने लगी है। यहीं से बंगाल में बदलाव की कहानी शुरू होती है। तुष्टिकरण की थकी हुई राजनीति के मुकाबले राष्ट्रवाद, विकास और सुशासन की बात करने वाली भाजपा तेजी से जनता का भरोसा जीतती दिख रही है। ममता सरकार की घुसपैठ पर चुप्पी, वोट बैंक की राजनीति और ईडी-आयोग जैसी संस्थाओं से टकराव वाली नीतियां आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा हथियार बन रही हैं। ममता बनर्जी अपनी जिद और तुष्टिकरण की राजनीति से बीजेपी के लिए रेड कार्पेट बिछा रही हैं। हर गलत फैसला, हर पक्षपाती कदम और हर संवैधानिक टकराव जनता को यह एहसास दिला रहा है कि अब बदलाव जरूरी है। यही कारण है कि बंगाल की फिजा में अब “मां-माटी-मानुष” नहीं, बल्कि सुरक्षा, विकास और स्थिरता की मांग गूंजने लगी है।

तुष्टिकरण के लिए तारिक रहमान को बधाई और मिठाई
राज्य में विधानसभा चुनाव की आहट तेज हुई, वैसे ही ममता बनर्जी की राजनीति एक बार फिर उसी पुराने ट्रैक पर लौट आई यानी मुस्लिम तुष्टिकरण। बांग्लादेश में जीत हासिल करने वाले तारिक रहमान को जीत की बधाई के साथ मिठाई भेजना केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि बंगाल की सियासत में एक गहरा संदेश है। यह संदेश साफ है—वोट बैंक सर्वोपरि है, चाहे राज्य की सुरक्षा और सामाजिक संतुलन दांव पर क्यों न लग जाए। विडंबना देखिए कि जिस बंगाल में सबसे ज्यादा अवैध घुसपैठियों की शिकायतें सामने आती रही हैं, जहां सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकी तेजी से बदल रही है, उसी बंगाल की मुख्यमंत्री बांग्लादेशी नेता को मिठाई भेजने में संकोच नहीं करतीं। सवाल यह है कि क्या राज्य के मूल निवासियों की चिंता से ज्यादा जरूरी विदेश के ‘भाई’ से रिश्ते निभाना है? यह दोहरा चरित्र अब किसी से छिपा नहीं रहा।

जय श्रीराम के नारों से बिदकने वाली ममता की बाबरी यात्रा पर बोलती बंद
दरअसल, पश्चिम बंगाल में ममता सरकार को इन दिनों कई भूचाल का सामना करना पड़ रहा है। ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ हैं तो खुद उनकी पार्टी में उनके खिलाफ आवाज उठने लगी है। कभी ममता बनर्जी के भरोसेमंद रहे विधायक हुमायूं कबीर अब उन्हीं के गले की फांस बनते जा रहे हैं। मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ के निर्माण की घोषणा, उस पर अमल और  बाबरी यात्रा निकालकर  राज्य की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जय श्रीराम के नारों से ही बिदक जाती थीं, उनकी बोलती बाबरी यात्रा पर बंद हो गई है। दरअसल, पश्चिम बंगाल की राजनीति में यदि किसी एक स्तंभ ने ममता बनर्जी को पिछले डेढ़ दशक तक सत्ता में टिकाए रखा है, तो वह है मुस्लिम वोट बैंक। यही साम्प्रदायिक संतुलन अब तेजी से दरकता नजर आ रहा है। यह कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं, बल्कि चुनावी गणित का सबसे स्थापित सच है। राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी लगभग 27-28 प्रतिशत है और मतदाता सूची में भी यह अनुपात लगभग उतना ही है। यही वजह है कि बंगाल की राजनीति में मुस्लिम मतदाता केवल एक समुदाय नहीं, बल्कि सत्ता के निर्णायक वोट बैंक बनते रहे हैं। लेकिन अब यही वोट बैंक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हाथ से फिसलता दिख रहा है। बल्कि यदि यह कहें कि वोट-बैंक रूपी यही औजार अगले विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के खिलाफ इस्तेमाल होगा, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

चुनाव आयोग का सख्त संदेश: अब लापरवाही नहीं चलेगी
इस बीच चुनाव आयोग ने ममता सरकार को करारा झटका दिया है। SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया में अड़ंगा डालने वाले मुख्यमंत्री के सात अधिकारियों को सस्पेंड कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि संवैधानिक कार्यों में बाधा किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। यह कार्रवाई सिर्फ प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि तृणमूल सरकार की मनमानी पर सीधा तमाचा है। सात अफसर निलंबित हो गए, लेकिन असली सवाल यह है कि उन्हें ऐसा करने का साहस कहां से मिला? क्या बिना मुख्यमंत्री के इशारे के इतने बड़े स्तर पर चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप संभव है? अफसरों को मोहरा बनाकर खुद को पाक-साफ दिखाने की यह पुरानी राजनीति अब जनता समझ चुकी है। दरअसल, ममता सरकार की राजनीति का केंद्र बिंदु वर्षों से एक ही रहा है और वह है एक वर्ग विशेष को खुश रखना। अवैध घुसपैठ, फर्जी दस्तावेज, राशन कार्ड और वोटर आईडी जैसे गंभीर मुद्दों पर सरकार की ढिलाई किसी भूल का नतीजा नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है।

सुप्रीम कोर्ट की दो टूक: एसआईआर में दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं
हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने भी ममता सरकार को साफ शब्दों में चेताया कि SIR प्रक्रिया में किसी तरह की अनावश्यक दखलंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। देश की सर्वोच्च अदालत को यह कहना पड़े, यह अपने आप में बताता है कि बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कितना दबाव बनाया जा रहा है। यह पहला मौका नहीं है जब ममता बनर्जी संवैधानिक संस्थाओं से भिड़ती नजर आई हों। कभी राज्यपाल से टकराव, कभी केंद्रीय एजेंसियों पर आरोप, ईडी की टीम से टकराव और अब चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी, यह एक ऐसे नेतृत्व की तस्वीर पेश करता है, जो कानून से ऊपर खुद को मान बैठा है।

अब इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर जोर दे रही जनता
एक ओर जहां देश के दूसरे हिस्से इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश और रोजगार पर बात कर रहे हैं, वहीं बंगाल की राजनीति आज भी पहचान और तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूम रही है। उद्योग पलायन कर रहे हैं, युवा बेरोजगार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री का फोकस बांग्लादेशी नेताओं को मिठाई भेजने और वोट बैंक साधने पर है। अब बंगाल का आम नागरिक सवाल पूछ रहा है, क्या यही सुशासन है? क्या यही ‘मां-माटी-मानुष’ का मॉडल है? जिन इलाकों में स्थानीय लोग खुद को अल्पसंख्यक महसूस करने लगे हैं, वहां सरकार की चुप्पी बहुत कुछ बयां करती है। जनता समझ रही है कि यह सब अचानक नहीं हो रहा, बल्कि वर्षों की राजनीतिक प्रयोगशाला का नतीजा है।

तुष्टिकरण की राजनीति अब भारी पड़ेगा विकास और सुशासन
सात अफसरों का निलंबन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले एक स्पष्ट संदेश है कि अब सिस्टम से खिलवाड़ नहीं चलेगा। यह ममता सरकार के लिए आखिरी चेतावनी भी हो सकती है कि लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती, जवाबदेही जरूर होती है। ममता बनर्जी आज उसी जाल में फंसती दिख रही हैं, जिसे उन्होंने खुद बुना है। मुस्लिम तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठ पर नरमी, संवैधानिक संस्थाओं से टकराव और अफसरशाही का दुरुपयोग, ये सब मिलकर उनकी सरकार की विश्वसनीयता को तेजी से खोखला कर रहे हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती इस बात का संकेत है कि अब मनमानी का दौर खत्म होने वाला है। बंगाल बदलाव चाहता है। वह विकास और सुशासन चाहता है। वह महिला शक्ति का आत्मसम्मान और युवाओ के लिए रोजगार चाहता है। और शायद इस बार वोट सिर्फ भावनाओं पर नहीं, बल्कि सच्चाई, सुरक्षा, सुशासन और विकास के लिए ही पड़ेगा।

बाबरी यात्रा के जरिए ममता के मुस्लिम वोट बैंक में पैठ बनाना लक्ष्य
बंगाल चुनाव से पहले टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद नादिया-मुर्शिदाबाद बॉर्डर (पलाशी) से बेलडांगा तक 22 किलोमीटर का पैदल मार्च (बाबरी यात्रा) शुरू की है। इस बाबरी यात्रा का मुख्य उद्देश्य मुर्शिदाबाद के बेल़डांगा में अयोध्या की बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति (Replica) का निर्माण करना है। इस यात्रा के जरिए कबीर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के वोट बैंक यानी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में अपनी पैठ बनाएंगे और अपनी नई पार्टी, जनता उन्नयन पार्टी (JUP) के लिए जनसंपर्क करेंगे। यह यात्रा नादिया जिले के ऐतिहासिक स्थल पलाशी से शुरू होकर मुर्शिदाबाद जिले में निर्माणाधीन बाबरी मस्जिद स्थल तक जाएगी। हालांकि पहले इसे उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक ले जाने की योजना थी, जिसे फिलहाल छोटा कर दिया गया है। खबरों के मुताबिक पहले यह यात्रा लगभग 265 किलोमीटर लंबी होनी थी, लेकिन बोर्ड परीक्षाओं के चलते और पुलिस की अनुमति न मिलने के कारण इसे घटाकर 22 किलोमीटर कर दिया गया है।

‘हुमायूं हम आएंगे, बाबरी फिर गिराएंगे’ से हिंदुओं की हुंकार, बंगाल में बाबरी के जिन्न से ममता की मुश्किलें चौतरफा बढ़ीं


मुर्शिदाबाद में तृणमूल कांग्रेस के हुमायूँ कबीर(अब पार्टी से निष्काषित) द्वारा बाबर के नाम पर मस्जिद बनाए जाने से ममता बनर्जी के सत्ता में आने के रास्ते में कांटे बिछा दिए हैं। ममता के लिए आगे कुआँ पीछे खाई वाली स्थिति है यानि ममता मस्जिद का विरोध करती है मुस्लिम वोटबैंक बुरी तरह से छिटक जाएगा, इसलिए ममता ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। लेकिन चुप्पी भी ममता को भारी पड़ने जा रही है।     

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले जिस तरह से ध्रुवीकरण की जमीन तैयार हो रही है, उसने ममता बनर्जी की रातों की नींद उड़ाकर रख दी है। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के पोस्टर—“हुमायूं हम आएंगे, बाबरी फिर गिराएंगे” के साथ ही हिंदुओं ने हुंकार भरी है कि पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद को नहीं बनने दिया जाएगा। दरअसल, बाबरी विवाद ने ममता बनर्जी की राजनीति की कमजोर नस पकड़ ली है। विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनने से यह सियासी आग उनकी सत्ता को झुलसा सकती है। बंगाल का चुनाव अब सिर्फ सत्ता का संघर्ष नहीं रहा, बल्कि यह पहचान, आस्था और राजनीतिक भविष्य की लड़ाई बन चुका है। लखनऊ में विश्व हिंदू रक्षा परिषद का बाबरी को लेकर नारा सिर्फ एक संगठन का उग्र बयान नहीं, बल्कि यह जागृत हो चुके हिंदुओं के ज्वालामुखी का संकेत है, जो मुर्शिदाबाद से निकलकर पूरे पश्चिम बंगाल राजनीति को झुलसाने की तैयारी में है। बाबरी मस्जिद विवाद का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ चुका है और इसका सबसे बड़ा नकारात्मक असर तृणमूल कांग्रेस पर पर पड़ता दिख रहा है। क्योंकि तुष्टिकरण की राजनीति के भंवर में फंसी ममता बनर्जी से अब बाबरी की जिन्न ना निगला जा रहा है और ना ही उगला जा रहा है।

लखनऊ में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने पर भारी विरोध
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से विश्व हिंदू रक्षा परिषद ने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बन रही एक मस्जिद का विरोध करने के लिए ‘मुर्शिदाबाद चलो’ का नारा दिया। इस मस्जिद की आधारशिला टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर 2024 को रखी थी, जिसे उन्होंने “बाबरी मस्जिद की तर्ज पर” बनाने का दावा किया था। लखनऊ में संगठन के कार्यकर्ताओं ने हाथों में फावड़ा, कुल्हाड़ी और भगवा झंडा लेकर प्रदर्शन किया और “बंटोगे तो कटोगे” आदि नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे बाबर के नाम पर किसी भी नई संरचना का निर्माण नहीं होने देंगे। 10 फरवरी (मंगलवार) को जब संगठन के कार्यकर्ता लखनऊ से मुर्शिदाबाद के लिए रवाना होने वाले थे, तब उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें रोक दिया। विश्व हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय को उनके आवास पर नजरबंद कर दिया। क्योंकि उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार नहीं चाहती कि कानून-व्यवस्था में किसी तरह का खलल पड़े। यह कार्रवाई बताती है कि मामला कितना संवेदनशील हो चुका है।

मुर्शिदाबाद में बाबरी-शैली मस्जिद ने आग में घी डाला
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यही मस्जिद निर्माण कार्य में 1000 से 1200 धर्मगुरुओं द्वारा कुरान की तिलावत भी की गई। इसके साथ ही इस कथित बाबरी मस्जिद का विरोध भी तेज हो गया है। यह विवाद अब केवल स्थानीय नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। जिस तरह हिंदू संगठन सड़क पर उतरने को तैयार हैं, योगी और ओवैसी आदि नेता मैदान में हैं और ममता बनर्जी असहज चुप्पी साधे बैठी हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि यह मुद्दा बंगाल चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा इलाके में सस्पेंडेड टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद के नाम से मस्जिद की नींव रखने की घोषणा ने सियासत को विस्फोटक मोड़ दे दिया। कबीर ने कहा कि यह महज धार्मिक पहल नहीं, बल्कि सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग है। यह मामला केवल राजनीतिक नहीं रहा, समाज के विभिन्न वर्गों ने इसे अलग-अलग रुख से लिया है। हिन्दू संगठनों ने इसे ‘अवैध’ और ‘संविधान के अनुरूप नहीं’ करार दिया है और बुलंद आवाज़ों में यह मांग उठी है कि सरकार कबीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करे।

हुमायूं के 100 सीटों पर लड़ने के ऐलान से ममता पर संकट
टीएमसी से निलंबित हुमायूं कबीर अब खुद को स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनाने की कोशिश में हैं। नई पार्टी बनाने और 100 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारने के ऐलान ने ममता बनर्जी के लिए अंदरूनी संकट खड़ा कर दिया है। टीएमसी चाहे औपचारिक रूप से उनसे दूरी बनाए, लेकिन यह विवाद ममता सरकार की प्रशासनिक कमजोरी और राजनीतिक असमंजस को उजागर करता है। इसके अलावा कबीर यदि किसी गठबंधन में चुनाव लड़े तो वह तृणमूल कांग्रेस के ही कोर वोट बैंक में सैंध लगाएगा। अब सवाल यह है कि क्या बंगाल का चुनाव रोज़गार, उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों पर होगा या फिर बाबरी मस्जिद जैसे भावनात्मक विषयों पर होगा। ममता सरकार के दौरान यह विवाद खड़ा होना, उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

बाबरी विवाद: भाजपा के लिए अवसर, टीएमसी के लिए संकट
भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को ममता सरकार की विफलता के तौर पर पेश कर रही है। पार्टी का दावा है कि बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति ने सामाजिक संतुलन बिगाड़ दिया है। बाबरी विवाद भाजपा को हिंदू मतों के ध्रुवीकरण का अवसर दे रहा है, जबकि टीएमसी का पारंपरिक समीकरण दरकता दिख रहा है। विधानसभा चुनाव में ओवैसी और हुमायूं कबीर जैसे चेहरे मुस्लिम मतदाताओं को अलग दिशा में मोड़ सकते हैं। इससे टीएमसी का मुस्लिम वोट बैंक भी कमजोर हो सकता है। यही वजह है कि यह विवाद ममता बनर्जी के लिए दोहरी मार साबित हो सकता है यानी हिंदू नाराज और मुस्लिम बंटे हुए। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि बंगाल धीरे-धीरे धार्मिक राजनीति की प्रयोगशाला बनता जा रहा है।

ममता बनर्जी के लिए क्या है खतरा?
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति पर यह विवाद गंभीर प्रभाव डाल रहा है। टीएमसी की तरफ से इसकी शुरुआत को पार्टी की आधिकारिक नीति नहीं बताते हुए दूरी बनाई गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी को इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट रूप से जनता तक पहुंचाने में कठिनाई हो रही है। हुमायूं कबीर के सार्वजनिक आरोपों और टिप्पणिओं ने टीएमसी नेतृत्व को अंदरूनी विवाद में उलझाया है। इसके अलावा, ओवैसी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के बंगाल आने की खबरें राजनीतिक समीकरणों को और जटिल बना रही हैं। इससे यह उदाहरण स्थापित हो रहा है कि चुनावों में धार्मिक और सांप्रदायिक मुद्दों को उघाड़ने से स्थिति अस्थिर हो सकती है। राजनीतिक समीकरणों का निचोड़ यह है कि बाबरी मस्जिद विवाद वोट बैंक राजनीति का एक नया मोड़ है। हिंदू मतदाताओं के बीच स्पष्टता की उम्मीदें पैदा होती दिख रही हैं। दरअसल, अब तक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से कोई स्पष्ट और मजबूत बयान नहीं आया है। यह चुप्पी बताती है कि वह दो पाटों के बीच फंसी हुई हैं—एक तरफ मुस्लिम वोट बैंक, दूसरी तरफ नाराज हिंदू मतदाता। यही असमंजस उनके लिए सबसे बड़ा राजनीतिक खतरा बनता जा रहा है।

कयामत के दिन तक भी बाबरी ढांचा नहीं बनेगा- सीएम योगी
उधर उत्तर प्रदेश से बाबरी मस्जिद विवाद का जिन्न एक बार फिर फूट पड़ा है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से बाबरी मस्जिद विवाद यहां गरमा गया है। मामले में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी मैदान में उतर गए हैं। सीएम योगी ने मुद्दे पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा है कि बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण कभी भी नहीं होगा, कयामत तक बाबरी ढांचा नहीं बनेगा। बाराबंकी के श्री राम जानकी मंदिर में आयोजित दशम श्री हनुमान विराट महायज्ञ में सीएम योगी ने कहा कि यह सरकार जो बोलती है, करके दिखाती है। यह जितना करती है, उतना ही बोलती है। हमने कहा था रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। सीएम योगी ने सवालिया लहजे में जनसमूह से पूछा कि क्या आज कोई संदेह है? हम आज फिर इस बात को कह रहे हैं कि कयामत के दिन तक भी बाबरी ढांचा नहीं बनेगा। उन्होंने कहा कि कयामत का दिन तो कभी आना नहीं है, इसलिए बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण भी कभी होना नहीं है। सीएम योगी कहा कि कयामत के दिन के आने का जो लोग सपना देख रहे हैं, ऐसे ही सड़ गल जाएंगे। कयामत का वह दिन कभी आने वाला नहीं है। जिन्हें सपना देखना है, देखते रहें। हम अपनी विरासत को सम्मान देते हुए, भारत की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने का कार्य करते रहेंगे।

मुस्लिम वोटों के लिए औवेसी और हुमायूं कबीर के मिलने की अटकलें
सीएम योगी ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि कानून तोड़ने वालों के लिए प्रदेश में कोई जगह नहीं है। अगर कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे। कयामत के दिन के लिए मत जियो। हिंदुस्तान में कायदे से रहना सीखो। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर कोई भी यहां कानून तोड़ने की कोशिश करेगा तो उसके लिए कानून के तहत ही कार्रवाई होगी। ऐसे लोगों का रास्ता जहन्नुम की तरफ ही जाता है। कानून तोड़कर अगर कोई जन्नत जाने का सपना देख रहा है तो उसका सपना कभी पूरा नहीं होने वाला है। हैदाराबाद वाले भड़काऊ भाईजान ओवैसी भी मुर्शिदाबाद जाने की सोच रहे हैं। यहां पर औवेसी और हुमायूं कबीर मिलकर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने की रुपरेखा बना सकते हैं। अयोध्या में दफ्न हो चुकी बाबरी को मुर्शिदाबाद में जिंदा कर हुमायूं कबीर ने एक ऐसे विवाद को जन्म दे दिया है जिसके नासूर बनने की पूरी आशंका है। लखनऊ के पोस्टर इसकी तस्दीक कर रहे हैं कि भविष्य में यह बड़ा मुद्दा बनने वाला है।

बंगाल में 50 लाख ‘फर्जी वोटर’ , ‘बाबरी’ का नींव रख हुमायूं बोले- अगले साल सीएम नहीं बनेगी ममता बनर्जी; कबीर को पार्टी से सस्पेंड कर बहुत तगड़ा खेला खेल दिया ममता ने

हरियाणा के बाद बिहार चुनावों ने मुस्लिम सियासत करने वाली सारी पार्टियों में भूचाल ला दिया है। मुसलमानों को खुश करने वाले लालू और तेजस्वी ने महाकुम्भ और राममन्दिर का विरोध करने की वजह से धरातल पर आ गए और कांग्रेस की तो लुटिया ही डूब गयी। खैर, अब बंगाल में भी वही होने के संकेत मिल रहे हैं। हुमायूँ कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रख ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटबैंक की सबके सामने वोट चोरी कर लिए। वो वोट बैंक जिसके दम पर ममता हिन्दुओं को ठोकर पर रखती थी। लेकिन बेशर्म हिन्दू इसके चोटिल होने के भ्रमजाल में फंस इसको वोट दे गए। जबकि ममता के मुख्यमंत्री बनने के बाद से जितना जानमाल का नुकसान हिन्दुओं का हुआ है किसी का नहीं हुआ। 

मुर्शिदाबाद में कबीर द्वारा बाबरी मस्जिद की नींव रख ममता को मुस्लिम वोट का सौदागर बन मझधार में डाल दिया है। तृणमूल के सूत्रों के अनुसार ममता कबीर को वापस पार्टी में लेकर उसके इशारे पर नाचेगी। जो कबीर कहेगा ममता मानने को तैयार हो जाएगी। लेकिन यह खेला कांग्रेस, ओवैसी और वामपंथियों को बहुत भारी पड़ने वाला है। खेला खेलने की माहिर ममता ने जो खेला खेला है सबकी नींद हराम कर दी है। ममता ने मस्जिद का विरोध करने की बजाए पूरा संरक्षण देने की चाल को समझना होगा। राजनीति शतरंज की चाल होती है यानि कबीर को पार्टी से सस्पेंड करना सिर्फ ड्रामा है। क्योकि कबीर मुसलमानों का ठेकेदार बन सकता है मुख्यमंत्री नहीं।  
पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया में करीब 50 लाख संदिग्ध नामों ने ममता बनर्जी सरकार पर सवालिया निसान खड़े कर दिए हैं। अब तक मिले 50 लाख हटाने योग्य नामों में से 23 लाख से ज्यादा लोगों के नाम ‘मृत मतदाता’ श्रेणी में आते हैं, जिनके मतदाता पहचान पत्र जारी हैं। इसके बाद दूसरे स्थान पर ‘स्थानांतरित’ मतदाता हैं, जिनकी संख्या 18 लाख से अधिक है। इसके अलावा 7 लाख से ज्यादा मतदाता ‘लापता’ हैं। जबकि शेष नाम ‘दोहराव’ या अन्य कारणों से ‘फर्जी’ पाए गए हैं। दूसरी ओर टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार (6 दिसंबर) को मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखकर ममता बनर्जी के लिए नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। ऐसे हालात में तृणमूल कांग्रेस की राजनीति इस समय एक ऐसे खतरनाक मोड़ पर है, जहां हर कदम ममता बनर्जी के लिए खतरे की घंटी बनता जा रहा है। कभी खुद को अल्पसंख्यक वोट बैंक की निर्विवाद चैंपियन बताने वाली ममता आज उसी वोट बैंक के भीतर उठी बगावत की आग में घिर गई हैं। इस बीच हुमायूं कबीर ने दावा किया है कि जिस वोट बैंक के दम पर ममता इतने सालों से पश्चिम बंगाल में राज कर रही हैं, वह उससे बेहद नाराज है। इसलिए अगले साल के विधानसभा चुनाव में ममता किसी भी सूरत में मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी।

ममता बनर्जी अपने ही विधायक के राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसी
सीएम ममता बनर्जी की दिक्कत यह है कि वह कबीर को ना रोक सकती हैं और ना ही उनका समर्थन कर सकती हैं। रोकेंगी तो मुस्लिम समुदाय के भीतर नाराजगी की आग भड़केगी, और समर्थन करेंगी तो यह और साफ हो जाएगा कि ममता की राजनीति सिर्फ एकतरफा तुष्टिकरण पर टिकी है। यह ऐसी दुविधा है जिसने उन्हें एक ऐसे राजनीतिक चक्रव्यूह में घेर लिया है, जिसमें किसी भी दिशा में कदम उठाने पर नुकसान ही नुकसान है। दरअसल, हुमायूं कबीर जिस तरह बाबरी मुद्दे को बंगाल की राजनीति में उठा रहे हैं, वह साफ संकेत देता है कि वह सिर्फ एक विधायक की भूमिका में नहीं, बल्कि एक मुस्लिम नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश में हैं। यही वह बिंदु है, जो ममता बनर्जी को सबसे अधिक अस्थिर कर रहा है। बंगाल का मुस्लिम वोट लंबे समय तक टीएमसी की सत्ता का ईंधन रहा है। पर आज वही वोट-बैंक भीतर से बिखरने को तैयार खड़ा है। कबीर का अभियान मुस्लिम समुदाय के बीच एक नया संदेश दे रहा है कि टीएमसी चाहे कितनी भी बड़ी पार्टी क्यों न हो, लेकिन उनकी आवाज कहने के लिए एक “नया चेहरा” अब मैदान में उतर चुका है।

दोहरे आक्रमण ने ममता सरकार में राजनीतिक तूफान खड़ा किया
राज्य में मतदाता सूची में 50 लाख संदिग्ध वोटरों का खुलासा, TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर की खुली चुनौती, और मुर्शिदाबाद में नई ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखे जाने का विवाद, इन तीनों ने मिलकर ममता सरकार के सामने एक ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है, जिसकी पकड़ से निकल पाना फिलहाल तो उनके लिए संभव नजर नहीं आता। दरअसल, बंगाल की वोटर लिस्ट में 50 लाख संदिग्ध नामों की मौजूदगी कोई छोटी बात नहीं। विपक्ष का आरोप है कि TMC ने अपने चुनावी हितों को साधने के लिए मतदाताओं की सूची को ऐसे भर दिया है कि फर्क करना मुश्किल हो गया है कि वास्तविक वोटर कौन है और ‘राजनीतिक रूप से पोषित’ नाम कौन से हैं। यदि वोटर लिस्ट पर ही भरोसा टूट जाए तो चुनावी लोकतंत्र कागज की तरह बिखर जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अविश्वास का निशाना सीधा ममता बनर्जी की सरकार है, क्योंकि यह पूरा तंत्र राज्य प्रशासन के दायरे में आता है।

अगले साल चुनाव में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी- कबीर
इस बीच TMC के लिए असली झटका मुर्शिबाद से आया है। मुर्शिदाबाद के विधायक हुमायूं कबीर, जिन्हें पार्टी ने निलंबित किया है, अब खुले तौर पर ममता बनर्जी के बड़े मुस्लिम वोट बैंक को चुनौती दे रहे हैं। शनिवार (6 दिसंबर) के दिन कबीर ने एक नई बाबरी मस्जिद की नींव रखी। इतिहास को देखते हुए जिसे स्थानीय लोग ‘बाबरी-स्टाइल’ मस्जिद कहने लगे हैं। यह कदम केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह एक राजनीतिक ऐलान है कि बंगाल में मुस्लिम राजनीति अब TMC की मोनोपॉली में नहीं रहेगी। कबीर ने यह कहकर TMC नेतृत्व के होश उड़ा दिए हैं कि 2026 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी और वे स्वयं 90 मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर धार्मिक राजनीति की नई धारा खड़ी करेंगे।

अयोध्या की तर्ज पर ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखी, दो लाख लोग शामिल
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में TMC से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने शनिवार को अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर बनने वाली मस्जिद की आधारशिला रखी। कबीर ने मंच पर मौलवियों के साथ फीता काटा और आधारशिला रखने की औपचारिकता पूरी की। इस दौरान नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर के नारे लगाए गए। कार्यक्रम में 2 लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ जुटने के दावे किए गए। बंगाल के अलग-अलग जिलों से आए लोगों में कोई अपने सिर, कोई ट्रैक्टर-ट्रॉली तो कोई रिक्शा या वैन से ईंट लेकर कार्यक्रम में पहुंचे। हुमायूं कबीर ने 25 नवंबर को कहा था कि वे 6 दिसंबर को अयोध्या में विवादित ढांचे के विध्वंस के 33 साल पूरे होने पर बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखेंगे। TMC ने 4 दिसंबर को हुमायूं कबीर को पार्टी से सस्पेंड कर दिया था।

हाईकोर्ट ने मस्जिद निर्माण पर रोक से इनकार किया था
कोलकाता हाईकोर्ट ने शुक्रवार को मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने से इनकार किया था। कोर्ट ने कहा कि कार्यक्रम के दौरान शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी। हाईकोर्ट के इस निर्देश के बाद हुमायूं कबीर मस्जिद की नींव रख रहे हैं। बेलडांगा समेत आसपास का इलाका आज हाई अलर्ट पर रहा। बेलडांगा और रानीनगर थाने के इलाका और उसके आसपास सेंट्रल आर्म्ड फोर्स की 19 टीमें, रैपिड एक्शन फोर्स, बीएसएफ, स्थानीय पुलिस की कई टीमों समेत 3 हजार से ज्यादा जवान तैनात किए हैं। विधायक हुमायूं कबीर ने मस्जिद निर्माण को लेकर कहा कि अब बेलडांगा में बाबरी मस्जिद को बनने से कोई भी ताकत इसे रोक नहीं सकती। कबीर ने दावा किया कि हिंसा भड़काकर कार्यक्रम को बाधित करने की साजिशें रची जा रही हैं। बंगाल के विभिन्न जिलों से लाखों लोग ऐसी कोशिशों को नाकाम कर देंगे। हुमायूं ने बताया कार्यक्रम में सऊदी अरब से भी धार्मिक नेता आ रहे हैं।

ममता बनर्जी मुस्लिम हितों की वास्तविक संरक्षक नहीं रहीं
दरअसल, विधायक हुमायूं कबीर की यह चुनौती इसलिए मामूली नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट करीब 25-27 प्रतिशत हैं और लंबे समय से इनका बड़ा हिस्सा TMC के साथ है। लेकिन घरेलू असंतोष, प्रशासनिक पक्षपात और स्थानीय स्तर पर TMC नेतृत्व की खामियों ने इस वोट बैंक को भीतर से खोखला कर दिया है। कबीर जैसे नेता इसी असंतोष को भुना रहे हैं। यह पहली बार है जब TMC के भीतर से ही कोई नेता मुस्लिम समुदाय को यह संदेश दे रहा है कि ममता बनर्जी उनके वास्तविक हितों की संरक्षक नहीं रहीं। दरअसल, ममता बनर्जी के सामने असली समस्या यह नहीं है कि कबीर ने मस्जिद की नींव रखी, बल्कि यह है कि उसने इसे बाबरी मस्जिद की यादों से जोड़कर भावनात्मक मुद्दा बना दिया है। यह वही मुर्शिदाबाद है जो TMC के लिए कभी एक सुरक्षित ‘राजनीतिक गढ़’ माना जाता था और अब वहीं से पार्टी की दीवार में गहरी दरार पड़ गई है।

नया मुस्लिम ध्रुवीकरण तैयार होने से ममता की मुश्किलें दोगुनी हुईं
हुमायूं कबीर की यह बगावत ममता बनर्जी के पूरे राजनीतिक कैलकुलेशन को झकझोर रही है। मुस्लिम वोट पहले ही AIMIM, ISF और छोटे स्थानीय समूहों के कारण खिसक रहे थे। अब TMC के ही विधायक ने एक नया मुस्लिम ध्रुवीकरण तैयार करने की कोशिश से ममता की मुश्किलें दोगुनी कर दी हैं। TMC ने जिसे निलंबित किया, वे अब खुद को ‘नई मुस्लिम राजनीति’ का चेहरा बनाने में जुटे हैं। वास्तविकता यह है कि ममता की राजनीति उन्हीं हथकंडों के वजन से दबने लगी है जिन्हें उन्होंने वर्षों तक सहारा बनाया था। मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति इतनी ज्यादा केंद्रीकृत थी कि अब उसी समुदाय के भीतर असंतोष पनप गया है। TMC के भीतर कई नेता शिकायत करते रहे हैं कि मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, केवल चुनावी भाषणों तक बात सीमित रहती है।

हिंदू वोटर भाजपा के साथ, मुस्लिम वोटर होने लगा विभाजित
बंगाल के राजनीतिक समीकरणों में एक नई हकीकत तेजी से उभर रही है। ममता बनर्जी चुनावी मैदान में अब दो तरफ से छिटकते वोटों से घिरी हैं। एक तरफ हिन्दू वोट जो पहले ही बीजेपी की ओर खिसक चुका है और दूसरी तरफ मुस्लिम वोट जो अब विभाजित होता दिख रहा है। बंगाल की सत्ता की चाबी इन्हीं दोनों समुदायों के संतुलन में छिपी हुई है। यदि यह संतुलन ही टूट जाए, तो TMC की राजनीति का पहिया चरमराना तय है। इसलिए 2026 का चुनाव अब TMC के लिए ‘रूटीन चुनाव’ नहीं रहेगा। यह ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य का निर्णायक मोड़ बनेगा। यदि मुस्लिम वोट बैंक दो या तीन हिस्सों में टूट गया और मतदाता सूची विवाद उनकी सरकार पर अविश्वास को और गहरा कर गया तो ममता बनर्जी बंगाल की सत्ता में लौटना असंभव जैसा हो जाएगा। क्योंकि विपक्ष से लड़ना तो आसान है, लेकिन पार्टी में बगावत, अपने ही वोट बैंक का टूटना, और प्रशासनिक तंत्र पर अविश्वास यह तीनों मिलकर किसी भी सरकार की नींव हिला सकते हैं।

टीएमसी के भीतर वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभरने के संकेत
दरअसल, मुर्शिदाबाद वह जिला है जहां से ममता को वर्षों से अपराजेय समर्थन मिलता आया है। लेकिन उसी किले की दीवारों के भीतर अब दरारें दिखने लगी हैं। कबीर की यह मुहिम न केवल टीएमसी के भीतर गुटबाजी को बढ़ा रही है, बल्कि यह भी संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर एक वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभर सकता है। ममता बनर्जी इसे अपने लिए राजनीतिक खतरा मानें या पार्टी के लिए संकट, लेकिन सच यही है कि बाबरी मस्जिद का यह विवाद अब एकतरफा नहीं रहेगा। यह पूरे राज्य के सत्ता समीकरणों में बदलाव की झनकार पैदा करेगा।

भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया
इसी बीच भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया है। साध्वी भारती ने साफ कहा है, “यदि बाबर के नाम वाली मस्जिद बनी तो उसका अयोध्या जैसा हाल होगा।” उन्होंने X पर लिखा, “खुदा, इबादत, इस्लाम के नाम पर मस्जिद बने हम सम्मान करेंगे। अगर बाबर के नाम से इमारत बनी तो उसका वही हाल होगा, जो 6 दिसंबर को अयोध्या में हुआ था। ईंटें तक नहीं बची थीं। मेरी ममता बनर्जी को सलाह है कि बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने की बात कहने वालों पर कार्रवाई करें। पश्चिम बंगाल और देश में अस्मिता और सद्भाव के लिए उनकी जिम्मेवारी है।” उमा भारती के एक-एक ईंट गायब वाले बयान पर विधायक हुमायूं उन्हें मुर्शिदाबाद आने की चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि उमा भारती को ईंट खोलने के लिए मुर्शिदाबाद आना पड़ेगा। हिम्मत है तो आकर गिरा दें। अगर तोड़ दिया तो दोबारा बनाएंगे। उनके इस बयान ने मस्जिद के मुद्दे को बंगाल की सरहदों से निकालकर राष्ट्रीय विमर्श में ला खड़ा किया। भाजपा को यह मौका मिला कि वह ममता पर सीधे प्रहार कर सके और कह सके कि बंगाल सरकार एक पक्ष की धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दे रही है। यह बयान टीएमसी के लिए सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि उसकी छवि पर लगा एक गहरा राजनीतिक धब्बा भी बन गया है।

ममता बनर्जी ने हुमायूं कबीर को दूसरा औवेसी बनने का मौका दिया
हिंदू मतदाताओं के बीच यह पक्की धारणा पहले ही गहरी हो चुकी है कि ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से कभी बाहर नहीं निकलतीं। अब इस विवाद ने उस धारणा को और ठोस रूप दे दिया। टीएमसी का ढुलमुल रवैया, आधिकारिक प्रतिक्रिया का अभाव और कबीर जैसे नेताओं की स्वतंत्र बयानबाजी, इन सबने मिलकर बंगाल के हिंदू मतदाताओं को एक बार फिर यह महसूस कराया कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए कोई जगह नहीं। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी अब एकमत नहीं रहे। AIMIM पहले से ही बंगाल में जमीन तलाश रही थी और अब कबीर का उभार उस जमीन को और उपजाऊ बना सकता है। राजनीति का यह समीकरण ममता बनर्जी के लिए सबसे घातक है। हिंदू वोट जा चुके हैं और अब मुस्लिम वोट भी बंटने की कगार पर खड़े हैं। ऐसे में हुमायूं कबीर पश्चिम बंगाल में दूसरे औवेसी बन कर उभर सकते हैं। क्योंकि इस पूरे विवाद के बीच हुमायूं को अब TMC से निलंबित कर दिया गया है।

बंगाल : हिन्दुओं को गुमराह करने ममता बाबरी मस्जिद के खिलाफ; मुर्शिदाबाद के विधायक हुमायूं कबीर के विवाद ने TMC की नींव हिलाई

SIR से परेशान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी टेड़े रास्ते से मुस्लिम वोटबैंक को रिझाने अपने विधायक हुमायूँ कबीर को अपना समर्थन दे रही है। पार्टी से निकालने और सस्पेंड करने में बहुत फर्क होता है। ममता चुनाव जीतने के लिए क्या खेला खेल जाए। बहुत पैंतरेबाज़ है ममता।   
पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों एक अजब मोड़ पर खड़ी है। यह एक ऐसा विस्फोटक मोड़ है, जिसमें सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस के भीतर उठा तूफान उसे ही हिलाता दिखाई दे रहा है। मुर्शिदाबाद में टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा शुरू की गई बाबरी मस्जिद निर्माण की मुहिम ममता बनर्जी के लिए अनचाहा तूफान बन गई है। कबीर पश्चिम बंगाल में बाबरी नाम से मस्जिद बनाने का दावा कर रहे हैं। हुमायूं कहते हैं कि जिस दिन अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, उसी तारीख पर यानी 6 दिसंबर 2025 को मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में वे बाबरी मस्जिद का शिलान्यास करेंगे। इसके जवाब में भाजपा और हिंदूवादी संगठनों ने मुर्शिदाबाद में ही अयोध्या की तर्ज पर दो अलग-अलग राम मंदिर बनाने का दावा किया है। उनका ये भी कहना है कि कोई भी अपनी जमीन पर मस्जिद बना सकता है, लेकिन बाबर के नाम पर इस देश में मस्जिद नहीं बनेगी। अगर बनी तो उसका हश्र भी अयोध्या जैसा ही होगा।

सीएम ममता बनर्जी अपने ही विधायक के राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसी
सीएम ममता बनर्जी की दिक्कत यह है कि वह कबीर को ना रोक सकती हैं और ना ही उनका समर्थन कर सकती हैं। रोकेंगी तो मुस्लिम समुदाय के भीतर नाराजगी की आग भड़केगी, और समर्थन करेंगी तो यह और साफ हो जाएगा कि ममता की राजनीति सिर्फ एकतरफा तुष्टिकरण पर टिकी है। यह ऐसी दुविधा है जिसने उन्हें एक ऐसे राजनीतिक चक्रव्यूह में घेर लिया है, जिसमें किसी भी दिशा में कदम उठाने पर नुकसान ही नुकसान है। दरअसल, हुमायूं कबीर जिस तरह बाबरी मुद्दे को बंगाल की राजनीति में उठा रहे हैं, वह साफ संकेत देता है कि वह सिर्फ एक विधायक की भूमिका में नहीं, बल्कि एक मुस्लिम नेता के तौर पर खुद को स्थापित करने की कोशिश में हैं। यही वह बिंदु है, जो ममता बनर्जी को सबसे अधिक अस्थिर कर रहा है। बंगाल का मुस्लिम वोट लंबे समय तक टीएमसी की सत्ता का ईंधन रहा है। पर आज वही वोट-बैंक भीतर से बिखरने को तैयार खड़ा है। कबीर का अभियान मुस्लिम समुदाय के बीच एक नया संदेश दे रहा है कि टीएमसी चाहे कितनी भी बड़ी पार्टी क्यों न हो, लेकिन उनकी आवाज कहने के लिए एक “नया चेहरा” अब मैदान में उतर चुका है।

टीएमसी के भीतर वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभरने के संकेत
दरअसल, मुर्शिदाबाद वह जिला है जहां से ममता को वर्षों से अपराजेय समर्थन मिलता आया है। लेकिन उसी किले की दीवारों के भीतर अब दरारें दिखने लगी हैं। कबीर की यह मुहिम न केवल टीएमसी के भीतर गुटबाजी को बढ़ा रही है, बल्कि यह भी संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में टीएमसी के भीतर एक वैकल्पिक मुस्लिम नेतृत्व उभर सकता है। ममता बनर्जी इसे अपने लिए राजनीतिक खतरा मानें या पार्टी के लिए संकट, लेकिन सच यही है कि बाबरी मस्जिद का यह विवाद अब एकतरफा नहीं रहेगा। यह पूरे राज्य के सत्ता समीकरणों में बदलाव की झनकार पैदा करेगा।

भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया
इसी बीच भाजपा नेता उमा भारती के बयान ने आग में घी का काम किया है। साध्वी भारती ने साफ कहा है, “यदि बाबर के नाम वाली मस्जिद बनी तो उसका अयोध्या जैसा हाल होगा।” उन्होंने X पर लिखा, “खुदा, इबादत, इस्लाम के नाम पर मस्जिद बने हम सम्मान करेंगे। अगर बाबर के नाम से इमारत बनी तो उसका वही हाल होगा, जो 6 दिसंबर को अयोध्या में हुआ था। ईंटें तक नहीं बची थीं। मेरी ममता बनर्जी को सलाह है कि बाबर के नाम पर मस्जिद बनाने की बात कहने वालों पर कार्रवाई करें। पश्चिम बंगाल और देश में अस्मिता और सद्भाव के लिए उनकी जिम्मेवारी है।” उमा भारती के एक-एक ईंट गायब वाले बयान पर विधायक हुमायूं उन्हें मुर्शिदाबाद आने की चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि उमा भारती को ईंट खोलने के लिए मुर्शिदाबाद आना पड़ेगा। हिम्मत है तो आकर गिरा दें। अगर तोड़ दिया तो दोबारा बनाएंगे। उनके इस बयान ने मस्जिद के मुद्दे को बंगाल की सरहदों से निकालकर राष्ट्रीय विमर्श में ला खड़ा किया। भाजपा को यह मौका मिला कि वह ममता पर सीधे प्रहार कर सके और कह सके कि बंगाल सरकार एक पक्ष की धार्मिक राजनीति को बढ़ावा दे रही है। यह बयान टीएमसी के लिए सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं, बल्कि उसकी छवि पर लगा एक गहरा राजनीतिक धब्बा भी बन गया है।

ममता बनर्जी ने हुमायूं कबीर को दूसरा औवेसी बनने का मौका दिया
हिंदू मतदाताओं के बीच यह पक्की धारणा पहले ही गहरी हो चुकी है कि ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति से कभी बाहर नहीं निकलतीं। अब इस विवाद ने उस धारणा को और ठोस रूप दे दिया। टीएमसी का ढुलमुल रवैया, आधिकारिक प्रतिक्रिया का अभाव और कबीर जैसे नेताओं की स्वतंत्र बयानबाजी, इन सबने मिलकर बंगाल के हिंदू मतदाताओं को एक बार फिर यह महसूस कराया कि ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस की राजनीति में उनके लिए कोई जगह नहीं। दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी अब एकमत नहीं रहे। AIMIM पहले से ही बंगाल में जमीन तलाश रही थी और अब कबीर का उभार उस जमीन को और उपजाऊ बना सकता है। राजनीति का यह समीकरण ममता बनर्जी के लिए सबसे घातक है। हिंदू वोट जा चुके हैं और अब मुस्लिम वोट भी बंटने की कगार पर खड़े हैं। ऐसे में हुमायूं कबीर पश्चिम बंगाल में दूसरे औवेसी बन कर उभर सकते हैं। क्योंकि इस पूरे विवाद के बीच हुमायूं को अब TMC से निलंबित कर दिया गया है।

मुर्शिदाबाद का मुद्दा टीएमसी में एक नए शक्ति-संतुलन के रूप में उभरा
यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि मुर्शिदाबाद का बाबरी मस्जिद विवाद ममता बनर्जी की राजनीति के लिए सिर्फ एक मुद्दा नहीं, बल्कि एक खुली चेतावनी है। एक ऐसी चेतावनी, जो बताती है कि राजनीतिक जमीन जितनी जल्दी सिर पर चढ़ाती है, उतनी ही जल्दी पैर भी खींच लेती है। ममता की कठिनाई यह है कि यह संकट बाहर से नहीं, भीतर से उठा है। बाहरी विरोधी से लड़ना आसान होता है, लेकिन अंदर उठी आग को बुझाना सबसे मुश्किल होता है। आने वाले महीनों में यह विवाद किस दिशा में जाएगा, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए किसी राजनीति के विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं। तस्वीर शीशे की तरह साफ है। अब मुर्शिदाबाद का यह मुद्दा टीएमसी के भीतर एक नए शक्ति-संतुलन की शुरुआत कर चुका है, जिसका नुकसान ममता को और फायदा उनके विरोधियों को मिलना लगभग तय है।