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7 पीढ़ियाँ भुगतेंगी अंजाम… अब बंगाल में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों की खैर नहीं, दंगाइयों और गुंडों के लिए शुभेंदु सरकार का नया कानून

योगी आदित्यनाथ या हिमंता सरमा से नहीं तो शुभेंदु अधिकारी से दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को सीखना चाहिए। दिल्ली में आए दिन हो रहे क़त्ल और अधिक्रमण पर श्रीमती रेखा गुप्ता को इन मुख्यमंत्रियों की तरह काम करना चाहिए। क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स, शराब घोटाला, मनी लॉन्डरिंग आदि का? क्या इन सबको चुनाव आने तक ठंठे बस्ते में डाल दिया गया है? मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़ काम करना होगा। अब तक जो अधिक्रमण हटाए जा रहे हैं सभी हिन्दू क्षेत्रों में लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों पर आंखें मूंदे हुए हैं। बंगाल मुख्यमंत्री शुभेंदु ने मुख्यमंत्री बनते ही विरोधियों के साथ-साथ दंगाइयों में और बांग्लादेश तक में खलबली मची हुई है। 

ममता की पार्टी TMC  ऐसे ही नहीं बिखरी, अधिकारी की कार्यशैली से बिखरी है। अगर अधिकारी ने बिना भेदभाव के काम किया ममता से अलग हुए कई विधायक और सांसद भी लपेटे में आएंगे। क्योकि ममता राज में जितना भी उपद्रव हुआ इन लोगों का भी प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष समर्थन था। यदि नहीं, फिर क्यों नहीं ममता का विरोध कर पार्टी छोड़ी? तब ये ही सब बड़े आनंद के साथ मलाई खा रहे था।       

पश्चिम बंगाल में अपराधियों और दंगाइयों पर लगाम कसने के लिए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी एक बेहद सख्त नया कानून ला रहे हैं। सोमवार(29 जून) को विधानसभा में पेश होने जा रहा यह बिल यूपी के ‘बुलडोजर मॉडल’ से भी ज्यादा घातक माना जा रहा है।

इस नए कानून के तहत सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों से भारी वसूली की जाएगी। इसके कड़े प्रावधानों को देखकर अभी से विपक्ष और अपराधियों के बीच खलबली मच गई है।

54 साल पुराना ढर्रा होगा खत्म

बंगाल सरकार साल 1972 के पुराने कानून ‘द वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर एक्ट’ में बड़ा बदलाव करने जा रही है। इसकी जगह अब विधानसभा में ‘पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण विधेयक, 2026’ पेश किया जाएगा।

सरकार का मानना है कि पुराना कानून आज के आधुनिक और संगठित अपराधों से निपटने के लिए काफी नहीं था। शुभेंदु अधिकारी सरकार ने साफ कर दिया है कि अब बंगाल में सिंडिकेट का नहीं बल्कि सिर्फ कानून का राज चलेगा।

दंगाइयों का होगा आर्थिक खात्मा

इस नए कानून का सबसे बड़ा डर इसका रिकवरी मैकेनिज्म यानी नुकसान की वसूली का नियम है। अगर किसी दंगे या बवाल में सरकारी या किसी की निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचता है, तो उसकी पूरी भरपाई अपराधी की संपत्ति बेचकर की जाएगी।

कानूनी जानकारों के मुताबिक यह कानून इतना कड़ा है कि नुकसान की भरपाई करते-करते दंगाइयों की आने वाली 7 पीढ़ियाँ तक कंगाल हो जाएँगी। यह अपराधियों को पूरी तरह आर्थिक रूप से खत्म करने वाला कदम है।

UP के मॉडल से भी दो कदम आगे

यह नया बिल उत्तर प्रदेश के योगी मॉडल से भी ज्यादा सख्त बताया जा रहा है। इसमें पुलिस को बिना मुकदमे के हिरासत में लेने और अपराधियों को जिले से बाहर निकालने की असीमित शक्तियाँ दी गई हैं। इतना ही नहीं, दंगाइयों और गुंडों को शरण देने वालों के खिलाफ भी इसमें सख्त नियम हैं। अब किसी भी अपराधी को छिपाने या पनाह देने पर सीधे दो साल की जेल की सजा काटनी होगी।

असम के कानून से समस्या : निकाह और तलाक़ के रजिस्ट्रेशन से किसी को क्या आपत्ति होनी चाहिए; हर बात में मुस्लिम फैक्टर लाना उचित नहीं है

सुभाष चन्द्र 

सबसे बड़ा आरोप लगाया जा रहा है कि The Assam Compulsory Registration of Muslim Marriage and Divorce Bill, 2024 केवल मुसलमानों के लिए है और इसलिए यह उनके लिए भेदभावपूर्ण (Discriminatory) हैं। जबकि हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने कहा है कि बिल का लक्ष्य child marriage / बिना सहमति के शादी और बहु विवाह को रोकना है और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करके Institution of Marriage को मजबूत करना है। 

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सच्चाई यह है कि मुसलमानों को इस्लाम और शरिया के नाम पर अनेक फायदे मिले हुए हैं। इस नए कानून में काजी को निकाह का रजिस्ट्रेशन का अधिकार नहीं होगा जबकि रजिस्ट्रेशन सरकार के पास कराना होगा। अभी तक के कानून में On Certain Grounds child marriage को भी अनुमति थी और काज़ी निकाह करा कर सर्टिफिकेट दे देता है।

दरअसल यह हिंदुओं के साथ भेदभावपूर्ण है क्योंकि उन्हें तो अपनी शादी register करानी ही पड़ती है जिसका कोई विरोध नहीं करता जैसे आज मुस्लिम कर रहे हैं असम में, शादी करवाने वाले पंडित को शादी का प्रमाणपत्र देने का अधिकार नहीं है जो काजी को है, इतना ही नहीं वर्षों से आर्य समाज मंदिरों में विवाह किए जा रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आर्यसमाज का यह अधिकार भी अवैध घोषित कर दिया। क्या ऐसा करने के लिए काजी पर भी रोक लगाना जरूरी नहीं था। 

मुसलमानों का कहना है कि इस्लाम में शादी नहीं निकाह होता है और निकाह एक अनुबंध (contract) होता है लेकिन Contract कौन कर सकता है यह Indian Contract Act, 1872 में परिभाषित है लेकिन मुस्लिम समाज किसी कानून को नहीं मानता, बस अपना इस्लामिक कानून चाहिए। 

इस कानून के अनुसार Valid Contract करने वाले की आयु 18 वर्ष होनी जरूरी है और यदि किसी के लिए कोर्ट से Guardian नियुक्त हुआ हो तो उस केस में 21 वर्ष से कम को नाबालिग माना जाता है; दूसरी शर्त यह है कि 18 वर्ष के बालिग Contract तब ही कर सकते हैं जब वे मानसिक रूप से स्वस्थ हों Sound Mind के हों जिन्हें पता हो कि contract में क्या लिखा है और उनके हित के लिए है या नहीं, Unsound Mind वाले व्यक्ति द्वारा किया हुआ Contract शुरू से ही Void माना जाता है।

यह सबसे बड़ी समस्या है मुसलमानों के लिए कि सरकार के पास रजिस्ट्रेशन के समय आयु पकड़ी जाएगी जिससे 18 से कम उम्र के लोगों का निकाह नहीं हो सकेगा। दूसरी मुख्य बात है जिससे मुसलमान असम में परेशान हैं कि रजिस्ट्रेशन के समय लड़का लड़की को साबित करना होगा कि वे असम के ही नागरिक है। बांग्लादेशी पकडे जाएंगे, रोना बस इस बात है।

बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF ने कहा है कि वो इस कानून को कोर्ट में चुनौती देंगे - कोर्ट जाना तो हर किसी का अधिकार है, आप भी जाएं लेकिन पहले यह विचार कर लेना कि यदि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी कानून पर मुहर लगा दी तो क्या आपको स्वीकार होगा क्योंकि कोर्ट के ऐसे फैसले मुस्लिम संगठन शरिया के खिलाफ बता कर मानने में आनाकानी करते हैं। अभी हाल ही का सुप्रीम कोर्ट के मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ के बाद गुजारा भत्ता के अधिकार देने के फैसले को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नाखुशी जाहिर की थी।

मुस्लिम समुदाय को समय के अनुसार अपने में बदलाव लाने चाहिए, निकाह रजिस्टर होने दीजिये, प्रतिष्ठा का मुद्दा ( Prestige Issue) न बनायें।