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ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने दिया इस्तीफा: उत्तराधिकारी चुने जाने तक अंतरिम रूप से संभालते रहेंगे पद

                कीर स्टार्मर का इस्तीफा, लेबर पार्टी में कलह के बाद छोड़ा पद (फोटो साभार: X_Keir_Starmer)
ब्रिटेन की राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने सोमवार (22 जून 2026) को अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी है। लेबर पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष और आंतरिक कलह के बीच स्टार्मर को यह कड़ा कदम उठाना पड़ा। डाउनिंग स्ट्रीट से जारी एक भावुक बयान में उन्होंने कहा कि उन्होंने किंग चार्ल्स को अपने फैसले की जानकारी दे दी है, लेकिन नया उत्तराधिकारी चुने जाने तक वह प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारियाँ संभालते रहेंगे।

स्टार्मर का यह इस्तीफा पिछले कई हफ्तों से चल रही राजनीतिक अटकलों के बाद आया है। हाल के दिनों में सरकार को कई राजनीतिक झटके लगे, जिससे जनता के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से घटी। इसके साथ ही लेबर पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व परिवर्तन की माँग लगातार तेज हो रही थी, जिसने स्टार्मर को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया।

डाउनिंग स्ट्रीट से दिए अपने इस्तीफे के बयान में कीर स्टार्मर ने पूरी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा, “मैंने किंग (राजा) को अपने इस फैसले की जानकारी दे दी है। पार्टी के भीतर चल रहे घटनाक्रम को देखते हुए मेरा पद छोड़ना ही उचित है। हालाँकि देश में प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने के लिए मैं तब तक अपने पद पर बना रहूँगा, जब तक कि मेरे उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर लिया जाता।”

जुलाई 2024 में कीर स्टार्मर के नेतृत्व में लेबर पार्टी ने ऐतिहासिक जीत हासिल की थी, जिसने ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी के 14 साल के शासन को खत्म किया था। शुरुआती दिनों में स्टार्मर सरकार को जनता का भारी समर्थन मिला, लेकिन जल्द ही देश की अर्थव्यवस्था, चरमराती सार्वजनिक सेवाओं और पार्टी के अंदरूनी मतभेदों ने उनके सामने बड़ी चुनौतियाँ खड़ी कर दीं।

ब्रिटेन के 58वें प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभालते हुए 61 वर्षीय स्टार्मर ने देश में बड़े बदलाव और नतीजों को धरातल पर लाने का वादा किया था। अपने पहले ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने अपने पूर्ववर्ती ऋषि सुनक की जमकर तारीफ की थी और सुनक के समर्पण व कड़ी मेहनत को सराहा था। हालाँकि उनका यह कार्यकाल भी हाल के वर्षों में ब्रिटेन के अन्य प्रधानमंत्रियों की तरह बेहद छोटा और उथल-पुथल भरा साबित हुआ।

कर्नाटक : कांग्रेस सरकार में बगावत, मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने पसंद का मंत्रालय न मिलने पर दिया इस्तीफा: मुख्यमंत्री शिवकुमार पर लगाए गंभीर आरोप

             कर्नाटक कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी का इस्तीफा (फोटो साभार: DH/Telangana Today)
जिस बात की आशंका थी उसकी शुरुआत हो गयी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि सिद्धारमैया अगर मुख्यमंत्री पद छोड़ रहे हैं तो नए मुख्यमंत्री को भी चैन से नहीं बैठने देंगे। खेल खिलेगा और खिलना शुरू हो गया। मनपसंद मंत्रालय नहीं मिलने पर कैबिनेट से इस्तीफा। मामूली बात नहीं। मुख्यमंत्री शिवकुमार गर्म खीर को फूंक मार-मार कर खाना होगा। इशारा आ चुका है।  

कर्नाटक में नई सरकार के गठन और विभागों के बंटवारे के तुरंत बाद कांग्रेस के भीतर का आंतरिक असंतोष एक बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और नवनियुक्त कैबिनेट मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। रेड्डी ने खुलेआम अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि उनसे किया गया वादा पूरा नहीं किया गया, जिसके चलते वे यह बड़ा कदम उठा रहे हैं। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे कैबिनेट छोड़ रहे हैं, लेकिन विधायक (MLA) और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहेंगे।

शुक्रवार (5 जून 2026) को बेंगलुरु में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रामलिंगा रेड्डी ने मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार पर सीधा निशाना साधा। रेड्डी ने दावा किया, “डीके शिवकुमार खुद मेरे घर आए थे और कहा था कि जब मैं सीएम बनूँगा, तो मैं इस मंत्रालय (बेंगलुरु विकास) को छोड़ दूँगा और आप इसे संभाल लेना।” रेड्डी के मुताबिक, शपथ ग्रहण समारोह से ठीक एक दिन पहले भी जब वे शिवकुमार से मिले, तो उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया था कि बेंगलुरु से जुड़ा पोर्टफोलियो उन्हीं को मिलेगा।

रेड्डी ने भावुक होते हुए कहा, “मैंने कभी इस विभाग की माँग खुद से नहीं की थी, लेकिन मुझे बार-बार इसका भरोसा दिया गया था। दो बार वादा करने के बाद अब मुझे जल संसाधन विभाग दे दिया गया। मैं इस फैसले से बेहद निराश हूँ और इसीलिए इस्तीफा दे रहा हूँ।”

रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को सौंपने के बजाय अपने एक समर्थक के जरिए मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को भिजवाया है। अपने त्यागपत्र में उन्होंने लिखा, “मैं कैबिनेट में मंत्री पद देने के लिए आपका और कॉन्ग्रेस पार्टी का आभार व्यक्त करता हूँ। चूँकि मैं अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम करने में असमर्थ हूँ, इसलिए मैं मंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार करें।”

हालाँकि रेड्डी ने मीडिया से कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से न तो शिवकुमार से नाराज हैं और ना ही सिद्धारमैया से।

मोदी फिर बने संकटमोचक, पश्चिम एशिया में युद्ध के वैश्विक तनाव के बीच भी 4.50 लाख भारतीयों की सकुशल वापसी

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव के बीच संकटमोचक बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीयों की सुरक्षित स्वदेश वापसी का सिलसिला बना हुआ है। विदेश मंत्रालय के अनुसार एक माह में ही साढ़े चार लाख से अधिक भारत नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है। मंत्रालय ने कहा है कि 28 फरवरी से अब तक लगभग 4.50 लाख यात्री और भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया से भारत लौट चुके हैं। इनमें खाड़ी देशों, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब, ओमान, बहरीन और कुवैत के अलावा ईरान, इज़राइल और संघर्ष प्रभावित अन्य क्षेत्रों से लौटे भारतीय यात्री कामगार, छात्र और तीर्थयात्री शामिल हैं। भारत सरकार लगातार स्थिति पर नजर रख रही है, क्योंकि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। युद्ध के कारण हवाई सेवाओं, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ा है, इसलिए भारतीय दूतावास लगातार हेल्पलाइन, विशेष उड़ानें और सुरक्षित निकासी योजनाएं चला रहे हैं।

भारतीय दुनिया के किसी कोने में फंसा हो, तिरंगा सुरक्षा की गारंटी
दुनिया एक बार फिर अशांत दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-इजराइल टकराव, या फिर अमेरिका की भूमिका हो। इन सबने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता और भय का माहौल बना दिया है। ऐसे समय में, जब बमों की आवाज और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच आम इंसान सबसे अधिक असुरक्षित होता है, तब राष्ट्रों की असली परीक्षा होती है। भारत ने इस कसौटी पर बार-बार खुद को साबित किया है। पीएम मोदी के प्रयासों से केंद्र सरकार युद्ध के बीच फंसे भारतीयों की वापसी करा रही है। मोदी सरकार ने यह स्थापित कर दिया है कि दुनिया के किसी भी कोने में अगर भारतीय फंसा है, तो तिरंगा उसकी सुरक्षा की गारंटी है। पिछले माह 23 मार्च तक अलग-अलग युद्ध क्षेत्रों में फंसे 3.75 लाख भारतीयों की सुरक्षित वापसी हुई है। यह स्वदेश वापसी केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि एक मानवीय प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय संकल्प का परिचायक है। हाल के घटनाक्रमों में यह स्पष्ट हुआ है कि भारत सरकार, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और इसके लिए हर संभव संसाधन जुटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है।

संकट के बीच सुरक्षित वापसी का बड़ा अभियान
इजरायल-यूएस-ईरान 2026 में युद्ध के तेज होने पर प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशन में भारत ने अपने देशवासियों को सकुशल निकालने के अभियान को और अधिक गति दी। हजारों भारतीयों को ईरान से सुरक्षित निकाला गया, जिनमें से अधिकांश को आर्मेनिया और अज़रबैजान के रास्ते बाहर लाकर दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों के जरिए भारत पहुंचाया गया। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर से जुड़े 70–80 छात्रों को सुरक्षित दिल्ली लाया गया। इस प्रकार 2025 और 2026 को मिलाकर अब तक करीब लाखों  भारतीयों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा चुकी है। तमिलनाडु के मछुआरे अभी भी ईरान क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिनकी निकासी के प्रयास तेज गति से जारी हैं। इन अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का इवैक्युएशन तंत्र केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, बहुस्तरीय और प्रभावी प्रक्रिया है, जिसमें कूटनीति, ट्रांजिट देशों का सहयोग और आधुनिक लॉजिस्टिक्स का बेहतरीन समन्वय देखने को मिलता है।

पिछले साल भी ईरान और इजराइल से भारतीयों को लाए वापस
इससे पहले 2025 में इजरायल-ईरान संघर्ष की शुरुआत में भारत ने चरणबद्ध तरीके से अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने का व्यापक अभियान चलाया। इस दौरान सबसे बड़ा प्रयास “ऑपरेशन सिंधु” के रूप में सामने आया, जिसके तहत कुल 4415 भारतीयों को सकुशल निकाला गया। इनमें 3597 ईरान से और 818 इजरायल से थे। इन नागरिकों को 19 विशेष उड़ानों (निजी एयरलाइंस और भारतीय वायुसेना) के जरिए मुख्य रूप से नई दिल्ली लाया गया। शुरुआती चरण में ही करीब 100 से अधिक छात्रों को ईरान से आर्मेनिया के रास्ते सुरक्षित निकालकर भारत पहुंचाया गया, जिसके बाद यह प्रक्रिया लगातार कई चरणों में आगे बढ़ती रही। इस पूरे अभियान में जम्मू-कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और केरल के हजारों छात्र, कामगार और पेशेवर शामिल थे। इस प्रकार 2025 के इस बड़े अभियान ने भारत की त्वरित रणनीति, समन्वय और नागरिकों की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को मजबूती से स्थापित किया।

भारतीय तिरंगा: सुरक्षा और विश्वास का सबसे भरोसेमंद का प्रतीक

जब कोई भारतीय विदेश में संकट में होता है, तो सबसे पहले उसे अपने देश के झंडे तिरंगे से उम्मीद बंधती है। यह केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि सुरक्षा और विश्वास का आश्वासन बन चुका है। इजरायल-ईरान संघर्ष के बीच जब हजारों भारतीय, विशेषकर छात्र, अनिश्चितता में फंसे थे, तब भारत सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें सुरक्षित निकालने का अभियान शुरू किया। दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों से विशेष उड़ानों के जरिए इन नागरिकों को वापस लाया गया। यह दिखाता है कि भारत केवल कागजी आश्वासन नहीं देता, बल्कि जमीनी स्तर पर परिणाम भी सुनिश्चित करता है। भारतीय दूतावासों ने इस पूरे अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हेल्पलाइन नंबर जारी करना, नागरिकों से लगातार संपर्क बनाए रखना, सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना और स्थानीय प्रशासन से तालमेल बैठाना। ये सभी कदम इस बात को दर्शाते हैं कि भारत की कूटनीतिक मशीनरी संकट के समय कितनी प्रभावी और सजग हो जाती है।

एयरलिफ्ट से लेकर ग्राउंड सपोर्ट तक का व्यापक नेटवर्क
भारत का इवैक्युएशन प्रोटोकॉल बहुआयामी है। इसमें केवल एयरलिफ्ट ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी व्यापक सहायता शामिल होती है। संघर्ष क्षेत्र से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना, वहां से उन्हें ट्रांजिट देशों तक ले जाना और फिर विशेष उड़ानों के जरिए भारत लाना। यह पूरी प्रक्रिया एक सुव्यवस्थित तंत्र के तहत संचालित होती है। भारतीय वायुसेना और नागरिक उड्डयन क्षेत्र की साझेदारी इस दिशा में एक मजबूत उदाहरण प्रस्तुत करती है। इन अभियानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को और मजबूत किया है। आज भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखा जाता है, जो न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अन्य देशों के नागरिकों की भी मदद करता है। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का आधुनिक रूप है, जहां मानवता को प्राथमिकता दी जाती है।

मोदी की निर्णायक भूमिका ने संकट को अवसर में बदला
किसी भी संकट में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह दिखाया है कि निर्णायक फैसले, त्वरित कार्रवाई और स्पष्ट प्राथमिकताएं किस तरह संकट को अवसर में बदल सकती हैं। यह केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दृष्टिकोण भी है, जो हर भारतीय को यह विश्वास दिलाता है कि वह कहीं भी हो, उसका देश उसके साथ खड़ा है। यह केवल राजनीति या कूटनीति का विषय नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का प्रश्न है। युद्ध के बीच फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना एक राष्ट्र के नैतिक दायित्व का हिस्सा है। भारत ने इस दायित्व को न केवल स्वीकार किया है, बल्कि उसे पूरी निष्ठा और क्षमता के साथ निभाया भी है। आज जब दुनिया अनिश्चितताओं से घिरी हुई है, भारत ने अपने कार्यों से यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल एक उभरती हुई शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील राष्ट्र भी है।

इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने जारी किए हेल्पलाइन नंबर
भारत ने बुधवार को ईरान से अपने नागरिकों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु शुरू करने की घोषणा की, क्योंकि इजराइल-ईरान के बीच संघर्ष कम होने का कोई संकेत नहीं दिखा। इजराइल- ईरान में हुए घटनाक्रमों को देखते हुए, भारत सरकार ने इजराइल से उन भारतीय नागरिकों को निकालने का फैसला किया है जो वहां से निकलना चाहते हैं। इजराइल से भारत की उनकी यात्रा लैंड बॉर्डर के माध्यम से और उसके बाद हवाई मार्ग से कराई जाएगी। तेल अवीव स्थित भारतीय दूतावास इजराइल में मौजूद भारतीय नागरिकों की मदद करेगा, जो अपने देश लौटना चाहते हैं। इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। मोदी सरकार ने नागरिकों से तेल अवीव में भारतीय दूतावास संपर्क की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन कराने का निर्देश दिया है।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से मेडिकल छात्रों की स्वदेश वापसी कराई
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संवेदनशीलता और लोकप्रियता ही है कि जब भी उन्हें पता चलता है कि दुनिया के किसी भी कौने में भारतीय संकट में हैं, तो वे उनकी सकुशल वापसी के लिए संकटमोचक की भूमिका में आ जाते हैं। ऐसा एक नहीं कई बार, कई देशों में फंसे भारतीयों के साथ हो चुका है। संकट से जूझ रहे भारतीयों की उम्मीदों का आखिरी सहारा पीएम मोदी ही बने हैं। वह चाहे कोरोना काल हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, या फिर किसी देश में कोई और संकट हो, हर बार हजारों भारतीयों की सकुशल स्वदेश वापसी हुई है। अब ताजा उदाहरण इजराइल-ईरान युद्ध का है। पीएम मोदी ने इस भीषण युद्ध के बीच ‘ऑपरेशन सिंधु’ चलाकर भारतीयों की सकुशल वापसी कराई है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान की मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे लगभग 110 भारतीय छात्र सुरक्षित भारत पहुंच गए हैं। इनमें से 90 छात्र कश्मीर के हैं। ईरान-इजराइल जंग से ऑपरेशन सिंधु के माध्यम से भारत पहुंचे छात्रों के मुताबिक वहां के हालात हर दिन खराब होते जा रहे हैं। खासकर तेहरान में स्थिति बहुत भयावह बनी हुई है। युद्ध इसलिए बहुत खराब है, क्योंकि इसमें इंसानियत ही खत्म हो जाती है।

अकेले ईरान में स्टूडेंट्स समेत दस हजार से ज्यादा भारतीय फंसे
ईरान और इजरायल के बीच में जारी जंग लगातार भीषण होती जा रही है। इजरायल जहां ईरान में राजधानी तेहरान, न्यूक्लियर साइट और सैन्य ठिकानों को टारगेट कर रहा है। वहीं ईरान भी इजरायल में सैन्य ठिकानों को तबाह करने में लगा है। जंग के बीच हजारों भारतीय ईरान और इजरायल में फंसे हुए हैं। अकेले ईरान में ही 10000 से ज्यादा भारतीय फंसे हैं जिनमें आधे से ज्यादा स्टूडेंट्स हैं। इनमें भी मेडिकल स्टूडेंट्स सबसे ज्यादा हैं। भारत सरकार ने युद्ध के बीच से भारतीयों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु लॉन्च किया है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान से निकाले गए ये छात्र मंगलवार को आर्मेनिया पहुंचे थे, जहां उन्हें राजधानी येरेवन के होटलों में ठहराया गया। इसके बाद इन्हें कतर के रास्ते भारत लाया गया। इंडिगो की एक फ्लाइट आर्मेनिया के येरेवन एयरपोर्ट से इन छात्रों को लेकर कतर की राजधानी दोहा के लिए रवाना हुई थी। इसके बाद एक दूसरी फ्लाइट से इन्हें दोहा से नई दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट लाया गया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने छात्रों को ईरान से बाहर निकालने की पुष्टि की है।

ईरान से लौटने वाले भारतीय छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल
इन छात्रों को आर्मेनिया बॉर्डर पर नॉरदुज चौकी से बसों में निकाला गया। ईरान में 1,500 स्टूडेंट्स सहित लगभग दक हजार भारतीय फंसे हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक मौजूदा हालात में देश के एयरपोर्ट भले ही बंद हैं, लेकिन लैंड बॉर्डर्स खुले हुए हैं। मंत्रालय ने विदेशी नागरिकों से ईरान छोड़ने से पहले अपना नाम, पासपोर्ट नंबर, गाड़ी डिटेल्स, देश से निकलने का समय और जिस बॉर्डर से जाना चाहते हैं, उसकी जानकारी मांगी थी।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से 110 छात्रों का ग्रुप दिल्ली पहुंच चुका है। इन छात्रों को आर्मेनिया के रास्ते भारत लाया गया है। इंडिगो एयरलाइंस की फ्लाइट देर रात 3 बजकर 43 मिनट पर दिल्ली लैंड हुई। इन 110 छात्रों में 94 जम्मू-कश्मीर से हैं जबकि 16 लोग अन्य 6 राज्यों से है। ईरान से लौटने वाले छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल हैं। सकुशल देश वापस आने के बाद इन छात्रों के चेहरे पर खुशी का साफ झलक रही थी।

ईरान-इजरायल के बीच जंग में राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी
वहीं, आपको बता दें कि इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, दोनों देशों के बीच जंग भीषण होती जा रही है। बुधवार को इजरायल ने तेहरान पर जबरदस्त अटैक किया। इजरायल के 50 से ज्यादा लड़ाकू विमानों ने ईरान की राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी की। इजरायल की एयरफोर्स ने तेहरान और उसके पास कराज में ईरान की न्यूकिलयर साइट को निशाना बनाया। इन दोनों ही न्यूक्लियर फैसेलिटीज में ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट में इस्तेमाल होने वाले सेंट्रीफ्यूज बनाता है। इजरायली सेना ने दावा किया कि 25 फाइटर जेट ने ईरान के वेस्टर्न सिटी करमनशाह में ईरान के 5 अटैक हेलीकॉप्टर्स को बर्बाद कर दिया। इजरायल के फाइटर जेट्स ने ईरान की उन साइट पर भी जोरदार अटैक किया जहां से इजरायल पर मिसाइल्स फायर की जा रही थी। इजरायल के हमलों में अब तक ईरान के करीब छह सौ लोग मारे जा चुके हैं और 1300 से ज्यादा लोग घायल हैं।

भारत ने फंसे लोगों को निकालने के लिए आर्मेनिया को क्यूं चुना?
दरअसल, ईरान का बॉर्डर 7 देशों से लगता है। ये देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान, आर्मेनिया, तुर्किये और इराक हैं। इसके अलावा समुद्री सीमा ओमान के साथ है। आर्मेनिया को ही चुनने की बड़ी वजह यह है कि आर्मेनिया का बॉर्डर ईरान के प्रमुख शहरों से कम दूरी पर है। आर्मेनिया के साथ भारत के संबंध काफी अच्छे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते भी हुए हैं। इसके अलावा आर्मेनियां को चुनने की कुछ प्रमुख वजहें हैं…
• आर्मेनिया राजनीतिक रूप से स्थिर है और भारत से उसके दोस्ताना संबंध हैं। वहां से फ्लाइट ऑपरेशन तेजी से संभव है, क्योंकि येरेवन एयरपोर्ट पूरी तरह चालू है।
• ईरान और आर्मेनिया के बीच फिलहाल कोई सीमा विवाद या सैन्य तनाव नहीं है।
• दूसरी तरफ ईरान का पूर्वी पड़ोसी पाकिस्तान है। पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते ऑपरेशन सिंदूर के बाद और उसके पहले से ही तनावपूर्ण हैं। ऐसे में भारत के पास पाकिस्तान के रास्ते छात्रों को लाने का विकल्प नहीं है।
• इराक पहले से ही ईरान के साथ चल रहे तनाव में शामिल है। कई बार इजराइल ने इराक में भी ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। इसलिए वहां से गुजरना खतरे से भरा हो सकता था।
• हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान खुलकर पाकिस्तान के समर्थन में आया था। उसने भारत की कार्रवाई की निंदा भी की थी। ऐसे में भारत उसकी मदद नहीं लेगा।
• तुर्किये भले ही स्थिर देश है, लेकिन ईरान से सड़क के जरिए वहां तक पहुंचना काफी लंबा है। हाल ही में भारत और तुर्किये के बीच तनातनी देखने को मिली है। दरअसल तुर्किये ने भी ऑपरेशन सिंदूर की निंदा करते हुए खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था।

ईरान से इसलिए भारतीय छात्रों को सीधे नहीं लाया जा रहा
भीषण जंग के चलते इस वक्त ईरान और इजराइल के बीच हालात काफी तनावपूर्ण हैं। कई शहरों में हमले हो चुके हैं और सुरक्षा का खतरा बना हुआ है। ऐसे में भारतीय छात्रों को सीधे ईरान से एयरलिफ्ट करना फिलहाल संभव नहीं है। ईरान के ज्यादातर इंटरनेशनल एयरपोर्ट इस समय नागरिक उड़ानों के लिए बंद हैं। युद्ध जैसे हालात की वजह से वहां से फ्लाइट उड़ाना सुरक्षित नहीं है। ईरान के कई इलाकों में इजराइली हमले हो चुके हैं। ऐसे में फ्लाइट्स पर भी हमले का खतरा बना रहता है। सीधे ईरान से भारतीय एयरलाइंस को भेजना काफी जोखिम भरा है। इसके लिए ईरान की इजाजत के साथ-साथ मजबूत सुरक्षा इंतजाम भी चाहिए होंगे, जो युद्ध की स्थिति में संभव नहीं हैं। नॉरदुज बॉर्डर सुरक्षित माना जा रहा है। आर्मेनिया में हालात स्थिर हैं और वहां से फ्लाइट्स भी आसानी से उड़ाई जा सकती हैं।

कतर से भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कराया

इससे पहले कतर की अदालत ने 12 फरवरी को भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कर दिया। इसमें से सात नौसैनिक भारत लौट आए हैं। आठों पूर्व नौसैनिकों पर जासूसी करने के आरोप लगाए गए थे और वे कतर की जेल में कैद थे। इन्हें कतर की अदालत ने मौत की सजा भी सुना दी थी, जिसके बाद इनकी रिहाई मुश्किल हो गई थी। 26 अक्टूबर 2023 को कतर की अदालत ने जब इन पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा सुनाई तब समूचा देश मोदी सरकार के साथ खड़ा था और प्रार्थना कर रहा था कि इनकी जल्द रिहाई हो। लेकिन नफरत की राजनीति करने वाली कांग्रेस और लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम को मुद्दा मिल गया। जब मौत की सजा सुनाई गई थी तब इसे सरकार की कूटनीतिक विफलता करार दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक प्रयासों से आज (12 फरवरी 2024) जब इनकी रिहाई हुई है तब उनके मुंह एक जोरदार तमाचा पड़ा है। चाहे पाकिस्तान से विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाना हो, यूक्रेन, लीबिया, सूडान, इजराइल, अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों को वापस लाना हो या फिर उत्तराखंड सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को सुरक्षित सकुशल लाना हो, आज नए भारत की ताकत पूरा विश्व देख रहा है।

भारत की कूटनीतिक चतुराई से रुकी मौत की सजा
कतर की अदालत की तरफ से जब पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का ऐलान किया गया था, तो भारत ने अपने कूटनीतिक चतुराई पेश करते हुए, इसके खिलाफ अपील की थी। इसका फायदा भी देखने को मिला था, क्योंकि 28 दिसंबर, 2023 को भारत की अपील को ध्यान में रखते हुए आठों नागरिकों को सुनाई गई मौत की सजा पर रोक लगा दी गई थी। पूर्व नौसैनिकों की रिहाई उस समय हुई है, जब पिछले सप्ताह ही दोनों देशों के बीच एक अहम समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत कतर से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) खरीदेगा। ये डील अगले 20 सालों के लिए हुई है और इसकी लागत 78 अरब डॉलर है। भारत की पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) कंपनी ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये करार किया है। इस समझौते के तहत कतर हर साल भारत को 7.5 मिलियन टन गैस निर्यात करेगा। इस गैस से भारत में बिजली, उर्वरक और सीएनजी बनाई जाएगी।

US का दावा कुछ भी हो, भारत लगातार खरीदता रहा है रूसी तेल: ‘जहाँ सस्ता मिले’ की नीति पर चलता रहा है हिंदुस्तान

  अमेरिकी बातों को नजरअंदाज कर हमेशा ही रूस से तेल खरीदता रहा है भारत, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI Grok)
भारतीय समय के मुताबिक अमेरिका ने शुक्रवार (6 मार्च 2026) को नई दिल्ली को 30 दिन का समय दिया कि वो समुद्र में पहले से मौजूद रूसी टैंकरों से कच्चा तेल खरीद सकता है, क्योंकि ईरान-इजराइल संघर्ष की वजह से अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन बाधित हो गई है। यह आधिकारिक आदेश सिर्फ उन शिपमेंट्स के लिए है जो अभी समुद्र में हैं। बयान में यह भी साफ कहा गया कि ईरान से ऐसे कोई खरीदारी की इजाजत नहीं दी जा रही, क्योंकि ईरान पर भारी प्रतिबंध हैं।

ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तारीफ की कि उन्होंने ग्लोबल एनर्जी सप्लाई को आने वाले खतरे से निपटने के लिए बड़ा फैसला लिया है, बिना रूस को कोई फायदा दिए। उन्होंने लिखा, “उनकी एनर्जी एजेंडा की वजह से तेल और गैस का उत्पादन अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुँच गया है। ग्लोबल मार्केट में तेल का बहाव जारी रखने के लिए ट्रेजरी विभाग भारतीय रिफाइनरियों को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन का अस्थायी छूट दे रहा है।”

उस संदेश में सबसे अहम शब्द था ‘अलाउ’ यानी इजाजत देना। ट्रंप प्रशासन ने जोर देकर कहा कि वो भारत को जरूरी कच्चा तेल खरीदने के लिए रूसी टैंकरों से छूट ‘दे रहा है’। अपनी तारीफ बढ़ाने के लिए बेसेंट ने इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की समझदारी और मेहरबानी बता दिया।

साभार सोशल मीडिया 

फिर बेसेंट ने चुपके से भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए कहा और दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा, “यह जानबूझकर छोटी अवधि का उपाय है जो रूसी सरकार को ज्यादा फायदा नहीं देगा क्योंकि यह सिर्फ उन ट्रांजेक्शन को मंजूरी देता है जो समुद्र में फंसे तेल से जुड़े हैं। भारत अमेरिका का जरूरी पार्टनर है और हमें पूरा विश्वास है कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाएगी। यह स्टॉप-गैप उपाय ईरान द्वारा ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से होने वाले दबाव को कम करेगा।”

फिर बेसेंट ने चुपके से भारत को अमेरिका से तेल खरीदने के लिए कहा और दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्तों का हवाला दिया। उन्होंने आगे कहा, “यह जानबूझकर छोटी अवधि का उपाय है जो रूसी सरकार को ज्यादा फायदा नहीं देगा क्योंकि यह सिर्फ उन ट्रांजेक्शन को मंजूरी देता है जो समुद्र में फंसे तेल से जुड़े हैं। भारत अमेरिका का जरूरी पार्टनर है और हमें पूरा विश्वास है कि नई दिल्ली अमेरिकी तेल की खरीदारी बढ़ाएगी। यह स्टॉप-गैप उपाय ईरान द्वारा ग्लोबल एनर्जी को बंधक बनाने की कोशिश से होने वाले दबाव को कम करेगा।”

भारत के करीब 40 प्रतिशत तेल आयात खाड़ी क्षेत्र से आता है और उसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है जो अभी ईरान के नियंत्रण में है। मोदी सरकार ने पहले ही घोषणा की थी कि देश एनर्जी सुरक्षा के मामले में बहुत आरामदायक स्थिति में है और हर दिन दो बार अपनी एनर्जी स्थिति का जायजा ले रहा है। स्टॉक की स्थिति भी अच्छी है और रोजाना भराई हो रही है। इसके अलावा भारत दूसरे स्रोतों से भी बात कर रहा है ताकि तेल का बहाव बिना रुके जारी रहे।

भारत सिर्फ अपने हितों को देखता है, अमेरिका को ‘अलाउ’ करने का कोई अधिकार नहीं

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका का यह नया कदम कई असफल दबाव वाली रणनीतियों के बाद आया है, जिसमें अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाकर कुल 50 प्रतिशत करना और भारत को ‘यूक्रेन युद्ध को फंडिंग’ के नाम पर रूसी तेल छोड़ने के लिए मजबूर करना शामिल है। दूसरी ओर नई दिल्ली ने बार-बार जोर दिया कि उसके फैसले अपनी संप्रभुता और हितों पर आधारित हैं, इसलिए वो किसी चुनौती के सामने नहीं झुकने वाला।

मॉस्को से तेल की खरीद हर महीने विभिन्न कारणों से ऊपर-नीचे होती रही, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, भले ही वाशिंगटन कुछ भी कहे। असल में भारत रूसी विक्रेताओं से लगातार संपर्क में रहा ताकि होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के बाद अपनी एनर्जी जरूरतें पूरी की जा सकें।

रीटर्स ने हाल ही में एक इन्फोग्राफिक शेयर किया जो बात साफ कर देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भारत की रूसी तेल खरीद निश्चित रूप से बढ़ गई। लेकिन यह इसलिए नहीं क्योंकि भारत ‘युद्ध को फंडिंग’ देना चाहता था। भारत का उस युद्ध से कोई लेना-देना नहीं था। भारत ने रूसी तेल इसलिए खरीदा क्योंकि रूसी तेल सस्ता मिल रहा था। और देश की जरूरतें पूरी करने के लिए तेल खरीदना भारत सरकार के लिए NATO नेताओं और यूरोपीय मीडिया को खुश करने से ज्यादा अहम था।

रीटर्स के ऊपर वाले इन्फोग्राफिक में साफ दिखता है कि अक्टूबर 2025 के बाद भारत की रूसी तेल खरीद थोड़ी कम हुई, लेकिन वो कभी ‘रुकी’ नहीं, जैसा अमेरिका दावा करना चाहता है।

इसलिए अमेरिका का यह खुद को बड़ा बताना सिर्फ खोखली श्रेष्ठता का एक और प्रयास है जबकि वो खुद को मेहरबान महाशक्ति दिखाने की कोशिश कर रहा है, जो हकीकत से बिल्कुल उलट है।

अमेरिकी छूट से पहले ही रूसी तेल के कार्गो भारत लौट आए

भारत ने ट्रंप प्रशासन की तथाकथित ‘इजाजत’ आने से पहले ही समुद्र में मौजूद रूसी टैंकरों से तेल लेना शुरू कर दिया था ताकि मिडिल ईस्ट से आने वाले कच्चे तेल की कमी पूरी हो सके, क्योंकि उस इलाके में तनाव बढ़ रहा है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक पहले से सुरक्षित किए गए 1 करोड़ बैरल से ज्यादा तेल का बड़ा हिस्सा शायद अमेरिका के इस नए बयान से पहले ही लिया जा चुका था।

भारत सरकार के सूत्रों ने पहले ही कहा था कि फरवरी में रूस भारत का टॉप एनर्जी सप्लायर में से एक था। फरवरी में भारत ने 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया।

ब्लूमबर्ग के शिप-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में रूसी कच्चे तेल के लगभग 1.5 करोड़ बैरल टैंकरों पर हैं जबकि सिंगापुर के पास और 70 लाख बैरल हैं। एक हफ्ते के अंदर ये सब भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा कुछ और सूज सागर और भूमध्य सागर से होते हुए उपमहाद्वीप की ओर बढ़ रहे हैं।

रूसी तेल वाले टैंकरों ने अपने रूट बदलकर भारतीय बंदरगाहों की ओर इशारा करना शुरू कर दिया था, इससे पहले कि व्हाइट हाउस से ‘हम इजाजत दे रहे हैं’ वाला नोटिस आया। केप्लर के मुताबिक कम से कम 18 जहाज जो उराल्स तेल ले जा रहे हैं, वे भारत की ओर बढ़ रहे हैं। कंपनी के एनालिस्ट सुमित रितोलिया ने कहा कि यह विकास “जल्द ही मात्रा को 20 लाख बैरल प्रतिदिन से ऊपर ले जा सकता है।”

एक सूत्र ने बताया कि सूजमैक्स टैंकर ओड्यून जो लगभग 10 लाख बैरल ले जा रहा था। रॉयटर्स ने रिपोर्ट किया कि 4 मार्च को पूर्वी पारादीप बंदरगाह पर राज्य रिफाइनर इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड को तेल देने के लिए दिखा।

इसके अलावा आईओसी को 7 मार्च को पश्चिम भारत के वडिनार बंदरगाह पर स्प्रिंग फॉर्च्यून से लगभग 7 लाख बैरल रूसी तेल मिलने की उम्मीद है। आईओसी के सूत्र ने बताया कि कंपनी रूस से खरीदारी तेज कर रही है जिसमें भारत के आसपास घूम रहे जहाजों पर रखे कंटेनर शामिल हैं।

मीडिया हाउस के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि भारतीय जल क्षेत्र के पास लगभग 95 लाख बैरल रूसी कच्चा तेल तैर रहा है और कुछ हफ्तों में पहुंच सकता है। एक और भारतीय रिफाइनर ने भी इस तेल का इस्तेमाल करने में दिलचस्पी दिखाई है। रितोलिया ने कहा, “अगर मिडिल ईस्ट से आने वाला तेल कम हो जाता है तो भारतीय रिफाइनर जल्दी ही रूसी ग्रेड की ओर मुड़ सकते हैं।”

उन्होंने देखा कि सिंगापुर स्ट्रेट, अरब सागर क्षेत्र और हिंद महासागर में लगभग 3 करोड़ बैरल रूसी तेल जहाजों पर उपलब्ध है, जिसमें फ्लोटिंग स्टोरेज में रखा तेल भी शामिल है।

ब्लूमबर्ग की एक अलग रिपोर्ट के मुताबिक, केप्लर और वोर्टेक्सा के ट्रैकिंग विश्लेषण से पता चला कि दो टैंकर जो कुल 14 लाख बैरल उराल्स कच्चा तेल ले जा रहे हैं, वे इस हफ्ते भारतीय बंदरगाहों पर उतारने जा रहे हैं, पहले वे पूर्व की ओर जाने का संकेत दे रहे थे।

5 मार्च को मटारी नाम का आफ्रामैक्स टैंकर जो लगभग 7 लाख बैरल ले जा रहा था, वडिनार पहुँचने वाला था। अरब सागर में एक और सूजमैक्स इंड्री जो 730 हजार बैरल से ज्यादा उराल्स लेकर सिंगापुर जा रहा था, इस हफ्ते अचानक उत्तर की ओर भारत की तरफ मुड़ गया। पिछले साल ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने इन तीनों जहाजों पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

भारत अपनी नीति खुद बनाता है, व्हाइट हाउस की ‘इजाजत’ से नहीं

ऊपर दिया डेटा साफ कर देता है कि भारत को समय देने का अमेरिका का दावा सिर्फ एक हताश कोशिश है जहाँ उसे क्रेडिट नहीं मिलना चाहिए। नई दिल्ली ने कभी इजाजत माँगी नहीं और न ही ऐसी किसी मेहरबानी की उम्मीद की थी क्योंकि वो चल रहे तनाव के बीच अपनी संप्रभु एनर्जी हितों का पीछा कर रही थी।

इसके अलावा इन आरोपों, जवाबों या रणनीतियों की बेकारता बार-बार साबित हो चुकी है क्योंकि ये मोदी सरकार के किसी फैसले को कभी प्रभावित नहीं करते। पिछले महीने केंद्र ने फिर दोहराया कि वो कच्चा तेल जहां सस्ता और अच्छी क्वालिटी का मिले वहां से आयात करता रहेगा।

भारतीय तेल कंपनियाँ गैर-प्रतिबंधित स्रोतों और भू-राजनीतिक माहौल को ध्यान में रखकर काम करेंगी। यह वाणिज्य और विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने कॉन्ग्रेस नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय स्थायी समिति को बताया।

एक ऐसा ही किस्सा तब हुआ जब भारत ने अमेरिका के इस दावे का जवाब दिया कि वो रूस से तेल लेना ‘बंद’ करने पर सहमत हो गया। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 9 फरवरी को कहा, “हमारे लिए एनर्जी खरीद के फैसलों में राष्ट्रीय हित मार्गदर्शक सिद्धांत होंगे।” उन्होंने बताया कि पर्याप्त उपलब्धता, उचित कीमत और सप्लाई की विश्वसनीयता ही देश की खरीद नीति के पीछे मुख्य कारण हैं।

विदेश सचिव के अनुसार भारत की ‘सबसे बड़ी प्राथमिकता’ है अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करना और सुनिश्चित करना कि उन्हें सही कीमत पर पर्याप्त ऊर्जा मिले, भरोसेमंद और सुरक्षित स्रोतों से।

उन्होंने कहा, “इसलिए हमारी आयात नीति एनर्जी के मामले में पूरी तरह इन्हीं उद्देश्यों से चलती है। हम किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं हैं और न ही रहना चाहते हैं। और स्रोतों का मिश्रण समय-समय पर बाजार की वास्तविक स्थितियों के आधार पर बदलता रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारा तरीका है कई स्रोतों को बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर उन्हें विविधता देना ताकि स्थिरता बनी रहे। इसलिए मैं कहूंगा कि इस क्षेत्र में जितना ज्यादा विविधता होगी, हम उतने ज्यादा सुरक्षित होंगे।” यह मजबूत जवाब तब आया जब ट्रंप ने दावा किया कि भारत रूसी तेल नहीं खरीदेगा और दोनों देशों के बीच व्यापार व्यवस्था के फ्रेमवर्क की घोषणा के दौरान 25 प्रतिशत टैरिफ घटा दिया।

जैसे ही संकेत मिला, भारत सरकार के सूत्रों ने फिर दोहराया कि रूसी कच्चा तेल भारत में आता रहेगा। भारत सरकार ने कहा, “आज हमारे पास होर्मुज स्ट्रेट में फंसे तेल से ज्यादा एनर्जी स्रोत हैं। हम कच्चे तेल, तेल उत्पादों और एलपीजी के मामले में आरामदायक स्थिति में हैं। हमारी मौजूदा स्टॉक स्थिति अच्छी है। हम दूसरे भौगोलिक क्षेत्रों से अपनी सप्लाई बढ़ाएंगे और होर्मुज स्ट्रेट से आने वाली कमी पूरी करेंगे।”

भारत सरकार ने कहा, “हम 2022 से रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं। 2022 में हम रूस से कुल आयात का सिर्फ 0.2 प्रतिशत ले रहे थे। फरवरी में हमने कुल कच्चे तेल आयात का 20 प्रतिशत रूस से लिया। फरवरी में भारत ने रूस से 10.4 लाख बैरल प्रतिदिन आयात किया।”

ट्रंप को अपने MAGA समर्थकों को खुश करना है, भारत को नहीं

ट्रंप प्रशासन में बिना वजह खुद को बधाई देने या सराहने की अजीब आदत है, जिसकी वजह से भारत के लगातार जवाबों के बाद खुद को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है।

दूसरी ओर नई दिल्ली लगातार अपने हितों की रक्षा कर रही है और मोदी सरकार इन हरकतों से बिल्कुल प्रभावित नहीं होती। दोनों के बीच यह अब रूटीन बन गया है जहाँ वाशिंगटन कोई बेतुका आदेश या शिकायत लाता है और नई दिल्ली उसे अनदेखा कर देती है या विनम्रता से खारिज कर देती है।

इसी तरह मौजूदा व्हाइट हाउस प्रशासन ने ‘घमंडी दिखावा’ को अपनी आदत बना लिया है। चाहे ‘8 वैश्विक युद्ध रोकना’ हो या पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंधों से नियंत्रण, ट्रंप के दावे और जमीन पर उनका असल असर अक्सर मेल नहीं खाता। बहुध्रुवीय दुनिया प्रतिबंधों और टैरिफ से रिमोट कंट्रोल नहीं होती।

एक संप्रभु देश की नीति संप्रभु हितों पर चलती है। प्रतिबंध या टैरिफ सिर्फ भू-राजनीतिक हिचकी हैं जिन्हें कभी-कभी ठीक करना और पार करना पड़ता है। चाहे कच्चा तेल हो, तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी), दुर्लभ पृथ्वी तत्व या कोई भी वस्तु, मौजूदा वैश्विक व्यवस्था सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स का जटिल जाल है।

कोई एक देश इसे धमकाकर या नखरे करके नहीं नियंत्रित कर सकता। भारत दशकों से इस जटिल जाल में नेविगेट कर रहा है और आगे भी करता रहेगा। इसके अलावा ट्रंप प्रशासन के दावे सिर्फ अपने घरेलू MAGA समर्थकों को खुश करने के लिए हैं।

भारतीय सरकार ऐसा नहीं करती। रूस-यूक्रेन युद्ध, गाजा-इजराइल संघर्ष और पिछले कई सालों के कई परिदृश्यों में भारत का विदेश मंत्रालय ने अपनी बातचीत पूरी तरह आधिकारिक रखी है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का सम्मान किया है।

जिस वायनाड ने राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा को ‘शरण’ देकर लोकसभा पहुँचाया, वहाँ एक-एक कर खुद की ही जान क्यों ले रहे कांग्रेस कार्यकर्ता? कांग्रेस ने कराया जॉब स्कैम, बेरोजगारों से की ठगी


केरल के वायनाड जिले में कांग्रेस पार्टी इन दिनों भारी संकट से जूझ रही है। यह वही इलाका है जहाँ पहले राहुल गाँधी सांसद थे और उन्होंने दो बार यहाँ से चुनाव जीता। बाद में उन्होंने सीट छोड़ दी और अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा को यहाँ से सांसद बनवाया। लेकिन अब वायनाड कांग्रेस का गढ़ कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता लगातार आत्महत्या कर रहे हैं या सुसाइड की कोशिश कर रहे हैं।

इन सब के पीछे जो वजह हैं, वो हैं- पार्टी के अंदरूनी कलह, भ्रष्टाचार, कर्ज के जाल और वादाखिलाफी। कई कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस पार्टी के काम के लिए करोड़ों का लोन लिया था, पार्टी ने वादा किया था कि पैसे लौटाने में मदद करेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कर्ज चुकाने के दबाव में पिता-पुत्र ने जान दे दी, अब बहू ने भी सुसाइड नोट लिखकर पार्टी को जिम्मेदार ठहराते हुए जान देने की कोशिश की।

कुछ दिन पहले ही एक नेता को फर्जी केस में फँसाया गया, जिसके बाद दूसरे नेता ने जान दे दी। ये घटनाएँ कांग्रेस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही हैं। केरल की वायनाड लोकसभा सीट से राहुल-प्रियंका को लगातार चुनाव जिताने के चक्कर में कार्यकर्ता कर्ज के बोझ तले दब गए और अब जान देने को मजबूर हो रहे हैं। पार्टी ने कर्ज चुकाने का वादा किया था, लेकिन पिता-पुत्र की मौत के बाद भी मदद नहीं की। कर्जदार पैसे माँग रहे थे, तो बहू ने सुसाइड नोट में कांग्रेस को कातिल बताया। ये सब पार्टी की खराब व्यवस्था की वजह से हो रहा है। प्रियंका गाँधी ने हाल ही में वायनाड का दौरा किया, लेकिन इन मुद्दों पर चुप्पी साधे रही।

वायनाड में कांग्रेस ने कराया जॉब स्कैम, बेरोजगारों से की ठगी

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहली बड़ी घटना दिसंबर 2024 की है, जब पूर्व डिस्ट्रिक्ट कांग्रेस कमिटी (डीसीसी) ट्रेजरर एनएम विजयन और उनके बेटे जिजेश ने आत्महत्या कर ली। विजयन लंबे समय से कांग्रेस के वफादार कार्यकर्ता थे। उन्होंने पार्टी के काम के लिए करीब 2.5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था।

ये कर्ज सुल्तान बाथेरी कोऑपरेटिव बैंक में नौकरियों के नाम पर लिया गया था। उन पर पार्टी के जिलाध्यक्ष एनडी अप्पाचन, पूर्व डीसीसी प्रेसिडेंट आईसी बालाकृष्णन एमएलए, पूर्व ट्रेजरर केके गोपीनाथन मास्टर और अन्य ने घोटाला करने के लिए दबाव डाला। उनसे जॉब के बदले कैश स्कैम कराया। लोग नौकरी के लिए लाखों रुपये देते थे, लेकिन नौकरी नहीं मिली। स्कैम फेल हो गया तो सारा बोझ विजयन पर आ गया।

विजयन ने अपनी संपत्ति गिरवी रख दी, लेकिन कर्ज चुकाने के लिए पैसे नहीं बचे। पार्टी ने वादा किया था कि कर्ज की जिम्मेदारी लेगी, लेकिन सिर्फ थोड़ी मदद की। केरल प्रदेश कांग्रेस कमिटी (केजेपीसीसी) ने कहा कि वो बाइंडिंग एग्रीमेंट नहीं था, सिर्फ मानवीय मदद है। विजयन ने 25 दिसंबर 2024 को जहर खाकर सुसाइड की कोशिश की, उनके बेटे जिजेश ने भी ऐसा ही किया। दोनों 27 दिसंबर को मर गए।

विजयन ने अपने सुसाइड नोट में सीधे अप्पाचन, बालाकृष्णन और गोपीनाथन को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने लिखा कि इन नेताओं ने उन्हें फँसाया और अब मदद नहीं कर रहे। परिवार का कहना है कि विजयन ने पार्टी के लिए सब कुछ किया, लेकिन बदले में धोखा मिला।

पुलिस ने सुसाइड नोट के आधार पर एमएलए बालाकृष्णन और तीन अन्य पर एबेटमेंट टू सुसाइड का केस दर्ज किया। लेकिन पार्टी ने इन नेताओं को अभी तक कोई सजा नहीं दी। परिवार आज भी कर्ज के बोझ तले दबा है। विजयन के बेटे ने कहा कि पिता ने पार्टी को बचाने के लिए खुद को झोंक दिया, लेकिन पार्टी ने पीठ दिखा दी। ये केस दिखाता है कि कैसे कांग्रेस पार्टी के अंदर के भ्रष्टाचार ने विजयन और उनके बेटे की जान ले ली।

बदनामी से परेशान नेता को देनी पड़ी जान

दूसरी घटना 12 सितंबर 2025 की है, जिसमें मुल्लानकोली पंचायत सदस्य जोस नेलेडम ने आत्महत्या कर ली। जोस कांग्रेस के स्थानीय नेता थे और मुल्लानकोली ग्राम पंचायत के वॉर्ड मेंबर थे। उनकी मौत पार्टी के अंदरूनी कलह की वजह से हुई।

दरअसल, कुछ दिन पहले जुलाई में एक डेवलपमेंट सेमिनार में डीसीसी प्रेसिडेंट अप्पाचन पर हमला हुआ था। ये फैक्शनल फाइट का नतीजा था। उसके बाद कनत्तुमालयिल थंकाचन, जो मारक्काडावु के लोकल कॉन्ग्रेस नेता हैं, को अवैध शराब और कंट्री बॉम्ब्स के केस में गिरफ्तार किया गया। थंकाचन 17 दिनों तक जेल में रहे। बाद में पुलिस ने कोर्ट में कहा कि केस फर्जी था और थंकाचन को रिहा कर दिया।

थंकाचन ने आरोप लगाया कि अप्पाचन गुट ने उन्हें फंसाया, जिसमें जोस भी शामिल थे। इसके बाद जोस पर साइबर अटैक शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर उन्हें बदनाम किया गया, अपमानित किया गया। जोस ने एक वीडियो रिकॉर्ड किया, जिसमें उन्होंने कहा कि पार्टी ने उनका साथ नहीं दिया। सुसाइड से पहले जोस ने जहर खाया, कलाई काटी और तालाब में कूद गए। पड़ोसी ने उन्हें पाया और हॉस्पिटल ले गए, लेकिन रास्ते में ही मौत हो गई।

सुसाइड नोट में जोस ने लिखा, “पार्टी ने संकट में साथ नहीं दिया, साइबर अटैक ने तोड़ दिया।” डीसीसी प्रेसिडेंट अप्पाचन ने माना कि पार्टी के अंदर ताकतें जिम्मेदार हैं। लेकिन पार्टी ने इसे कवर-अप करने की कोशिश की। मलयाला मनोरमा और मथ्रुभूमि जैसे अखबारों में जोस के नोट को छिपाया गया। ये सब कुछ प्रियंका गाँधी के वायनाड दौरे के समय हुआ, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी।

विजयन की परेशान बहू ने दी जान देने की कोशिश

वायनाड की तीसरी घटना 13 सितंबर 2025 की है, जब एनएम विजयन की बहू पद्मजा ने सुसाइड की कोशिश की। पद्मजा 2024 में आत्महत्या कर लेने वाले विजयन की बहू हैं। उन्हें उनका बेटा प्राइवेट हॉस्पिटल ले गया।

सुसाइड नोट में पद्मजा ने लिखा, “किलर कांग्रेस, यहाँ एक और विक्टिम।” उन्होंने कहा कि पार्टी ने कर्ज नहीं चुकाया, जिसकी वजह से परिवार टूट रहा है। पद्मजा ने 12 सितंबर को मीडिया से कहा था कि पार्टी ने 30 जून 2025 तक 2.5 करोड़ का कर्ज चुकाने का वादा किया था, लेकिन सिर्फ 20 लाख दिए।

पद्मजा ने एमएलए टी सिद्दीक पर भी आरोप लगाया कि वो लिखित वादों को पूरा नहीं कर रहे। अस्पताल बिल तक के पैसे नहीं दे रहे। प्रियंका गाँधी ने परिवार को सपोर्ट का आश्वासन दिया था, लेकिन 13 सितंबर को वायनाड विजिट के दौरान भी नहीं मिलीं। पद्मजा ने पूछा, “क्या हमें मरना पड़ेगा तभी कांग्रेस को आँखें खुलेगी?”

                                            अस्पताल में पद्मजा (फोटो साभार: Deshabhimani)

पद्मजा ने एक ऑडियो क्लिप जारी की, जिसमें थिरुवनचूर राधाकृष्णन कह रहे हैं कि पार्टी को कर्ज चुकाना चाहिए था। लेकिन पार्टी कह रही है कि कुछ कर्ज सेटल हो गया। ये सुसाइड अटेम्प्ट ने वायनाड में विरोध प्रदर्शन भड़का दिए।

आत्महत्या के कम से कम 5 मामले, लेकिन राहुल-प्रियंका ने साधी चुप्पी

वायनाड में कांग्रेस का ये संकट नया नहीं है। पिछले दशक में कम से कम पाँच कार्यकर्ताओं ने आत्महत्या की है। 2015 में पीवी जॉन, मनांथावादी ब्लॉक कांग्रेस कमिटी के प्रेसिडेंट ने पार्टी ऑफिस में ही फाँसी लगा ली थी। वो लोकल बॉडी इलेक्शन में हार के बाद अपमानित हो रहे थे। इसके अलावा साल 2023 में राजेंद्रन नायर ने सुसाइड किया, क्योंकि कांग्रेस कंट्रोल्ड प्राइमरी कोऑपरेटिव बैंक पुलप्पल्ली में उनके लैंड डॉक्यूमेंट्स का दुरुपयोग करके लोन लिया गया। पूर्व डीसीसी प्रेसिडेंट केएल पौलोस और जनरल सेक्रेटरी केके अब्राहम पर केस हैं। ये सभी घटनाएँ फैक्शनल फाइट, भ्रष्टाचार और वादाखिलाफी से जुड़ी हैं।

                                   पीवी जॉन, NM विजयन और बेटा जितेश (फोटो साभार: OnManorama)

प्रियंका बदलना चाहती हैं नेता, इतनी जान लेने बाद

प्रियंका गाँधी ने वायनाड की हालत पर नाराजगी जताई है। उन्होंने केपीसीसी से रिपोर्ट माँगी और डिस्ट्रिक्ट लीडरशिप चेंज की माँग की। अप्पाचन को हटाने की बात चल रही है। हटाए जाने वाले नामों में टीजे आइजैक और केई विनयान शामिल हैं। प्रियंका ने कहा कि मंडक्कई-चूरालमाला लैंडस्लाइड विक्टिम्स के लिए हाउसिंग प्रोजेक्ट में देरी हो रही है, क्योंकि डीसीसी साथ नहीं दे रही है। वो फंड्स जुटाने को तैयार थीं, लेकिन लोकल लीडर्स ने काम नहीं किया।

अंडरवर्ल्ड गैंग जैसी हो गई है कांग्रेस 

विपक्षी सीपीएम कह रहा है कि कांग्रेस अंडरवर्ल्ड गैंग जैसी हो गई है। सीपीएम लीडर एमवी जयराजन ने विजयन परिवार का कर्ज चुकाने का ऐलान किया। मंत्री वी शिवंकुट्टा ने कहा कि कांग्रेस मर्डर, सुसाइड एबेटमेंट और वायलेंस का प्रतीक है।

इन सबके बीच, कांग्रेस कार्यकर्ता निराश हैं। एक नेता ने कहा कि पार्टी ने अपना मास बेस खो दिया। केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) पंचायत इलेक्शन की तैयारी कर रहा है, लेकिन ये सुसाइड्स ने पार्टी को पैरालाइज्ड कर दिया।

कांग्रेस को अब अपनी कार्यप्रणाली सुधारनी होगी। कार्यकर्ता जो पार्टी के लिए जान देते हैं, उन्हें धोखा नहीं मिलना चाहिए। वायनाड जैसे ट्रेडिशनल स्ट्रॉन्गहोल्ड में ये संकट पार्टी की साख को बर्बाद कर रहा है। समाज को ऐसी पार्टी से उम्मीद नहीं करनी चाहिए जो अपने ही लोगों को मार डालती है। ये समय है कि कांग्रेस आँखें खोले और सुधार करे, वरना वायनाड में उनका गढ़ ढह जाएगा।

दिल्ली : AAP को डुबो रही केजरीवाल की जिद; पहले झूठे वादे करते हैं, फिर विक्टिम कार्ड खेलते हैं; क्या कांग्रेस नेता सिंघवी केजरीवाल को ठिकाने लगा रहे है?


यूपीए सरकार के करप्शन के खिलाफ, समाजवादी कार्यकर्ता अन्ना हजारे का सहारा लेकर जो आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई थी। अब 12 साल बाद खुद करोड़ों के करप्शन के आरोपों के कारण आप का अस्तित्व ही खतरे में है। दिल्ली शराब घोटाला केस में पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और डिप्टी मुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया जेल में हैं। अब तो इस घोटाले में आम आदमी पार्टी के भी संलिप्त होने के सबूतों के बाद आप को भी आरोपी बना दिया गया है। इन सबके बीच एक साल के अंदर मौजूदा विधायक, पूर्व विधायक और पूर्व मंत्री समेत सैकड़ों कार्यकर्ता पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं। अरविंद केजरीवाल पर झूठे वादे बार-बार एक्सपोज हो रहे हैं। लोकसभा चुनाव में आप को करारी हार झेलनी पड़ी है। ऐसे में पार्टी के अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं चलने के कारण अब आप नेता ही दबी जुबान में ये चर्चा करने लगे हैं कि बिना लीडरशिप के पार्टी कितने दिन चलेगी? अरविंद केजरीवाल का जेल से सरकार चलाने का जिद-भरा फैसला कहीं पार्टी को डुबो ही ना दे?

कुछ तो यहाँ तक बोलने लगे हैं कि केजरीवाल जिस सिंघवी को अपना वकील बनाए हुए हैं, आखिर हैं तो कांग्रेस पार्टी से, उस कांग्रेस पार्टी से जिसकी तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भिजवाने का वायदा करके सत्ता में आए, लेकिन किसी भी फाइल को खोलने की बजाए ठिकाने लगा दी। पार्टी पर हो रही कार्यवाही कांग्रेस की ही शिकायत पर हो रही है और वकील भी कांग्रेस, यानि केजरीवाल ने खुद आगे कुआं पीछे खाई खोद ली है। केजरीवाल कांग्रेस की इस टेडी चाल को नहीं समझ सके। कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व शीला की बढ़ती लोकप्रियता को बट्टा लगाने अपनी सलाहकार समिति के सदस्यों अरविन्द, मनीष, योगेंद्र आदि को उतारा और अब केजरीवाल को ठिकाने लगाने प्रवक्ता सिंघवी को। आम आदमी पार्टी को कांग्रेस ही ख़त्म करके साँस लेगी। पार्टी में किसी पर विश्वास नहीं, मुख्यमंत्री बनाना चाहता है अपनी पत्नी को सुनीता को। पार्टी का अब टूटना तय है, कोई नहीं बचा सकता। जनता भी सच्चाई समझ गयी है। 

अरविंद केजरीवाल ही शराब घोटाले में किंगपिन और मुख्य साजिशकर्ता
दिल्ली की शराब नीति में करोड़ों के घोटाले के मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने राउज एवेन्यू कोर्ट में दाखिल चार्जशीट में सीएम अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को भी आरोपी बनाया है। चार्जशीट में ईडी ने अरविंद केजरीवाल को घोटाले में किंगपिन और मुख्य साजिशकर्ता बताया है। इतना ही नहीं ईडी ने दावा किया है कि गोवा इलेक्शन में रिश्वत के पैसों का ना सिर्फ इस्तेमाल हुआ, बल्कि इसकी पूरी जानकारी केजरीवाल को भी थी। चार्जशीट में अरविंद केजरीवाल और आरोपी विनोद चौहान के वॉट्सएप चैट का डिटेल दिया गया है। आरोप है कि के कविता के पीए ने विनोद के जरिए 25.5 करोड़ रुपए गोवा चुनाव के लिए आम आदमी पार्टी को पहुंचाए थे। ईडी का कहना है कि इस चैट से ये साफ है कि विनोद चौहान के अरविंद केजरीवाल के साथ कितने घनिष्ठ रिश्ते थे। शराब नीति मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही ईडी ने अरविंद केजरीवाल को 21 मार्च को गिरफ्तार किया था। वे अभी तिहाड़ जेल में हैं। लंबे इंतजार के बाद 12 जुलाई को अरविंद केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली, लेकिन रिहाई अटकी हुई है। ईडी और सीबीआई के जिस तरह के संगीन आरोप हैं, उससे केजरीवाल की कई और रातें जेल में कट सकती हैं।

लोकसभा चुनाव में करारी हार, नहीं चला ‘जेल का बदला वोट’ का स्लोगन
ऐसे में बड़े सवाल केजरीवाल की पार्टी के अस्तित्व को लेकर भी उठ रहे हैं। दरअसल, केजरीवाल ने जेल जाने के बावजूद किसी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया, क्योंकि ना तो उन्हें किसी पर विश्वास है, और ना ही वो ऐसा चाहते थे। क्योंकि केजरीवाल को लगा था कि लोकसभा चुनाव में ‘जेल का बदला वोट’ का स्लोगन केजरीवाल को सिंपैथी दिलाएगा। लेकिन केजरीवाल इतने एक्सपोज हो चुके हैं कि दिल्ली की जनता ने उनकी पार्टी के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखाई। परिणामस्वरूप आम आदमी पार्टी को कांग्रेस से गठबंधन करने के बावजूद दिल्ली की सातों सीटों पर करारी हाल झेलनी पड़ी। लेकिन केजरीवाल इसे बाद भी रस्सी जो जल गई, पर ऐंठन नहीं गई, वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। करारी हार के बाद भी वे अपनी इस जिद पर सवार हैं कि जेल से ही सरकार चलाएंगे।

केजरीवाल सीएम पद छोड़ेंगे तो हजारों करोड़ का शीशमहल भी छूट जाएगा
दिल्ली के आम आदमी पार्टी की सरकार में मंत्री रहे राजकुमार आनंद ही केजरीवाल के जेल से सरकार चलाने के फैसले पर सवाल खड़े करते हैं। वे कहते हैं, ‘जेल से सरकार चलाने की जिद खुद उनकी है। उन्हें लगता है कि CM पद छोड़ेंगे, तो बहुत कुछ छोड़ना पड़ेगा। उनका हजारों करोड़ का शीशमहल छूट जाएगा। उन्हें किसी पर विश्वास नहीं है कि जेल से छूटने पर फिर से उन्हें सीएम पद मिलेगा या वो फिर से सड़क पर आ जाएंगे। वे कहते हैं कि जब केजरीवाल जेल जा रहे थे, तब जनता से कहा गया कि पार्टी के अंदर रेफरेंडम हुआ। इसके मुताबिक कार्यकर्ता चाहते हैं कि केजरीवाल जेल से सरकार चलाएं, लेकिन ये सब लोग अच्छी तरह जानते हैं कि रेफरेंडम कैसे होते हैं। किसलिए और किसके फेवर में कराए जाते हैं। इसलिए इस तरह की बातों का कोई मतलब नहीं है।

लीडरशिप क्राइसिस से जूझ AAP में लगातार उठ रहे बगावती सुर
पार्टी छोड़कर गए पूर्व विधायक नितिन त्यागी ने भी मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर झूठे वादे करने और फिर विक्टिम कार्ड खेलने का आरोप लगाया है। वे मानते हैं कि हालात ऐसे बनते जा रहे हैं, जिसमें AAP का अस्तित्व ही खतरे में नजर आ रहा है? क्योंकि पार्टी लीडरशिप क्राइसिस से जूझ रही है। AAP में लगातार बगावती सुर उठ रहे हैं। केजरीवाल ने पार्टी की मजबूत सेकेंड लेयर बनाई ही नहीं, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। जहां तक आम आदमी पार्टी के अंदरखाने की बात है तो मौजूदा हालात में तो पार्टी में काफी खलबली है। इतना तो तय है कि आने वाले वक्त में पार्टी को और झटके लगेंगे। पार्टी के कई नेता अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। इसीलिए वे दूसरी पार्टियों में अपनी संभावनाएं तलाशने में जुट गए हैं। जिन्हें मौका मिल रहा है, वे आप का दागदार दामन छुड़ाकर नया राजनीतिक करियर बनाने में लगे हैं।

लोकसभा की तरह विधानसभा चुनाव में भी बैठ जाएगा आप का भट्टा
दरअसल, आप नेताओं की सबसे बड़ी चिंता आसन्न विधानसभा चुनाव को लेकर है। दबी जुबान से पार्टी के अंदरूनी हल्कों में जिक्र होने लगा है कि केजरीवाल की यही रणनीति रही तो, कहीं ऐसा न हो कि लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी आप का भट्टा बैठ जाए। जिस सिम्पैथी की आस केजरीवाल लगाए बैठे हैं, वो उनके लगातार झूठ के एक्सपोज होने और शराब घोटाले में संलिप्तता के चलते उन्हें मिलना बहुत मुश्किल है। आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता रहे आशुतोष कहते हैं, ‘आप के सामने अपना अस्तित्व बचाने का संकट है। शराब घोटाला ने इनकी मुश्किल बढ़ा रखी है। पार्टी के सबसे बड़े नेता जेल में हैं।

केजरीवाल को किसी पर भरोसा नहीं, इसलिए नहीं छोड़ रहे सीएम पद
आप की सबसे बड़ी दिक्कत यह भी है कि पार्टी का कोई स्ट्रक्चर नहीं है। कोई सेकेंड लाइन और थर्ड लाइन लीडरशिप नहीं है। अब आप ही सोचिए कि पार्टी कैसे आगे बढ़ेगी। दरअसल, अरविंद केजरीवाल को संविधान पर भरोसा ही नहीं है। किसी नेता या पत्नी पर भरोसा नहीं है। सुनीता केजरीवाल बीच में काफी एक्टिव हुई थीं। उस वक्त बातें ये भी थीं कि शायद वे मुख्यमंत्री बनें, लेकिन फिर केजरीवाल का जेल से ही सरकार चलाने का फैसला सामने आया। वे CM पद से इस्तीफा देकर किसी और को एक्टिंग CM बना सकते थे। फिर जेल से बाहर आकर खुद कुर्सी संभाल लेते, जैसा हेमंत सोरेन ने किया। लेकिन केजरीवाल को लगता है कि वो कुर्सी छोड़ेंगे तो लड़ाई हार जाएंगे। ये अहंकार है। वो अभी कितने दिन जेल में रहेंगे किसी को नहीं पता, लेकिन वो पद नहीं छोड़ना चाहते। ऐसा इसलिए है क्योंकि पूरी पार्टी सिर्फ एक आदमी के इर्द-गिर्द घूम रही है।’

वरिष्ठ नेता स्वाति मालीवाल केस ने AAP की मुश्किलें और बढ़ाईं
स्वाति मालीवाल केस तो सिर्फ एक उदाहरण है, जो खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के अंदरूनी हलकों में तो नाराजगी और बगावती सुर तेजी से उठने लगे हैं। पार्टी के एक सीनियर लीडर ऑफ द रिकॉर्ड कहते हैं, ‘सबको चुप रहने का ऑर्डर मिला है, लेकिन पार्टी के अंदर इस मामले को लेकर गुस्सा है। यह सही है कि ने स्वाति मालीवाल केस ने AAP की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। क्योंकि स्वाति पार्टी की पुरानी सदस्य हैं। वो पार्टी बनने से पहले से आंदोलनों और तमाम गतिविधियों से जुड़ी रहीं। उनके मामले में कम से कम विधायकों की एक बैठक तो होनी चाहिए थी। स्वाति मालीवाल पार्टी में CM की सबसे करीबी थीं। उन्होंने ये आरोप क्यों लगाए? उस पर साथ बैठकर चर्चा की जरूरत तक नहीं समझी गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में स्वाति मालीवाल से मिलते-जुलते और केस भी देखने को मिल सकते हैं। ऐसे में पार्टी को बड़ा नुकसान हो सकता है।

लीडरशिप क्राइसिस के बीच भी AAP के अंदर CM पद के कई दावेदार
पार्टी में एक ओर तो लीडरशिप क्राइसिस साफ दिख रही है, दूसरी ओर कुछ नेता इस ताक में भी नजर आ रहे हैं कि कैसे वो केजरीवाल की जगह सीएम बन सकते हैं। ऐसे नेताओं में आतिशी, संदीप पाठक, दुर्गेश पाठक, संजय सिंह आदि शामिल हैं। लेकिन ये फिलहाल केजरीवाल के आगे कुछ बोल नहीं पा रहे हैं। या ये कहें कि किसी में हिम्मत नहीं है। पूर्व AAP नेता नितिन त्यागी कहते हैं, ‘पार्टी के अंदर 5-6 CM हैं। मैंने लक्ष्मीनगर से जैसे ही इस्तीफा दिया, यहां के कैंडिडेट के लिए 5 नाम आए। एक आतिशी का कैंडिडेट है, तो दूसरे को संदीप पाठक ने आश्वासन दिया है। तीसरे को संजय सिंह ने तो चौथे को गोपाल राय और पांचवें को दुर्गेश पाठक ने दिया है। छठा मनीष सिसोदिया का भतीजा है। अगर पार्टी के अंदर दरारें नहीं होतीं, तो एक सीट के लिए 6-6 कैंडिडेट नहीं होते।’

AAP के पूर्व मंत्री बोले- केजरीवाल और उनकी सरकार की नीयत ही खराब
केजरीवाल सरकार में समाज कल्याण मंत्री रहे राजकुमार आनंद साफ-साफ मानते हैं कि सरकार की नीयत ही खराब है। ये पहले ऐसी योजनाओं की घोषणा करते हैं, जो लागू ही नहीं होती। फिर विक्टिम कार्ड खेलते हैं कि जनहित के कल्याण के बीच LG अड़ंगा लगा रहे हैं। योजना को पास कराने की कोशिश नहीं करते। वे कहते हैं, ‘दिल्ली में हर साल करीब 3000 करोड़ रुपए का SC-ST फंड एलोकेट होता है। ये फंड दलितों की बस्तियों, उनके बच्चों की पढ़ाई और दूसरी वेलफेयर स्कीम्स के लिए आता है, लेकिन इस फंड का बहुत मामूली सा हिस्सा ही उन पर खर्च होता है। बाकी दूसरे डिपार्टमेंट्स के खाते में चला जाता है। बच्चों के लिए फैलोशिप स्कीम्स लाई गईं। मंत्री रहते हुए मैं सैकड़ों बच्चों से मिला, लेकिन उसमें दलित नहीं थे। यही हाल दलितों की बस्तियों और उनके हिस्से की दूसरी योजनाओं का है।’

केजरीवाल पहले झूठे वादे करते हैं, फिर विक्टिम कार्ड खेलते हैं
AAP के पूर्व विधायक नितिन त्यागी को 7 जून, 2024 में कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप मढ़ दिया गया। कुछ ही दिनों बाद नितिन ने BJP जॉइन कर ली। दरअसल, लोकसभा चुनाव में दिल्ली की महिलाओं को हर महीने 1000 रु. देने का वादा किया था। इस योजना के विरोध और सस्पेंशन पर त्यागी मीडिया से साफ कहते हैं, ‘योजना ठीक थी, लेकिन नीयत नहीं। दरअसल ये योजना कभी लागू ही नहीं होनी थी। पार्टी का पहले से प्लान था कि सितंबर में हम कह देंगे कि लेफ्टिनेंट जनरल योजना को अप्रूव नहीं कर रहे। जैसा पहले ‘वन टाइम वाटर बिल सेटलमेंट स्कीम’ को लेकर किया था।’ वे आगे कहते हैं कि ये योजना 1 अगस्त, 2023 में लागू होनी थी, लेकिन कह दिया गया कि LG ने अप्रूव नहीं की। योजना लागू न होने का आरोप केंद्र की BJP सरकार पर लगा। जबकि सच तो ये है कि इस पर कभी कोई कैबिनेट नोट बना ही नहीं था। ना ही कोई बैठक हुई थी। योजना को प्रोसेस करने की कोशिश ही नहीं हुई थी। ये वादा सिर्फ खुद को विक्टिम दिखाने और केंद्र पर ठीकरा फोड़ने के लिए किया गया था।

‘बंगाल में कांग्रेस और CPIM को हराना है’ – ममता बनर्जी ; उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव ने दिखाई औकात

जब अपने ही दांत जिव्हा को काट दे, फिर दोष किसे दिया सकता। यह सच है भारत में Communist और मुस्लिम लीग पार्टी को छोड़ 99.9% पार्टियां कांग्रेस की गलत नीतियों के कारण ही कांग्रेस को त्याग बनी है। भारतीय जनसंघ(वर्तमान भारतीय जनता पार्टी) भी कांग्रेस में चल रही तुष्टिकरण नीति के कारण अलग हुई। आज उसी भाजपा को हराने कांग्रेस अन्य पार्टियों को लेकर गठबंधन बना लिया, जो दिन-प्रतिदिन तार-तार हो रहा है। दरअसल INDI गठबंधन पर कांग्रेस क्यों लप-लपाती जिव्हा लगाए हुए हैं। जिसे समस्त गैर-कांग्रेस पार्टियां समझ गयी, कांग्रेस का उद्देश्य भाजपा को हराना नहीं, बल्कि राहुल और प्रियंका को स्थापित करना है और ये ही दोनों गठबंधन और कांग्रेस के लिए घातक हैं।  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हराने के लिए बनाया गया INDI गठबंधन दिन प्रतिदिन तार-तार हो रहा है। अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भांजे अभिषेक बनर्जी ने 
कांग्रेस नेताओं के खिलाफ यलगार का ऐलान कर दिया है। उधर अखिलेश यादव ने भी लोकसभा चुनाव के लिए पहली सूची जारी करके साफ़ कर दिया है कि वह उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा समझौता कांग्रेस नेतृत्व के सामने नहीं करना चाहेंगे। 

ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस से बिना कोई समझौता किए हुए ही बंगाल के उत्तर हिस्से में एक पदयात्रा चालू कर दी है। यह पदयात्रा भी उन जिलों में हो रही है, जहाँ से कुछ ही समय पहले राहुल गाँधी गुजरे हैं। यहाँ वह यात्रा करने के साथ ही कांग्रेस पर हमला भी कर रही हैं। वह यहाँ कूचबिहार क्षेत्र में पदयात्राएँ कर रही हैं। 

बनर्जी & कम्पनी vs अधीर रंजन चौधरी

ममता बनर्जी ने बंगाल के इस्लामपुर में इस यात्रा के दौरान कहा, “तृणमूल कांग्रेस ही वह पार्टी है, जो आपके अधिकारों के लिए लड़ती है। हमें बंगाल में कांग्रेस और सीपीआईएम को हराने के लिए साथ आना होगा और एकजुट होना होगा।”
ममता बनर्जी ही नहीं बल्कि उनके भांजे सांसद अभिषेक बनर्जी भी कांग्रेस पर हमलावर हैं। वह बंगाल कांग्रेसअध्यक्ष और लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी पर हमला बोल रहे हैं। 
उन्होंने अधीर रंजन के रवैये पर कहा, “अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि वह बंगाल में राष्ट्रपति शासन चाहते हैं। वह कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं और इंडिया ब्लॉक के सदस्य होने के नाते, वह ममता बनर्जी को कैसे चुनौती दे सकते हैं? हमने कांग्रेस पर हमला नहीं किया। मैंने इस विषय में कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन वह कांग्रेस के भीतर एक ट्रोजन हॉर्स हैं।” 
अभिषेक बनर्जी यहाँ ही नहीं रुके, उन्होंने आगे कहा, “पिछले 7 महीनों में, आपने देखा है कि अधीर रंजन ने क्या-क्या कहा है। वह ममता बनर्जी को चुनौती दे रहे हैं, जिन्हें कांग्रेस INDI गठबंधन के सबसे मजबूत सहयोगी बनाने का दावा कर रही है। आखिर, आप किसकी मदद कर रहे हैं? क्या आप कांग्रेस को मजबूत कर रहे हैं या बीजेपी को ?” 
हाल ही में तृणमूल कांग्रेस ने ऐलान किया था कि बंगाल में वह अकेले चुनाव लड़ने वाली है। उधर अधीर रंजन चौधरी ने भी ममता बनर्जी पर हमले जारी रखे हैं। उन्होंने कल (30 जनवरी, 2019) को बंगाल की ममता सरकार पर आरोप लगाया कि वह राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा को इजाजत नहीं दे रही है। गौरतलब है कि यात्रा आज (31 जनवरी) को बिहार से बंगाल में प्रवेश करेगी। उन्होंने आरोप लगाया है कि यहाँ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली को भी इजाजत नहीं दी जा रही।
अधीर रंजन चौधरी बंगाल की कानून व्यवस्था को लेकर लगातार ममता बनर्जी की सरकार पर सवाल उठाते आए हैं। उन्होंने हाल ही में जब ED की टीम पर TMC नेता के घर पहुँचने पर हमला हुआ था तो भी बंगाल में राष्ट्रपति शासन की माँग की थी। उन्होंने पंचायत चुनावों के दौरान हुई हिंसा का मुद्दा भी जोरशोर से उठाया था।

उत्तर प्रदेश में भी INDI गठबंधन को तगड़ा झटका

ऐसा नहीं है कि INDI गठबंधन की राह बंगाल में ही मुश्किल हो रही है। उत्तर प्रदेश में भी उनके सामने समस्याओं का अम्बार है। हाल ही में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने ऐलान किया था कि वह कॉन्ग्रेस को राज्य में 11 सीट देंगे। इस पर कॉन्ग्रेस ने आपत्ति जताई थी।
अब सपा ने एक कदम और आगे बढ़कर लोकसभा चुनावों के लिए 16 प्रत्याशियों की एक सूची भी जारी कर दी।  सपा ने इस सूची में फर्रुखाबाद का टिकट भी घोषित किया है। गौरतलब है कि यहाँ से पूर्व में विदेश मंत्री रहे सलमान खुर्शीद सांसद रहे हैं।
वहीं इसके अलावा खीरी लोकसभा सीट पर भी पेंच फँसेगा। दरअसल, यहाँ से सपा ने उत्कर्ष वर्मा को प्रत्याशी घोषित किया है। उत्कर्ष वर्मा यहाँ खीरी की सदर विधानसभा सीट से दो बार विधायक रहे हैं। वह कौशल किशोर वर्मा के पोते हैं, जो कि इस सीट से तीन बार विधायक रहे।
दूसरी तरफ से कांग्रेस से इस सीट से रवि प्रकाश वर्मा अपनी बेटी पूर्वी वर्मा के लिए दावा ठोंक रहे हैं। उन्होंने हाल ही में सपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामा है। वह यहाँ से खुद तीन बार सांसद रहे हैं। यह उनके परिवार की परम्परागत सीट है। उनका परिवार इस लोकसभा सीट को 10 बार जीत चुका है।
पंजाब और केरल में भी गठबंधन खटाई में 
कॉन्ग्रेस के सामने पंजाब की भी चुनौती है। यहाँ आम आदमी पार्टी उससे समझौता करने के मूड में नहीं है। कांग्रेस का भी लोकल नेतृत्व यहाँ आप के साथ कोई डील नहीं करना चाहता है। दोनों पार्टियाँ कह रही हैं कि वह अपने दम पर 12 लोकसभा सीटों पर लड़ेंगे। उधर केरल में वामपंथी सरकार पर कांग्रेस का स्थानीय नेतृत्व रोज नए हमले कर रहा। यहाँ भी आपस में समझौता होगा, इसकी सम्भावना कम नजर आ रही है।