मोदी फिर बने संकटमोचक, पश्चिम एशिया में युद्ध के वैश्विक तनाव के बीच भी 4.50 लाख भारतीयों की सकुशल वापसी

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और तनाव के बीच संकटमोचक बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीयों की सुरक्षित स्वदेश वापसी का सिलसिला बना हुआ है। विदेश मंत्रालय के अनुसार एक माह में ही साढ़े चार लाख से अधिक भारत नागरिकों की सुरक्षित वापसी कराई गई है। मंत्रालय ने कहा है कि 28 फरवरी से अब तक लगभग 4.50 लाख यात्री और भारतीय नागरिक पश्चिम एशिया से भारत लौट चुके हैं। इनमें खाड़ी देशों, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, सऊदी अरब, ओमान, बहरीन और कुवैत के अलावा ईरान, इज़राइल और संघर्ष प्रभावित अन्य क्षेत्रों से लौटे भारतीय यात्री कामगार, छात्र और तीर्थयात्री शामिल हैं। भारत सरकार लगातार स्थिति पर नजर रख रही है, क्योंकि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते और काम करते हैं। युद्ध के कारण हवाई सेवाओं, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर पड़ा है, इसलिए भारतीय दूतावास लगातार हेल्पलाइन, विशेष उड़ानें और सुरक्षित निकासी योजनाएं चला रहे हैं।

भारतीय दुनिया के किसी कोने में फंसा हो, तिरंगा सुरक्षा की गारंटी
दुनिया एक बार फिर अशांत दौर से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-इजराइल टकराव, या फिर अमेरिका की भूमिका हो। इन सबने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता और भय का माहौल बना दिया है। ऐसे समय में, जब बमों की आवाज और कूटनीतिक बयानबाजी के बीच आम इंसान सबसे अधिक असुरक्षित होता है, तब राष्ट्रों की असली परीक्षा होती है। भारत ने इस कसौटी पर बार-बार खुद को साबित किया है। पीएम मोदी के प्रयासों से केंद्र सरकार युद्ध के बीच फंसे भारतीयों की वापसी करा रही है। मोदी सरकार ने यह स्थापित कर दिया है कि दुनिया के किसी भी कोने में अगर भारतीय फंसा है, तो तिरंगा उसकी सुरक्षा की गारंटी है। पिछले माह 23 मार्च तक अलग-अलग युद्ध क्षेत्रों में फंसे 3.75 लाख भारतीयों की सुरक्षित वापसी हुई है। यह स्वदेश वापसी केवल एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि एक मानवीय प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय संकल्प का परिचायक है। हाल के घटनाक्रमों में यह स्पष्ट हुआ है कि भारत सरकार, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है और इसके लिए हर संभव संसाधन जुटाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती है।

संकट के बीच सुरक्षित वापसी का बड़ा अभियान
इजरायल-यूएस-ईरान 2026 में युद्ध के तेज होने पर प्रधानमंत्री के दिशा-निर्देशन में भारत ने अपने देशवासियों को सकुशल निकालने के अभियान को और अधिक गति दी। हजारों भारतीयों को ईरान से सुरक्षित निकाला गया, जिनमें से अधिकांश को आर्मेनिया और अज़रबैजान के रास्ते बाहर लाकर दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों के जरिए भारत पहुंचाया गया। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर से जुड़े 70–80 छात्रों को सुरक्षित दिल्ली लाया गया। इस प्रकार 2025 और 2026 को मिलाकर अब तक करीब लाखों  भारतीयों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा चुकी है। तमिलनाडु के मछुआरे अभी भी ईरान क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिनकी निकासी के प्रयास तेज गति से जारी हैं। इन अभियानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का इवैक्युएशन तंत्र केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित, बहुस्तरीय और प्रभावी प्रक्रिया है, जिसमें कूटनीति, ट्रांजिट देशों का सहयोग और आधुनिक लॉजिस्टिक्स का बेहतरीन समन्वय देखने को मिलता है।

पिछले साल भी ईरान और इजराइल से भारतीयों को लाए वापस
इससे पहले 2025 में इजरायल-ईरान संघर्ष की शुरुआत में भारत ने चरणबद्ध तरीके से अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने का व्यापक अभियान चलाया। इस दौरान सबसे बड़ा प्रयास “ऑपरेशन सिंधु” के रूप में सामने आया, जिसके तहत कुल 4415 भारतीयों को सकुशल निकाला गया। इनमें 3597 ईरान से और 818 इजरायल से थे। इन नागरिकों को 19 विशेष उड़ानों (निजी एयरलाइंस और भारतीय वायुसेना) के जरिए मुख्य रूप से नई दिल्ली लाया गया। शुरुआती चरण में ही करीब 100 से अधिक छात्रों को ईरान से आर्मेनिया के रास्ते सुरक्षित निकालकर भारत पहुंचाया गया, जिसके बाद यह प्रक्रिया लगातार कई चरणों में आगे बढ़ती रही। इस पूरे अभियान में जम्मू-कश्मीर, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और केरल के हजारों छात्र, कामगार और पेशेवर शामिल थे। इस प्रकार 2025 के इस बड़े अभियान ने भारत की त्वरित रणनीति, समन्वय और नागरिकों की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को मजबूती से स्थापित किया।

भारतीय तिरंगा: सुरक्षा और विश्वास का सबसे भरोसेमंद का प्रतीक

जब कोई भारतीय विदेश में संकट में होता है, तो सबसे पहले उसे अपने देश के झंडे तिरंगे से उम्मीद बंधती है। यह केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि सुरक्षा और विश्वास का आश्वासन बन चुका है। इजरायल-ईरान संघर्ष के बीच जब हजारों भारतीय, विशेषकर छात्र, अनिश्चितता में फंसे थे, तब भारत सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उन्हें सुरक्षित निकालने का अभियान शुरू किया। दुबई और जेद्दाह जैसे ट्रांजिट केंद्रों से विशेष उड़ानों के जरिए इन नागरिकों को वापस लाया गया। यह दिखाता है कि भारत केवल कागजी आश्वासन नहीं देता, बल्कि जमीनी स्तर पर परिणाम भी सुनिश्चित करता है। भारतीय दूतावासों ने इस पूरे अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हेल्पलाइन नंबर जारी करना, नागरिकों से लगातार संपर्क बनाए रखना, सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना और स्थानीय प्रशासन से तालमेल बैठाना। ये सभी कदम इस बात को दर्शाते हैं कि भारत की कूटनीतिक मशीनरी संकट के समय कितनी प्रभावी और सजग हो जाती है।

एयरलिफ्ट से लेकर ग्राउंड सपोर्ट तक का व्यापक नेटवर्क
भारत का इवैक्युएशन प्रोटोकॉल बहुआयामी है। इसमें केवल एयरलिफ्ट ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी व्यापक सहायता शामिल होती है। संघर्ष क्षेत्र से लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाना, वहां से उन्हें ट्रांजिट देशों तक ले जाना और फिर विशेष उड़ानों के जरिए भारत लाना। यह पूरी प्रक्रिया एक सुव्यवस्थित तंत्र के तहत संचालित होती है। भारतीय वायुसेना और नागरिक उड्डयन क्षेत्र की साझेदारी इस दिशा में एक मजबूत उदाहरण प्रस्तुत करती है। इन अभियानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को और मजबूत किया है। आज भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखा जाता है, जो न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अन्य देशों के नागरिकों की भी मदद करता है। यह ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना का आधुनिक रूप है, जहां मानवता को प्राथमिकता दी जाती है।

मोदी की निर्णायक भूमिका ने संकट को अवसर में बदला
किसी भी संकट में नेतृत्व की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने यह दिखाया है कि निर्णायक फैसले, त्वरित कार्रवाई और स्पष्ट प्राथमिकताएं किस तरह संकट को अवसर में बदल सकती हैं। यह केवल प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दृष्टिकोण भी है, जो हर भारतीय को यह विश्वास दिलाता है कि वह कहीं भी हो, उसका देश उसके साथ खड़ा है। यह केवल राजनीति या कूटनीति का विषय नहीं है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का प्रश्न है। युद्ध के बीच फंसे लोगों को सुरक्षित निकालना एक राष्ट्र के नैतिक दायित्व का हिस्सा है। भारत ने इस दायित्व को न केवल स्वीकार किया है, बल्कि उसे पूरी निष्ठा और क्षमता के साथ निभाया भी है। आज जब दुनिया अनिश्चितताओं से घिरी हुई है, भारत ने अपने कार्यों से यह सिद्ध कर दिया है कि वह केवल एक उभरती हुई शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील राष्ट्र भी है।

इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने जारी किए हेल्पलाइन नंबर
भारत ने बुधवार को ईरान से अपने नागरिकों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु शुरू करने की घोषणा की, क्योंकि इजराइल-ईरान के बीच संघर्ष कम होने का कोई संकेत नहीं दिखा। इजराइल- ईरान में हुए घटनाक्रमों को देखते हुए, भारत सरकार ने इजराइल से उन भारतीय नागरिकों को निकालने का फैसला किया है जो वहां से निकलना चाहते हैं। इजराइल से भारत की उनकी यात्रा लैंड बॉर्डर के माध्यम से और उसके बाद हवाई मार्ग से कराई जाएगी। तेल अवीव स्थित भारतीय दूतावास इजराइल में मौजूद भारतीय नागरिकों की मदद करेगा, जो अपने देश लौटना चाहते हैं। इजराइल से निकलने वाले नागरिकों के लिए सरकार ने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। मोदी सरकार ने नागरिकों से तेल अवीव में भारतीय दूतावास संपर्क की वेबसाइट पर रजिस्ट्रेशन कराने का निर्देश दिया है।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से मेडिकल छात्रों की स्वदेश वापसी कराई
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की संवेदनशीलता और लोकप्रियता ही है कि जब भी उन्हें पता चलता है कि दुनिया के किसी भी कौने में भारतीय संकट में हैं, तो वे उनकी सकुशल वापसी के लिए संकटमोचक की भूमिका में आ जाते हैं। ऐसा एक नहीं कई बार, कई देशों में फंसे भारतीयों के साथ हो चुका है। संकट से जूझ रहे भारतीयों की उम्मीदों का आखिरी सहारा पीएम मोदी ही बने हैं। वह चाहे कोरोना काल हो या रूस-यूक्रेन युद्ध, या फिर किसी देश में कोई और संकट हो, हर बार हजारों भारतीयों की सकुशल स्वदेश वापसी हुई है। अब ताजा उदाहरण इजराइल-ईरान युद्ध का है। पीएम मोदी ने इस भीषण युद्ध के बीच ‘ऑपरेशन सिंधु’ चलाकर भारतीयों की सकुशल वापसी कराई है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान की मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे लगभग 110 भारतीय छात्र सुरक्षित भारत पहुंच गए हैं। इनमें से 90 छात्र कश्मीर के हैं। ईरान-इजराइल जंग से ऑपरेशन सिंधु के माध्यम से भारत पहुंचे छात्रों के मुताबिक वहां के हालात हर दिन खराब होते जा रहे हैं। खासकर तेहरान में स्थिति बहुत भयावह बनी हुई है। युद्ध इसलिए बहुत खराब है, क्योंकि इसमें इंसानियत ही खत्म हो जाती है।

अकेले ईरान में स्टूडेंट्स समेत दस हजार से ज्यादा भारतीय फंसे
ईरान और इजरायल के बीच में जारी जंग लगातार भीषण होती जा रही है। इजरायल जहां ईरान में राजधानी तेहरान, न्यूक्लियर साइट और सैन्य ठिकानों को टारगेट कर रहा है। वहीं ईरान भी इजरायल में सैन्य ठिकानों को तबाह करने में लगा है। जंग के बीच हजारों भारतीय ईरान और इजरायल में फंसे हुए हैं। अकेले ईरान में ही 10000 से ज्यादा भारतीय फंसे हैं जिनमें आधे से ज्यादा स्टूडेंट्स हैं। इनमें भी मेडिकल स्टूडेंट्स सबसे ज्यादा हैं। भारत सरकार ने युद्ध के बीच से भारतीयों को निकालने के लिए ऑपरेशन सिंधु लॉन्च किया है। इस ऑपरेशन के तहत ईरान से निकाले गए ये छात्र मंगलवार को आर्मेनिया पहुंचे थे, जहां उन्हें राजधानी येरेवन के होटलों में ठहराया गया। इसके बाद इन्हें कतर के रास्ते भारत लाया गया। इंडिगो की एक फ्लाइट आर्मेनिया के येरेवन एयरपोर्ट से इन छात्रों को लेकर कतर की राजधानी दोहा के लिए रवाना हुई थी। इसके बाद एक दूसरी फ्लाइट से इन्हें दोहा से नई दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट लाया गया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने छात्रों को ईरान से बाहर निकालने की पुष्टि की है।

ईरान से लौटने वाले भारतीय छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल
इन छात्रों को आर्मेनिया बॉर्डर पर नॉरदुज चौकी से बसों में निकाला गया। ईरान में 1,500 स्टूडेंट्स सहित लगभग दक हजार भारतीय फंसे हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक मौजूदा हालात में देश के एयरपोर्ट भले ही बंद हैं, लेकिन लैंड बॉर्डर्स खुले हुए हैं। मंत्रालय ने विदेशी नागरिकों से ईरान छोड़ने से पहले अपना नाम, पासपोर्ट नंबर, गाड़ी डिटेल्स, देश से निकलने का समय और जिस बॉर्डर से जाना चाहते हैं, उसकी जानकारी मांगी थी।

ऑपरेशन सिंधु के तहत ईरान से 110 छात्रों का ग्रुप दिल्ली पहुंच चुका है। इन छात्रों को आर्मेनिया के रास्ते भारत लाया गया है। इंडिगो एयरलाइंस की फ्लाइट देर रात 3 बजकर 43 मिनट पर दिल्ली लैंड हुई। इन 110 छात्रों में 94 जम्मू-कश्मीर से हैं जबकि 16 लोग अन्य 6 राज्यों से है। ईरान से लौटने वाले छात्रों में 54 लड़कियां भी शामिल हैं। सकुशल देश वापस आने के बाद इन छात्रों के चेहरे पर खुशी का साफ झलक रही थी।

ईरान-इजरायल के बीच जंग में राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी
वहीं, आपको बता दें कि इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग लगातार बढ़ रही है। जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, दोनों देशों के बीच जंग भीषण होती जा रही है। बुधवार को इजरायल ने तेहरान पर जबरदस्त अटैक किया। इजरायल के 50 से ज्यादा लड़ाकू विमानों ने ईरान की राजधानी तेहरान पर भारी बमबारी की। इजरायल की एयरफोर्स ने तेहरान और उसके पास कराज में ईरान की न्यूकिलयर साइट को निशाना बनाया। इन दोनों ही न्यूक्लियर फैसेलिटीज में ईरान यूरेनियम एनरिचमेंट में इस्तेमाल होने वाले सेंट्रीफ्यूज बनाता है। इजरायली सेना ने दावा किया कि 25 फाइटर जेट ने ईरान के वेस्टर्न सिटी करमनशाह में ईरान के 5 अटैक हेलीकॉप्टर्स को बर्बाद कर दिया। इजरायल के फाइटर जेट्स ने ईरान की उन साइट पर भी जोरदार अटैक किया जहां से इजरायल पर मिसाइल्स फायर की जा रही थी। इजरायल के हमलों में अब तक ईरान के करीब छह सौ लोग मारे जा चुके हैं और 1300 से ज्यादा लोग घायल हैं।

भारत ने फंसे लोगों को निकालने के लिए आर्मेनिया को क्यूं चुना?
दरअसल, ईरान का बॉर्डर 7 देशों से लगता है। ये देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान, आर्मेनिया, तुर्किये और इराक हैं। इसके अलावा समुद्री सीमा ओमान के साथ है। आर्मेनिया को ही चुनने की बड़ी वजह यह है कि आर्मेनिया का बॉर्डर ईरान के प्रमुख शहरों से कम दूरी पर है। आर्मेनिया के साथ भारत के संबंध काफी अच्छे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा समझौते भी हुए हैं। इसके अलावा आर्मेनियां को चुनने की कुछ प्रमुख वजहें हैं…
• आर्मेनिया राजनीतिक रूप से स्थिर है और भारत से उसके दोस्ताना संबंध हैं। वहां से फ्लाइट ऑपरेशन तेजी से संभव है, क्योंकि येरेवन एयरपोर्ट पूरी तरह चालू है।
• ईरान और आर्मेनिया के बीच फिलहाल कोई सीमा विवाद या सैन्य तनाव नहीं है।
• दूसरी तरफ ईरान का पूर्वी पड़ोसी पाकिस्तान है। पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते ऑपरेशन सिंदूर के बाद और उसके पहले से ही तनावपूर्ण हैं। ऐसे में भारत के पास पाकिस्तान के रास्ते छात्रों को लाने का विकल्प नहीं है।
• इराक पहले से ही ईरान के साथ चल रहे तनाव में शामिल है। कई बार इजराइल ने इराक में भी ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। इसलिए वहां से गुजरना खतरे से भरा हो सकता था।
• हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान खुलकर पाकिस्तान के समर्थन में आया था। उसने भारत की कार्रवाई की निंदा भी की थी। ऐसे में भारत उसकी मदद नहीं लेगा।
• तुर्किये भले ही स्थिर देश है, लेकिन ईरान से सड़क के जरिए वहां तक पहुंचना काफी लंबा है। हाल ही में भारत और तुर्किये के बीच तनातनी देखने को मिली है। दरअसल तुर्किये ने भी ऑपरेशन सिंदूर की निंदा करते हुए खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था।

ईरान से इसलिए भारतीय छात्रों को सीधे नहीं लाया जा रहा
भीषण जंग के चलते इस वक्त ईरान और इजराइल के बीच हालात काफी तनावपूर्ण हैं। कई शहरों में हमले हो चुके हैं और सुरक्षा का खतरा बना हुआ है। ऐसे में भारतीय छात्रों को सीधे ईरान से एयरलिफ्ट करना फिलहाल संभव नहीं है। ईरान के ज्यादातर इंटरनेशनल एयरपोर्ट इस समय नागरिक उड़ानों के लिए बंद हैं। युद्ध जैसे हालात की वजह से वहां से फ्लाइट उड़ाना सुरक्षित नहीं है। ईरान के कई इलाकों में इजराइली हमले हो चुके हैं। ऐसे में फ्लाइट्स पर भी हमले का खतरा बना रहता है। सीधे ईरान से भारतीय एयरलाइंस को भेजना काफी जोखिम भरा है। इसके लिए ईरान की इजाजत के साथ-साथ मजबूत सुरक्षा इंतजाम भी चाहिए होंगे, जो युद्ध की स्थिति में संभव नहीं हैं। नॉरदुज बॉर्डर सुरक्षित माना जा रहा है। आर्मेनिया में हालात स्थिर हैं और वहां से फ्लाइट्स भी आसानी से उड़ाई जा सकती हैं।

कतर से भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कराया

इससे पहले कतर की अदालत ने 12 फरवरी को भारतीय नौसेना के सभी आठ पूर्व नौसैनिकों को रिहा कर दिया। इसमें से सात नौसैनिक भारत लौट आए हैं। आठों पूर्व नौसैनिकों पर जासूसी करने के आरोप लगाए गए थे और वे कतर की जेल में कैद थे। इन्हें कतर की अदालत ने मौत की सजा भी सुना दी थी, जिसके बाद इनकी रिहाई मुश्किल हो गई थी। 26 अक्टूबर 2023 को कतर की अदालत ने जब इन पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा सुनाई तब समूचा देश मोदी सरकार के साथ खड़ा था और प्रार्थना कर रहा था कि इनकी जल्द रिहाई हो। लेकिन नफरत की राजनीति करने वाली कांग्रेस और लेफ्ट लिबरल इकोसिस्टम को मुद्दा मिल गया। जब मौत की सजा सुनाई गई थी तब इसे सरकार की कूटनीतिक विफलता करार दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कूटनीतिक प्रयासों से आज (12 फरवरी 2024) जब इनकी रिहाई हुई है तब उनके मुंह एक जोरदार तमाचा पड़ा है। चाहे पाकिस्तान से विंग कमांडर अभिनंदन को वापस लाना हो, यूक्रेन, लीबिया, सूडान, इजराइल, अफगानिस्तान में फंसे भारतीयों को वापस लाना हो या फिर उत्तराखंड सुरंग में फंसे 41 श्रमिकों को सुरक्षित सकुशल लाना हो, आज नए भारत की ताकत पूरा विश्व देख रहा है।

भारत की कूटनीतिक चतुराई से रुकी मौत की सजा
कतर की अदालत की तरफ से जब पूर्व नौसैनिकों को मौत की सजा का ऐलान किया गया था, तो भारत ने अपने कूटनीतिक चतुराई पेश करते हुए, इसके खिलाफ अपील की थी। इसका फायदा भी देखने को मिला था, क्योंकि 28 दिसंबर, 2023 को भारत की अपील को ध्यान में रखते हुए आठों नागरिकों को सुनाई गई मौत की सजा पर रोक लगा दी गई थी। पूर्व नौसैनिकों की रिहाई उस समय हुई है, जब पिछले सप्ताह ही दोनों देशों के बीच एक अहम समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भारत कतर से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) खरीदेगा। ये डील अगले 20 सालों के लिए हुई है और इसकी लागत 78 अरब डॉलर है। भारत की पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड (पीएलएल) कंपनी ने कतर की सरकारी कंपनी कतर एनर्जी के साथ ये करार किया है। इस समझौते के तहत कतर हर साल भारत को 7.5 मिलियन टन गैस निर्यात करेगा। इस गैस से भारत में बिजली, उर्वरक और सीएनजी बनाई जाएगी।

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