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कांग्रेस राज में हिमाचल दिवालिया! पहली बार बजट में कटौती और कर्ज 1 लाख करोड़ पार, IAS,IPS,IFS अधिकारियों को वेतन देने के पैसे नहीं

हिमाचल प्रदेश में सत्ता बदलने पर बीजेपी के सत्ता में आने पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी सरकारी कर्मचारियों और बिकाऊ लोगों को जमाकर सरकार के खिलाफ हंगामा करवाएंगे। कोई अक्ल का अंधा ये नहीं देख रहा कांग्रेस कितना नुकसान कर रही है। इस समय मजा आ रहा है और बीजेपी गवर्नमेंट बनने पर चिल्लाएंगे हमारे घर का चूल्हा नहीं जल रहा। जनता को उन आन्दोलनजीवियों से सावधान रहने की जरुरत है।  

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने राज्य को दिवालिया बना दिया है। वित्तीय कुप्रबंधन, मुफ्त की योजनाओं, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के चुनावी वादों (‘रेवड़ी कल्चर’) के कारण राज्य का खजाना खाली हो गया है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि सरकार को मंत्रियों और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है, जिसकी वजह से कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए कांग्रेस की सुक्खू सरकार तरह तरह के हथंकडे अपना रही है। अब सरकार ने राज्य में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और भारतीय वन सेवा (IFS) के काडर की स्वीकृत संख्या को कम करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का निर्णय लिया है, ताकि प्रशासनिक खर्चों और भारी भरकम प्रशासनिक तंत्र के बोझ को कम किया जा सके।

खर्च में कटौती का नया हथकंडा, कैडर कटौती का प्रस्ताव

आईएएस (IAS) पद: स्वीकृत संख्या 153 से घटाकर 130 करने का प्रस्ताव, (यानी 23 अधिकारियों की कमी)

आईएफएस (IFS) पद: स्वीकृत संख्या 118 से घटाकर 83 करने का प्रस्ताव, (यानी 35 अधिकारियों की कमी)

आईपीएस (IPS) पदों की संख्या में भी कटौती पर विचार, फिलहाल 96 IPS पद

सुक्खू ने बनाया अवश्यकता से अधिक अधिकारियों का बहाना 
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य सरकार के मुफ्त की योजनाओं में कटौती की जगह अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या में कमी करने का फैसला लिया है। उन्होंने दलील दी है कि IAS, IPS और IFS के बहुत अधिक पद हिमाचल प्रदेश में है। इतने अधिक अधिकारियों की हिमाचल प्रदेश को जरूरत नहीं है। हिमाचल प्रदेश में 153 IAS अफसर हैं। हमने IAS कैडर को 153 से 130 करने की कोशिश की है। मेरा विचार इसे 110 करना है लेकिन पहले 130 किया है। इससे सरकार के राजस्व खर्चे में 100-150 करोड़ की कमी आई है। बड़े कैडर को बनाए रखने पर राज्य को हर साल करीब 200 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुनने की इजाज़त देती रहेगी और उन्हें तुरंत जाने की मंजूरी भी देगी।

 

जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा प्रस्ताव
अधिकारियों के मुताबिक, अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या कम करने का एक औपचारिक प्रस्ताव जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। अभी 20 से ज्यादा आईएएस अधिकारी और 12 से ज्यादा आईपीएस और आईएफएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर हैं, जिनमें से कुछ राज्य में गैर संवर्ग पदों पर हैं। हिमाचल की सुक्खू सरकार ने केंद्र सरकार से अपील करने का फैसला किया है कि केंद्र सरकार राज्य को और ज्यादा केंद्रीय सेवा अधिकारी आवंटित न करे, क्योंकि अनुमान है कि हर अधिकारी पर सालाना खर्च 40 से 50 लाख रुपये के बीच होता है जिसमें वेतन, महंगाई भत्ता, उनसे जुड़े कर्मी और दूसरी सुविधाएं शामिल हैं।

नई भर्ती और नया काम नहीं, 30% संस्थानों को बंद करने का सुझाव
फरवरी 2026 में सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वित्त विभाग से एक प्रेजेंटेशन तैयार करने को कहा था। उस प्रेजेंटेशन में हिमाचल के खजाने की सारी स्थितियों को स्पष्ट करने के लिए कहा था। प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवीर के प्रजेंटेशन में कहा था कि कोई नई भर्ती की स्थिति में सरकार नहीं है। मौजूदा स्थिति में जो स्टाफ है, उसी का युक्तिकरण करना होगा, जो संस्थान हैं, उनमें से 30 फीसदी बंद किए जाएं, कोई भी नए काम शुरू करने की स्थिति में सरकार नहीं है। हिमाचल की स्थिति ये है कि नया पे-स्केल तो छोड़ दें, हम पे-रिवीजन का भी नहीं सोच सकते। एचआरटीसी को कोई सब्सिडी नहीं दे पाएंगे। पानी-बिजली के बिल चार्ज करने की सलाह है। एमआईएस की सब्सिडी भी जीरो करनी पड़ेगी।

अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का 20-30% छह महीने के लिए स्थगित  
वित्त विभाग द्वारा अप्रैल 2026 में जारी एक अधिसूचना के अनुसार, वित्तीय संसाधनों के कुशल प्रबंधन के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा छह महीने के लिए स्थगित कर दिया गया। ये कटौती 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगी। अधिसूचना के अनुसार, यह स्थगन मई 2026 से प्रभावी हुआ। मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिवों, प्रधान सचिवों, पुलिस महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, प्रधान मुख्य वन संरक्षक और अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के वेतन का तीस प्रतिशत स्थगित किया गया। इसके अलावा सचिवों, विभागाध्यक्षों, पुलिस महानिरीक्षकों, उप पुलिस महानिरीक्षकों, पुलिस अधीक्षकों, एसपी स्तर तक के पुलिस अधिकारियों, मुख्य वन संरक्षकों, वन संरक्षकों और जिला वन अधिकारी स्तर तक के अन्य वन अधिकारियों के वेतन का बीस प्रतिशत स्थगित कर दिया गया।

कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित, सोशल मीडिया में तंज 
हिमाचल प्रदेश में इस समय कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित है। यदि सारा डीए देना हो तो सरकार के खजाने में करीब दस हजार करोड़ रुपए की रकम इसी मद में चाहिए। गौरतलब है कि
केंद्र सरकार के कर्मचारी 60% डीए पा रहे हैं, जबकि हिमाचल के कर्मचारियों को 45% ही मिल रहा है। फिर कर्मचारी एक्ट खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीनियोरिटी से उपजे वित्तीय लाभ भी करीब-करीब इतने ही होंगे। यानी इन दो मदों में ही 20 हजार करोड़ रुपए चाहिए। यदि चरणबद्ध तरीके से भी भुगतान किया जाए तो भी सरकार को कुछ न कुछ अतिरिक्त इंतजाम करना होगा। वहीं हिमाचल सर्व अनुबंध कर्मचारी संघ ने 15 अगस्त,2026 से पहले सोशल मीडिया में पोस्ट करते हुए लिखा, ‘क्या 15 अगस्त को हिमाचल के कर्मचारियों को डीए मिल जाएगा? आप सबको कितनी उम्मीद है’ इसके जवाब में नसीब सैनी ने लिखा ‘ओपीएस मिल गई…डीए भूल जाओ’ 

15 अगस्त को भी कर्मचारियों के उम्मीदों पर फिरा पानी
15 अगस्त,2026 के आगमन से पहले ही सोशल मीडिया पर कर्मचारी ग्रुप्स में डीए व एरियर को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं थीं। कुछ को उम्मीद थी कि कम से कम तीन फीसदी की किश्त मिल जाएगी, लेकिन बहुत से लोग ये मान कर चल रहे थे कि डीए की घोषणा नहीं होगी। न्यू पेंशन स्कीम कर्मचारी महासंघ के नेता राजिंद्र मन्हास ने कर्मचारियों से सवाल किया था कि कितने साथियों को मेरी तरह लगता है कि डीए की घोषणा नहीं होगी? उसमें कमेंट बॉक्स में अधिकांश का मत यही था कि डीए मिलने के आसार न के बराबर हैं। जैसे ही 15 अगस्त को सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का संबोधन खत्म हुआ, सोशल मीडिया कर्मचारियों के तंज से भर गया।

खजाना खाली, डीए फ्रीज करने और OPS की जगह UPS का सुझाव
प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवरी 2026 के प्रेजेंटेशन में सभी आंकड़ों को स्पष्ट करते हुए राज्य सरकार को सलाह दी थी कि अभी स्थिति ऐसी है कि डीए फ्रीज करना होगा और एरियर की देनदारी संभव नहीं है। यही नहीं, ओपीएस की जगह यूपीएस का विकल्प देखने की बात भी देवेश कुमार ने कही थी। देवेश कुमार ने याद दिलाया कि ओपीएस जब लागू की थी तो हिमाचल को 1800 करोड़ रुपए के एडिशनल लोन की कटौती का सामना करना पड़ा था। देवेश कुमार ने प्रेजेंटेशन में बताया था कि कर्मचारियों व पेंशनर्स के लिए पिछले वेतन आयोग के एरियर का 8500 करोड़ रुपए बकाया है। इसके अलावा पांच हजार करोड़ रुपए का डीए व डीआर एरियर बकाया है, सरकार ये नहीं दे पाई है। वित्त सचिव ने इसी दौरान टिप्पणी की-सर, मैं यहां कहना चाहूंगा कि ये रकम हम दे भी नहीं पाएंगे। क्योंकि हमारे पास धन ही नहीं है। इसके साथ ही आगे भी डीए व डीआर देने की स्थिति में नहीं है। 

इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती 
फरवरी में प्रधान वित्त सचिव ने अपनी प्रेजेंटेशन में खजाने की दयनीय हालत का वर्णन किया और फिर मार्च महीने में सुक्खू सरकार के बजट में उसका असर दिख गया। हिमाचल के इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती की गई। गौरतलब है कि इस बार वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सीएम सुक्खू ने 54,928 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। जबकि पिछली बार वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 58,514 करोड़ का बजट था। इस हिसाब से ये अंतर 3586 करोड़ रुपये का था। यही नहीं, सीएम, कैबिनेट मिनिस्टर्स व अफसरों-कर्मियों की सेलेरी भी स्थगित (डेफर) की गई।

इतिहास में पहली बार कर्ज 1 लाख करोड़ के पार 
हिमाचल सरकार की बजट रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक हिमाचल प्रदेश की कुल देनदारियां 1 लाख 4 हजार 410 करोड़ रूपए तक पहुंच गई हैं, जो राज्य के इतिहास में पहली बार 1 लाख करोड़ के पार गई। पिछले वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा 96 हजार 522 करोड़ रूपए था, जिससे साफ है कि कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में राज्य का सार्वजनिक कर्ज भी बढ़कर 75 हजार 554 करोड़ रुपये हो गया है, जबकि एक साल पहले यह 70 हजार 369 करोड़ था। वर्ष 2024–25 के दौरान सरकार ने 26 हजार 622 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया और 18 हजार 168 करोड़ की अदायगी की, जिससे कुल कर्ज में शुद्ध वृद्धि दर्ज हुई। कैग (Comptroller and Auditor General of India) की रिपोर्ट के अनुसार कुल राजस्व का लगभग 79% केवल वेतन, पेंशन, और कर्ज के ब्याज के भुगतान में चला जाता है।

हिमाचल प्रदेश पर कैसे बढ़ा कर्ज का बोझ?

पुरानी पेंशन योजना (OPS) :  पुरानी पेंशन योजना (OPS) को पुनः लागू करने के कारण राज्य सरकार के बजट पर अतिरिक्त वार्षिक वित्तीय बोझ पड़ा है, जिससे प्रतिबद्ध देनदारियां बढ़ गई हैं। ओपीएस बहाल होने से राज्य के लगभग 1.36 लाख कर्मचारियों को लाभ मिला, लेकिन कैग (CAG) और रिजर्व बैंक ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में पेंशन का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। 

महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह : राज्य की लाखों महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने के वादे से सरकारी खजाने पर सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा। सीमित राजस्व संग्रह के कारण इस योजना को पूरी तरह लागू करने में सरकार को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

मुफ्त बिजली और पानी : राज्य में घरेलू उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली और ग्रामीण क्षेत्रों में मुफ्त पानी देने से राज्य बिजली बोर्ड (HPSEB) और जल शक्ति विभाग का घाटा काफी बढ़ गया। सब्सिडी का भुगतान समय पर न होने से इन बोर्डों की वित्तीय स्थिति चरमरा गई।

कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी:  कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी योजनाओं ने भी राज्य के बजट में गैर-उत्पादक व्यय (Non-Developmental Expenditure) को बढ़ाया।

वेतन, पेंशन और सब्सिडी पर बढ़ते खर्च :  राजस्व स्रोत सीमित होने के कारण, राज्य इन प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए उधार पर तेजी से निर्भर हो गया है। प्रदेश का सालाना वेतन और पेंशन का भुगतान लगभग 27,000 करोड़ रुपये है, जबकि अपने स्रोतों से कुल राजस्व करीब 18,000 करोड़ रुपये ही आता है।

आंतरिक आय के साधन सीमित : पर्यटन, जलविद्युत और कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण राज्य के आंतरिक आय के साधन सीमित हैं, जबकि कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों का दबाव लगातार बना हुआ है।

बढ़ता बजट घाटा (Budget Deficit) : हिमाचल सरकार की सलाना आय – 42 हजार करोड़ रुपये, सलाना खर्च – 48 हजार करोड़ रुपये और हर साल 6000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट घाटा।

हिमाचल में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का खटाखट मॉडल बना खटारा मॉडल


हिमाचल प्रदेश का आर्थिक संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। इसको ठीक करने के गंभीर प्रयास की जगह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सिर्फ केंद्र सरकार पर ठीकरा फोड़ कर अपने जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहे हैं। बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया में लिखा कि हिमाचल प्रदेश में राहुल गांधी जी व प्रियंका गांधी जी का खटाखट मॉडल अब खटारा मॉडल बन चुका है।

हिमाचल में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राज्य सरकार की तरफ़ से की गई सेस के माध्यम से बढ़ोत्तरी आम आदमी की जेब पर हमला है। जब से कांग्रेस सरकार आई है, जनता की जेब पर लगातार अतिरिक्त भार ही डाल रही है। कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के महज दो महीनों में ही वैट में लगातार वृद्धि की गई, डीजल पर वैट बढ़ाकर 10.40 रुपए कर दिया गया… उसके बाद अतिरिक्त 5 रुपए का सेस भी लगाया गया।

ये हिमाचल के इतिहास की सबसे विफल सरकार है जिसने प्रदेश के हर वर्ग को सिर्फ़ ठगने और जनता पर महंगाई का बोझ डालने का काम किया है। पहले पेट्रोल, डीजल, बस किराए व सीमेंट के दामों में बढ़ोत्तरी के बाद अब फिर एक बार पेट्रोल डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी करके हिमाचलवासियों की परेशानी बढ़ाने व उन पर आर्थिक बोझ लादकर उनका मासिक बजट खराब कर दिया है। आज हिमाचल में ट्रक ड्राइवर, किसान, व्यापारी व आम आदमी पेट्रोल और डीजल की इस बढ़ी कीमत से कराह रहे हैं, मगर यह सरकार बेसुधी की चादर ताने सो रही है।

कांग्रेस और AAP की पालतू मीडिया, राहुल और सोनिया के गुणगान पर मिलते थे पद्म श्री अवार्ड


2014 में जब से बीजेपी सरकार आयी है तब से कांग्रेस की पालतू मीडिया ने गोदी-मीडिया का भ्रम फैलाकर जनता को गुमराह कर रखा है जबकि हकीकत यह है कि मीडिया आज भी कांग्रेस की तर्ज पर काम कर रही है। अगर मीडिया गोदी-मीडिया होती तो राहुल गाँधी की दोहरी नागरिकता और दो नामों - राहुल गाँधी और राहुल विन्ची -पर शोर मचा रही होती। लेकिन सब मुंह में दही जमाए बैठी है। अगर स्थिति विपरीत होती देखो कितना शोर मच रहा होता। सच्चाई यह है कि विपक्ष ही ऐसे बेसिर पैर के मुद्दे उठाता रहता है जो खुद ही विस्फोट हो जाते हैं। और मीडिया अपनी TRP के चक्कर उसे भुनाता है।    

हिंदी के महान कवि दुष्यंत कुमार की कविता की दो पंक्तियां हैं, “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।” इन पंक्तियों से प्रेरणा लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लोकसभा में भाषण देने आते हैं, लेकिन उनका मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना होता है, इससे अभी तक ना सूरत बदली और ना ही सीरत। राहुल गांधी ने 29 जुलाई, 2026 को लोकसभा में पेपर लीक से जुड़ा ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा के दौरान 50 मिनट तक भाषण दिया। इस दौरान राहुल गांधी ने अपनी परंपरा को जारी रखा और इडियट जैसे असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया, जिसको लेकर जमकर हंगामा हुआ। लेकिन देश की पालतू मीडिया इसे राहुल के नए अवतार के रूप में पेश कर रही है।

 राहुल गांधी के बचाव में उतरी पालतू मीडिया

अब आपको दिखाते हैं, किस तरह पालतू मीडिया राहुल गांधी के असंसदीय भाषा का बचाव कर रही है। उनके बचाव में नए-नए तथ्य गढ़ रही है। क्योंकि उन्हें राहुल गांधी को देखकर पुराने दिन याद आने लगते हैं, जब सत्ता की मलाई चाटने, पुरस्कार पाने, जमीन और फ्लैट पाने, विदेश यात्रा पर जाने, मंत्रिमंडल में अपने पसंद के लोगों को मंत्री बनाने का मौका मिलता था, जो मोदी सरकार में बंद हो गया है। इससे परेशान पत्रकार राहुल गांधी का कवच बनकर सामने आते हैं और नमक का हक अदा करते हैं। ऐसे में ही एक तथाकथित राजनीतिक विश्लेषक कुमार आशुतोष हैं, जो पहले पत्रकार से राजनेता और राजनेता से फिर पत्रकार बनकर गोदी मीडिया पर ज्ञान देते हैं। लेकिन पालतू पत्रकार बनकर राहुल गांधी का बचाव करने का कोई मौका नहीं चुकते हैं।  
कांग्रेस राज में पालतू पत्रकारों को मिला पद्म श्री पुरस्कार 
पालतू मीडिया के पत्रकार अपने निजी स्वार्थ के लिए ना सिर्फ पत्रकारिता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, बल्कि दूसरों पत्रकारों की जान का दुश्मन बन गए हैं। ऐसे पत्रकार अपनी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता खो चुके हैं। इसलिए दूसरों की विश्वसनीयता खत्म करना चाहते हैं। पालतू मीडिया के पत्रकार गांधी परिवार को छोड़कर किसी दूसरे की तारीफ नहीं सुनना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि उनकी तरह गांधी परिवार की गुलामी सभी पत्रकार करें। क्योंकि कांग्रेस सरकार से मिली सुविधाओं की कीमत पर अपनी निष्ठा बेच दी और पालतू पत्रकार बन गए। पालतू पत्रकारोंं की नजरों में नेहरू-गांधी परिवार इस देश का पालनहार है। नेहरू-गांधी परिवार का वारिस ही इस देश पर राज करने के लिए पैदा हुए हैं। कांग्रेस ने भी अपने पालतू पत्रकारों का पूरा ख्याल रखा। उनकी निष्ठा को देखते हुए कांग्रेस राज में पद्म श्री पुरस्कार से समानित किया था। 
पालतू पत्रकारों द्वारा गुणगान और महिमामंडन
2 अक्टूबर, 2022 को कर्नाटक के मैसूर में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने बारिश के बीच जनसभा को संबोधित किया। राजा बारिश में भीगकर भाषण क्या दिया, मानो उसने 2024 की बड़ी जंग जीत ली हो। राजा का शौर्य देखकर पालतू पत्रकार काफी खुश नजर आए। उन्होंने राहुल की शान में किस तरह कसीदे पढ़े उसे आप देख सकते हैं।  
AAP की पालतू मीडिया

कांग्रेस का ‘खटाखट’ वसूली मॉडल EXPOSED: पहले मुफ्त का झांसा, अब जनता की जेब पर डाका


चुनाव के समय मंचों से गूंजता वो ‘खटाखट-खटाखट’ का नारा आपको याद है? राहुल गांधी से लेकर कांग्रेस के तमाम दिग्गजों ने वादा किया था कि सरकार बनते ही महिलाओं और युवाओं के खातों में ‘खटाखट’ पैसे आएंगे। लेकिन चुनाव बीतते ही तस्वीर 180 डिग्री बदल गई है। अब पैसे जनता के खाते में आ नहीं रहे, बल्कि टैक्स, सेस और कमीशन के नाम पर जनता की जेब से ‘खटाखट’ काटे जा रहे हैं। राहुल गांधी के उन चुनावी वादों का बोझ अब आम आदमी की कमर तोड़ रहा है। हिमाचल की वादियों से लेकर कर्नाटक के गलियारों तक, कांग्रेस सरकारों का यह पैटर्न बेनकाब हो चुका है: पहले लोकलुभावन वादों से वोट बटोरना, और फिर सत्ता मिलते ही ‘वसूली अभियान’ चलाना!

कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश में गारंटियों की ऐसी झड़ी लगाई थी कि लगा था राज्य में विकास की नदियां बहेंगी। लेकिन हुआ क्या? 1 अप्रैल 2026 से एंट्री परमिट की दरों में ऐसी खटाखट बढ़ोतरी की गई कि पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय लोगों के भी होश उड़ गए। अब पर्यटकों को अपनी गाड़ियों के लिए 170 रुपये तक का मोटा शुल्क देना होगा। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि इस फैसले से हिमाचल के पर्यटन उद्योग की कमर टूट जाएगी। हैरानी की बात यह है कि जो सरकार चुनाव से पहले रेवड़ियां बांट रही थी, वो अब ‘खजाना खाली है’ का राग अलाप रही है। विपक्ष का सवाल सीधा है- क्या चुनावी रैलियों में गारंटियां बांटते वक्त खजाने का आकलन करना भूल गए थे, या जनता को ठगने की यह सोची-समझी रणनीति थी?

हिमाचल में तो सिर्फ टैक्स बढ़ा है, लेकिन कर्नाटक में तो भ्रष्टाचार का ‘रेट कार्ड’ ही सार्वजनिक हो गया है। राज्य के मंत्री सतीश जारकीहोली के एक शर्मनाक बयान ने पूरी सियासत में आग लगा दी है। उन्होंने सरेआम स्वीकार किया कि ‘सरकारी कामों में कमीशन पहले भी था, अब भी है और आगे भी रहेगा।’ जब मंत्री खुद भ्रष्टाचार को सिस्टम का हिस्सा मान लें, तो समझ लीजिए कि विकास की फाइलें बिना सेवा-शुल्क के नहीं हिलेंगी। कर्नाटक के ठेकेदार अब हजारों करोड़ के बकाया भुगतान के लिए सड़कों पर हैं। आरोप है कि बिना 40 प्रतिशत कमीशन दिए सरकारी बिल पास ही नहीं होते।

विपक्ष अब इसे राहुल गांधी का असली डेवलपमेंट मॉडल बता रहा है, जहां राज्य के विकास के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन गारंटी के नाम पर वसूली और कमीशन का खेल जोरों पर है। पेट्रोल, डीजल और बिजली के बढ़ते दाम इस खटाखट मॉडल की कड़वी सच्चाई हैं।

कांग्रेस इसे राजस्व जुटाना कह सकती है, लेकिन जनता इसे चुनावी ठगी मान रही है। ऐसे में आज बहस सिर्फ टैक्स या कमीशन की नहीं, बल्कि उस भरोसे की है जो चुनावी विज्ञापनों में बेचा गया था। जब जेब से पेट्रोल, बिजली और एंट्री टैक्स के नाम पर पैसे कट रहे हैं, तब आम आदमी को समझ आ रहा है कि राजनीति में मुफ्त का खाना सबसे महंगा पड़ता है।

आधार को लेकर कांग्रेस का दोहरापन और राजनीतिक अवसरवाद फिर से उजागर; 2022 में सुप्रीम कोर्ट में आधार को नागरिकता का प्रमाण नहीं मानने वाले अब 2025 में प्रमाण मान रहे हैं

कांग्रेस की स्थापना से लेकर आज तक इसके इतिहास को देखा जाये तो (1) मुस्लिम पक्ष की तरफ ज्यादा झुकाओ, (2) दोगलापन और (3) जनता को गुमराह करना आदि आदि क्योकि पार्टी की स्थापना किसी भारतीय ने नहीं ब्रिटिश मूल के नागरिक ने की थी और उसका उद्देश्य भारत को आज़ादी नहीं बल्कि स्वतंत्रता संग्राम से जनता का ध्यान भटकाना था। अगर ये उद्देश्य नहीं होता तो ब्रिटिश सरकार ने देशद्रोह के इल्जाम में जेल में बंद कर दिया होता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ जिसका मतलब समझा जा सकता है, कुछ कहने की जरुरत नहीं और ना ही किसी तर्क वितर्क की। हाथ कंगन को आरसी क्या पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या। 

भारत को आज़ादी गाँधी के 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड़क बिना ढाल" से नहीं नेताजी सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु आदि महान क्रांतिकारियों के कारण मिली थी। कांग्रेस के सुरमा भोपाली कहो या चौधरी बने फिर रहे महात्मा गाँधी ने तो ब्रिटिश सरकार से नेताजी को ब्रिटिश सरकार के हवाले करने का समझौता किया था। गाँधी ने किस आधार पर समझौते पर हस्ताक्षर किये थे?
(देखिए नीचे कटिंग) 
मेरे पिताश्री मगन बिहारी लाल निगम बताते थे कि जब आज़ादी की लड़ाई चरम पर थी गाँधी ने नमक आंदोलन से जनता को भटकाने का काम ही नहीं किया, उसका असर यह हुआ की टके सेर बिकने वाला नमक 1 पैसे सेर हो गया। नेताजी के लोहे को ब्रिटिश सरकार ने भी स्वीकार किया है। देखिए अंग्रेजी अख़बार The Tribune(12 फरवरी 2006) में प्रकाशित समाचार।(देखिए पृष्ठ ऊपर) भारत की आज़ादी में जिन क्रांतिकारियों ने अपना जीवन ही नहीं सबकुछ देश पर न्योछावर कर दिया कांग्रेस ने कभी उनका गुणगान नहीं किया विपरीत इसके जो गुप्त रूप ब्रिटिश सरकार से मिले हुए थे उनको आज़ादी का सुरमा भोपाली बना जनता के आगे परोस दिया। इतना ही नहीं जब जलियावालां का उधम सिंह द्वारा जनरल डायर को मार बदला लेने पर बताओ क़ी गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से क्या कहा था?
LoP राहुल से कोई पूछे कि अगर वीर दामोदर सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से माफ़ी मांगी थी फिर उनको काला पानी की सजा क्यों हुई थी? इस LoP को नहीं मालूम काला पानी की सजा कितनी कठोर होती है। दूसरे यह कि किसी भी पत्र के अंत में Yours Faithfully, Very Truely Yours, Yours Obedient या फिर Sincerely Yours आदि ही लिखा जाता है। 
कांग्रेस का दोहरापन एक बार फिर सामने आया है। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) सर्वे में आधार को शामिल करने की कांग्रेस की मांग एक बार फिर राजनीतिक छलावे और अवसरवाद का जीता-जागता उदाहरण बन चुकी है। कुछ ही समय पहले, 2021 में कांग्रेस ने जोर-शोर से कहा था कि आधार केवल निवास प्रमाण है, नागरिकता का प्रमाण नहीं। उन्होंने आधार को वोटर आईडी से जोड़ना अवैध और अलोकतांत्रिक करार दिया था। कांग्रेस ने यह भी चेतावनी दी थी कि इससे गैर-नागरिकों को वोट देने का अधिकार मिल सकता है, जो लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है। साथ ही निजता के अधिकार का उल्लंघन होने की चिंता भी जताई थी। लेकिन अब, 2025 आते-आते कांग्रेस वही मांग कर रही है, जिसे उसने पहले खारिज किया था। पार्टी चुनाव आयोग से आधार को SIR सर्वे में शामिल करने की जोरदार मांग कर रही है।

यह साफ-साफ दिखाता है कि कांग्रेस की विचारधारा और नीतियां स्थिर नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए रोजाना बदलती रहती हैं। 2021 में जो आधार लिंकिंग को संविधान विरोधी बताती थी, वही आज इसे चुनाव सुधार का जरिया बता रही है। कांग्रेस का यह दोगलापन और राजनीतिक अवसरवाद इस बात का प्रमाण है कि पार्टी नीति नहीं, केवल अपने राजनीतिक फायदे के लिए काम करती है। जब विरोध करना फायदेमंद था, तब आधार को अवैध बताया, और जब समर्थन से लाभ दिखा, तब उसी आधार को चुनाव सुधार का हथियार बना डाला। सोशल मीडिया पर कांग्रेस की इस दोहरी नीति को लेकर तीखी आलोचना हो रही है। लोग इसे कांग्रेस के दोगलेपन और राजनीतिक छलावे के रूप में देख रहे हैं। आप भी देखिए कांग्रेस के इस दोहरे रवैये को…

2022: कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट गई थी कि आधार कार्ड और वोटर पहचान पत्र को लिंक न किया जाए क्योंकि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं है।

2025: कांग्रेस कह रही है कि आधार कार्ड से नागरिकता साबित नहीं होगी तो कैसे होगी। आधार ही नागरिकता का प्रमाण है।

कोई मतलब है इस बात का? pic.twitter.com/crWyzj1AJR

— Dilip Mandal (@Profdilipmandal) July 11, 2025


प्रधानमंत्री बनने की होड़ को नीतीश की मुहिम को केजरीवाल और कांग्रेस का झटका

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर्दे के पीछे से 2024 के लिए सियासी बिसात बिछाने की कोशिश कर रहे हैं। एनडीए से अलग होने के बाद विपक्षी दालों का ‘मुख्य मोर्चा’ बनने के लिए नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं। इस बीच मीडिया में खबर आई कि वे उत्तर प्रदेश के फूलपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन कांग्रेस और अरविंद केजरीवाल ने नीतीश कुमार की सियासी चाल को जोरदार झटका दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ऐसा बयान दिया है, जिससे नीतीश के अरमानों पर पानी फिर सकता है। उनके बयान से लगता है कि नीतीश की पलटीमार छवि को देखते हुए कांग्रेस उन पर भरोसा नहीं करती है। उन्होंने कांग्रेस से अलग मोर्चा बनाने वालों पर हवाई किला बनाने और पीठ में खंजर भोंकने का तंज कसा।

‘हवाई किला’ बना रहे नीतीश कुमार

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कोलकाता गय थे। जहां उन्होंने बिना किसी का नाम लिए कहा कि कांग्रेस के बिना फ्रंट बनाने के योजना बनाने वाले केवल ‘हवाई किला’ बना रहे हैं। बहुत सारे क्षेत्रीय दल पहले भी अपने स्वार्थ के लिए कांग्रेस की पीठ में खंजर भोंक चुके हैं। वे कांग्रेस को पंचिंग बैग समझ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोई भी गैरभाजपाई गठबंधन बिना कांग्रेस के पांच साल तक स्थायी सरकार नहीं दे सकता है। कांग्रेस को अलग करके कभी विपक्षी एकता संभव नहीं है।

कांग्रेस के बिना 5 साल सरकार चलाने की बात सोचना मूर्खता- जयराम

जयराम रमेश ने कहा कि गठबंधन का मतलब होता है कि कुछ पाने के लिए कुछ देना भी पड़ता है। अब तक सबने कांग्रेस का फायदा उठाया है। फायदा लेने के बाद वे कांग्रेस पर ही बरसने लगते हैं। अब यह सब रुकना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय राजनीति में कांग्रेस एक बड़ा हाथी है और कोई इसे किनारे नहीं कर सकता। अगर कोई गैर-भाजपा संगठन सोचता है कि बिना कांग्रेस कोई गठबंधन पांच साल के लिए एक स्थिर सरकार प्रदान कर सकता है, तो वह मूर्ख है। कांग्रेस के बिना कोई विपक्षी एकता कभी नहीं हो सकती।

‘भारत जोड़ो यात्रा’ के जरिए विपक्ष की अगुवाई की दावेदारी

विपक्ष दालों के नेतृत्व को लेकर नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, के चंद्रशेखर राव, अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस के बीच जबरदस्त होड़ मची हुई है। लेकिन कांग्रेस अपने अतीत को देखते हुए इस होड़ में खुद को आगे रखना चाहती है। इसलिए वो 7 सितंबर से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ कर रही है। यह यात्रा केवल कांग्रेस की है। कांग्रेस अपने मजबूत उपस्थिति वाले क्षेत्रों में यात्रा कर अधिक से अधिक सीटें हासिल करने पर जोर दे रही है, ताकि सभी दलों की अगवाई को लेकर अपनी दावेदारी को और मजबूत कर सके। इस यात्रा से दूसरे दलों को दूर रखकर कांग्रेस ने जता दिया है कि वो किसी भी कीमत पर नेतृत्व की दावेदारी से पीछे नहीं हट सकती है। इससे नीतीश कुमार की मुहिम को झठका लग सकता है।

कांग्रेस की जगह खुद को आगे रखने की कोशिश में नीतीश

‘मुख्य मोर्च’ बनाने की कवायद में जुटे नीतीश कुमार कांग्रेस की जगह खुद को आगे रखने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसके लिए वो बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटों पर अपनी नजर गड़ाये हुए हैं, ताकि इन तीन राज्यों से अधिक से अधिक सीटें लाकर अपनी दावेदारी पेश कर सके। जेडयू के नेता भी नीतीश कुमार को 2024 के लिए पीएम मैटेरियल बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। वहीं आम आदमी पार्टी और टीएमसी ने पहले भी कांग्रेस को मुख्य भूमिका में रखने पर ऐतराज जताया था। इन दोनों पार्टियों ने ही कई मुद्दों का हवाला देकर कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार नहीं किया। 

केजरीवाल ने विपक्षी एकता की जगह अलापा ‘एकला चलो’ का राग

उधर दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में 18 सितंबर, 2022 को आम आदमी पार्टी ने पहला राष्ट्रीय जनप्रतिनिधि सम्मेलन आयोजित किया। इसमें केजरीवाल ने कहा कि उनका फिलहाल बीजेपी को हराने के लिए बने विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की कोई योजना नहीं है। इसके बजाय केजरीवाल ने पार्टी सदस्यों से आप के ‘मेक इंडिया नंबर 1’ अभियान के जरिए ‘भारत के 130 करोड़ नागरिकों का गठबंधन’ बनाने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा।

केजरीवाल ने नीतीश के अरमानों पर फेरा पानी

आम आदमी पार्टी कांग्रेस की जगह बीजेपी के खिलाफ मुख्य विकल्प के तौर पर अपनी जमीन तैयार कर रही है और पार्टी नेताओं की ओर से भी बार- बार यह कहा जा रहा है कि वो ही विकल्प है। केजरीवाल ने एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा, “क्या मुझे कांग्रेस को कमजोर करने की जरूरत है? क्या राहुल गांधी पर्याप्त नहीं हैं।” इस तरह केजरीवाल और कांग्रेस ने अपना स्टैंड क्लियर कर नीतीश कुमार के अरमानों पर पानी फेरने का संकेत दे दिया है।