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बेटे की सरकार में तिरुपति की रसोई में ‘बीफ की घुसपैठ’, कॉन्ग्रेस पिता के शासन में इसी मंदिर में क्रॉस वाले स्तंभ पर हुआ विवाद: तब YSR, अब जगनमोहन

तिरुपति मंदिर में जगन मोहन और उनके पिता YSR के राज के दौरान ईसाई दखल को लेकर विवाद हुआ है (चित्र साभार: NDTV & DR.YSRAP/FB)
आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में प्रसाद के लड्डू में पशुओं की चर्बी और मछली का तेल पाए जाने का विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। हिन्दुओं की आस्था को चोट पहुँचाने वाली यह मिलावट पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी के राज में होने का आरोप लगाया गया है। लड्डू में पशु चर्बी और मछली का तेल मिलाए जाने की बात की पुष्टि लैब रिपोर्ट से भी हो गई है। इसके बाद जगन मोहन रेड्डी और उनके समय में तिरुपति मंदिर का प्रशासन करने वाले तिरुपति देवस्थानम बोर्ड से जुड़े लोग घेरे में हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने इस बीच इन सभी रिपोर्टों को खारिज करते हुए अपना बचाव किया है। उन्होंने ऐसी किसी भी गड़बड़ी से इनकार किया है। उन्होंने कहा, “लड्डुओं के घी के लिए टेंडर प्रक्रिया हर छह महीने में होती है, और मानदंड कई दशकों से नहीं बदले हैं। टेंडर डालने वालों को NBL प्रमाणपत्र और गुणवत्ता का प्रमाणपत्र देना होता है। TTD घी से नमूने लेकर प्रमाणित होने वालों को ही टेंडर देता है। TDP धार्मिक मामले का राजनीतिकरण कर रही है। हमने अपने शासनकाल में 18 बार कई चीजों को अस्वीकार किया था।”

जगन अब कुछ भी कहें, यह मामला थमता नहीं दिख रहा है। इससे पहले भी तिरुपति मंदिर के बारे में हुए विवादों ने हिन्दुओं को झकझोर कर रख दिया था। तब इस हिन्दू मंदिर में ईसाई परम्परा घुसाने का आरोप लगाया गया था। जब यह आरोप लगा था तब जगन मोहन रेड्डी के पिता YS राजशेखर रेड्डी राज्य के मुखिया थे।

यह विवाद 2007 में हुआ था। तब भाजपा समेत हिन्दू संगठनों ने आरोप लगाया था कि TTD ने मंदिर के एक उत्सव के लिए जिन स्तम्भ का ऑर्डर दिया है, वह ईसाइयों के लिए पवित्र क्रॉस जैसे दिखते हैं। 2007 में होने वाले वार्षिक ब्रम्होत्सव के लिए TTD ने 250 स्तम्भ बनाने का ऑर्डर दिया था।

यह ऑर्डर बेंगलुरु की एक कम्पनी का को दिया गया था। यह स्तम्भ महोत्सव के दौरान सौन्दर्य के काम में लगाए जाने थे। इनका निर्माण प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से होना था और इन पर नक्काशी की की जानी थी। हालाँकि, जब इन स्तम्भों का एक नमूना बन कर तिरुपति पहुँचा तो लोगों के कान खड़े हो गए।

भाजपा समेत कई हिन्दू संगठनों ने आरोप लगाया कि इनकी बनावट ईसाई क्रॉस जैसी लगती है। हिन्दुओं ने कथित तौर पर क्रॉस जैसे दिखने वाले स्तम्भ को तोड़ भी दिया था। हालाँकि, TTD में YSR की सरकार द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारी इस डिजाइन का बचाव करते रहे थे।

अधिकारियों ने इस दौरान दावा किया था कि यह स्तम्भ मंदिर की डिजाइन से मिलते हुए बनाए गए हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री YSR के ईसाई होने के कारण यह विरोध और तेज हो गया था। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने आरोप लगाया था कि तिरुपति के आसपास लगातार ईसाई दखल बढ़ रहा है।

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YSR 2004 से 2009 के बीच राज्य के मुख्यमंत्री रहे थे और उनकी 2009 में एक विमान हादसे में मौत हो गई थी। उनके बेटे जगन ने इसके बाद उनकी राजनीति को आगे बढाते हुए अपनी पार्टी बनाई और 2019 में मुख्यमंत्री बने थे। उनके कायर्काल में भी तिरुपति में ईसाई को चेयरमैन बनाने का विवाद हुआ था।

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                         तिरुपति मंदिर में हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ (फोटो साभार: leonardo.ai)
तिरुपति बालाजी मंदिर में प्रसाद की शुद्धता से छेड़छाड़ का मामला कोई साधारण मामला नहीं है। सामने आई रिपोर्ट बताती है कि जो प्रसाद भगवान वेंकटेश्वर को चढ़ता था उसमें पिछले कुछ समय से जानवर की चर्बी वाला घी इस्तेमाल होता था। मामला गरमाया तो घी की जाँच रिपोर्ट सामने आई और ये पता चला कि घी में मछली का तेल, गोमांस और सूअर की चर्बी सब डली हुई थी।

समूचा देश इस रिपोर्ट को देख सन्न रह गया। किसी को उम्मीद नहीं थी कि इतने बड़ा आस्था का केंद्र तिरुपति मंदिर साजिश का शिकार होगा। सवाल उठने शुरू हुए, लोगों ने विरोध करना शुरू किया। लेकिन इन सबके बीच एक गैंग और एक्टिव हुई- लिबरल, वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की।


कुछ ने तो खुलेआम खुशी जताई कि आखिरकार हिंदुओं ने बीफ का सेवन कर ही लिया, लेकिन वहीं दूसरी कुछ लोग तर्क देते दिखे कि जो हो गया वो हो गया अब मामले पर आगे नहीं बोला जाना चाहिए क्योंकि ये कोई बड़ी बात नहीं है। उनके मुताबिक कई मंदिरों में घटिया क्वालिटी के घी का प्रयोग होता है और तमाम हिंदू मांसाहारी भी हैं तो इसलिए इस खुलासे से इतना फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

बड़ी चालाकी से इस मामले को हिंदुओं के खान-पान से जोड़कर हल्का दिखाने का प्रयास हो रहा है जबकि विवाद खान-पान का नहीं आस्था और विश्वास का है।

भारत में विभिन्न वर्ग के लोग रहते हैं। सबका अपना खान-पान है। कोई शाकाहारी है कोई मांसाहारी। हिंदू भी ऐसे ही हैं। इनमें कुछ लोग हैं जो प्याज लहसुन को भी हाथ नहीं लगाते, लेकिन वही कुछ हैं जो नॉनवेज चाव से खाते हैं। अब खान-पान के हिसाब से इनकी तुलना की जाए तो इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है, लेकिन आस्था की बात आते ही ये एक होते हैं।

हिंदू धर्म में गोमांस वर्जित है और सनातन मानने वाले इससे पूरा परहेज करते हैं…। फिर आखिर किस तरीके से ये कहा जा सकता है कि जो मांसाहारी हैं वो इस मुद्दे का बवाल न बनाएँ। खान-पान निजी मामला हो सकता है लेकिन उन्हें धोखे में रखकर ऐसी चीजें उन्हें खिलाना कहाँ तक उचित होता है?

घर में भगवान की पूजा करते समय प्रयास किए जाते हैं कि भगवान को लगने वाला प्रसाद शुद्ध तरीके से निर्मित हो, फिर इतने बड़े मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद के साथ ऐसा खिलवाड़ बर्दाश्त योग्य कैसे योग्य हो सकता है।

इतनी बड़ी घटना के बाद भी हिंदू शांत हैं। उनके लिए शायद विरोध का अर्थ केवल सोशल मीडिया पोस्ट करना है। यदि ज्यादा गंभीर मामला है तो धड़ाधड़ पोस्ट करते हैं और अगर छोटा-मोटा मामला है तो एक दो ट्वीट के बाद भूल जाते हैं। लेकिन क्यायही मखौल अगर किसी अन्य मजहब का उड़ता तो क्या आपको लगता है वो इस प्रकार नाराजगी व्यक्त करते…।

ब्रिटिश भी नहीं खिला पाए थे गोमांस

एक समय ऐसा भी था जब गोमांस के सहारे ब्रिटिशों ने भी हिंदुओं की आस्था भंग करनी चाही थी। हालाँकि उस समय गुलाम देश में होते हुए हिंदुओं का विरोध जमीनी था। नतीजा ये हुआ कि भारतीय हिंदुओं ने ब्रिटिशों के दिए गेहूँ, आटे, रोटी किसी चीज को हाथ लगाना बंद कर दिया। घी में जानवरों की चर्बी की बात आई, दवाओं में गाय और सूअर के मांस के मिलावट की…। हिंदुओं ने सब छोड़ दिया।
कथिततौर पर ये सारी अफवाहें थीं, लेकिन उस समय में भी हिंदुओं ने इनका बहिष्कार करने से परहेज नहीं किया था और आखिर में जब ब्रिटिशों ने गोमांस वाली कारतूस उनके हाथ में थमानी चाही थी तो हिंदू उनके विरुद्ध इतनी मजबूती से खड़े हुए थे कि आज हिंदुओं के उसी विरोध को 1857 का विद्रोह भी कहा जाता है। सोचकर देखिए, जिन हिंदुओं ने एक भनक लगने पर अपने धर्म के लिए अपनी मूलभूत जरूरतों को त्याग दिया उनके लिए धर्म के साथ होने खिलवाड़ कितनी बड़ी बात होगी।

क्या दक्षिण से उठेगी फिर हिंदुत्व की लहर

इस घटना के बाद आज भले ही देश के अन्य हिस्सों में हिंदुओं का आक्रोश न नजर आ रहा हो, लेकिन दक्षिण में सनातन धर्म रक्षा बोर्ड को लागू करने की माँग अब जोरों पर हैं। खुद डिप्टी सीएम पवन कल्याण ने इस बोर्ड की माँग करते हुए हिंदुओं को एकजुट होने की अपील की है जिसके बाद उम्मीद की जा रही है कि शायद तिरुपति की इस घटना के बाद हिंदू के जागृत होने की लहर दक्षिण से ही उठेगी ठीक वैसे जैसे 1200साल पहले हुआ था।
अवलोकन करें : -
8वीं सदी में जब भारत भूमि पर सनातन पर खतरा धर्म क्षीण होने लगा था, हिंदू पथ से भ्रमित होने लगे थे तब धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आदि शंकराचार्य अपनी यात्रा पर निकले। उन्होंने रणनीति बनाई और विभिन्न धर्म केंद्रों की यात्रा के दौरान उपस्थित धर्म गुरुओं को तर्क और शास्त्रार्थ की चुनौती देते रहे। यह आदि शंकराचार्य का चमत्कार ही था कि पूरे भारतवर्ष में उन्हें कोई भी नहीं हरा पाया। धीरे-धीरे धर्म छोड़कर गए धर्म गुरू वापस सनातन में लौटने लगे। उनके द्वारा स्थापित किए गए चार मठ (वर्धन पुरी मठ (जगन्नाथ पुरी), श्रंगेरी पीठ (रामेश्वरम्), शारदा मठ (द्वारिका) और ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ धाम)) ही हैं जिन्हें आज चार धाम के नाम से जाना जाता है।