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गले की हड्डी बना तालिबान ; ‘F*ck जो बायडेन’ के नारों से गूंजा खचाखच भरा स्टेडियम

अफगानिस्तान की सत्ता पर जिस तरह से तालिबान काबिज हुआ और जिन हालातों में अमेरिकी सेना ने वहाँ से पलायन किया उसकी वजह से जो बायडेन निशाने पर हैं। घर में ही अमेरिकी राष्ट्रपति का लगातार विरोध हो रहा है और उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन गिरती जा रही है। सार्वजनिक तौर पर विरोधों के बाद अब ‘f*ck जो बायडेन’ के नारे भी सुनाई पड़ रहे हैं।

कई कॉलेज फुटबॉल मैच के दौरान स्टेडियम में इस तरह के नारे सुने गए हैं। इसके अलावा इसे कई अन्य जगहों पर भी इसी तरह के नारों को सुना गया।

सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई है जिसमें लोग खुद या दूसरे इस तरह के नारे लगाते दिख रहे हैं। अपलोड किए गए वीडियो में से बहुत सारे कॉलेज फ़ुटबॉल मैचों के दौरान कैप्चर किए गए थे।

वीडियो में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि बहुत ही कम समय में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन की देश में लोकप्रियता में किस हद तक गिरावट आई है।

अफगानिस्तान से वापसी के बीच बायडेन की अप्रूवल रेटिंग में भारी गिरावट आई है। तालिबान के सत्ता में वापस आने से सैकड़ों अमेरिकी अफगानिस्तान में फँसे रह गए हैं। इसके अलावा अमेरिकी करदाताओं के पैसे से बने अरबों के हथियार और उपकरण भी अफगानिस्तान में छोड़ने पड़े हैं जो अब तालिबान के कब्जे में हैं।

इसी को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेनन की कड़ी आलोचना की जा रही है। इतना ही नहीं उनके राजनीतिक विरोधियों ने तो उनका इस्तीफा माँगना भी शुरू कर दिया है। यूएसए टुडे के मुताबिक, अगस्त के आखिरी हफ्ते में बायडेन की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 41 फीसदी पर आ गई थी, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। जबकि, पिछले सप्ताह तक अधिकतर सर्वे में राष्ट्रपति जो बायडेन की अप्रूवल रेटिंग को 50 फीसदी से ऊपर दिखाया गया था।

हालाँकि, सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि 87 प्रतिशत डेमोक्रेट का अभी भी उन पर भरोसा कायम है। लेकिन तटस्थ लोगों में से केवल 32 प्रतिशत का मानना है कि बायडेन का काम संतोषजनक है।

तालिबानी कहीं का भी हो, कठोरता ही उसका एकमात्र उपचार है

डॉ राकेश कुमार आर्य, संपादक, उगता भारत

अफगानिस्तान में अजेय बने पंजशीर घाटी में कमजोर पड़ने पर अब तालिबान ने भी वार्ता की राह पर चलने का फैसला लिया है। इस कड़ी में तालिबान ने अपने 40 सदस्यों के एक प्रतिनिधमंडल को समझौते के लिए पंजशीर घाटी की सेनाओं के पास भेजा। हालांकि, इस वार्ता का निष्कर्ष क्या निकला, यह अभी तक साफ नहीं है।

दरअसल पंजशीर में अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद और खुद को अफगानिस्तान का केयरटेकर राष्ट्रपति घोषित कर चुके अमरुल्लाह सालेह तालिबान को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। सालेह ने ऐलान कर दिया था कि सिर्फ सार्थक वार्ताएं ही स्वीकार की जाएंगी। इसके बाद तालिबान की ओर से प्रतिनिधिमंडल भेजा जाना सीधे तौर पर उसके बर्ताव में आई नरमी को दिखा रहा है।

पंजशीर में तालिबान विरोधी सेना का नेतृत्व कर रहे अहमद मसूद ने बीते रविवार को ही तालिबान के साथ शांतिपूर्वक वार्ता होने की उम्मीद जताई थी। उन्होंने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से टेलीफोन पर बातचीत के दौरान कहा, 'हम तालिबान को यह एहसास कराना चाहते हैं कि आगे बढ़ने का एकमात्र तरीका वार्ता है। हम नहीं चाहते कि युद्ध छिड़े।'

यह बयान तालिबानियों की उस टिप्पणी के बाद आया था, जिसके मुताबिक सैकड़ों तालिबानी लड़ाके पंजशीर घाटी की ओर बढ़ रहे थे।

बता दें कि इकलौता प्रांत पंजशीर ही है, जहां तालिबान के खिलाफ नया नेतृत्व बन रहा है, जो तालिबान की सत्ता को मानने से इनकार कर रहा है। अहमद मसूद के पिता अहमद शाह मसूद भी तालिबान से हमेशा लड़ते रहे हैं. उन्होंने तो अफगानिस्तान से सोवियत संघ को भी बाहर करने में अहम भूमिका निभाई थी। अहमद शाह मसूद की हत्या साल 2001 में तालिबान और अलकायदा के लड़ाकों ने की थी।

अफगानिस्तान में जो कुछ भी हो रहा है उसका भारत पर प्रभाव पड़ना निश्चित है। यह एक बहुत अच्छा संकेत है कि वहां पर उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने तालिबान के सामने हथियार डालने से मना कर दिया है। उनके इस प्रकार इनकार करने के बाद अफगानिस्तान गृहयुद्ध की लपटों में जलने लगा है। राजनीति और कूटनीति का यह सिद्धांत है कि दुश्मन को उसके अपने ही मकड़जाल में उलझाये रखो, अन्यथा वह समय आने पर आपके लिए संकट पैदा कर सकता है । इस सिद्धांत के पालन में भारत के लिए यही उचित होगा कि अफगानिस्तान के तालिबान अपने देश के भीतर ही उलझे रहें। यह हमारे लिए तब और भी अधिक आवश्यक हो जाता है जब अफगानिस्तानी तालिबानियों के सत्ता में लौट आने की खबरों से उत्साहित होकर भारत के भी कई तालिबानी रंग बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं। जम्मू कश्मीर में पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती ने कुछ इस प्रकार बयान दिया है कि जैसे तालिबानी बहुत शीघ्र जम्मू कश्मीर पर हमला करेंगे और इसके भारत से अलग होने का अब अधिक समय नहीं रह गया है। इसके साथ ही कश्मीर में हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस भी तालिबानियों से प्रेरणा लेकर सर उठाने की कोशिश करती हुई दिखाई दी है। जिस पर केंद्र सरकार ने तुरंत कार्यवाही करते हुए प्रतिबंध लगा दिया है। 

सपा के नेता शफीक उर रहमान और उन जैसे अलगाववादी विचार रखने वाले कई मुस्लिम कट्टरपंथियों ने अफगानिस्तान में तालिबान की जीत को आजादी की जंग के रूप में देखा है और इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की है कि तालिबान अपने देश को आजाद कराने में सफल हो गया है । तालिबान के द्वारा वहां पर जिस प्रकार महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार किए गए हैं वह सब इन लोगों ने उपेक्षित कर दिए हैं। इनके व्यवहार आचरण से ऐसा लगता है कि जैसे इस्लाम की 'हिफाजत' के लिए महिलाओं और बच्चों पर ऐसे अत्याचार कोई अधिक मायने नहीं रखते , या समझो कि ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं है या इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि दुश्मनों के बीवी बच्चों के साथ 'ऐसा तो होना ही चाहिए '। इस प्रकार की सोच को आप किसी भी दृष्टिकोण से मानवीय और लोकतांत्रिक सोच नहीं कह सकते । आज की 21 वीं सदी में जब मनुष्य अपनी सफलता के विभिन्न कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, तब ऐसी दरिंदगी बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है।

अभी तक केंद्र की मोदी सरकार अफगानिस्तान के मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। जिसके अच्छे परिणाम भी दिखाई दे रहे हैं । प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के नेता व्लादिमीर पुतिन से 45 मिनट तक बातचीत की है। जिससे लग रहा है कि भारत और रूस दोनों मिलकर अफगानिस्तान के बारे में कोई ना कोई 'संयुक्त रणनीति' बनाने जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस प्रकार राज्य विधानसभा में तालिबानियों का पक्ष पोषण करने वाले नेताओं को आड़े हाथों लिया है वह भी उनकी शेरदिली का प्रमाण है । इसी प्रकार का स्पष्टवादी चिंतन प्रत्येक उस व्यक्ति के विरुद्ध राजनेताओं की ओर से प्रकट होना चाहिए जो देश को तोड़ने वाले लोगों का साथ देता है या संसार में आतंकी गतिविधियों में लगे लोगों के साथ खड़ा दिखाई देता है।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि इस समय देश की सुरक्षा और भविष्य के दृष्टिगत हम सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर अफगानिस्तान के प्रति किसी भी प्रकार के प्रमाद का प्रदर्शन ना करें। वहां से आने वाले मुस्लिम शरणार्थियों को किसी भी स्थिति में शरण देने की गलती ना करें। यदि हमने ऐसी गलती इस समय की तो निश्चय ही भविष्य में इसके बहुत भयंकर परिणाम हमको भुगतने पड़ सकते हैं।

भारत में तालिबानी 'अपसंस्कृति' को फैलाने का काम करने वाली हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की सोच प्रारंभ से ही भारत के विषय में अलगाववादी रही है । इसके नेता कश्मीर समस्या को त्रिपक्षीय बताते रहे हैं। वह जम्मू कश्मीर को लेकर होने वाली प्रत्येक प्रकार की वार्ता में पाकिस्तान को भी एक आवश्यक पक्षकार बनाकर बैठाने का दबाव केंद्र सरकार पर डालते रहे हैं। उनके इस प्रकार के आचरण से पता चलता है कि वे पाकिस्तान के टुकड़ों पर पलने वाले उसके पिट्ठू हैं। इनके विषय में हमें ध्यान रखना चाहिए कि अलगाववाद और विखंडनवाद इनके खून में समाया हुआ है। यदि इनके खून के साथ तालिबानी अपसंस्कृति का खून आकर मिल गया तो यह भारत में विकास के स्थान पर विनाश की हवा चला देंगे। इस दृष्टिकोण से केंद्र की मोदी सरकार ने हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस के दोनों धड़ों पर प्रतिबंध लगाकर उचित ही निर्णय लिया है।

हमें हुर्रियत कांफ्रेंस और उस जैसे अन्य भारतीय तालिबानी संगठनों के इस दृष्टिकोण को समझना चाहिए कि वह 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार द्वारा  देशविरोधी धारा 370 और 35a को हटाए जाने के निर्णय पर आज तक यह कहते आ रहे हैं कि संविधान की ये दोनों धाराएं बहाल होनी चाहिएं और इनकी बहाली के लिए होने वाले वार्तालाप में पाकिस्तान को भी आमंत्रित किया जाए। हुरिर्यत कॉन्फ्रेंस की इस देश विरोधी मांग को हमें हल्के से नहीं लेना चाहिए। क्योंकि धारा 370 और 35a को हटाना भारत का अंदरूनी मामला था। जिसमें किसी भी बाहरी देश को हस्तक्षेप करने की या उसे एक पार्टी बनाकर उसके साथ बातचीत करने की आवश्यकता हमें नहीं है।

भारत के इन तालिबानियों को देश ,धर्म और संस्कृति के विनाश के लिए विषधर नाग समझना चाहिए। जिनका फन कुचला जाना समय की आवश्यकता है । यदि इनकी पीठ थपथपाते हुए हमारे देश के किसी भी राजनीतिक दल के नेता दिखाई दें तो उनके साथ भी कानून को कठोरता से निपटना चाहिए। सभी राष्ट्रवादी शक्तियों को सरकार से मांग करनी चाहिए कि वह इन सभी लोगों से कठोरता से निपटे। हम सबका केंद्र सरकार पर यह सामूहिक दबाव होना चाहिए कि देश विरोधी लोगों के कोई मौलिक अधिकार नहीं होते। मौलिक अधिकारों के नाम पर किसी भी आतंकवादी या देश विरोधी व्यक्ति या शक्ति का समर्थन करना या उसे संरक्षण देना भी अब 'अपराध' घोषित होना चाहिए।

पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती को इस बात का भी ज्ञान होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में आज भी दर्जनों सीटें ऐसी हैं जो खाली पड़ी रहती हैं । जम्मू कश्मीर विधानसभा में खाली पड़ी ये सीटें कश्मीर के उस हिस्से से चुनकर आने वाले  विधायकों की सीटें हैं जो इस समय पाकिस्तान के कब्जे में है। इन सीटों के बने रहने से पता चलता है कि जम्मू कश्मीर में चाहे किसी भी राजनीतिक दल की सरकार रही हो, ये सीटें उसे बताती रही हैं कि जम्मू कश्मीर तभी सुख की नींद सो सकेगा जब पाक अधिकृत कश्मीर भी भारत के साथ सम्मिलित हो जाएगा और वहां से चुने जाने वाले विधायक भारत के इस राज्य की विधानसभा में आकर बैठ पाएंगे । अब मांग केवल एक ही होनी चाहिए कि संपूर्ण जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यह राज्य उस सारे क्षेत्र को लेकर बनता है जो पाकिस्तान ने जबरन कब्जाया हुआ है।

यदि इस समय रूस और उसके साथी मिलकर तालिबानियों के विरुद्ध कोई 'कठोर निर्णय' लेते हैं तो भारत को भी इन लोगों का साथ देकर अपनी उस कश्मीर को पाकिस्तान के अधिकार क्षेत्र से मुक्त कराने की दिशा में 'मजबूत निर्णय' लेना ही चाहिए जो उसने जबरन कबजायी हुई है।

पीडीपी की नेता  महबूबा मुफ्ती पर इस समय विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। क्योंकि वह देश विरोधी शक्तियों के हाथों में खेल रही हैं। उनके लिए चाहे पाकिस्तान हो, चाहे हुर्रियत कॉन्फ्रेंस हो, चाहे कोई अन्य शक्ति - संगठन हो वह भारत के विरुद्ध किसी से भी हाथ मिला सकती हैं । अपनी सत्ता प्राप्ति की कामना की पूर्ति के लिए महबूबा मुफ्ती इस समय कुछ भी कर सकती हैं। उनके लिए देश कोई मायने नहीं रखता। उन्हें जम्मू-कश्मीर की सत्ता चाहिए। वह भारत के शीर्ष अर्थात कश्मीर में बैठकर दक्षिण की ओर अर्थात शेष भारत को अपना मानकर न देखते हुए पाकिस्तान सहित हर उस देश की ओर देखना चाहती हैं जो उन्हें कश्मीर की 'साम्राज्ञी' बनाने में सहायता कर सकता हो। देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप में आस्था रखने वाले लोगों को कश्मीर की इस नेता की छटपटाहट को समझना चाहिए। उन्हें इसकी छटपटाहट को देखकर यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि भारत की कीमत पर महबूबा किस प्रकार सब कुछ करने को तैयार हैं?

हमें इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि हुर्रियत कांफ्रेंस पिछले 30 वर्ष से जम्मू-कश्मीर प्रदेश की जनता के प्रतिनिधित्व के नाम पर भारत की संघीय व्यवस्था को चुनौती देने का काम करती रही है। वह भारत की जमीन पर काम करते हुए भारत के संदर्भ में पाकिस्तानी दृष्टिकोण का समर्थन करती आयी है। इसके पीछे उसकी मजहबी द्वेष पूर्ण भावना काम करती रही है। क्योंकि उसे भारत को दारुल इस्लाम में परिवर्तित कर अपनी 'गजवा-ए- हिन्द' की सोच के आधार पर 'मुगलिस्तान' बनाना है और यह मुगलिस्तान आगे चलकर पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ मिलकर शेष हिंदुस्तान के सर्वनाश की बड़ी तैयारी करेगा। 

हमें यह आज भी ध्यान रखना चाहिए कि हिंदू विनाश के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश भी एक हैं और यदि मुगलिस्तान अस्तित्व में आया तो वह भी '।हिंदू विनाश' की योजना पर मजबूती से काम करेगा। तनिक कल्पना करें कि जब यह तीन देश मित्र होकर अपने सामूहिक शत्रु अर्थात शेष भारत के विनाश की योजना पर काम कर रहे होंगे तो उन्हें कितनी शीघ्रता से अपने 'लक्ष्य' में सफलता प्राप्त हो सकेगी?

हमें भारत के भीतर बैठे भारत के दुश्मनों के इरादे समझने होंगे। उनका उद्देश्य भारत का विनाश है और उससे भी बढ़कर स्पष्ट शब्दों में कहें तो उनका उद्देश्य हिंदू विनाश है। हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं ने जम्मू कश्मीर की छवि विश्व मंचों पर कुछ इस प्रकार प्रस्तुत की कि वहां पर लोगों के साथ बहुत जोर जबरदस्ती की जा रही है । उन्होंने भारतीय पक्ष की हवा निकालने का भी कोई अवसर छोड़ा नहीं।

देश में बढ़ते अलगाववाद और आतंकवाद से निपटने के लिए देश की सरकार को इस समय जनसंख्या नियंत्रण कानून और धर्मांतरण विरोधी कानून लाने की आवश्यकता है। जो लोग जनसंख्या बढ़ाकर देश के टुकड़े करने के मंसूबे पाल रहे हैं उनके मंसूबों पर पानी फेरने के लिए इस प्रकार की नीति अपनायी जानी समय की आवश्यकता है। जैसे ही तालिबान ने अफगानिस्तान में अपनी तथाकथित सफलता का ढिंढोरा पीटा वैसे ही भारत के तालिबानियों ने जोश दिखाना आरंभ कर दिया । इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि देश विरोधी शक्तियों के द्वारा अब  'वृहद-बांग्लादेश' बनाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है । जानकारों का मानना है कि इस योजना में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आशीर्वाद भी देश विरोधी शक्तियों के साथ है। इस मंसूबे को पालने वाले लोग भारत के तालिबानी ही कहे जाएंगे और जो लोग जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र कराकर एक अलग देश के सपने संजो रहे हैं उन्हें भी भारत के तालिबानी ही मानना चाहिए।

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कश्मीर के बारे में जब भी चर्चा होती है तो कई लोग 'कश्मीरियत' की चर्चा करने से भी नहीं चूकते हैं। उन्हें 'कश्मीरियत' उस तथाकथित गंगा जमुनी संस्कृति में दिखाई देती है जिसने वास्तविक कश्मीरी संस्कृति का विनाश कर दिया अर्थात् उस हिंदू वैदिक संस्कृति का विनाश इसी गंगा जमुनी संस्कृति ने किया जो कभी इस प्रदेश को ऋषियों की पवित्र भूमि घोषित करती थी। वास्तविक कश्मीरियत वह थी जो ऋषियों की वेद वाणी के गीत सुना करती थी और  जब उस वाणी से नि:सृत हुए गीत संगीत को अपनी सुरीली बांसुरी के माध्यम से प्रसारित करती थी तो न केवल भारत बल्कि सारा संसार उसकी ओर खिंचा चला आता था। क्या यह तथाकथित गंगा जमुनी संस्कृति आज फिर कश्मीर की उस कश्मीर को लौटा सकती है ? 

गंगा जमुनी संस्कृति की मूर्खता पूर्ण अवधारणा ने ऋषियों का विनाश किया। उनकी संस्कृति का विनाश किया, उनके चिंतन और उनकी विचारधारा का नाश किया। उनके मूल्यों का नाश किया और जो लोग वहां पर हिंदू के नाम पर निवास कर रहे थे उन्हें दिन रखकर 1989 में वहां से भागने के लिए मजबूर किया। इसके उपरांत भी गंगा जमुनी संस्कृति के गीत गाकर या उसके छलावे में रखकर जिस प्रकार हमें ठगा जा रहा है उस छलावे और तथाकथित गंगा जमुनी संस्कृति से हमें सावधान रहने की आवश्यकता है। वास्तव में गंगा जमुनी संस्कृति की यह अपसंस्कृति एक बीमारी है । जो हमारे मौलिक स्वरूप को धीरे-धीरे समाप्त कर देती है । जैसे ही कहीं हमारी मौलिक संस्कृति समाप्ति की ओर बढ़ती है वैसे ही हमें पता चलता है कि या तो हमारा देश टूट गया या फिर हम खून खराबे के नए दौर में दाखिल हो गए।

प्रधानमंत्री मोदी जी अफगानिस्तान के तालिबानियों के विरुद्ध जो भी निर्णय लें वह देश की इन सभी अंदरूनी समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए लें। बाहरी तालिबानियों को कुचलते समय भीतरी तालिबानी किसी भी प्रकार से उनसे खाद-पानी न ले पाएं इस बात का पूरा प्रबंध कर लिया जाए। पूरा देश यह चाहता है कि तालिबानी चाहे बाहर के हों चाहे भीतर के हों ,उनके विरुद्ध कठोरता से ही पेश आना चाहिए।  

जो बाइडेन ने अमेरिका को शर्मिंदा किया 

उधर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगान नीति को लेकर अपने उत्तराधिकारी जो बाइडेन पर निशाना साधा। ट्रंप ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि निकासी अभियान के जरिए बड़ी संख्या में आतंकवादी भी अफगानिस्तान से बाहर आ गए होंगे। ट्रंप ने कहा कि अफगानिस्तान से निकाले गए 26 हजार लोगों में से केवल 4 हजार अमेरिकी हैं, और इस बात का कोई अंदाजा ही नहीं है कि निकासी अभियान में कितने आतंकी अमेरिका लाए गए। उन्होंने कहा कि बाइडेन ने अफगानिस्तान में आतंकवादियों के सामने घुटने टेक दिए।

‘जो बाइडेन कितने आतंकवादी अमेरिका लाएंगे?’

ट्रंप ने अगस्त 24 को एक बयान में कहा, ‘बाइडेन ने अफगानिस्तान के आतंकवादियों के सामने घुटने टेक दिए हैं और सैनिकों को वापस बुला कर हजारों अमेरिकियों को मरने के लिए छोड़ दिया। अब हमें पता चला है कि निकाले गए 26,000 लोगों में से केवल 4 हजार अमेरिकी थे। तालिबान जिसने अब पूरी तरह कब्जा कर लिया है, उसने इन निकासी उड़ानों में सबसे प्रतिभाशाली लोगों को चढ़ने की अनुमति नहीं दी। हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि अफगानिस्तान से कितने आतंकवादियों को हवाई मार्ग के जरिए निकाला गया। यह एक भयानक विफलता है। कोई पुनरीक्षण नहीं किया गया। जो बाइडेन कितने आतंकवादी अमेरिका लाएंगे? हमें नहीं पता।’

‘बाइडेन ने अमेरिका को शर्मिंदा किया है’

इस बीच, रिपब्लिकन सांसद माइक वाल्ट्ज ने प्रतिनिधि सभा में एक प्रस्ताव पेश कर तालिबान के हमले की गति और प्रकृति के बारे में सैन्य तथा खुफिया सलाहकारों की सलाह को ना मानने को लेकर बाइडेन की निंदा की। इस प्रस्ताव को अल्पसंख्यक नेता केविन मैकार्थी, अल्पसंख्यक सचेतक स्टीव स्कैलिस और कॉन्फ्रेंस की अध्यक्ष एलिस स्टेफनिक द्वारा सह-प्रायोजित किया गया था। वाल्ट्ज ने कहा, ‘राष्ट्रपति बाइडेन ने अमेरिका को विश्व मंच पर शर्मिंदा किया है और हमारे आधुनिक इतिहास में विदेश नीति में सबसे बड़ी गड़बड़ी की है।’

अमेरिका की 20 साल की मेहनत बेकार ; तालिबानी आतंकियों के सामने ऐसे पस्त हुई 6 लाख करोड़ रूपए की फ़ौज

                   हेरात पर कब्जे के बाद मस्ती करते तालिबान के आतंकी (बाएँ), अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन (दाएँ)
अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी क्या शुरू हुई, तालिबान ने पाँव पसारने चालू कर दिए। अब तो स्थिति ये है कि काबुल को छोड़ कर अधिकतर बड़े शहर अब आतंकियों के कब्जे में हैं। अफगानिस्तान की सेना व पुलिस तालिबान के सामने पस्त नजर आ रही है। अमेरिका ने अपने हाथ खींच लिए हैं। भारत के लिए भी ये चिंता का विषय है, क्योंकि आतंक समर्थक पाकिस्तान की तालिबान के साथ भी साँठगाँठ है।

ताज़ा खबर ये है कि तालिबान अब अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में घुस चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अफगानिस्तान के ही गृह मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की है। तालिबान का कहना है कि वो अभी काबुल की एंट्री पॉइंट पर ही है। काबुल में कई स्थानों पर गोलीबारी की आवाज़ सुनी गई। हाल ही में वहाँ एक कार ब्लास्ट भी हुआ था। अमेरिका किसी तरह वहाँ से निकल कर भागने को बेताब है।

फुस्स हो गई 6 लाख करोड़ रूपए की फ़ौज?

तालिबान जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा है, अफगानिस्तान के सशस्त्र बल आत्मसमर्पण करते जा रहे हैं। मई में शुरू हुआ तालिबान का हिंसक अभियान डेढ़ दर्जन बड़े शहरों को अपने चपेट में ले लिया है और अफगानिस्तानी सेना बिखरती जा रही है। मुल्क के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े शहर कंधार व हेरात अब तालिबान के कब्जे में हैं। कहीं हफ़्तों गोलीबारी चली तो कहीं तालिबान को संघर्ष का सामना ही नहीं करना पड़ा।

ऐसे में ये में ये सवाल उठना लाजिमी है कि अब तक अफगानिस्तानी सेना के प्रशिक्षण, उपकरणों और हथियारों पर अमेरिका ने पिछले 20 वर्षों में जो 83 बिलियन डॉलर (6.16 लाख करोड़ रुपए) खर्च किए थे, वो कहाँ चले गए? उसका परिणाम क्यों नहीं दिख रहा? बराक ओबामा जब अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तभी उन्होंने अफगानिस्तान की सेना को सशक्त करने का खाका तैयार किया था। योजना थी कि उन्हें दायित्व सौंप कर अमेरिका वहाँ से निकलेगा।

इसके लिए अमेरिका की तर्ज पर अफगानिस्तान में सेना का गठन किया गया, लेकिन अब ये सब बेकार हो गया है। यानी, अफगानिस्तान की फ़ौज पर 2 दशकों में 6 लाख करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद आज मुल्क का अधिकतर हिस्सा तालिबानी आतंकियों के कब्जे में है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने 11 सितंबर, 2021 तक अपनी सेना की वापसी की घोषणा की, तभी से अफगानिस्तानी फ़ौज बिखरने लगी। ऐसे में सवाल यह भी है कि अमेरिका के रहते अफगान सेना चैन से बैठ बांसुरी क्यों बजा रही थी? जो देश इतने वर्ष अपनी सेना का सक्षम नहीं पाया, उससे ज्यादा देश के प्रति लापरवाही और क्या हो सकती है, कौन आएगा इनकी मदद को? अब अगर कोई भी देश आएगा निश्चित रूप से सरकार पर उसी देश का अधिकार होगा, और उसी देश का झंडा। अफगानिस्तान हमेशा के लिए दुनियां के नक़्शे से साफ हो जायेगा। 

20 साल अमेरिका का समर्थन और आधुनिक हथियार मिलने के बाद भी ये अफ़ग़ान 20 दिनो में ही घुटने टेक कर अपनी बहन बेटियों को तालिबान के लड़ाकों को सोंपने तैयार हो गए! ये घटना देखता हूँ तो गर्व से मस्तक उठ जाता हैं कि 800 साल की लूट और इस्लामिक बर्बरता से लड़ते हुए हमारे पूर्वजों ने हमें सनातनी रखा! हो सकता हैं कुछ लोगों को अपनी अपनी जाति के योद्धाओं पर गर्व हो लेकिन मुझे अपने सभी वीर बलिदानी पूर्वजों पर गर्व हैं! वो महान लोग किसी भी जाति या समुदाय से क्यों न हो लेकिन उनके अदम्य साहस और बलिदान के कारण ही आज हम हैं! 

वर्तमान में जो वहाँ #Afghanistan में हो रहा हैं उसको देख कर समझ आता हैं कि इस्लामिक आक्रांताओं की लूट का समय कैसा रहा होगा! भारत वहाँ विकास करने में व्यस्त था लेकिन यह भूल गया कि समस्या की जड़ पिछड़ापन नहीं कुछ और हैं! अमेरिका इतने सालो से वहाँ कट्टरता रूपी पेड़ के पत्ते काटते रहा लेकिन जड़ को काटने का प्रयास नहीं किया! इस सब बर्बरता के पीड़ित मनुष्य और उत्पीड़न करने वालों के बस नाम बदलते हैं लेकिन इसके पीछे एक वैचारिक सोच हैं जोकि इसकी जड़ हैं वो सालो से नहीं बदली हैं! जब तक मानव समाज द्वारा इस मानसिक बीमारी के जड़ से इलाज पर लिखा, बोला और काम नहीं किया जाएगा तब तक ऐसे ही मनुष्यों को इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा फिर वो सामान्य मनुष्य चाहें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, बौद्ध या पारसी किसी भी विचार को मानने वाला क्यों न हो! यह कट्टरता का विचार अब मानवता पर खतरा हैं जिसका समाधान भी हम मनुष्यों को ही मिल जूल कर निकालना पड़ेगा! आशा हैं कि लोग Afghanistan की हालत देख कर सीखेंगे क्योंकि घर परिवार सबके हैं!

आतंकवाद के विरुद्ध बोलने वाला कोई देश आगे नहीं आ रहा है। भारतीय मुसलमानों का हमदर्द बनने वाला पाकिस्तान भी चुपचाप मुस्लिम देश अफगानिस्तान की बर्बादी देख रहा है, लेकिन कोई मानवाधिकार वाला भी नहीं बोल रहा, कमाल है। 

इसकी शुरुआत ग्रामीण इलाकों से हुई। गाँवों में बने आउटपोस्ट्स को घेरने के बाद तालिबान के आतंकी कहते थे कि अगर उन्हें आगे जाने दिया जाएगा तो वो सबकी जान बख्श देंगे। यहीं से आत्मसमर्पण का दौर शुरू हुआ। अपने उपकरण, हथियारों व गोला-बारूद छोड़ कर अफगानिस्तानी सशस्त्र बल पीछे हटते चले गए। इससे तालिबान को ज्यादा से ज्यादा गाँवों व सड़कों पर कब्ज़ा मिलता चला गया।

अफगानिस्तान में 3 लाख सैनिकों की एक फौज तैयार की गई थी, लेकिन अब इसका एक छठा हिस्सा ही सक्रिय है। भ्रष्टाचार और कई गोपनीयता के कारण कागज़ पर संख्या कुछ और थी और असल में कुछ और। अफगानिस्तान की सरकार से सैनिक पहले से ही नाराज़ थे। इन सब पर अधिकारियों ने कोई ध्यान नहीं दिया। तालिबान ने सुरक्षा बलों के मन में बिठा दिया कि वो राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार के लिए लड़ रहे हैं, जो इस लायक ही नहीं हैं।

इसीलिए, अफगानिस्तान सरकार के लिए लड़ते हुए मरने से बेहतर इन सैनिकों ने आत्मसमर्पण को चुना। कंधार में तो स्थिति और खराब थी। सैनिकों के लिए जो आलू लाए गए थे, उसे तालिबान ने अपने कब्जे में ले लिया। सैनिक तक भूख से जूझ रहे थे। ऐसे में वो भला क्या मुकाबला करते? सरकार से भी उन्हें समर्थन नहीं मिला। तालिबान ने गाँवों को छोड़ कर शहरों का रुख किया और एक के बाद एक राजधानियों को कब्जाते चले गए।

2001 से लेकर अब तक अफगानिस्तान के 60,000 जवानों ने अपनी जान गँवाई है। कुंदूज़ शहर में तो अफगानिस्तान की सेना का एक पूरे मुख्यालय ने ही तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका द्वारा दिए गए ड्रोन व हैलीकॉप्टर तक आतंकियों के कब्जे में चले गए। मुल्क के सैन्य अधिकारियों का कहना है कि ये युद्ध नहीं बल्कि ‘मानसिक युद्ध’ ज्यादा है। पायलटों का कहना है कि नेताओं को उनकी फ़िक्र कम और एयरक्राफ्ट्स के रख-रखाव पर ज्यादा थी।

सैनिकों की संख्या तो दूर, हथियार और राशन तक के मामले में अफगानिस्तान की सेना कमजोर है। बताया जा रहा है कि तालिबान के लगभग 1 लाख लड़ाके मैदान में हैं। कई इलाकों में तो तालिबान ने पुलिस अधिकारियों को रुपए देकर उन्हें पीछे हटने को मजबूर किया। हेलमंड के लश्कर गाह में लड़ाई के वक़्त जब सेना ने मदद माँगी तो वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि वहीं रुको और लड़ो। यही सब तालिबान की ताकत इतनी जल्दी बढ़ने के कारण हैं।

सबसे बड़ी बात ये है कि अफगानिस्तान के कई जाने माने ‘वॉरलॉर्ड्स’ ने भी तालिबान के सामने सरेंडर कर दिया है। इनमें मोहम्मद इस्माइल खान भी शामिल हैं, जिन्होंने लंबे समय तक तालिबान के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। वहीं अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति मार्शल अब्दुल राशिद दोस्तुम भी शामिल हैं, जिन्होंने 40 साल तक युद्ध लड़ा है। इससे निचले स्तर के अधिकारियों व सैनिकों का आत्मविश्वास डिगा है।

अमेरिका को अपनी चिंता 

उधर अमेरिका का अब सारा जोर इस बात पर है कि वो जल्द से जल्द अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल ले। इसके लिए 5000 अतिरिक्त सैनिक भी भेजे जा रहे हैं, जो अमेरिकी राजनयिकों व अधिकारियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करेंगे। 1000 सैनिक भेज दिए गए हैं और 3000 अतिरिक्त भेजे जा रहे हैं। अमेरिका के अपने अब तक के सबसे लंबे युद्ध से हाथ खींचने के बाद अब वो पीछे हटने के मूड में बिलकुल नहीं है।

यानी, अब वो अफगानिस्तान को अपने हाल पर छोड़ कर निकलने पर ही आमदा है। अफगानिस्तान में स्थित अमेरिकी दूतावास और एयरपोर्ट्स की सुरक्षा के लिए पहले से ही अमेरिकी सैनिक लगे हुए हैं। एक बार सारे अधिकारी निकल जाएँ तो ये भी लौट जाएँगे। अमेरिका ‘राजनीतिक सेटलमेंट’ के लिए अफगान सरकार के समर्थन की बात कर रहा है और साथ ही कह रहा है कि अफगानिस्तान से आतंकी खतरों को लेकर ख़ुफ़िया विभाग अलर्ट पर है।

अमेरिकी विशेषज्ञ तक माँग कर रहे हैं कि अमेरिका कम से कम तालिबान को इतनी चेतावनी तो दे कि अगर वो काबुल में घुसते हैं तो फिर अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करेगा। जो बायडेन को अफगानिस्तान से पूरी तरह अमेरिका के निकलने के निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील भी की जा रही है। महिलाओं के साथ क्रूरता और सार्वजनिक रूप से मौत का खेल खेल रहे तालिबान को अब कौन रोकेगा?

भारत नहीं करेगा हस्तक्षेप 

जहाँ तक भारत का सवाल है, वो अफगानिस्तान में किसी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप करने से बचेगा क्योंकि हम पहले से ही पाकिस्तान और चीन के मोर्चे पर लगे हुए हैं। ऐसे में, एक और संकट मोल लेने का कोई अर्थ नहीं। तालिबान कह रहा है कि वो भारत द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं को नुकसान नहीं पहुँचाएगा, लेकिन भारत अपने कर्मचारियों व अधिकारियों को वहाँ छोड़ने की भूल नहीं कर सकता है।

दानिश सिद्दीकी की हत्या ने ये दिखा दिया है कि तालिबानी आतंकियों के भीतर भारत के प्रति किस तरह कूट-कूट कर नफरत भरी हुई है। दानिश सिद्दीकी के शव तक के साथ भी बर्बरता की गई थी। युवतियों व विधवाओं की तालिबान के लड़ाकों से जबरन शादी कराई जा रही है। तालिबान लड़कियों की लिस्ट तलब कर रहा है। उन्हें स्कूलों-कॉलेजों से लौटा दिया जा रहा है। उनका पहनावा तय कर रहा है।

अगर तालिबान किसी प्रकार की गड़बड़ी करता है तो भारत उसे वैसे ही जवाब देने की क्षमता रखता है, जैसा पाकिस्तान को अक्सर दिया जाता है। लेकिन, तालिबान भारत से सीधे नहीं उलझना चाहेगा। हाँ, पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के कई सरगना जरूर तालिबान के साथ हैं। ऐसे में, हमें सीमा पर घुसपैठ पर कड़ी नजर रखनी होगी। पंजाब में ‘किसान आंदोलन’ के कारण खालिस्तानियों की सक्रियता और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच भारत किसी दूसरे देश में सैन्य हस्तक्षेप का रिस्क नहीं लेगा।

वैसे भी भारत के वामपंथियों में तालिबान को लेकर गजब की चुप्पी है। बार-बार मुग़ल राज का बचाव करने वाले इस्लामी चरमपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवी तालिबान के कुकृत्यों पर चुप्पी साधे हुए हैं। यही लोग भविष्य में तालिबान की ‘अच्छाई’ को लेकर लेख लिखें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। औरंगजेब और अलादीन खिलजी का बचाव करने वाले तालिबान के विरोधी कैसे हो सकते हैं? अब नजर इस पर है कि भारतीय विदेशी कूटनीति तालिबानी खतरे से कैसे निपटती है।

इजरायल-हमास के बीच संघर्ष विराम, फिलिस्तीनियों ने ‘अल्लाहू-अकबर’ नारों के साथ मनाया जश्न, अमेरिका ने किया स्वागत

                                      इजरायल-हमास के बीच संघर्ष विराम की घोषणा
11 दिनों चले संघर्ष के बाद इजरायल और हमास संघर्ष विराम करने पर सहमत हो गए हैं। इन दोनों के बीच हुए संघर्ष में 200 से ज्यादा फिलिस्तीनियों और इजरायल में 12 की मौत हुई। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने युद्धविराम की घोषणा की और सुरक्षा कैबिनेट ने अपने बयान में इसे “आपसी और बिना शर्त” कहा।

नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि इजरायल ने अपने सुरक्षा मंत्रिमंडल की देर रात बैठक के बाद मिस्र के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। हमास ने तुरंत इसका अनुसरण किया और कहा कि वह इस सौदे का सम्मान करेगा। हमास ने पुष्टि की संघर्ष विराम शुक्रवार को (भारतीय समयानुसार सुबह) 6 बजे से लागू होगा।

इजरायल ने संघर्ष विराम का सम्मान न होने पर फिर लड़ाई की चेतावनी

इजरायली कैबिनेट ने अपनी घोषणा में कहा कि मिस्र की मध्यस्थता वाले युद्धविराम पर सर्वसम्मति से सहमति बनी थी और उसे अपने इस अभियान से कई “महान उपलब्धियां” हासिल हुईं – उनमें से कुछ “अभूतपूर्व” थीं।

इजरायल ने साथ ही चेतावनी दी कि इस संघर्ष विराम का सम्मान नहीं करने पर लड़ाई को फिर से शुरू करने के लिए उसके दरवाजे खुले हैं। इजरायल ने जोर दिया कि जमीन पर वास्तविकता अभियान के भविष्य को निर्धारित करेगी।

युद्ध विराम लागू होने पर फिलिस्तीनियों ने मनाया जश्न

युद्धविराम प्रभावी होते ही, फिलीस्तीनी खुशी मनाने के लिए अपने घर छोड़कर गाजा की सड़कों पर निकल आए। उनमें से कुछ ने “अल्लाहू अकबर” का नारा लगाया, जबकि अन्य अपनी बालकनी से सीटी बजाते नजर आए।
सड़कें कारों से खचाखच भरी गई, ड्राइवर हॉर्न बजा रहे थे और लोग खिड़कियों से झंडे लहरा रहे थे। कुछ लोगों ने रायफल से हवा में फायरिंग की, तो कुछ ने पटाखे छोड़े। मस्जिद के लाउडस्पीकरों ने इसे “यरुशलम की तलवार की लड़ाई के दौरान कब्जे पर हासिल प्रतिरोध की जीत” के रूप में वर्णित किया।
एके-47 राइफल पकड़े एक व्यक्ति ने कहा, “हमारी उंगलियां ट्रिगर पर हैं, और हम फिर से लड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन अब हम अपने लोगों के साथ जश्न मनाएंगे।”

अमेरिका ने किया संघर्ष विराम के फैसले का स्वागत

युद्धविराम का ये फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन के संघर्ष विराम के आह्वान और मिस्र, कतर और संयुक्त राष्ट्र द्वारा मध्यस्थता किए जाने के एक दिन बाद आया।

संघर्ष विराम की घोषणा के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने लड़ाई में “सभी परिवारों, इजरायल और फिलिस्तीनी, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया है” के प्रति अपनी ”संवेदना” व्यक्त की।

गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, पिछले 11 दिनों से जारी इस संघर्ष में कम से कम 230 फिलिस्तीनी मारे गए हैं, जबकि इजरायल के 12 लोगों की मौत हुई है।

बायडेन ने की इजरायल के आयरन डोम की तारीफ

पिछले 11 दिनों में नेतन्याहू को 6 बार कॉल करने वाले बायडेन ने कहा कि अमेरिका के सहयोग से विकसित इजरायल की आयरन डोम डिफेंस सिस्टम ने संकट शुरू होने के बाद से “अनगिनत लोगों की जान” बचाई थी। बिडेन ने संघर्ष शुरू होने के बाद से ही नेतन्याहू को भविष्य में इजरायल सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करने के लिए अपना “पूर्ण समर्थन” देने का वादा किया था। 

आयरन डोम का इस्तेमाल हमास द्वारा इजरायल की ओर दागे गए हजारों रॉकेटों में से कई को हवा में ही नष्ट करने के किया गया था। इजरायल ने हमास के रॉकेट हमलों के बाद गाजा पट्टी पर भारी हवाई हमले करते हुए जवाबी कार्रवाई की थी।

बिडेन ने कहा कि अमेरिका “तेजी से मानवीय सहायता” प्रदान करने और गाजा में “पुनर्निर्माण प्रयासों” में सहायता करने के लिए संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ काम करेगा। उन्होंने कहा, “हम इसे हमास के बजाय फिलिस्तीनी प्राधिकरण के साथ साझेदारी में करेंगे, जिससे हमास को अपने सैन्य शस्त्रागार को बहाल करने की अनुमति न मिले।”

बाइडेन ने कहा, “मेरा मानना ​​है कि फिलिस्तीनी और इजरायल समान रूप से सुरक्षित रूप से रहने और स्वतंत्रता, समृद्धि और लोकतंत्र के समान उपायों का आनंद लेने के अधिकारी हैं।”

पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से ‘डबल झटका’

भारत के साथ व्यापार को लेकर खुद ही फैसले लेकर खुद ही उसे पलट रहे पाकिस्तान को अब संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से ‘डबल झटका’ मिला है। पहला, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन की मेजबानी वाली ‘क्लाइमेट लीडर्स समिट’ में पाकिस्तान को न्योता नहीं दिया गया है। दूसरा, US क्लाइमेट एन्वॉय जॉन केरी अपने एशिया ट्रिप में भारत तो आएँगे, लेकिन पाकिस्तान का दौरा नहीं करेंगे।

क्लाइमेट समिट मार्च 22-23, 2021 को होना है। ये समिट वर्चुअल रूप से ही होगा। इसमें जलवायु संकट के लिए किए जा रहे प्रयासों में तेज़ी लाने पर चर्चा की जाएगी। दुनिया भर के 40 वैश्विक नेता इस समिट का हिस्सा बनेंगे। भारत के अलावा बांग्लादेश भी इसमें शामिल होगा, लेकिन पाकिस्तान नहीं। इस साल नवंबर में स्कॉटलैंड के ग्लासगो में ‘UN क्लाइमेट चेन्ज कॉन्फ्रेंस (COP26)’ का आयोजन भी होना है।

क्लाइमेट चेन्ज के दुष्प्रभावों के मामले में पाकिस्तान दुनिया का 5वाँ सबसे कमजोर मुल्क है, लेकिन इसके बावजूद उसे न्योता न मिलने से वहाँ के नेता और अधिकारी बौखलाए हुए हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ज़ाहिद हाफिज चौधरी ने कहा कि पाकिस्तान के ‘बिलियन ट्री सुनामी’ प्रोजेक्ट को वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम से लेकर कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रशंसा मिली। उन्होंने कहा कि इस समिट में वो देश शामिल हो रहे हैं, जो 80% कार्बन एमिशन के लिए जिम्मेदार हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान मुद्दे को छोड़ दें तो पाकिस्तान का अमेरिका के लिए कोई महत्व नहीं है। इसीलिए, विश्व के इन 40 नेताओं में इमरान खान का नाम शामिल नहीं है। पाकिस्तान द्वारा तालिबान को समर्थन देने से भी अमेरिका खफा है। पाकिस्तान को अमेरिका ने कड़ा सन्देश भी दिया है। स्पेशल एन्वॉय जाल्में ख़लीलजाद ने भी अपने पिछले इस्लामाबाद दौरे में विदेश मंत्री की जगह पाकिस्तान के सेना प्रमुख से मुलाकात की थी।

अब अमेरिकी राजदूत जॉन केरी भारत और बांग्लादेश आ रहे हैं, लेकिन वो पाकिस्तान नहीं जाएँगे। अब पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय ये कह कर इज्जत बचा रहा है कि वो कार्बन एमिशन के मामले में काफी निचले पायदान पर है, इसीलिए इस समिट में उसे नहीं बुलाया गया। पाकिस्तान का कार्बन एमिशन 1% से भी कम है। भारत पर 2050 तक नेट जीरो एमिशन लक्ष्य का दबाव भी है। केरी का दौरा गुरुवार (अप्रैल 1, 2021) से शुरू हुआ।

इस दौरान उन्हें UAE, भारत और बांग्लादेश जाना है। 9 दिनों तक चलने वाली इस दौरे में अबुधाबी, नई दिल्ली और ढाका उनका ठिकाना बनेगा। केरी ने तीनों देशों के दौरे को लेकर ट्वीट भी किया। भारत ने कहा है कि वो पेरिस समझौते का पालन करते हुए 2030 तक कार्बन एमिशन को 2005 के स्तर से 30-35% कम करेगा। साथ ही वो ग्रीन व रिन्यूएबल एनर्जी के प्रयोग को बढ़ावा देने में लगा हुआ है। भारत ने ‘इंटरनेशनल सोलर अलायन्स’ भी बनाया है।

पाकिस्तान की सरकार वहाँ की इस्लामी कट्टरवादियों के सामने झुक गई है। 1 दिन पहले ही वहाँ की केंद्रीय कैबिनेट ने ‘इकोनॉमिक कोआर्डिनेशन कमिटी (ECC)’ के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिसमें भारत से कॉटन और शुगर इम्पोर्ट करने की बात कही गई थी। उससे 1 दिन पहले ही पाकिस्तान ने भारत से होने वाले व्यापार पर से पाबंदी हटाई थी। 2019 में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद पाकिस्तान ने बौखलाहट में ये निर्णय लिया था।

व्हाइट हाउस से ट्रंप की विदाई के बाद रॉयटर्स का नस्लभेदी वीडियो

                                                                                            साभार: @jorebungley on Twitter

जो बायडेन (Joe Biden) ने 20 जनवरी 2021 को 46वें अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली। इस दौरान दुनिया भर के मीडिया संगठनों ने विशेष कवरेज, वीडियो और सूचना के प्रचार-प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ी। मीडिया ने हर पहलू से यह साबित करने की कोशिश की, कि कैसे नए अमेरिकी राष्ट्रपति का अंदाज अपने पूर्ववर्ती से अलग है।

ब्रिटेन स्थित थॉमसन रॉयटर्स समूह के स्वामित्व वाले रॉयटर्स ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों और उनके ‘कुत्तों’ को लेकर एक वीडियो साझा किया। इसमें जो बायडेन का जर्मन शेफर्ड कुत्ता ‘मेजर’ व्हाइट हाउस में एंट्री लेते हुए दिखा रहा है। वह व्हाइट हाउस में रहने के लिए आने वाला पहला रेस्क्यू डॉग है। रॉयटर्स ने बताया है कि सिर्फ बायडेन ही नहीं, अन्य पूर्व राष्ट्रपति भी व्हाइट हाउस में अपने पालतू जानवरों के साथ रह चुके हैं।

रॉयटर्स ने अपने वीडियो में बताया है कि जॉर्ज बुश द्वारा व्हाइट हाउस में लाए गए दो कुत्ते ‘बेज़ले और बार्नी’ की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ओबामा सनी ‘और’ बो नाम के दो कुत्तों को लेकर व्हाइट हाउस में आए थे।

रॉयटर्स की रिपोर्ट में संबंधित राष्ट्रपतियों के कुत्तों की छवियाँ साझा करते हुए बताया गया है कि क्लिंटन दंपती चॉकलेट लैब्राडोर रिट्रीवर- ’बडी’ को लाए थे। जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश और परिवार के पास व्हाइट हाउस में कई कुत्ते थे, जिसमें बुश की पत्नी बारबरा द्वारा लिखी गई बच्चों की पुस्तक मिल्ली का स्टार भी शामिल है।

व्हाइट हाउस में कुत्ते को लाने की परंपराओं को निभाने के लिए विभिन्न पूर्व राष्ट्रपतियों और वर्तमान राष्ट्रपति जो बायडेन की प्रशंसा करते हुए रायटर्स ने कहा कि, 1860 के दशक में एंड्रयू जॉनसन के बाद से डोनाल्ड ट्रम्प ही केवल ऐसे राष्ट्रपति थे जिनके पास व्हाइट हाउस में कोई पालतू जानवर नहीं था।

वहीं ट्रम्प की पालतू जानवरों में कम रुचि होने के बारे में बताते हुए रॉयटर्स ने वीडियो में दो एशियाई राष्ट्र प्रमुखों, भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी और पूर्व जापानी पीएम शिंजो आबे की राष्ट्रपति ट्रम्प से हुई मुलाकात की क्लिप साझा की।

यहाँ यह बात गौर करने वाली है कि जब पालतू जानवरों’ में अरुचि की बात आई तो रायटर्स ने पूरी दुनिया मे पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प के हजारों क्लिप में से सिर्फ पीएम मोदी और पूर्व पीएम शिंजो आबे को ही चुना। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों विश्व नेताओं को, ‘लीजन ऑफ मेरिट’ से सम्मानित किया गया था – जो कि संयुक्त राज्य सशस्त्र बलों के सर्वोच्च सैन्य पुरस्कारों में से एक है।

यह बात सच है कि पूर्व राष्ट्रपति ट्रम्प की हजारों वीडियो क्लिप हैं, लेकिन रॉयटर्स ने व्हाइट हाउस के पालतू जानवरों और कुत्तों के वीडियो पर दो एशियाई नेताओं को दिखाना ज्यादा उचित समझा।

यहाँ कॉनन के साथ ट्रम्प का एक वीडियो है, जो बगदादी के रेड में घायल हुआ कुत्ता है। रॉयटर्स चाहता तो इस क्लिप का इस्तेमाल व्हाइट हाउस में पालतू जानवरों के बारे में बात करने के लिए कर सकता था।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद अमेरिका के नए राष्ट्रपति बायडन ने अमेरिकी जनता को लोकतांत्रिक पद्धति कायम रखने के लिए बधाई दी। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा, “यह अमेरिका का दिन है। यह लोकतंत्र का दिन है। यह इतिहास और आशा का दिन है।”

बायडन ने शपथ लेने के बाद कहा कि यह किसी उम्मीदवार की जीत का जश्न नहीं, लोकतंत्र के उद्देश्य की जीत का जश्‍न है। जनता की इच्छाओं को सुना और समझा गया है।

जो बायडन को मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने शपथ दिलाई। उनके साथ कमला हैरिस ने देश की पहली महिला उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ली। उन्हें सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सोनिया सोतोमयोर द्वारा शपथ दिलाई गई।

अमेरिका : कैपिटल हिल दंगे भड़काने में वामपंथी एक्टिविस्ट गिरफ्तार

'इंसरजेंस यूएसए' का संस्थापक सुलिवन

पिछले दिनों यूएस कैपिटल हिल में हुई अराजकता और उपद्रव में एक ‘ट्रंप विरोधी अनार्किस्ट’ वामपंथी कार्यकर्ता पर दंगों में कथित भागीदारी के संबंध में आपराधिक केस दर्ज किया गया है। ‘फॉक्स न्यूज’ का दावा है कि जॉन सुलिवान ने उन्हें बताया था कि वह कैपिटल में ट्रंप समर्थक भीड़ के ‘दस्तावेज़’ लेने गया था।

एक फेडरल क्रिमिनल कम्प्लेन के अनुसार, उटाह आधारित समूह ‘इंसरजेंस यूएसए’ के संस्थापक जॉन सुलिवान को कथित तौर पर वीडियो में प्रदर्शनकारियों को उकसाते हुए सुना गया, जिसे उन्होंने एफबीआई को प्रदान किया था। वामपंथी कार्यकर्ता ने यह वीडियो अपने YouTube और Twitter अकाउंट में बदले हुए नाम Jayden X.g द्वारा भी साझा किया है।

एफबीआई द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद वामपंथी कार्यकर्ता सुलिवान को वाशिंगटन, डीसी में संघीय अदालत में जनवरी 14, 2021 को आरोपित ठहराया गया है। वह अब अपने गृह राज्य उटाह में, टॉयले काउंटी में हिरासत में है।

एफबीआई के विशेष एजेंट मैथ्यू द्वारा हस्ताक्षरित एक शपथ पत्र के अनुसार, भवन के अंदर जॉन सुलिवान ने दंगाइयों से कहा, “हमें इसे जला देना होगा, ये हमारा घर है म*****।”

वामपंथी कार्यकर्ता एक प्रतिबंधित इमारत और गलत आचरण के साथ ही दंगों में शामिल होने और उपद्रव भड़काने के कारण सिविल डिसऑर्डर के संघीय आरोपों का सामना कर रहा है।

सुलिवान ने भी कथित तौर पर पुलिस को बताया कि वह दंगों के दौरान कैपिटल में मौजूद था, और उसने एक टूटी हुई खिड़की से अंदर प्रवेश किया। जब प्रदर्शनकारी कैपिटल के प्रवेश द्वार के पास एक दीवार पर चढ़ गए, तब उसने कथित तौर पर वीडियो में कहा, “तुम लोग कमाल के हो, आगे बढ़ो।”

रिपोर्ट्स के अनुसार, सुलिवान ने दंगाइयों के अंदर घुसने के बाद जश्न मनाया और उसे वीडियो में यह कहते हुए भी सुना गया कि ‘हम इस इतिहास का हिस्सा हैं’।

जो बायडेन के शपथ ग्रहण समारोह में प्रस्तुति देंगी लेडी गागा और जेनिफर लोपेज

अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ लेंगे। इस दौरान, पॉप गायिका लेडी गागा 20 जनवरी को जेनिफर लोपेज के साथ जो बायडेन के शपथ ग्रहण के दौरान राष्ट्रगान गाएँगी। वहीं, यूएस कैपिटल पर हमले को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ बुधवार (जनवरी 13, 2021) को महाभियोग प्रस्ताव पारित कर दिया गया। वह दूसरी बार महाभियोग का सामना करने वाले अमेरिका के पहले राष्ट्रपति बन गए हैं।

अमेरिकी संसद में उत्पात के बीच गोलीबारी में एक की मौत: ट्विटर ने ट्रंप पर लगाया 12 घंटे का बैन

                                                ट्रंप समर्थकों का हंगामा (साभार: reuters)
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों को लेकर राजनीतिक संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा। चुनावी नतीजों पर अमेरिकी संसद में बुलाई गई बैठक से पहले डोनाल्ड ट्रंप समर्थकों की भीड़ ने व्हाइट हाउस और कैपिटल भवन को घेर लिया। ट्रंप के समर्थकों ने कैपिटल भवन पर जम कर हंगामा किया। वाशिंगटन डीसी स्थित कैपिटल में अमेरिकी कॉन्ग्रेस के लोग बैठते हैं।

विरोध प्रदर्शन के दौरान समर्थकों की पुलिस के साथ झड़प हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, हंगामे के बीच एक नागरिक (महिला) को गोली भी लगी है। जिसकी अस्पताल में उपचार के दौरान मृत्यु हो गई। अमेरिकी राजधानी में हंगामे और हिंसा के बीच कई लोग घायल भी हुए हैं। 

उपद्रव और हंगामे की इन घटनाओं के बाद वाशिंगटन डीसी में कर्फ्यू लगा दिया गया है। इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनावी नतीजों में धांधली का आरोप भी लगाया। हाल ही में हुए चुनावों के दौरान राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित जो बायडेन ने भी इस घटना पर प्रतिक्रिया दी है।

उन्होंने कहा, “मैं राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से आह्वान करता हूँ कि वह शपथ पूरी करें, संविधान की रक्षा करें और इस घेराव को बंद ख़त्म करने की माँग उठाएँ। कैपिटल भवन पर जिस तरह का हंगामा हुआ है हम असल में वैसे नहीं हैं। यह क़ानून का पालन नहीं करने वालों की छोटी संख्या है। इस तरह की घटना राजद्रोह है।”

इस घटना पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी प्रतिक्रिया दी है।

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “वाशिंगटन में हुई दंगों और हिंसा की घटनाओं से निराश हूँ। सत्ता का स्थानान्तरण आदेशानुसार और शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। संवैधानिक प्रक्रिया को इस तरह के असंवैधानिक प्रदर्शन से तबाह नहीं किया जा सकता है।”

हालाँकि, ट्रंप ने अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने का निवेदन किया था। उन्होंने कहा, “प्रदर्शन के बीच हिंसा नहीं होनी चाहिए, याद रखें हम एक क़ानून और व्यवस्था की पार्टी हैं।” कैपिटल भवन में हिंसा के दौरान ट्विटर ने डोनाल्ड ट्रंप का ट्विटर एकाउंट भी ब्लॉक कर दिया। ट्विटर ने ‘नागरिक एकता और चेतावनी भरी हिंसात्मक नीतियों’ का हवाला देते हुए ट्रंप का एकाउंट 12 घंटे के लिए बंद किया था।

ट्विटर ने स्पष्ट किया कि इस तरह के भड़काऊ विचारों को बढ़ावा देने पर एकाउंट स्थाई रूप से रद्द किया जा सकता है। ट्विटर के बाद फेसबुक ने भी डोनाल्ड ट्रंप का वीडियो हटा दिया था। अमेरिकी राजधानी में उपद्रव और हिंसा के दौरान ट्रंप ने समर्थकों को सम्बोधित किया था। जिस पर फेसबुक ने कहा था, “ट्रंप का वीडियो हिंसा और हंगामे को कम करने की बजाय बढ़ाने में मदद कर रहा था।”

नीरा टंडन : जो बायडेन की टीम में एक और भारतीय

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन की टीम में भारतीय मूल के लोगों का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। अब नीरा टंडन का ‘ऑफिस ऑफ मैनेजमेंट एंड बजट (OMB)’ का निदेशक नियुक्त किया जाना तय माना जा रहा है। ये व्हाइट हाउस के भीतर एक बड़ा पद है। प्रशासन के बजट के पूरे प्रबंधन के लिए OMB के डायरेक्टर ही जिम्मेदार होते हैं। 50 वर्षीय नीरा टंडन इस पद को संभालने वाली पहली महिला होंगी।

फ़िलहाल वो ‘सेंटर फॉर अमेरिकन प्रोसेस’ की चीफ एग्जीक्यूटिव हैं। ये संगठन वामपंथी झुकाव वाला है। इससे ये भी स्पष्ट होता जा रहा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन एक लिबरल और सेंट्रिस्ट लोगों की टीम तैयार कर रहे हैं। अमेरिकी मीडिया एजेंसियों की कई ख़बरों में कहा गया है कि इस नॉमिनेशन की घोषणा जल्द ही होगी। अभी की आर्थिक स्थिति में OMB के डायरेक्टर का किरदार काफी महत्वपूर्ण होने वाला है।

इससे पहले वो अमेरिका की पूर्व प्रथम महिला हिलेरी क्लिंटन की सबसे विश्वस्त सलाहकार रह चुकी हैं। हिलेरी ने ओबामा प्रशासन में ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट’ का जिम्मा भी संभाला था। नीरा ने तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के ‘अफोर्डेबल केयर एक्ट’ को पास कराने में अहम भूमिका निभाई थी। उनका जन्म मैसाचुसेट्स के बेडफोर्ड में हुआ है। उनके माता-पिता भारत से जाकर अमेरिका में बस गए थे।

उन्होंने लॉस एंजेल्स स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से आर्ट्स में स्नातक की डिग्री हासिल की थी। उनका पालन-पोषण भी कई परेशानियों के बीच हुआ था क्योंकि उनकी उम्र जब महज 5 साल थी, तभी उनके माता-पिता ने तलाक ले लिया था और वो अलग रहने लगे थे। उनकी माँ ने काफी संघर्ष के बाद ट्रेवल एजेंट का जॉब प्राप्त किया। 1992 में स्नातक करने के बाद 1996 में उन्होंने येल लॉ स्कूल से जुरिस डॉक्टर की डिग्री प्राप्त की।

फिर उन्होंने ‘एल लॉ एंड पॉलिसी रिव्यू’ में बतौर सबमिशन्स एडिटर सेवा दी। कॉलेज में ही उनकी मुलाकात उनके होने वाले पति बेंजामिन एडवर्ड्स से हुई थी। दोनों ने मिल कर 1988 में डेमोक्रेट राष्ट्रपति उम्मीदवार माइकल डुकाकिस के चुनाव प्रचार का जिम्मा संभाला, लेकिन वो जीत नहीं पाए। इसके बाद उन्होंने वाशिंगटन डीसी में कई राष्ट्रपति उम्मीदवारों के चुनाव प्रचार अभियान में विभिन्न पदों पर काम किया।

उन्हें क्लिंटन परिवार का विश्वस्त माना जाता है। हिलेरी क्लिंटन तो उन्हें अपना दोस्त मानती हैं। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की ऊर्जा नीतियों, स्वास्थ्य सुधार और घरेलू नीतियों के अभियानों में कई पद संभाले थे। अगर हिलेरी क्लिंटन 2014 में अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव जीत जातीं तो उन्हें बड़ा रोल मिलना तय था। फ़िलहाल नीरा टंडन जो बायडेन प्रशासन के बजट की जिम्मेदारी संभालेंगी। अमेरिका के भारतीय संगठनों ने उनकी नियुक्ति का स्वागत किया है।

जहाँ एक तरफ कमला हैरिस अफ़्रीकी-भारतीय मूल की पहली महिला हैं, जो वहाँ उपराष्ट्रपति के पद तक पहुँची हैं, तो दूसरी तरफ जो बायडेन ने यूएस की नई ‘फर्स्ट लेडी’ और अपनी पत्नी जिल के पॉलिसी डायरेक्टर (नीति निदेशक) के रूप में माला अडिगा को नियुक्त किया है। भारतीय मूल की माला अडिगा जो बायडेन के 2020 चुनावी अभियान की सीनियर पॉलिसी अडवाइजर रही हैं।

जो बायडेन द्वारा भारत के पुराने मित्र को अमेरिका का नया विदेश मंत्री बनाए जाने से पाकिस्तान और चीन की नींद हराम

                                  एंटोनी ब्लिंकेन लम्बे समय से जो बायडेन के सलाहकार रहे हैं
अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति ने अपनी टीम के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है और इसी क्रम में एंटोनी ब्लिंकेन को ‘सेक्रेटरी ऑफ स्टेट’ बनाया गया है। अर्थात, वो संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के नए विदेश मंत्री होंगे। ये भारत के लिए अच्छी, तो पाकिस्तान और चीन के लिए बुरी खबर है। वो पहले से ही जो बायडेन की विदेशी नीतियों को बनाने वाली टीम के मुखिया रहे हैं। वो जो बायडेन के उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में उनके NSA भी रह चुके हैं।

वो ‘स्टेट फॉरेन रिलेशन कमिटी’ के स्टाफ डायरेक्टर भी रहे हैं। फिर वो डिप्टी सेक्रेटरी बन गए। उनके पिता हंगरी में एम्बेस्डर रहे थे। उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के विदेशी मुद्दों पर स्पीच लिखने से अपने करियर की शुरुआत की थी। मध्य-पूर्व, चीन, यूरोप, ईरान और भारत को लेकर जो बायडेन की रणनीतियों के पीछे एंटोनी ब्लिंकेन ही रहे हैं। भारत-अमेरिका परमाणु करार के समय उन्होंने सीनेट में इसके पक्ष में माहौल तैयार किया था।

तब बराक ओबामा तक इस करार को सीनेट में पास करने से हिचक रहे थे और डेमोक्रेट पार्टी के फार लेफ्ट वर्ग में एकमत नहीं था, तब उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी। इस साल की शुरुआत में हडसन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में भारत के साथ रिश्तों पर बोलते हुए उन्होंने कहा था कि भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करना और भारत-अमेरिका संबंधों में गहराई लाना जो बायडेन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक होगी।

उन्होंने कहा था कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत-अमेरिका के रिश्ते का महत्व है और इसीलिए वैश्विक मुद्दों पर स्थिरता के लिए इस पर आगे बढ़ना ज़रूरी है क्योंकि ये काफी लोकतांत्रिक होगा। उन्होंने याद दिलाया कि पेरिस क्लाइमेट समझौते के वक्त भारत को उसमें शामिल करने में तत्कालीन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जो बायडेन ने बड़ी भूमिका निभाई थी, क्योंकि भारत और चीन के बिना इस समझौते का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता।

उन्होंने कहा था कि भारत को हमने समझाया कि वो इस समझौते में आने के बाद ज्यादा समृद्ध और सुरक्षित होगा। उन्होंने कहा कि ये कठिन था लेकिन भारत को मनाने में हम कामयाब रहे। साथ ही बताया कि अगर भारत इसका हिस्सा नहीं बनता तो वैश्विक चुनौतियों का समाधान नहीं हो पाता। पेरिस समझौते, WHO और ईरान JCPOA से डोनाल्ड ट्रम्प ने नाता तोड़ लिया था। नए अमेरिकी राष्ट्रपति इन तीनों में फिर से अमेरिका को वापस लेकर जाएँगे।

एंटोनी ब्लिंकेन का मानना है कि जम्मू कश्मीर या अन्य मुद्दों पर, जिनमें दोनों देशों के बीच सहमति न हो, उस पर भारत जैसे देश से खुल कर बात की जा सकती है। चीन और पाकिस्तान में उनकी नियुक्ति को लेकर नाराजगी देखने को मिल सकती है। 58 वर्षीय एंटोनी ब्लिंकेन ने याद किया था कि अमेरिका और भारत के रक्षा पार्टनर बनने के पीछे जो बायडेन का भी योगदान था।

उन्होंने ये भी कहा था कि न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, बल्कि अन्य वैश्विक संगठनों में भी भारत को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिलाने के लिए प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा था कि जिस तरह सीमा से लेकर आर्थिक मोर्चों तक चीन आक्रामक होकर गलत तरीके से फायदा उठा रहा है, उससे हमें निपटना है। साथ ही वो आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति की भी वकालत करते रहे हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भारत को मुख्य पार्टनर बताते हैं।

उधर चीन की कम्युनिस्ट सरकार के एक सलाहकार का कहना है कि चीन को इस ग़लतफ़हमी को दूर कर लेना चाहिए कि जो बायडेन प्रशासन के अंतर्गत उसके अमेरिका के साथ रिश्ते अपने-आप सुधरने लगेंगे। उसने चेताया कि उनके अंतर्गत अमेरिका अब चीन के खिलाफ और ज्यादा सख्त रवैया अपना सकता है। उसका मानना है कि वो अच्छे और पुराने दिन अब चले गए हैं। SCMP के अनुसार, 40 साल पहले एक-दूसरे के देश में दूतावास स्थापित होने के बाद दोनों के रिश्ते सबसे बुरी स्थिति में हैं।

चीन सरकार के सलाहकार ने दी चेतावनी : ‘युद्ध छेड़ सकते हैं नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन, अच्छे दिन चले गए’:

जहाँ वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले से ही चीन की नाक में दम कर के रखे हुए हैं, वहीं अब वहाँ के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बायडेन से भी उसे डर लगने लगा है। कम्युनिस्ट सरकार के एक सलाहकार का कहना है कि चीन को इस ग़लतफ़हमी को दूर कर लेना चाहिए कि जो बायडेन प्रशासन के अंतर्गत उसके अमेरिका के साथ रिश्ते अपने-आप सुधरने लगेंगे। उसने चेताया कि उनके अंतर्गत अमेरिका अब चीन के खिलाफ और ज्यादा सख्त रवैया अपना सकता है।

 ‘साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP)’ की खबर के अनुसार, शेनझेन स्थित थिंक टैंक ‘एडवांस इंस्टिट्यूट ऑफ ग्लोबल एंड कंटेम्पररी चाइना स्टडीज’ के डीन झेंग योंगनियाँ ने कहा कि चीन की सरकार को अमेरिका के साथ रिश्ते बेहतर करने के हर मौके का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीन को इस सोच से बचना चाहिए कि अमेरिका के साथ उसके रिश्ते वैसे ही हो जाएँगे, जैसे डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने से पहले थे।

गुआंगझोउ में ‘अंडरस्टैंडिंग चाइना कॉन्फ्रेंस’ के इतर एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा, “वो अच्छे और पुराने दिन अब चले गए हैं। अमेरिका में जो शीत युद्ध की स्थिति है, वो कई वर्षों में अभी सबसे ज्यादा सक्रिय स्थिति में है। ये सब कुछ एक रात में नहीं ख़त्म होगा।”

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने यूएस-चीन रिश्तों को लेकर लम्बी रणनीति बनाने के लिए झेंग योंगनियाँ को विचार-विमर्श हेतु बुलाया था। SCMP के अनुसार, 40 साल पहले एक-दूसरे के देश में दूतावास स्थापित होने के बाद दोनों के रिश्ते सबसे बुरी स्थिति में हैं।

व्यापार, मानवाधिकार और कोरोना वायरस सहित कई मुद्दों पर दोनों देशों में नहीं बन रही है। Pew के सर्वे में पाया गया था कि 70% अमेरिकी चीन को पसंद नहीं करते हैं। चीनी सरकार के सलाहकार का कहना है कि व्हाइट हाउस में घुसते ही जो बायडेन जनता की इन भावनाओं का फायदा उठा सकते हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका के समाज के टुकड़े हो गए हैं और जो बायडेन अब कुछ नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा:

“वो सचमुच एक काफी कमजोर राष्ट्रपति होंगे। वो तो घरेलू मुद्दों तक को भी नहीं सुलझा सकते हैं। इसी कारण वो कुछ कूटनीतिक स्तर पर करना चाहेंगे और वो होगा चीन के खिलाफ कुछ कार्रवाई करना। अगर हम कहते हैं कि ट्रम्प लोकतंत्र और आज़ादी को बढ़ावा देने में रुचि नहीं रखते हैं, बायडेन हैं। ट्रम्प युद्ध की इच्छा नहीं रखते हैं। लेकिन, नया डेमोक्रेट अमेरिकी राष्ट्रपति युद्ध शुरू कर सकता है। अंतर सिर्फ इतना है कि ट्रम्प एक कारोबारी हैं, जो ऐसे निर्णय लेते हैं जिसकी उम्मीद किसी को न हो। बायडेन क्या करेंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। वो इलीट कूटनीतिज्ञ हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि जहाँ ट्रम्प चीन के प्रति बिना सोच-विचार किए ही सख्त हैं, बायडेन तर्कपूर्ण ढंग से सख्त रहेंगे। उन्होंने अमेरिका-चीन के बिगड़ते रिश्तों के लिए वहाँ के घरेलू मुद्दों को जिम्मेदार ठहराया। झेंग ने कहा कि अमेरिका ने जिस ‘नियो-लिबरल’ आर्थिक विकास मॉडल को अपनाया और बढ़ावा दिया, उसके कारण वहाँ संपत्ति का अंतर बढ़ता चला जा रहा है और उसने समाज को विभाजित कर दिया है।

उन्होंने दावा किया कि अमेरिका के आंतरिक मामले चीन के साथ रिश्तों को खराब करने के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने हुवाई का उदाहरण दिया, जो चिप्स के लिए पहले अमेरिका पर निर्भर था लेकिन अब उसे नुकसान हो रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि चीन की कई कम्पनियाँ अमेरिका से ही कंपोनेंट्स लेकर वैश्विक बाजार में उससे तैयार उपकरण बेचती हैं। उन्होंने कहा कि चीन कई क्षेत्रीय व्यापारिक समझौतों के जरिए आगे रहने की कोशिश कर रहा है।

जो बायडेन ने तुर्की को लेकर भी कहा था कि वो एक ‘असली समस्या’ है और इसे लेकर वो उसे सख्त हिदायत जारी करते। जो बायडेन ने कहा था कि वो तुर्की को सबक सिखाते, भले ही इसके लिए उन्हें ‘सिचुएशन रूम’ में हजारों घंटे ही क्यों न व्यतीत करना पड़े या फिर सीरिया या ईराक में स्थिति सुधारने के लिए क्यों न कुछ भी करना पड़े। चुनाव प्रचार के समय ही उन्होंने साफ़ कर दिया था कि वो तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) से बात कर उन्हें चेता देते कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, इसके लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

‘मैं एर्दोआँ को सबक सिखाऊँगा, तुर्की को कीमत चुकानी पड़ेगी’ – जो बायडेन

जो बायडेन ने की थी एर्दोआँ को सबक सिखाने की बात

द एसोसिएटेड प्रेस, एनबीसी न्यूज़ और अन्य समाचार आउटलेट्स के अनुमानों के अनुसार डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन ने 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में राष्ट्रपति ट्रम्प को हराया है, उन्हें 270 इलेक्टोरल कॉलेज वोट हासिल हुए है। शनिवार को एक जीत भाषण में बिडेन ने कहा: “मैं एक राष्ट्रपति बनने की प्रतिज्ञा करता हूं जो विभाजन नहीं करना चाहता है, लेकिन एकीकरण करता है। जो लाल राज्यों और नीले राज्यों को नहीं देखता है, वह केवल संयुक्त राज्य को देखता है।” ट्रम्प ने एक बयान भी जारी किया: “साधारण तथ्य यह है कि यह चुनाव खत्म हो गया है। द न्यू यॉर्क टाइम्स के अनुसार, चुनाव के दिन से ट्रम्प अभियान ने युद्ध के मैदानों में “लगभग एक दर्जन” मुकदमे दायर किए हैं।

कमला हैरिस इतिहास में पहली महिला, अश्वेत और एशियाई अमेरिकी उपराष्ट्रपति का चुनाव करती हैं। 56 वर्षीय हैरिस, भारत और जमैका के प्रवासियों की बेटी हैं।राष्ट्रपति-चुनाव जो बिडेन ने शनिवार को काले मतदाताओं को धन्यवाद दिया, जो व्हाइट हाउस में उनके नामांकन और चुनाव की कुंजी थे।डेमोक्रेटिक नामांकन के लिए बिडेन के ठोकर अभियान को दक्षिण कैरोलिना में मुख्य रूप से काले मतदाताओं द्वारा जीत के साथ पुनर्जीवित किया गया था। और फिर अफ़्रीकी-अमेरिकी समर्थन इस सप्ताह विस्कॉन्सिन, मिशिगन और पेंसिल्वेनिया में संकीर्ण जीत में महत्वपूर्ण थे। पूरे देश में कई दिनों के तनावपूर्ण मतदान के बाद, राष्ट्रपति-चुनाव जो बिडेन और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस दोनों ने शनिवार रात अपने भाषणों में मतदान कर्मियों को धन्यवाद दिया।

जहाँ एक तरफ लिबरल जमात जो बायडेन के अमेरिकी राष्ट्रपति चुने जाने से खुश है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि इससे आतंकवाद को लेकर अमेरिका के रुख में शायद ही कोई बदलाव आएगा। इसका कारण है दुनिया में नया खलीफा बनने चले तुर्की को लेकर उनका रुख। जो बायडेन ने तुर्की को लेकर कहा था कि वो एक ‘असली समस्या’ है और इसे लेकर वो उसे सख्त हिदायत जारी करते।

जो बायडेन ने कहा था कि वो तुर्की को सबक सिखाते, भले ही इसके लिए उन्हें ‘सिचुएशन रूम’ में हजारों घंटे ही क्यों न व्यतीत करना पड़े या फिर सीरिया या ईराक में स्थिति सुधारने के लिए क्यों न कुछ भी करना पड़े। चुनाव प्रचार के समय ही उन्होंने साफ़ कर दिया था कि वो तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ (Erdogan) से बात कर उन्हें चेता देते कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, इसके लिए उन्हें बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।

इधर आर्मेनियन असेंबली ऑफ अमेरिका ने भी जो बायडेन को बधाई देते हुए माँग की है कि अमेरिका में अजरबैजान और तुर्की के प्रभाव को लेकर जाँच बिठाई जाए। उसने ISIS के साथ तुर्की के गठबंधन के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि क्षेत्र में अशांति के लिए तुर्की ही जिम्मेदार है और उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। अमेरिका में आर्मेनिया के नागरिकों ने भी तुर्की पर शिकंजा कसने की माँग की है।

जो बायडेन के इस ट्वीट पर लोगों की प्रक्रियाएं :

वहीं अब तुर्की की राजधानी अंकारा में भी जो बायडेन को लेकर हलचल तेज हो गई है और तुर्की के नेता कह रहे हैं कि वो नए अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ संबंधों को ठीक करने के लिए सारी कोशिशें करेंगे। ‘ग्रीक सिटी टाइम्स’ ने अनुमान लगाया है कि ट्रम्प के साथ तो एर्दोआँ के मित्रता भरे थोड़े-बहुत रिश्ते भी थे, लेकिन अब तुर्की को आशंका है कि नए राष्ट्रपति नई शर्तें लेकर आएँगे, जिससे उसे खासी परेशानी होने वाली है।

तुर्की के विदेश मंत्री का भी कहना है कि डोनाल्ड ट्रम्प के साथ उनके मुल्क के गंभीर रिश्ते थे और अब आगे चुनौती भरा समय होने वाला है। डोनाल्ड ट्रम्प ने तुर्की के खिलाफ लगे कुछ प्रतिबंधों को ढीला कर दिया था, जिन्हें फिर से वापस लाया जा सकता है। साथ ही मध्य-पूर्व में तुर्की के हस्तक्षेप को कम किया जाएगा। तुर्की के ही एक पत्रकार ने स्वीकार किया है कि अब अमेरिकी कॉन्ग्रेस उसके मुल्क के खिलाफ कार्रवाई करेगा।

तुर्की दक्षिण एशियाई देशों में अपना विस्तार करना चाहता है। लेकिन, दूसरी तरफ इस इलाके में सऊदी अरब का प्रभाव किसी से छुपा नहीं है। इसके लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआँ और उनकी सरकार की तरफ से तमाम प्रयास जारी हैं। उसका नतीजा है कि तुर्की ने अपनी छवि बतौर एक रेडिकल इस्लामिक देश स्थापित कर ली है। जुलाई 2020 में तुर्की की सरकार ने बाईज़ानटाईन कैथेद्रल हगिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद में तब्दील कर दिया था।