अमेरिका की 20 साल की मेहनत बेकार ; तालिबानी आतंकियों के सामने ऐसे पस्त हुई 6 लाख करोड़ रूपए की फ़ौज

                   हेरात पर कब्जे के बाद मस्ती करते तालिबान के आतंकी (बाएँ), अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन (दाएँ)
अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी क्या शुरू हुई, तालिबान ने पाँव पसारने चालू कर दिए। अब तो स्थिति ये है कि काबुल को छोड़ कर अधिकतर बड़े शहर अब आतंकियों के कब्जे में हैं। अफगानिस्तान की सेना व पुलिस तालिबान के सामने पस्त नजर आ रही है। अमेरिका ने अपने हाथ खींच लिए हैं। भारत के लिए भी ये चिंता का विषय है, क्योंकि आतंक समर्थक पाकिस्तान की तालिबान के साथ भी साँठगाँठ है।

ताज़ा खबर ये है कि तालिबान अब अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में घुस चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो अफगानिस्तान के ही गृह मंत्रालय ने इसकी पुष्टि की है। तालिबान का कहना है कि वो अभी काबुल की एंट्री पॉइंट पर ही है। काबुल में कई स्थानों पर गोलीबारी की आवाज़ सुनी गई। हाल ही में वहाँ एक कार ब्लास्ट भी हुआ था। अमेरिका किसी तरह वहाँ से निकल कर भागने को बेताब है।

फुस्स हो गई 6 लाख करोड़ रूपए की फ़ौज?

तालिबान जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा है, अफगानिस्तान के सशस्त्र बल आत्मसमर्पण करते जा रहे हैं। मई में शुरू हुआ तालिबान का हिंसक अभियान डेढ़ दर्जन बड़े शहरों को अपने चपेट में ले लिया है और अफगानिस्तानी सेना बिखरती जा रही है। मुल्क के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े शहर कंधार व हेरात अब तालिबान के कब्जे में हैं। कहीं हफ़्तों गोलीबारी चली तो कहीं तालिबान को संघर्ष का सामना ही नहीं करना पड़ा।

ऐसे में ये में ये सवाल उठना लाजिमी है कि अब तक अफगानिस्तानी सेना के प्रशिक्षण, उपकरणों और हथियारों पर अमेरिका ने पिछले 20 वर्षों में जो 83 बिलियन डॉलर (6.16 लाख करोड़ रुपए) खर्च किए थे, वो कहाँ चले गए? उसका परिणाम क्यों नहीं दिख रहा? बराक ओबामा जब अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तभी उन्होंने अफगानिस्तान की सेना को सशक्त करने का खाका तैयार किया था। योजना थी कि उन्हें दायित्व सौंप कर अमेरिका वहाँ से निकलेगा।

इसके लिए अमेरिका की तर्ज पर अफगानिस्तान में सेना का गठन किया गया, लेकिन अब ये सब बेकार हो गया है। यानी, अफगानिस्तान की फ़ौज पर 2 दशकों में 6 लाख करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद आज मुल्क का अधिकतर हिस्सा तालिबानी आतंकियों के कब्जे में है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने 11 सितंबर, 2021 तक अपनी सेना की वापसी की घोषणा की, तभी से अफगानिस्तानी फ़ौज बिखरने लगी। ऐसे में सवाल यह भी है कि अमेरिका के रहते अफगान सेना चैन से बैठ बांसुरी क्यों बजा रही थी? जो देश इतने वर्ष अपनी सेना का सक्षम नहीं पाया, उससे ज्यादा देश के प्रति लापरवाही और क्या हो सकती है, कौन आएगा इनकी मदद को? अब अगर कोई भी देश आएगा निश्चित रूप से सरकार पर उसी देश का अधिकार होगा, और उसी देश का झंडा। अफगानिस्तान हमेशा के लिए दुनियां के नक़्शे से साफ हो जायेगा। 

20 साल अमेरिका का समर्थन और आधुनिक हथियार मिलने के बाद भी ये अफ़ग़ान 20 दिनो में ही घुटने टेक कर अपनी बहन बेटियों को तालिबान के लड़ाकों को सोंपने तैयार हो गए! ये घटना देखता हूँ तो गर्व से मस्तक उठ जाता हैं कि 800 साल की लूट और इस्लामिक बर्बरता से लड़ते हुए हमारे पूर्वजों ने हमें सनातनी रखा! हो सकता हैं कुछ लोगों को अपनी अपनी जाति के योद्धाओं पर गर्व हो लेकिन मुझे अपने सभी वीर बलिदानी पूर्वजों पर गर्व हैं! वो महान लोग किसी भी जाति या समुदाय से क्यों न हो लेकिन उनके अदम्य साहस और बलिदान के कारण ही आज हम हैं! 

वर्तमान में जो वहाँ #Afghanistan में हो रहा हैं उसको देख कर समझ आता हैं कि इस्लामिक आक्रांताओं की लूट का समय कैसा रहा होगा! भारत वहाँ विकास करने में व्यस्त था लेकिन यह भूल गया कि समस्या की जड़ पिछड़ापन नहीं कुछ और हैं! अमेरिका इतने सालो से वहाँ कट्टरता रूपी पेड़ के पत्ते काटते रहा लेकिन जड़ को काटने का प्रयास नहीं किया! इस सब बर्बरता के पीड़ित मनुष्य और उत्पीड़न करने वालों के बस नाम बदलते हैं लेकिन इसके पीछे एक वैचारिक सोच हैं जोकि इसकी जड़ हैं वो सालो से नहीं बदली हैं! जब तक मानव समाज द्वारा इस मानसिक बीमारी के जड़ से इलाज पर लिखा, बोला और काम नहीं किया जाएगा तब तक ऐसे ही मनुष्यों को इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा फिर वो सामान्य मनुष्य चाहें हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, यहूदी, बौद्ध या पारसी किसी भी विचार को मानने वाला क्यों न हो! यह कट्टरता का विचार अब मानवता पर खतरा हैं जिसका समाधान भी हम मनुष्यों को ही मिल जूल कर निकालना पड़ेगा! आशा हैं कि लोग Afghanistan की हालत देख कर सीखेंगे क्योंकि घर परिवार सबके हैं!

आतंकवाद के विरुद्ध बोलने वाला कोई देश आगे नहीं आ रहा है। भारतीय मुसलमानों का हमदर्द बनने वाला पाकिस्तान भी चुपचाप मुस्लिम देश अफगानिस्तान की बर्बादी देख रहा है, लेकिन कोई मानवाधिकार वाला भी नहीं बोल रहा, कमाल है। 

इसकी शुरुआत ग्रामीण इलाकों से हुई। गाँवों में बने आउटपोस्ट्स को घेरने के बाद तालिबान के आतंकी कहते थे कि अगर उन्हें आगे जाने दिया जाएगा तो वो सबकी जान बख्श देंगे। यहीं से आत्मसमर्पण का दौर शुरू हुआ। अपने उपकरण, हथियारों व गोला-बारूद छोड़ कर अफगानिस्तानी सशस्त्र बल पीछे हटते चले गए। इससे तालिबान को ज्यादा से ज्यादा गाँवों व सड़कों पर कब्ज़ा मिलता चला गया।

अफगानिस्तान में 3 लाख सैनिकों की एक फौज तैयार की गई थी, लेकिन अब इसका एक छठा हिस्सा ही सक्रिय है। भ्रष्टाचार और कई गोपनीयता के कारण कागज़ पर संख्या कुछ और थी और असल में कुछ और। अफगानिस्तान की सरकार से सैनिक पहले से ही नाराज़ थे। इन सब पर अधिकारियों ने कोई ध्यान नहीं दिया। तालिबान ने सुरक्षा बलों के मन में बिठा दिया कि वो राष्ट्रपति अशरफ गनी की सरकार के लिए लड़ रहे हैं, जो इस लायक ही नहीं हैं।

इसीलिए, अफगानिस्तान सरकार के लिए लड़ते हुए मरने से बेहतर इन सैनिकों ने आत्मसमर्पण को चुना। कंधार में तो स्थिति और खराब थी। सैनिकों के लिए जो आलू लाए गए थे, उसे तालिबान ने अपने कब्जे में ले लिया। सैनिक तक भूख से जूझ रहे थे। ऐसे में वो भला क्या मुकाबला करते? सरकार से भी उन्हें समर्थन नहीं मिला। तालिबान ने गाँवों को छोड़ कर शहरों का रुख किया और एक के बाद एक राजधानियों को कब्जाते चले गए।

2001 से लेकर अब तक अफगानिस्तान के 60,000 जवानों ने अपनी जान गँवाई है। कुंदूज़ शहर में तो अफगानिस्तान की सेना का एक पूरे मुख्यालय ने ही तालिबान के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। अमेरिका द्वारा दिए गए ड्रोन व हैलीकॉप्टर तक आतंकियों के कब्जे में चले गए। मुल्क के सैन्य अधिकारियों का कहना है कि ये युद्ध नहीं बल्कि ‘मानसिक युद्ध’ ज्यादा है। पायलटों का कहना है कि नेताओं को उनकी फ़िक्र कम और एयरक्राफ्ट्स के रख-रखाव पर ज्यादा थी।

सैनिकों की संख्या तो दूर, हथियार और राशन तक के मामले में अफगानिस्तान की सेना कमजोर है। बताया जा रहा है कि तालिबान के लगभग 1 लाख लड़ाके मैदान में हैं। कई इलाकों में तो तालिबान ने पुलिस अधिकारियों को रुपए देकर उन्हें पीछे हटने को मजबूर किया। हेलमंड के लश्कर गाह में लड़ाई के वक़्त जब सेना ने मदद माँगी तो वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि वहीं रुको और लड़ो। यही सब तालिबान की ताकत इतनी जल्दी बढ़ने के कारण हैं।

सबसे बड़ी बात ये है कि अफगानिस्तान के कई जाने माने ‘वॉरलॉर्ड्स’ ने भी तालिबान के सामने सरेंडर कर दिया है। इनमें मोहम्मद इस्माइल खान भी शामिल हैं, जिन्होंने लंबे समय तक तालिबान के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। वहीं अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति मार्शल अब्दुल राशिद दोस्तुम भी शामिल हैं, जिन्होंने 40 साल तक युद्ध लड़ा है। इससे निचले स्तर के अधिकारियों व सैनिकों का आत्मविश्वास डिगा है।

अमेरिका को अपनी चिंता 

उधर अमेरिका का अब सारा जोर इस बात पर है कि वो जल्द से जल्द अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से निकाल ले। इसके लिए 5000 अतिरिक्त सैनिक भी भेजे जा रहे हैं, जो अमेरिकी राजनयिकों व अधिकारियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करेंगे। 1000 सैनिक भेज दिए गए हैं और 3000 अतिरिक्त भेजे जा रहे हैं। अमेरिका के अपने अब तक के सबसे लंबे युद्ध से हाथ खींचने के बाद अब वो पीछे हटने के मूड में बिलकुल नहीं है।

यानी, अब वो अफगानिस्तान को अपने हाल पर छोड़ कर निकलने पर ही आमदा है। अफगानिस्तान में स्थित अमेरिकी दूतावास और एयरपोर्ट्स की सुरक्षा के लिए पहले से ही अमेरिकी सैनिक लगे हुए हैं। एक बार सारे अधिकारी निकल जाएँ तो ये भी लौट जाएँगे। अमेरिका ‘राजनीतिक सेटलमेंट’ के लिए अफगान सरकार के समर्थन की बात कर रहा है और साथ ही कह रहा है कि अफगानिस्तान से आतंकी खतरों को लेकर ख़ुफ़िया विभाग अलर्ट पर है।

अमेरिकी विशेषज्ञ तक माँग कर रहे हैं कि अमेरिका कम से कम तालिबान को इतनी चेतावनी तो दे कि अगर वो काबुल में घुसते हैं तो फिर अमेरिका अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करेगा। जो बायडेन को अफगानिस्तान से पूरी तरह अमेरिका के निकलने के निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील भी की जा रही है। महिलाओं के साथ क्रूरता और सार्वजनिक रूप से मौत का खेल खेल रहे तालिबान को अब कौन रोकेगा?

भारत नहीं करेगा हस्तक्षेप 

जहाँ तक भारत का सवाल है, वो अफगानिस्तान में किसी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप करने से बचेगा क्योंकि हम पहले से ही पाकिस्तान और चीन के मोर्चे पर लगे हुए हैं। ऐसे में, एक और संकट मोल लेने का कोई अर्थ नहीं। तालिबान कह रहा है कि वो भारत द्वारा चलाई जा रही परियोजनाओं को नुकसान नहीं पहुँचाएगा, लेकिन भारत अपने कर्मचारियों व अधिकारियों को वहाँ छोड़ने की भूल नहीं कर सकता है।

दानिश सिद्दीकी की हत्या ने ये दिखा दिया है कि तालिबानी आतंकियों के भीतर भारत के प्रति किस तरह कूट-कूट कर नफरत भरी हुई है। दानिश सिद्दीकी के शव तक के साथ भी बर्बरता की गई थी। युवतियों व विधवाओं की तालिबान के लड़ाकों से जबरन शादी कराई जा रही है। तालिबान लड़कियों की लिस्ट तलब कर रहा है। उन्हें स्कूलों-कॉलेजों से लौटा दिया जा रहा है। उनका पहनावा तय कर रहा है।

अगर तालिबान किसी प्रकार की गड़बड़ी करता है तो भारत उसे वैसे ही जवाब देने की क्षमता रखता है, जैसा पाकिस्तान को अक्सर दिया जाता है। लेकिन, तालिबान भारत से सीधे नहीं उलझना चाहेगा। हाँ, पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के कई सरगना जरूर तालिबान के साथ हैं। ऐसे में, हमें सीमा पर घुसपैठ पर कड़ी नजर रखनी होगी। पंजाब में ‘किसान आंदोलन’ के कारण खालिस्तानियों की सक्रियता और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच भारत किसी दूसरे देश में सैन्य हस्तक्षेप का रिस्क नहीं लेगा।

वैसे भी भारत के वामपंथियों में तालिबान को लेकर गजब की चुप्पी है। बार-बार मुग़ल राज का बचाव करने वाले इस्लामी चरमपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवी तालिबान के कुकृत्यों पर चुप्पी साधे हुए हैं। यही लोग भविष्य में तालिबान की ‘अच्छाई’ को लेकर लेख लिखें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। औरंगजेब और अलादीन खिलजी का बचाव करने वाले तालिबान के विरोधी कैसे हो सकते हैं? अब नजर इस पर है कि भारतीय विदेशी कूटनीति तालिबानी खतरे से कैसे निपटती है।

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