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फरीदाबाद जामा मस्जिद से संदिग्ध सामान बरामद; योगी आदित्यनाथ बन कार्यवाही करनी होगी; कश्मीर से लेकर दिल्ली ब्लास्ट तक मस्जिदों का दुरूपयोग; अल फलाह यूनिवर्सिटी के सभी डॉक्टरों- प्रोफेसरों के लॉकरों और बैंक डिटेल तक खँगालेगी पुलिस

सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की नींद बहुत देर में खुली। दरअसल, सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को उस समय हरकत में आना था जब शोभा यात्राओं, त्यौहारों और मन्दिरों पर हमले किए जा रहे थे। इन दुर्घटनाओं को जरुरत से ज्यादा हलके में लिया गया था। ये हमले हादसा नहीं प्रयोग थे। सरकार बताए कि कितने पत्थर सप्लाई करने वालों और मस्जिदों में जमा करने वालों पर कार्यवाही हुई? अगर इतनी ही तत्परता से जितनी अब दिल्ली ब्लास्ट के बाद कार्यवाही हो रही है तब की जाती शायद दिल्ली ब्लास्ट नहीं होता। क्योकि पत्थरबाज़ी कर इन स्लीपर सेलों ने दिखा दिया रास्ता साफ है मुस्लिम होने के नाते मोदी सरकार कोई खास कार्यवाही नहीं करने वाली। यह कोई आरोप नहीं कड़वा सच है जिसे स्वीकार करना होगा। 
जिस तरह कश्मीर में हिन्दुओं को भगाने में मस्जिदों का इस्तेमाल हुआ था, लेकिन उन मस्जिदों पर कोई कार्यवाही इसलिए नहीं हुई क्योकि इनके गुलाम सत्ता में बैठे हुए थे। लेकिन जब मस्जिदों से पत्थराव हो रहा था सरकारों ने उन मस्जिदों पर क्या कार्यवाही की? अगर दिल्ली में केजरीवाल सरकार थी तो केंद्र में मोदी सरकार? अगर यही काम मन्दिरों से होता क्या तब भी सरकार खामोश रहती? वर्तमान सरकार को मुस्लिम वोटबैंक पॉलिसी को त्यागना होगा। योगी आदित्यनाथ बन कार्यवाही करनी होगी।          
हरियाणा के फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल से विस्फोटक बनाने का सामान मिलने के मामले के बाद पुलिस को स्थानीय स्तर पर अमोनियम नाइट्रेट, यूरिया खरीदने का पता चला था। इसके बाद शहर के अलग अलग हिस्सों में चेकिंग अभियान चलाया जा रहा है।

अल फलाह यूनिवर्सिटी के सभी डॉक्टरों के लॉकर चेक किए जाएँगे और प्रोफेसरों की बैंक डिटेल को भी खंगाला जाएगा। करीब 200 डॉक्टर पहले ही पुलिस के रडार पर हैं।

दरअसल फरीदाबाद की त्यागी मार्केट के पास के जामा मस्जिद से 23 नवंबर 2025 को दानेदार सफेद पाउडर, दूसरी पॉलिथीन में सफेद महीन पाउडर और तीसरी पॉलिथीन में काले रंग का पाउडर मिला है। पुलिस ने जब्त कर इसे जाँच के लिए भेज दिया है।

इससे पहले पुलिस की जाँच में पता चला है कि जमा किए गए केमिकल फरीदाबाद, नूंह और आसपास के इलाकों से खरीदे गए थे। मॉड्यूल में शामिल डॉक्टर 2023 से ही अमोनियम नाइट्रेट जैसे केमिकल जमा कर रहे थे।

त्यागी मार्किट जामा मस्जिद से संदिग्ध सामान बरामद

हरियाणा के फरीदाबाद में अल फलाह यूनिवर्सिटी के संदिग्ध आतंकी डॉक्टरों की गिरफ्तारी और उनके तार इलाके की कई मस्जिदों के इमामों से जुड़ने के खुलासे के बाद पुलिस ने आज फिर से कई इलाकों में सर्च अभियान चलाया। इस सर्च ऑपरेशन के दौरान, डबुआ के त्यागी मार्केट स्थित जामा मस्जिद में चेकिंग की गई।

चेकिंग के दौरान पुलिस को मस्जिद से संदिग्ध पदार्थ बरामद हुआ। इन संदिग्ध सामान में दो बोरे में व्हाइट पावडर और एक प्लास्टिक के बोरे में ब्लैक पाउडर टाइप का कुछ संदिग्ध पदार्थ मिला। पुलिस ने इस संदिग्ध पदार्थ को तुरंत जांच के लिए कब्जे में ले लिया है।

अंग्रेजी और देशी शराब बरामद

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस पदार्थ को जल्द ही लैब में जांच के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद ही इसकी प्रकृति और असलियत का खुलासा हो पाएगा। इस अभियान के दौरान पुलिस ने दो अन्य स्थानों पर तलाशी लेते हुए अवैध अंग्रेजी और देशी शराब भी बरामद की है।

दरअसल, हरियाणा के नूंह और मेवात में भी पिछले दिनों पुलिस और जांच एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर रेड की थी। यह कार्रवाई आतंकी उमर के नूंह-मेवात कनेक्शन की विस्तृत जानकारी जुटाने के लिए की गई। इन इलाकों में आतंकी उमर गाड़ी में घूमते हुए कई सीसीटीवी फुटेज सामने आया था, जिसके बाद दिल्ली स्पेशल सेल, हरियाणा एसटीएफ और अन्य एजेंसियों ने मिलकर नूंह जिले में एक बड़ा सर्च ऑपरेशन चलाया था।

लोगों से हो रही पूछतांछ

इस दौरान पुलिस फिरोजपुर झिरका भी गई थी, जहां उमर को सीसीटीवी फुटेज में देखा गया था। रेड के दौरान कई लोगों के दस्तावेज चेक किए गए, उमर से जुड़े लोगों से पूछताछ की गई और संदेह के आधार पर कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया, ताकि उमर और मेवात के बीच के तार को पूरी तरह से समझा जा सके। फरीदाबाद की मस्जिद से संदिग्ध पाउडर की बरामदगी इसी जांच का एक हिस्सा है।

पुलिस का सर्च ऑपरेशन के दौरान इलाके में रहने वाले किराएदारों का डीटेल भी देखा जा रहा है, साथ ही मकान मालिकों को पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही घर किराए पर देने को कहा गया है। इलाके में दूसरे राज्यों से आए लोगों की जाँच भी की जा रही है।

अवलोकन करें:-

आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने पर अरशद मदनी को इमाम डॉ उमर अहमद इलियासी की फटकार
आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने पर अरशद मदनी को इमाम डॉ उमर अहमद इलियासी की फटकार
 

इस बीच अल फलाह यूनिवर्सिटी में सख्ती के बाद जिनके बच्चे पढ़ रहे हैं, वे काफी परेशान दिखे। यूनिवर्सिटी प्रबंधन और छात्रों के बीच तीखी नोक-झोंक भी हुई। एनआईए और दूसरी जाँच एजेंसियां लगातार कैंपस में आकर पड़ताल कर रही हैं। इससे छात्रों और उनके परिजनों की चिंता और बढ़ गई है। शनिवार(22 नवम्बर) को भी कई छात्र-छात्राओं के पेरेंट्स कैंपस पहुँचे और यूनिवर्सिटी प्रबंधन से बात करने की कोशिश की।

आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ने पर अरशद मदनी को इमाम डॉ उमर अहमद इलियासी की फटकार

                                                                मौलाना अरशद मदनी
जिस तरह जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने दिल्ली ब्लास्ट में पकडे जा रहे इस्लामिक आतंकवादियों को cover fire देते इस्लाम से जोड़ने पर सरकार को समय की नजाकत को देखते हुए आतंकवादियों को cover fire देने वालों की भी जाँच करनी चाहिए, चाहे जमीयत ही क्यों न हो। किसी भी शोभा यात्रा और हिन्दू त्यौहारों पर पत्थरबाज़ी करने वालों को भी हलके में नहीं लेना चाहिए। ऐसे ही लोग आतंकवादियों के स्लीपर सेल होते हैं जिनके बलबूते आतंकवादी और दंगाई देश का माहौल ख़राब कर बेगुनाहों की जानों से खिलवाड़ करते हैं। इतना ही नहीं, निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक और आतंकवादियों की पैरवी करने वाले वकीलों पर बार एसोसिएशन को भी इस गंभीर मुद्दे पर सख्ती से पेश आना होगा। वकीलों को रोजी-रोटी के लिए और भी केस मिल जाएंगे। देश की सुरक्षा का सवाल है।       
दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने भारत में मुसलमानों की स्थिति की तुलना अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों के मुसलमानों से की थी। अब उनके इसी बयान पर ऑल इंडिया इमाम ऑर्गनाइज़ेशन के चीफ इमाम डॉ उमर अहमद इलियासी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। साथ ही यह भी खुलासा किया कि उन्होंने पाकिस्तान के चीफ इमाम को एक स्पष्ट फतवा भेजा है, जिसमें कहा गया है कि किसी भी आतंकी संगठन को पैगंबर मोहम्मद के नाम का इस्तेमाल करने की अनुमति न दी जाए।
मदनी जवाब दे कि क्या आतंकवादी इस्लाम का प्रचार प्रसार कर रहे थे? हर अपराध को इस्लाम से जोड़ victim card खेलते शर्म करो।

     
डॉ इलियासी को और दूसरे इमामों, मौलानाओं, मौलवियों और इस्लामिक विद्वानों को लेकर मस्जिदों से लेकर सड़क तक मदनी जैसों के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। बात-बात पर दंगाइयों और आतंकवादियों पर कानूनी कार्यवाही होने पर उसे इस्लाम से जोड़ना कौनसी इंसानियत है? क्यों नहीं दिल्ली ब्लास्ट में पकडे जाने वाले आतंकवादियों के परिवार का बहिष्कार करते? सरकार पर दबाव डाल इनको मिलने वाली सरकारी सुविधाएं और बैंक खातों की जाँच करने के लिए  भी दबाव डालना चाहिए।       

इलियासी ने न केवल इस बयान को देश का माहौल खराब करने वाला बताया। इलियासी का कहना है कि मदनी की टिप्पणी से देश में डर और अराजकता फैल सकती है और इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

आतंकवाद के मुद्दे पर सवाल: गलत पक्ष का साथ क्यों?

इलियासी ने आरोप लगाया कि अरशद मदनी आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर गलत पक्ष का साथ दे रहे हैं। उन्होंने अल फलाह यूनिवर्सिटी के संदर्भ का ज़िक्र करते हुए कहा कि लाल किले पर धमाके की साजिश में जुड़े तीन जाने-माने लोगों की गिरफ्तारी राष्ट्रीय सुरक्षा का गंभीर मामला है, ऐसे में जमीयत उलेमा-ए-हिंद को आतंकवाद का विरोध करना चाहिए था।

इलियासी ने कहा कि अगर गिरफ्तार लोग मुस्लिम हैं, तो भी आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होना अनिवार्य है, क्योंकि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता। उन्होंने माँग की कि मदनी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी बात स्पष्ट करें ताकि जनता तक सही संदेश पहुॅंचे और समाज में एकता बनी रहे।

भारत के मुस्लिमों की स्थिति बेहतर, मोदी सरकार में नए अवसर

इमाम इलियासी ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मुस्लिमों को अधिक अवसर मिले हैं। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में सिविल सेवाओं में मुस्लिम युवाओं की संख्या बढ़ी है और केंद्र सरकार की योजनाओं से मुस्लिमों को उल्लेखनीय लाभ मिला है।

उनका कहना है कि भारत में मुस्लिमों को हमेशा सम्मान मिला है और वे सर्वोच्च संवैधानिक पदों तक पहुँचे हैं, इसलिए उनकी तुलना किसी पश्चिमी देश के मुस्लिम समाज से करना गलत और अनावश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि जैसे-जैसे भारत दुनिया में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है, सभी को इसमें साथ देना चाहिए।

देशहित में बयान वापस लें: इलियासी की अपील

इलियासी ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि अरशद मदनी अपना बयान वापस नहीं लेते या स्पष्ट नहीं करते, तो इससे देश में अविश्वास और तनाव का वातावरण पैदा हो सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि राष्ट्र और समाज की शांति सर्वोपरि है और हर जिम्मेदार नेतृत्व को आतंकवाद व सांप्रदायिकता के खिलाफ एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए।

अल फलाह यूनिवर्सिटी की मान्यता रद्द हो; दिल्ली ब्लास्ट से जाँच के घेरे में फरीदाबाद की अल फलाह यूनिवर्सिटी, विवादित है इसका चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी

अल फलाह यूनिवर्सिटी का चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी (फोटो साभार: File/Al Falah University)
         
दिल्ली में लाल किले के सामने सोमवार(10 नवंबर 2025) को बड़ा धमाका हुआ, जिससे पूरा देश दहल गया। मिनटों में जाँच एजेंसियाँ मौके पर पहुँचीं और उस ब्लास्ट की जाँच शुरू की जिसमें कम से कम 13 लोगों की जान गई।

जिस तरह अल फलाह यूनिवर्सिटी का नाम आतंकवादियों और अन्य विवादों के साथ जुड़ने की वजह से इसकी मान्यता रद्द करने की मांग भी उठ सकती है।  

जल्दी ही दिल्ली लाल किला ब्लास्ट और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का लिंक सामने आया, क्योंकि धमाका करने वाला आतंकवादी उन तीन मेडिकल डॉक्टर्स का साथी था जो यूनिवर्सिटी से जुड़े थे और हरियाणा पुलिस व जम्मू-कश्मीर पुलिस के जॉइंट ऑपरेशन में गिरफ्तार हुए थे। पुलिस ने दिल्ली ब्लास्ट से कुछ घंटे पहले गिरफ्तार डॉक्टर्स से जुड़े ठिकानों से 2,900 किलो से ज्यादा विस्फोटक बरामद किए थे।

यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रो (डॉ) भूपिंदर कौर ने आखिरकार बयान दिया कि यूनिवर्सिटी का पकड़े गए टेरर मॉड्यूल से कोई लिंक नहीं है, लेकिन यूनिवर्सिटी के चांसलर और फाउंडर जवाद अहमद सिद्दीकी चुप रहे। हैरानी की बात है कि सिद्दीकी का डिजिटल फुटप्रिंट लगभग नहीं है।

ऑपइंडिया ने चांसलर जवाद अहमद सिद्दीकी पर उपलब्ध जानकारी खँगाली और कुछ परेशान करने वाला इतिहास मिला। उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल पर ज्यादा जानकारी नहीं है। ‘अबाउट’ सेक्शन में लिखा है, ‘मैनेजिंग ट्रस्टी: अल-फलाह चैरिटेबल ट्रस्ट 1995 से अब तक, चांसलर: अल-फलाह यूनिवर्सिटी, फरीदाबाद 2014 से अब तक, मैनेजिंग डायरेक्टर: अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड 1996 से अब तक।’

                                                                                                                               सोर्स: लिंक्डइन

ऑपइंडिया को मिल्ली गजट की जुलाई 2000 की रिपोर्ट में लिखा मिला कि जवाद अहमद सिद्दीकी नाम का शख्स अपने दो भाइयों के साथ तिहाड़ जेल में था क्योंकि अल-फलाह इन्वेस्टमेंट लिमिटेड में निवेशकों को ठगा था। कंपनी की जानकारी देखी तो पता चला कि वो 1992 में रजिस्टर्ड हुई और स्टेटस ‘स्ट्राइक ऑफ’ है, यानी कंपनी बंद हो चुकी है।

                                                                                                                               सोर्स: लिंक्डइन

जौबाकॉर्प पर उपलब्ध जानकारी से पता चला कि कंपनी का सिर्फ एक डायरेक्टर था, जवाद अहमद सिद्दीकी।

                                                                                                                                  सोर्स: लिंक्डइन

सिद्दीकी के पुराने डायरेक्टोरियल एसोसिएशन से अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड का लिंक मिला। सिद्दीकी मार्च 2019 तक इस कंपनी के डायरेक्टर थे।

                                                                                                                                 सोर्स: लिंक्डइन

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड की और जानकारी देखी तो दो पुराने डायरेक्टर मिले, जवाद अहमद सिद्दीकी और सऊद अहमद सिद्दीकी।

                                                                                                                               सोर्स: लिंक्डइन

ये जानकारी जरूरी थी क्योंकि जब ऑपइंडिया ने मिली गजट में बताए केस को देखा, तो दो नाम थे- जवाद और सऊद। इस केस पर बाद में आएँगे।

अल-फलाह एजुकेशन सर्विस प्राइवेट लिमिटेड और अल-फलाह यूनिवर्सिटी का कनेक्शन जोड़ने के लिए कंपनी का पता चेक किया। वो था ‘अल-फलाह हाउस, 274-ए, जामिया नगर, ओखला, नई दिल्ली।’

                                                                                                                           सोर्स: लिंक्डइन

ये वही पता है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी की ऑफिशियल वेबसाइट पर है।

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हमने ‘jasiddiqui@rediffmail.com’ ईमेल से भी कनेक्शन जोड़ा, जो यूनिवर्सिटी प्रोफाइल वाली कई वेबसाइट्स पर ऑफिशियल ईमेल के तौर पर लिस्टेड है।

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यूनिवर्सिटी के भारत एजुकेशन पेज पर सिद्दीकी और फरदीन दोनों के ईमेल हैं।

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ये ईमेल आईडी अल-फलाह इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के जौबाकॉर्प पेज पर भी है, वही कंपनी जो फ्रॉड में शामिल थी।

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साफ है कि जो शख्स गिरफ्तार हुआ और लंबे समय तिहाड़ जेल में रहा, वही जवाद अहमद सिद्दीकी है जो अल-फलाह यूनिवर्सिटी चला रहा है।

कंपनी के मौजूदा डायरेक्टर हैं सुफयान अहमद सिद्दीकी और फरदीन बेग। सुफयान अहमद सिद्दीकी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, फरदीन बेग अल-फलाह यूनिवर्सिटी में टीचर हैं और एंटी-रैगिंग कमिटी के मेंबर भी।

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हमारी रिसर्च में पता चला कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी 2 मई 2014 को हरियाणा प्राइवेट यूनिवर्सिटी (अमेंडमेंट) एक्ट, 2014 से स्थापित की गई, जो हरियाणा विधानसभा ने पास किया। यूजीसी से 5 जनवरी 2015 को सेक्शन 2(एफ) और 12(बी) के तहत मान्यता मिली। एक्सपर्ट कमिटी बनी और इंस्पेक्शन विजिट 29-30 मई 2015 को हुई। बाद में कमियों को पूरा करने पर यूजीसी ने मान लिया।

जवाद अहमद सिद्दीकी 2 साल से ज्यादा जेल में रहा

अब उस केस पर आते हैं, जिसके लिए उसे तिहाड़ भेजा गया था। ऑपइंडिया को दिल्ली हाई कोर्ट का 27 मार्च 2003 का जजमेंट मिला, जो जस्टिस आरसी चोपड़ा ने सुनाया था। कोर्ट डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, 2000 में न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी, नई दिल्ली में एफआईआर दर्ज हुई थी आईपीसी की धारा 420, 409, 406, 468, 471 और 120(बी) के तहत। केस इकोनॉमिक ऑफेंस विंग, क्राइम ब्रांच, नई दिल्ली को भेजा गया।

केस डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, जवाद सिद्दीकी अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन-कम-मैनेजिंग डायरेक्टर थे, और सऊद सिद्दीकी (अल-फलाह एजुकेशन सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड के पूर्व डायरेक्टर में से एक) उसका डायरेक्टर था। पिटिशनर्स और उनके साथी आरोपियों ने ढेर सारे निवेशकों को अपनी कंपनीज में डिपॉजिट करवाया। कोर्ट ने नोट किया कि उन्होंने 7.5 करोड़ रुपये की रकम गबन की। शिकायत केआर सिंह ने की थी, जिन्हें 95 लाख रुपए का चूना लगाया गया था।

जजमेंट में लिखा था, “आरोप है कि पिटिशनर्स ने ढेर सारे लोगों को अपनी ग्रुप कंपनीज में डिपॉजिट करवाया लेकिन बाद में उनके सिग्नेचर फर्जी करके और डॉक्यूमेंट्स बनाकर उन डिपॉजिट्स को अपनी कंपनीज के शेयर्स में बदल दिया।”

जाँच और एफएसएल रिपोर्ट्स ने कन्फर्म किया कि निवेशकों के सिग्नेचर फर्जी थे। डिपॉजिट कुछ ऐसी कंपनीज के नाम पर लिए गए जो कभी थीं ही नहीं। फिर पैसा आरोपितों के पर्सनल अकाउंट्स में ट्रांसफर हो गया। जब कोर्ट ने ये जजमेंट पास किया, तब तक जवाद 37 महीने और सऊद 38 महीने जेल में थे।

ट्रिब्यून की जून 2004 की रिपोर्ट के मुताबिक, 1995 में अल-फलाह ग्रुप ऑफ कंपनीज ने अल-फलाह सहकारी आवास समिति बनाई। ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने 1996 में समिति को 10,000 स्क्वायर मीटर अलॉट किए, जहाँ मेंबर्स और शेयरहोल्डर्स के लिए 100 फ्लैट्स बनाने थे। लेकिन कुछ फाइनेंशियल दिक्कतों की वजह से कंस्ट्रक्शन नहीं हुआ और जवाद वगैरह गिरफ्तार हो गए।

जवाद जेल में थे, तब उनके कुछ साथियों ने उन्हें ठगा और उनके सिग्नेचर फर्जी करके 13 करोड़ में कुछ फ्लैट्स बेच दिए। ट्रिब्यून रिपोर्ट में उनकी गिरफ्तारी की खबर छपी थी, जिसमें आरोपित थे एसपी यादव, मंजूर हसन जैदी और संजीव श्रीवास्तव।

जवाद अहमद सिद्दीकी को लेकर ये खुलासे अल-फलाह यूनिवर्सिटी चलाने वालों की विश्वसनीयता और बैकग्राउंड पर गंभीर सवाल उठाते हैं। फ्रॉड और फॉर्जरी के पुराने आरोपों से लेकर टेरर मॉड्यूल से जुड़ा विवाद तक, पैटर्न ऐसा है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यूनिवर्सिटी प्रशासन ने खुद को चल रही जाँच से अलग कर लिया है, लेकिन अल-फलाह की लीडरशिप को संदिग्ध फाइनेंशियल और क्रिमिनल गतिविधियों से जोड़ने वाले सबूत बताते हैं कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी और उसके मैनेजमेंट की तेजी से गहरी जाँच जरूरी है।

                                                                                                   (साभार :सभी ग्राफ चित्र OpIndia)