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पश्चिम बंगाल : लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी सैयद इरदीस को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी


राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

                                                     सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

                                                             सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।