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पश्चिम बंगाल : लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी सैयद इरदीस को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी


राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

                                                     सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

                                                             सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।

आतंकियों को ‘Cover fire' देना बंद करो मेहबूबा बहुत हो गया, बेशर्मो की तरह 'Victim card' मत खेलो : समस्या ‘मजहब’ है, नीतियाँ होतीं तो हर युवा बारूद बाँधकर खुद को उड़ा रहा होता


दिवंगत CDS जनरल बिपिन रावत ने एक बार कहा था कि भारत को 2 मोर्चों पर नहीं ढाई मोर्च पर लड़ाई लड़नी है। 2 मोर्चे यानी पाकिस्तान और चीन हमारे सामने हैं और आधा मोर्चा देश के भीतर ही छिपा बैठा है। इसकी कोई तय सूरत नहीं है लेकिन उसकी सीरत भारत विरोध ही है। भारत के खिलाफ बयानबाजी और आतंकी व भारत विरोधी तत्वों को कवर फायर देना, यही काम इस आधे मोर्चे का है। इसका जिक्र क्यों? जब तक देश में इन बहरूपी नेताओं पर कार्यवाही नहीं होगी देश में छिपे गद्दारों, आतंकवादियों से निजात नहीं मिलेगी। पत्थरबाजों और दंगाइयों पर भी ऐसी ही कार्यवाही होनी चाहिए।    
मेहबूबा 1989 में अपनी बहन रुबैया का अपहरण कांड क्यों भूल जाती हो? तुम्हारा परिवार किस तरह आतंकवादियों को अपना दामाद मान समर्थन देता रहा है, जिस वजह से कश्मीर को अपनी कुर्सी और तिजोरी की खातिर बारूद के ढेर पर बैठा दिया। फिर कहती हो देशभक्त। जब अनुच्छेद 370 को हटाए जाने पर तुम्ही ने कहा था कि "कोई तिरंगा उठाने वाला भी नहीं मिलेगा", ये तुम्हारा ही बयान था। तुम्हारे जैसे बहरूपियों के रहते कश्मीर में "पाकिस्तान ज़िंदाबाद", "पाकिस्तान झंडे" और सुरक्षा कर्मियों को पीटा जाता था। सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरबाज़ी होती थी।     

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के एक बयान के कुछ हिस्से पढ़िए। उन्होंने लाल किले के सामने विस्फोट पर कहा है, “कश्मीर की मुसीबत लाल किले के सामने बोल पड़ी है।” जनसत्ता में छपे एक बयान के मुताबिक, उन्होंने कहा, “जो युवा डॉक्टर और इंजीनियर बनने के लिए तैयार थे, वे अब खुद को विस्फोट करने के लिए तैयार हैं, यह सोचने की जरूरत है।”

मुफ्ती ने कहा आगे है, “हमसे कहाँ गलती हुई। केंद्र सरकार को सोचना होगा। आपने यहाँ के युवाओं से वादा किया था कि आप उनके हाथों से पत्थर और बंदूकें लेकर उन्हें लैपटॉप देंगे। लेकिन आज आपने उसी युवा को आत्मघाती हमलावर बना दिया है।”

आतंकियों के लिए महबूबा का दर्द कोई पहली बार या नया नही हैं। आतंकी बुरहान वानी से लेकर अफजल गुरु और यासीन मलिक तक उनकी नजरों में हालात के मारे लोग रहे हैं। वो इनको मिली सजा के लिए न्याय व्यवस्था तक पर सवाल खड़े कर चुकी हैं और अब आतंक की पौध को तैयार करने का ठीकरा भी केंद्र सरकार के सिर मढ़ देना चाहती हैं।

                                     द वायर में महबूबा का अफजल और यासीन के लिए लेख

अब आते हैं महबूबा के बयान पर और समझने की कोशिश करते हैं कि वो केंद्र को निशाना बना रही हैं लेकिन क्यों? हो सकता है कि केंद्र की योजनाओं को लेकर सवाल हों, कई लोगों में नाराजगी पर भी हो सकती है लेकिन क्या इतनी नाराजगी कि लोग आतंकी बन जाएँ? जाहिर है ऐसा कतई नहीं है, तो बात साफ है कि महबूूबा मुफ्ती अपने इस बयान के सहारे किसी को तो बचाने की कोशिश कर रही हैं।

महबूबा मुफ्ती ने दोष बेशक केंद्र पर मढ़ दिया लेकिन शायद इसकी आड़ में जहर बोने वालों को बचाने की भी कोशिश चल रही है। वह उन्हें कवर फायर देने पर आमादा हैं जिनकी वजह से नौजवान किताबों और लैपटॉप से खीचकर बम-बारूद की ओर जा रहे हैं। जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन क्या दिल्ली से चलाए जाते हैं? कल को कहीं महबूबा यह सवाल ना उठा दें कि इन आतंकी संगठनों की विचारधाराएँ संसद में बैठकर लिख जा रही हैं?

महबूबा का सवाल आतंकी कैंपों में दी जाने वाली ट्रेनिंग पर नहीं है, वहाँ फैलाई जाने वाली नफरत पर नहीं है और पाकिस्तान से आने वाली फंडिंग पर भी नहीं है। वो बस केंद्र सरकार और उसकी नीतियों को ही आतंकवाद का जिम्मेदार बताना चाहती हैं। वो उस मजहबी कट्टरता को नहीं देखती हैं जो युवाओं के मन में भरी जा रही है।

भारत 140 करोड़ लोगों का देश है। तरह की परेशानियाँ यहाँ हैं, रोजगार की दिक्कतें हैं, असमानता और संघर्ष भी है लेकिन क्या देश के लोग बारूद बनकर फट गए हैं? क्या देश के युवा अपनी समस्याओं का समाधान टिफिन या जूते में बम बाँधकर निकालता है? यह कहना कि किसी युवा के हाथ में बंदूक इसलिए आई क्योंकि सरकार ने लैपटॉप नहीं दिया, आतंकियों की विचारधारा को एक राजनीतिक तर्क में बदलने की कोशिश है।

सरकार ने कश्मीर के विकास के लिए लगातार काम किया है। शिक्षा से लेकर पर्यटन और रोजगार के अवसर बनाए गए हैं लेकिन कुछ राजनीतिक दल और अलगाववादी समूह हर समस्या के पीछे एक ही कहानी बताते हैं- नाराजगी।

इसी कथित नाराजगी का इस्तेमाल आतंकी संगठन अपने रिक्रूटमेंट के लिए करते रहते हैं। गुमराह करने वाली किताबें, उकसाने वाले भाषण, मजहबी लोगों और स्थानों से फैलाए गए कट्टर संदेश और बॉर्डर के उस पार से आने वाले हथियार-पैसे, ये जिस आतंकी इकोसिस्टम की देन है उस पर महबूबा जैसे लोग सवाल नहीं उठाते हैं।

महबूबा का तर्क है कि केंद्र ने युवाओं को पत्थर और बंदूकें छुड़ाकर लैपटॉप देने का वादा किया था। हाँ, वादा किया था और बड़े पैमाने पर दिया भी गया। जम्मू-कश्मीर में स्कूल-कॉलेजों के लिए नई इमारतें बनीं, मेडिकल कॉलेजों की सीटें बढ़ीं, पर्यटन के रिकॉर्ड टूटे, खेल के मैदान भरे, उद्योग ने दस्तक दी और युवाओं ने स्टार्टअप शुरू किए।

महबूबा कभी यह नहीं पूछतीं कि इतने सकारात्मक बदलावों के बीच भी आतंकी संगठन क्यों सक्रिय हैं, कौन उन्हें बनाए रखता है, कौन उनके लिए भर्ती करने का माहौल तैयार करता है। यह सवाल भी तो उठना चाहिए कि जो युवा पढ़ाई के लिए तैयार थे उन्हें ‘शहादत’ के नाम पर कौन तैयार करता है?

केंद्र सरकार को दोष देना आसान है। आतंकी विचारधारा से सवाल पूछना और उसके कटघरे में खड़ा करना मुश्किल हैं। कश्मीर के युवाओं के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रही महबूबा मुफ्ती को इन चालबाजियों से बाहर आने की जरूरत है। जनता ने आपको नकार दिया है और आपके इन विचारों को अपने वोट से नकार दिया है।

कश्मीर के युवाओं ने बार-बार दिखाया है कि वे खेल, शिक्षा, कला और व्यापार अन्य क्षेत्रों में भी कमाल का काम कर सकते हैं। कुछ नेता जो चाहते हैं कि उनका दर्द के बहाने वो अपनी राजनीतिक दवाई तलाश कर सकें उनसे युवाओं को बचना ही होगा।

इसको (राशिद अल्वी को) तुरंत भेजो पाकिस्तान… ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने उठाए सवाल

                                                      राशिद अल्वी (फोटो साभार: X_ANI)
कांग्रेस नेता रशीद अल्वी ने भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर की सफलता पर सवाल उठाकर विवाद खड़ा कर दिया है। अल्वी ने पूछा कि क्या इस ऑपरेशन में हर एक आतंकवादी मारा गया और क्या अब पहलगाम जैसे हमले दोबारा नहीं होंगे।

राशिद अल्वी ने कहा, “हमारी सेना ने सरकार के आदेश का पालन किया, लेकिन ये न्यूनतम जवाब है। क्या सभी आतंकवादी खत्म हुए? पीएम मोदी ने कहा था कि आतंकवादियों का नामोनिशान मिटा देंगे, अगर ऐसा हुआ तो अच्छा है।” अल्वी का ये बयान कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के रुख से अलग है, जिसने ऑपरेशन की तारीफ की थी। यही नहीं, राशिद अल्वी सर्जिकल स्ट्राइक पर भी सबूत माँग चुके हैं।

ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों पर हमला किया। इनमें बहावलपुर, मुरीदके और सियालकोट जैसे इलाके शामिल थे, जहाँ जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के बड़े आतंकी सरगनाओं को निशाना बनाया गया। सभी हमले सफल रहे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रात भर इसकी निगरानी की। ये ऑपरेशन 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब था।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने ऑपरेशन की सराहना करते हुए कहा, “हमारी सेना ने आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की। कांग्रेस हमेशा राष्ट्रीय एकता और सेना के साथ खड़ी है।”

खरगे ने यह भी कहा कि पहलगाम आतंकवादी हमले के दिन से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्पष्ट रूप से सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ कोई भी निर्णायक कार्रवाई करने के लिए सशस्त्र बलों और सरकार के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय एकता और एकजुटता समय की माँग है और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हमारे सशस्त्र बलों के साथ खड़ी है। हमारे नेताओं ने अतीत में रास्ता दिखाया है और राष्ट्रीय हित हमारे लिए सर्वोच्च है।”

लेकिन अल्वी के बयान ने पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठाए हैं। उनके बयान को कुछ लोग सेना के मनोबल को कमजोर करने वाला मान रहे हैं। अल्वी का ये रवैया नया नहीं है; वे पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत माँग चुके हैं।

इस ऑपरेशन को देशभर में समर्थन मिल रहा है, लेकिन अल्वी जैसे नेताओं के बयान से कांग्रेस की मानसिकता पर सवाल उठ रहे हैं।

                                                      स्क्रीनशॉट X-ANI

कुछ लोगों ने तो सीधे कह दिया कि इसे (राशिद अल्वी को) तुरंत पाकिस्तान भेज देना चाहिए।

सिक्योरिटी नहीं आई काम, मौके पर ही ढेर हो गया वैष्णो देवी के भक्तों का कातिल आतंकी अबु कताल, कैसे पाकिस्तान में बैठे भारत के दुश्मनों को एक-एक कर ढेर कर रहे ‘अज्ञात’

                                                    अबु कताल (फोटो साभार: आजतक)
लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी अबु कताल की कल (16 मार्च 2025) पाकिस्तान के झेलम में अज्ञात लोगों द्वारा हत्या कर दी गई। घटना के वक्त अबु कताल अपने सिक्योरिटी गार्ड के साथ जा रहा था तभी, कुछ लोग आए और 15-20 राउंड फायरिंग की। इस हमले में उसके साथ उसका गार्ड भी मारा गया और उसने खुद भी वहीं दम तोड़ दिया।

कौन था अबु कताल?

अबु कताल पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का प्रमुख और मोस्ट वांटेड आतंकी था। उसकी संलिप्ता भारत में हुए कई हमलों में थी। वह आतंकी संगठन का मुख्य हैंडलर था जो पुंछ-राजौरी इलाके से एक्टिव था। उसका काम केवल आतंकी साजिश रचना नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर आतंकियों को LET से जोड़ना भी था। उसने सबसे पहली बार साल 2000 में जम्मू में घुसपैठ की थी। हाफिज सई से उसका रिश्ता चाचा-भतीजे वाला था। उसे हाफिज का दाहिना हाथ भी कहा जाता था।

आतंकी गतिविधियों में था शामिल

रिपोर्ट्स बताती हैं कि अबु कताल का नाम 1 जनवरी 2023 को राजौरी जिले के ढांगरी गांव में हुए एक आतंकवादी हमले में भी शामिल था, जिसमें सात लोग मारे गए थे। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल की थी जिसमें अबु कताल सहित अन्य आतंकियों का नाम शामिल किया गया था। इसके अलावा अबु कताल का नाम 9 जून 2024 को शिवखोड़ी में हुए आतंकी हमले भी आया था। उस हमले में 10 लोगों की मौत हो गई थी।

पाकिस्तान में किन-किन आतंकियों को ‘अज्ञात’ ने किया ढेर

पाकिस्तान में अज्ञात लोगों द्वारा आतंकियों के मारे जाने की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी बड़े-बड़े आतंकियों को अज्ञात द्वारा मारने के मामले सामने आए हैं।
  • साल 2024 में कुछ अज्ञात लोगों ने हाफिज सईद के ही करीबी लश्कर के आतंकी आमिर सरफराज की पाकिस्तान के लाहौर में हत्या कर दी गई थी। अज्ञात हमलावरों ने उसके ठिकाने पर डोरबेल बजाकर उसे मौत के घाट उतारा था।
  • साल 2023 में LeT के अकरम गाजी को खैबर पख्तूनख्वा में मोटरसाइकल पर सवार हमलावरों द्वारा गोली से मार दिया गया था।
  • मौलाना रहीम उल्लाह तरीक को भी 14 नवंबर 2023 को कराची के ओरंगी टाउन में गोली मार दी गई थी।
  • शाहिद लतीफ, भी जैश का मोस्ट वांटेड आतंकी था, उसकी हत्या भी 11 अक्तूबर 2023 को हुई थी।
  • आतंकी सरदार हुसैन अराइन को भी 1 अगस्त 2023 को कराची में उसी दुकान के पास गोली मारी गई थी।
  • ख्वाजा शाहिद, नाम का लश्कर आतंकी भी जो 2019 में जम्मू में सुंजवान आर्मी कैंप पर हुए हमले का मास्टरमाइंड था उसकी हत्या भी कश्मीर के पीओके में हुई थी। बाद में उसकी लाश सिर कटी अवस्था में मिली थी।
  • इसी प्रकार साल 2022 में कंधार विमान हाईजैक के आतंकी मिस्त्री जहूर की पाकिस्तान में हत्या कर दी गई थी।