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दिल्ली में 150 अवैध घरों पर बुलडोजर एक्शन, शालीमार बाग में चल रही अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई: छावनी में तब्दील पूरा इलाका


दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में रविवार (31 मई 2026) की सुबह बड़े पैमाने पर ध्वस्तीकरण अभियान शुरू किया गया। मैक्स हॉस्पिटल रोड पर सड़क चौड़ीकरण परियोजना के तहत 150 से अधिक अवैध निर्माणों को हटाया जा रहा है।

दिल्ली में राज चाहे किसी भी पार्टी का हो लेकिन अतिक्रमण पर कार्रवाही सिर्फ हिन्दू क्षेत्रों में ही क्यों होती है? जबकि हर पार्टी जानती है कि जितना अतिक्रमण मुस्लिम क्षेत्रों में हुआ है शायद ही कहीं और हुआ हो। जामा मस्जिद क्षेत्र का पुराना नक्शा निकालो और आज का फर्क अपने आप सामने आ जाएगा। इतना ही नहीं नक़्शे की भी जरुरत नहीं मकानों में निकले छज्जों के नीचे की सरकारी जमीन को दुकानों में मिला दिया गया है। पटरियां चलने काबिल नहीं। कहीं कारों का जमावड़ा और कहीं रिक्शाओं का। पैदल चलने वाला सड़क पर चलने को मजबूर है। मीना बाजार की कितनी बार सफाई की गयी, फिर वही अतिक्रमण।   

प्रशासन ने सुबह करीब चार बजे से कार्रवाई शुरू की। इलाके में किसी भी तरह की अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस और पैरामिलिट्री फोर्स के जवान बड़ी संख्या में तैनात किए गए हैं।

जिन मकानों पर कार्रवाई हो रही है, उनमें कई पुराने और बहुमंजिला भवन भी शामिल हैं। मकान मालिकों को पहले ही नोटिस देकर 30 मई तक घर खाली करने के निर्देश दिए गए थे। हालाँकि कुछ लोग अभी तक पूरी तरह सामान नहीं निकाल पाए थे।

सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद शुरू हुई कार्रवाई

यह ध्वस्तीकरण अभियान सड़क चौड़ी करने की योजना का हिस्सा है। प्रशासन के अनुसार, आउटर रिंग रोड से आजादपुर मंडी जाने वाले मार्ग को संजय गाँधी ट्रांसपोर्ट नगर से सीधे जोड़ने के लिए यह कदम उठाया गया है।

सड़क के बीच में आने वाले मकानों को हटाना जरूरी बताया गया था। प्रभावित लोगों ने इस कार्रवाई के खिलाफ पहले दिल्ली हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने भी शनिवार (30 मई 2026) तक मकान खाली करने का निर्देश दिया था।

नोटिस मिलने के बाद कई परिवार अपने घर खाली कर चुके थे और सामान भी हटा लिया था जबकि कुछ घरों में अभी भी सामान मौजूद है। तय समय सीमा समाप्त होने के बाद रविवार सुबह प्रशासन ने बुलडोजर कार्रवाई शुरू कर दी।

मौके पर प्रशासनिक अधिकारी भी मौजूद हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने और किसी तरह के विरोध-प्रदर्शन या झड़प की आशंका को देखते हुए बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती की गई है।

ईरान के सपोर्ट में शिया आबादी पाकिस्तान में कल्तेआम न मचा दे, इसलिए डरे असीम मुनीर ने NYT की रिपोर्ट ही उड़ा दी


पाकिस्तान में एक बार फिर मीडिया सेंसरशिप की बड़ी घटना सामने आई है। अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट को पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन में छपने से रोक दिया गया। यह रिपोर्ट पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते गुस्से पर आधारित थी।

रिपोर्ट का शीर्षक था- ‘Pakistan’s Leaders Try to Contain Rising Anger Over Iran War at Home’ यानी ‘पाकिस्तान के नेता ईरान युद्ध पर घरेलू गुस्से को काबू में करने की कर रहे कोशिश’। इस रिपोर्ट के लेखक हैं पाकिस्तानी फ्रीलांस पत्रकार जिया उर रहमान और ये रिपोर्ट 20 अप्रैल 2026 को न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट और अंतरराष्ट्रीय संस्करण में छपी, लेकिन पाकिस्तान में बिकने वाले प्रिंट संस्करण से पूरी तरह हटा दी गई।

NYT के पाकिस्तान और अफगानिस्तान ब्यूरो चीफ एलियन पेल्टियर ने खुद एक्स पर पोस्ट करके इसकी जानकारी दी। उन्होंने लिखा कि रिपोर्ट अमेरिका और बाकी दुनिया में तो छपी, लेकिन पाकिस्तान के प्रिंट एडिशन से हटा दी गई। स्थानीय प्रकाशक (एक्सप्रेस ट्रिब्यून या ट्रिब्यून ग्रुप) ने इसे हटाया।

पन्ने पर खाली जगह छोड़ दी गई और नीचे छोटा डिस्क्लेमर छपा- “यह लेख हमारे पाकिस्तानी प्रकाशन साझेदार द्वारा प्रिंट के लिए हटा दिया गया है। न्यूयॉर्क टाइम्स और इसके संपादकीय स्टाफ की इसमें कोई भूमिका नहीं है।” यह घटना पाकिस्तान में प्रेस की आजादी और धार्मिक संवेदनशीलता पर नई बहस छेड़ गई है।

NYT की रिपोर्ट में क्या लिखा था?

रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता का मुख्य बिचौलिया बन गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इस डिप्लोमेसी को लेकर काफी सक्रिय हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पाकिस्तान की इस भूमिका की तारीफ की है। लेकिन घरेलू स्तर पर हालात बिगड़ रहे हैं।

पाकिस्तान में करीब 3.5 करोड़ (35 मिलियन) शिया मुसलमान रहते हैं। वे ईरान से गहरे आध्यात्मिक संबंध रखते हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य टॉप क्लेरिक्स की अमेरिकी-इजरायली हमलों में मौत के बाद पाकिस्तान के शिया इलाकों में भारी आक्रोश फैल गया।

दरअसल, 18 मार्च 2026 को आर्मी चीफ आसिम मुनीर ने खुद शिया मौलानाओं की एक अहम मीटिंग बुलाई। मीटिंग का मकसद शिया समुदाय का गुस्सा शांत करना था ताकि शिया-सुन्नी टकराव न भड़के। मिलिट्री मीडिया विंग के मुताबिक आसिम मुनीर ने शिया मौलानाओं को चेतावनी दी कि किसी दूसरे देश में हुई घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

हालाँकि कुछ शिया मौलानाओं ने मीटिंग को तनावपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि उनकी पाकिस्तान के प्रति वफादारी पर सवाल उठाए गए। कुछ ने दावा किया कि आसिम मुनीर ने कहा कि जो ईरान के प्रति वफादार हैं, उन्हें पाकिस्तान छोड़ देना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया कि शिया समुदाय का गुस्सा बढ़ रहा है। ईरान युद्ध अब पाकिस्तान में ईंधन की महंगाई और बिजली कटौती के बाद दूसरा सबसे बड़ा घरेलू मुद्दा बन गया है। अधिकारी डर रहे हैं कि यह गुस्सा शिया-सुन्ना हिंसा को फिर भड़का सकता है। शिया अल्पसंख्यक पहले से ही आतंकवादी हमलों का शिकार होते रहे हैं।

रिपोर्ट में आगे लिखा गया कि पाकिस्तान बाहर शांति का दूत बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन घर में आग लगी हुई है। अगर घरेलू स्तर पर ही संप्रदायिक तनाव बढ़ा तो बाहर की डिप्लोमेसी कैसे काम करेगी? यह रिपोर्ट पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करती है- जहाँ एक तरफ आर्मी चीफ ट्रंप के ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ बनने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ 3.5 करोड़ शियाओं का गुस्सा काबू में करने के लिए मीटिंगें बुलानी पड़ रही हैं।

पहले भी ऐसी हरकतें कर चुका है पाकिस्तान

यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने NYT की रिपोर्ट को सेंसर किया हो। 2017 में मई महीने में पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ ने NYT के पाकिस्तान एडिशन में एक आर्टिकल लिखा था। उसका शीर्षक था ‘Pakistan Triangle of Hate: Taliban, Army and India’। इसमें पाकिस्तानी सेना के भारत विरोधी एजेंडे, तालिबान के साथ गठजोड़ और एहसानुल्लाह एहसान (टीटीपी नेता, जो लाहौर हमले और मलाला यूसुफजई पर हमले का जिम्मेदार था) जैसे आतंकियों से संबंधों का जिक्र था। लोकल पब्लिशर ने इसे छापने के बाद पन्ने से पूरी तरह साफ कर दिया। जगह खाली छोड़ दी गई। नीचे नोट लिखा गया कि NYT का इसमें कोई हाथ नहीं है।

जनवरी में जेन-जी के लिए लेख को हटवाया गया

जनवरी 2026 में एक और बड़ा मामला सामने आया। पाकिस्तानी पीएचडी स्कॉलर जोरैन निजामानी (अमेरिका में पढ़ रहे, अभिनेता फाजिला काजी और कैसर खान निजामानी के बेटे) ने एक्सप्रेस ट्रिब्यून में ‘It Is Over’ नाम का लेख लिखा था। लेख में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की पुरानी पीढ़ी और सत्ता पर काबिज लोग युवाओं (Gen Z) पर अब कोई असर नहीं छोड़ रहे।

उन्होंने लिखा कि जबरन देशभक्ति, भाषण और सेमिनार अब काम नहीं कर रहे। युवा इंटरनेट और जानकारी की वजह से सब समझ रहे हैं। वे बराबरी, अधिकार और सही व्यवस्था चाहते हैं। जो बोलता है उसे चुप करा दिया जाता है, इसलिए कई युवा चुपचाप देश छोड़ रहे हैं।

इस लेख को भी कुछ ही घंटों में वेबसाइट से हटा दिया गया था। हालाँकि इसके बाद इस लेख के स्क्रीनशॉट वायरल हो गए। सोशल मीडिया पर जोरैन को नेशनल हीरो कहा जाने लगा। PTI, मानवाधिकार संगठनों और पत्रकारों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया।

ये सभी घटनाएँ एक पैटर्न दिखाती हैं कि पाकिस्तान में आर्मी चीफ आसिम मुनीर के नेतृत्व में मीडिया पर सख्त नियंत्रण है। संवेदनशील मुद्दे चाहे सेना की आलोचना हो, युवाओं का असंतोष हो या शिया समुदाय का गुस्सा, इन सबको दबाया जा रहा है।

सरकार का तर्क है कि ऐसी रिपोर्ट्स से संप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह असल में सच्चाई छिपाने की कोशिश है। पाकिस्तान प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 158वें स्थान पर है। स्वतंत्र पत्रकारों पर दबाव, बैंक खाते फ्रीज करने, सरकारी विज्ञापन रोकने और झूठी खबर फैलाने के कानून के तहत गिरफ्तारियाँ आम बात हैं।

पाकिस्तान की कथनी और करनी में अंतर, खोल रहा खुद के चैनल

अब सवाल यह है कि पाकिस्तान बाहर दुनिया के सामने ‘शांति का दूत’ और ‘मॉडर्न डिप्लोमेटिक पावर’ का चेहरा दिखाने की कोशिश क्यों कर रहा है, जबकि अंदर मीडिया को इतना कस रहा है?

इस सवाल का जवाब NYT का एक और आर्टिकल देता है जो मार्च 2026 में छपा था- ‘How Pakistan Is Trying to Reshape Its Image Abroad’। इस रिपोर्ट में एलियन पेल्टियर और जिया उर रहमान ने विस्तार से बताया कि पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ विदेशी छवि सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर मीडिया अभियान चला रही हैं।

पाकिस्तान ने इंडिया और अफगानिस्तान के तालिबान सरकार के खिलाफ नई अंग्रेजी न्यूज चैनल शुरू किए हैं। PTV (पाकिस्तान टीवी) को फिर से लॉन्च किया गया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद चैनल के हेडक्वार्टर जाकर कहा कि इसका डिजिटल डिपार्टमेंट विदेशी प्रोपगैंडा का मुकाबला करेगा और पाकिस्तान का मैसेज दुनिया तक पहुँचाएगा। सुरक्षा एजेंसियाँ पत्रकारों से संपर्क करके स्टेट-फ्रेंडली चैनल शुरू करने को कह रही हैं। टैक्स छूट और फंडिंग का लालच दिया जा रहा है।

इन चैनल्स का मुख्य टारगेट भारत और अफगानिस्तान में तालिबान है। वे पाकिस्तानी मिलिट्री की भाषा में खबरें चला रहे हैं, जैसे भारत पर हमले, तालिबान के खिलाफ कार्रवाई आदि। लेकिन स्वतंत्र मीडिया पर दबाव बढ़ रहा है। डॉन अखबार की सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। कई पत्रकार गिरफ्तार कि गए। रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ट्रकी और कतर जैसे देशों की तरह स्टेट-बैक्ड चैनल (TRT, अल जजीरा) की नकल करना चाहता है, लेकिन फंडिंग और विजन की कमी है।

पाकिस्तान में दूर नहीं ‘कयामत’ के दिन!

यह पूरा मामला दिखाता है कि पाकिस्तान दोहरी नीति चला रहा है। बाहर ट्रंप से दोस्ती और शांति की बातें, लेकिन वो अंदर से सेंसरशिप और दबाव की नीति लागू कर रहा है। वैसे, माना ये भी जा सकता है कि कहीं NYT की रिपोर्ट हटाने से शिया समुदाय का गुस्सा और बढ़ गया तो? इतिहास गवाह है कि दबाया हुआ सच एक न एक दिन बाहर आता ही है। पाकिस्तान की मीडिया स्ट्रैटजी कितनी कामयाब होगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन फिलहाल यह साफ है कि आसिम मुनीर की कठपुतली सरकार अभिव्यक्ति की आजादी को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का नाम देकर कुचल रही है।      (साभार) 

मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश से इनकार पर ईसाई अधिकारी को हटाया, सुप्रीम कोर्ट पहुँचा मामला: धर्म देखकर नहीं, कमांड से चलती है भारतीय सेना


भारत में अक्सर कहा जाता है कि लोगों का गुस्सा जल्दी शांत हो जाता है और उनकी ध्यान देने की क्षमता बहुत कम होती है। लेकिन जब मुख्य न्यायाधीश बी आर गवाई पर किसी ने जूता फेंका, संभवतः उनके उस बयान को लेकर जो उन्होंने भगवान विष्णु की मूर्ति की बहाली के मामले में दिया था, तब सोशल मीडिया और मीडिया हंगामा मच गया। विपक्षी पार्टियाँ और भारत के ‘सिक्युलर’ दलों के समर्थक इसे ‘जातिवाद’ से जोड़ने लगे, जबकि कुछ पत्रकार ‘संस्थाओं का सम्मान’ जैसी बातें करने लगे।

कुछ दिन बाद, जब यह मामला खुद ही शांत हो जाना चाहिए था, तब भी कुछ लोग जैसे अरफा ख़ानुम शेरवानी और अन्य वामपंथी इसे जातिवादी नजरिए से दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे हिंदू समाज में दरार डाल सकें, जो मोदी को लगातार तीसरी बार सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

लेकिन जब देश इस मामले में उलझा हुआ था, उसी समय एक और महत्वपूर्ण न्यायिक मामला चुपचाप सामने आया। यह मामला न्यायपालिका की प्रतिष्ठा की नहीं बल्कि भारतीय सेना के अनुशासन, पदानुक्रम और कर्तव्य की सच्चाई को सामने लाता है।

यह मामला एक ईसाई सेना अधिकारी, लेफ्टिनेंट सैमुअल कमलेसान का है। उन्होंने अपनी रेजिमेंट के मंदिर में एक छोटा धार्मिक अनुष्ठान करने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि यह उनके ईसाई धर्म के खिलाफ है। इस कारण उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और 5 अक्टूबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में यह मामला सुना गया। सवाल यह था कि क्या किसी व्यक्ति का धार्मिक अधिकार (अनुच्छेद 25) सेना के कठोर अनुशासन और यूनिट की एकता से ऊपर हो सकता है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले ही उनके बर्खास्तगी के फैसले को सही ठहराया था और कहा था कि किसी के कारण कानून द्वारा दिए गए आदेश का पालन न करना अनुशासनहीनता है। कोर्ट का तर्क साफ था: सेना में धर्म व्यक्तिगत होता है लेकिन अनुशासन संस्थागत।

यह मामला किसी व्यक्ति के धर्म का उल्लंघन नहीं है। यह समझने का मामला है कि सेना कोई मंदिर, मस्जिद या चर्च नहीं है बल्कि सेवा का पवित्र स्थान है। यहाँ हर सैनिक केवल तिरंगे के सामने झुकता है।

मामला: जहाँ एक ईसाई सैनिक ने मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने से इनकार कर दिया

लेफ्टिनेंट कमलेसान का सेवा रिकॉर्ड बताता है कि वह 3rd Cavalry Regiment से जुड़े थे, जिसमें सिख, जाट और राजपूत सैनिक थे। इस रेजिमेंट में एक मंदिर और एक गुरुद्वारा था, कोई ‘सर्व धर्म स्थल’ नहीं। वह अपने सैनिकों के साथ दीवाली, गुरुपरब और होली जैसे त्योहारों में हिस्सा लेते थे। सभी के अनुसार वह एक ईमानदार और सम्मानजनक अधिकारी थे।

लेकिन जब उन्हें रेजिमेंटल अनुष्ठान के तहत मंदिर के भीतर जाकर आरती करने का आदेश मिला, तो उन्होंने इससे विनम्रता से मना कर दिया। उनका कहना था कि यह उनके ईसाई धर्म के एक ईश्वर में विश्वास के खिलाफ होगा।

यहाँ पर नागरिक दृष्टिकोण असफल होता है। सेना व्यक्तिगत पसंद पर नहीं चलती। जब कोई वरिष्ठ अधिकारी आदेश देता है, तो इसमें ‘अगर’ या ‘लेकिन’ नहीं होता। कोई संकोच, इंकार या अपवाद कमांड की दीवार में दरार डालता है और युद्ध के मैदान में ये दरारें घातक हो सकती हैं।

सेना ने हाईकोर्ट को स्पष्ट रूप से बताया कि किसी देवता के प्रति अनुष्ठान रेजिमेंट की पहचान, एकता और मनोबल का हिस्सा हैं। जब कोई अधिकारी इस प्रथा से दूरी बनाता है, तो वह अपने सैनिकों से अलग हो जाता है, जिनकी आस्था अक्सर उनके युद्ध के नारे और साहस से जुड़ी होती है।

यह मामला हिंदू बनाम ईसाई का नहीं है। रेजिमेंट के धार्मिक अनुष्ठान पूजा के लिए नहीं, बल्कि सैनिकों के बीच एकता और तालमेल बनाए रखने के लिए होते हैं। यह वैसा ही है जैसे युद्ध से पहले की अरदास या ‘बजरंग बली की जय’ का युद्ध नारा, जो धार्मिक बयान नहीं बल्कि सैनिकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने का साधन है।

क्यों सेना लोकतंत्र दिखाने की जगह नहीं होती?

नागरिक अक्सर यह समझते हैं कि सेना भी व्यक्तिगत पसंद या लोकतांत्रिक बहस पर चलती है, लेकिन यह गलत है। सेना कोई लोकतंत्र नहीं है। यह आदेश और आज्ञाकारिता पर चलती है।

हर आदेश, चाहे वह कितना भी छोटा हो, जूते चमकाने, राइफलें साफ करने या कोई प्रतीकात्मक अनुष्ठान करने का पवित्र माना जाता है। यदि कोई सैनिक अपने धर्म या व्यक्तिगत आस्था के आधार पर तय करे कि किस आदेश का पालन करना है और किसे अनदेखा करना है, तो सेना का ढाँचा ही कमजोर पड़ जाता है।

सोचिए अगर कोई सैनिक कहे कि वह दुश्मन पर गोली नहीं चलाएगा क्योंकि उसका धर्म हत्या की मनाही करता है, या कोई झंडा फहराने से मना कर दे क्योंकि उसका धर्म राष्ट्रीय प्रतीकों को मान्यता नहीं देता। ऐसे निर्णय सेना की एकता और युद्ध क्षमता के लिए खतरा हैं।

सेना की शपथ किसी ईश्वर के प्रति नहीं होती बल्कि भारत के संविधान, गणतंत्र और सेनापति के प्रति होती है, जो जनता की सामूहिक इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। वर्दी पहनते ही धर्म, जाति और पंथ पीछे छोड़ दिए जाते हैं। इसलिए सेना गर्व से कहती है: ‘सैनिकों का धर्म उनकी यूनिट है।’

व्यक्तिगत अपवादों का खतरा

लेफ्टिनेंट कमलेसान के समर्थक कहते हैं कि उन्होंने सम्मान दिखाया। उन्होंने मंदिर के बाहर सम्मानपूर्वक खड़े होकर जूते उतारे, अनुष्ठान का पालन देखा और भाईचारे को बनाए रखा। यह सही है। लेकिन अनुशासन का सवाल इरादे का नहीं बल्कि पालन का होता है। उन्हें असम्मान के लिए नहीं बल्कि आज्ञा न मानने के लिए दंडित किया गया।

जिस पल कोई सैनिक किसी आदेश की सीमाओं पर सवाल उठाने या बातचीत करने लगता है, चाहे वह बहुत विनम्रता से ही क्यों न करे तो वह उस व्यवस्था में ‘व्यक्तिगत सोच’ (subjectivity) को शामिल कर देता है, जिसे बिल्कुल स्पष्ट और पूर्ण (absolute) रहना चाहिए। और आदेशों में यह पूर्ण अनुशासन तानाशाही नहीं है।

कश्मीर में नक्सल-उन्मूलन अभियान या मणिपुर में घात लगने जैसी स्थितियों में कोई कमांडिंग ऑफिसर यह समझाने का समय नहीं पा सकता कि आदेश क्यों पालन करना चाहिए। सैनिकों को सहमति देने का विकल्प नहीं होता, उन्हें आदेश का पालन करना पड़ता है।

इसी वजह से एक प्रतीकात्मक आदेश को भी सिद्धांत का मामला माना जाता है। इसलिए आज्ञा का पालन ना करने पर सख्त दंड जरूरी होता है, ताकि अन्य सैनिकों के लिए उदाहरण बने। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इसी बात को सही ठहराया। शांति के समय में किसी सैनिक की इनकार की कार्रवाई, युद्ध में किसी अन्य सैनिक की हिचकिचाहट बन सकती है। सेना ऐसे कदमों को अहंकार से नहीं बल्कि समझदारी और अनुशासन बनाए रखने के लिए दंडित करती है।

फॉक्सहॉल के बिल में विश्वास

कोई यह नहीं कह सकता कि सैनिक धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं। वास्तव में, धर्म अक्सर उन्हें लड़ने, सहने और बलिदान देने की ताकत देता है। गोरखा सैनिक खुकुरी लेकर देवी काली का स्मरण करते हैं, सिख सैनिक ‘बोले सो निहाल’ का नारा लगाते हैं और राजपूताना राइफल्स ‘राजा रामचंद्र की जय’ कहते हैं। धर्म सेना की सांस्कृतिक पहचान में गहराई से बुना हुआ है।

लेकिन एक सीमा है। सेना धर्म को ताकत के स्रोत के रूप में मानती है, विभाजन के कारण नहीं। हर रेजिमेंट अपने दूसरे धर्म के त्योहारों को भी मनाता है, हिंदू ईद मनाते हैं, मुस्लिम दिवाली मनाते हैं और ईसाई होली का आनंद लेते हैं। फिर भी कोई भी व्यक्तिगत धर्मिक विश्वास सामूहिक पहचान से ऊपर नहीं होता।

सैनिक निजी जीवन में धार्मिक हो सकता है, लेकिन वर्दी में वह एक अरब भारतीयों की आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय सेना में सेवा करना स्वयं एक पवित्र कार्य है, एक प्रकार की पूजा, जहाँ देवता राष्ट्र है और प्रार्थना सेवा है।

सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट, जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई में, सही तरीके से यह सवाल उठा रही है: क्या धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सेना के अनुशासन के अधीन होता है? यदि भारत को सुरक्षित रहना है, तो इसका उत्तर केवल ‘हाँ’ हो सकता है।

सेना व्यक्तिगत आस्था के लिए नहीं बनी है। यह सामूहिक विश्वास की रक्षा के लिए है, 1.4 अरब भारतीयों के देश की सुरक्षा में भरोसे के लिए। कोर्ट का काम किसी एक व्यक्ति के धर्म को तौलना नहीं है, बल्कि उस शक्ति की नैतिक और संचालन क्षमता को बनाए रखना है, जो व्यवस्था और अराजकता के बीच अंतिम रक्षा की रेखा है।

जब हाईकोर्ट ने कहा कि सेना में चीजें नागरिक दुनिया से अलग होती हैं, इसका मतलब धर्म की अवहेलना नहीं बल्कि सेवा की पवित्रता की रक्षा से था। उसी तरह जैसे डॉक्टर को सर्जरी करते समय भावना को अलग रखना पड़ता है  या न्यायाधीश को फैसला देते समय पूर्वाग्रह को अलग रखना पड़ता है, सैनिक को आदेश का पालन करते समय व्यक्तिगत विश्वास को अलग रखना पड़ता है।

धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय अनुशासन

एक उदार लोकतंत्र में धार्मिक स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन सेना में अनुशासन सबसे पवित्र होता है। संविधान खुद इस अंतर को मान्यता देता है। अनुच्छेद 33 संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों के कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों को सीमित कर सके, ताकि वे अपने कर्तव्यों का सही तरीके से पालन कर सकें और अनुशासन बनाए रख सकें।

क्योंकि वर्दी में मिली स्वतंत्रता पूर्ण नहीं होती, वह देश की सुरक्षा पर निर्भर करती है। लेफ्टिनेंट कमलेसान की धार्मिक चिंता सच्ची हो सकती है, लेकिन उनका इनकार उस व्यवस्था को चुनौती देता है जो व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर संस्थागत अनुशासन पर टिकी है और यही वर्दी का सबसे बड़ा विरोधाभास है। स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए, सैनिक को अपनी कुछ स्वतंत्रता त्यागनी पड़ती है।

बड़ा संदेश

यह मामला किसी ईसाई अधिकारी को सजा देने का नहीं है। यह भारत को यह याद दिलाने का है कि जब कोई सैनिक सैन्य वर्दी पहनता है, तब उसका एकमात्र धर्म कर्तव्य होता है।

रेजिमेंट का मंदिर कोई धार्मिक स्थल नहीं बल्कि परंपरा और निरंतरता का प्रतीक है, वह स्थान जहाँ पीढ़ियों से सैनिक युद्ध पर जाने से पहले प्रार्थना करते हैं, जहाँ शहीदों के नाम दर्ज हैं और जहाँ भाईचारे की भावना जीवित रहती है।

जब कोई युवा अधिकारी उस अनुष्ठान को करने से मना करता है जो उसके साथियों को इस विरासत से जोड़ता है, तो वह अनजाने में ही उस पवित्र भावना को तोड़ देता है, यह किसी देवता की नहीं, बल्कि रेजिमेंट की आत्मा की अवमानना होती है। क्योंकि रेजिमेंट केवल सैन्य इकाई नहीं होती, वह भाईचारे और बलिदान की जीवंत परंपरा होती है।

एक सैनिक का एकमात्र धर्म: राष्ट्र सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट को यह याद रखना होगा कि जहाँ पुजारी, मौलवी और पादरी अपनी आस्था में अपना सर्वोच्च धर्म पाते हैं, वहीं एक सैनिक का मंदिर उसका रणक्षेत्र होता है और उसका ईश्वर भारत माता।

पुजारी का धर्म उसे ईश्वर की पूजा सिखाता है, जबकि सैनिक का धर्म उसे उन लोगों की रक्षा करना सिखाता है जो स्वतंत्र रूप से पूजा करते हैं। अगर धर्म आज्ञा पालन में बाधा बनने लगे, तो कल वर्दी सिर्फ कपड़ा बनकर रह जाएगी।

भारत की सेनाएँ न हिंदू हैं, न मुस्लिम, न सिख, न ईसाई, वे उस सभ्यतागत राष्ट्र की फौलादी रीढ़ हैं जिसने कई युद्ध लड़े और जीते हैं। हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर में मिली शानदार जीत इसका उदाहरण है, क्योंकि उन सैनिकों ने कभी यह नहीं पूछा कि युद्ध से पहले किस ईश्वर का नाम लिया जा रहा है।

लेफ्टिनेंट कमलेसान की आस्था का सम्मान है लेकिन उनके इनकार का नहीं। क्योंकि जब धर्म और कर्तव्य आमने-सामने आते हैं, तो भारतीय सैनिक के लिए हमेशा कर्तव्य ही सर्वोपरि होता है।

बिहार : लालू-राज में खूब बने बोगस वोटर, अब SIR में 65 लाख ऐसे वोटर के नाम हटे

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से विपक्ष में खलबली मचना स्वाभाविक है। इतने बोगस वोटर्स सामने आ रहे हैं जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। शायद यही वजह है कि विपक्ष EVM की बजाए बैलेट पेपर की मांग कर रही थी ताकि पोलिंग बूथ लूटकर इन बोगस वोटरों के वोट भी डाल दिए जाएं, जैसाकि पहले होता रहा था। बैलेट पेपर तो शायद अब भारत में इतिहास ही बनकर रह जायेगा। 

लेकिन वोटर लिस्ट में बोगस और मरे हुए लोगों के नाम होने पर सभी पार्टियां जिम्मेदार हैं। पोलिंग एजेंटों ने क्यों नहीं चुनावों से पहले इनके वोट कटवाए? क्या इनमे सभी पार्टियों के वोटर शामिल थे? कटघरे में वैसे तो सारी ही पार्टियां हैं। अब कोई ईमानदारी का चोला ओढ़ ले तो उससे पाप नहीं धुल जाते। हमाम में नंगे सभी है।   
बिहार में लालू-राज की कारगुजारियां एक बार फिर सामने आईं हैं। चुनाव जीतने के लिए उनके राज में ऐसे-ऐसे लोगों के बोगस मतदाता पहचान पत्र बना दिए गए, जो बिहार में रहते ही नहीं हैं। इतना ही नहीं जांच में अब मृतकों तक के वोटर आईकार्ड मिले हैं, जिनके माध्यम से राजद उम्मीदवारों को जिताने के प्रयास किए जाते थे। बिहार में मतदाता पुनरीक्षण के लिए एक महीने चले विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में बिहार के 7.89 करोड़ में से 7.24 करोड़ मतदाताओं (91.69 प्रतिशत) ने गणना प्रपत्र जमा करा दिए हैं। निर्वाचन आयोग ने ताजा रिपोर्ट जारी कर बताया कि इस दौरान 22 लाख (2.83 प्रतिशत) ऐसे मतदाताओं की पहचान हुई है, जिनकी मौत हो चुकी है। 36 लाख (4.59 प्रतिशत) लोग या तो पिछले पते से स्थायी रूप से स्थानांतरित हो गए है या उनका पता नहीं चला। सात लाख (0.89 प्रतिशत) मतदाताओं ने कई जगह पंजीकरण कराया हुआ है। इनके नाम हटाए जाएंगे। इधर बिहार की तर्ज पर विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम 2025 (एसआईआर) को राजस्थान में भी लागू कराने का खाका चुनाव आयोग ने तैयार कर लिया है। सिर्फ औपचारिक तिथि का ऐलान बाकि है। इसके तहत राजस्थान के 5 करोड़ 48 लाख वोटरों में से 2 करोड़ 57 लाख 14461 वोटरों को इस दायरे में लाया 
जाएगा।

व्यापक पुनरीक्षण के तहत 7.24 करोड़ नागरिकों के वैधता फॉर्म इकट्ठे
इस व्यापक पुनरीक्षण के तहत 7.24 करोड़ नागरिकों के वैधता फॉर्म इकट्ठे किए गए। इसके लिए बूथ स्तर अधिकारी (BLO) और बूथ स्तर एजेंट (BLA) ने अहम भूमिका निभाई। इन्होंने घर-घर जाकर नागरिकों से आवश्यक जानकारी एकत्र की। 25 जुलाई 2025 तक पहले चरण को 99.8% कवरेज के साथ सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया। अब चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के पहले चरण के आंकड़े जारी कर दिए हैं। इसके मुताबिक बिहार में अब 7.24 करोड़ वोटर हैं। पहले यह आंकड़ा 7.89 करोड़ था। वोटर लिस्ट रिवीजन के बाद 65 लाख नाम सूची से हटा दिए गए हैं। हटाए गए नामों में वे लोग शामिल हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं या फिर कहीं और स्थायी रूप से रह रहे हैं या जिनका नाम दो वोटर लिस्ट में दर्ज था। इनमें से 22 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। 36 लाख मतदाता स्थानांतरित पाए गए, जबकि 7 लाख लोग अब किसी और क्षेत्र के स्थायी निवासी बन चुके हैं।

बिहार में 7.9 करोड़ में से 91 प्रतिशत फॉर्म जमा, 22 लाख मृतकों की पहचान
बिहार में इस साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव के दौरान शत-प्रतिशत सही वोटिंग के लिए चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम 2025 (एसआईआर) शुरू किया था। इस पर कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल समेत विपक्षी पार्टियों ने काफी हायतौबा मचाई। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय तक में याचिका दायर कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिन पहले वोटर लिस्ट रिवीजन जारी रखने की अनुमति दे दी। अदालत ने इसे संवैधानिक जिम्मेदारी बताया। चुनाव आयोग की ओर से यह विशेष अभियान 24 जून 2025 को शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य फर्जी, दोहरे नामांकन और स्थानांतरित मतदाताओं को सूची से हटाना और नए योग्य मतदाताओं को जोड़ना था। निर्वाचन आयोग ने एसआईआर की जारी रिपोर्ट बताया है कि 36 लाख लोग या तो पिछले पते से स्थायी स्थानांतरित हो गए हैं या उनका पता नहीं है। इसके साथ ही 7 करोड़ से ज्यादा फॉर्म जमा हुए हैं और अब तक 22 लाख मृत वोटरों की पहचान हो चुकी है।

व्यापक स्तर पर चला अभियान, 5.7 करोड़ नंबरों पर भेजे मैसेज
चुनाव आयोग के मुताबिक विशेष गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम 2025 (एसआईआर) व्यापक स्तर पर चलाया गया। इसके तहत करीब 5.7 करोड़ मोबाइल नंबरों पर पुनरीक्षण समझाने वाले एसएमएस भेजे गए। बिहार के प्रवासियों में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से देशभर में 246 अखबारों में विज्ञापन दिए गए। कुल 29 लाख गणना फॉर्म ऑनलाइन भरे गए। इसमें 16 लाख से अधिक फॉर्म ऑनलाइन, जबकि 13 लाख से अधिक फॉर्म डाउनलोड किए गए। बिहार के सभी 261 शहरी व स्थानीय निकायों के सभी 5683 वाडों में विशेष शहरी शिविर लगाए गए। आयोग ने यह भी तय किया कि बिना किसी स्पष्ट आदेश और वाजिब कारण के ड्रॉफ्ट मतदाता सूची से कोई भी नाम नहीं हटाया जाएगा। चुनाव आयोग के मुताबिक, बूथ स्तर के अधिकारियों को ये मतदाता नहीं मिले और न ही उन्हें गणना फार्म वापस मिले, क्योंकि या तो वे अन्य राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता बन गए थे, या वहां मौजूद नहीं थे। इनकी वास्तविक स्थिति 1 अगस्त तक फॉमों की जांच के बाद पता चलेगी। आयोग ने कहा है कि 1 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। साथ ही हर बूथ की मुद्रित और डिजिटल प्रतियां सभी 12 दलों को दी जाएगी। कोई मतदाता या दल 1 अगस्त से 1 सितंबर तक अपने दावे आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं।

बिहार में 1 अगस्त को जारी होगी प्री-वोटर लिस्ट, एक महीने का मौका
बिहार राज्य निर्वाचन आयोग से जुड़े लोगों का कहना है, ‘अभी ज्यादा से ज्यादा फॉर्म कलेक्ट कराए जा रहे हैं। इसके बाद जांच होगी। सूची में जो भी शिकायत आएगी, उसकी जांच होगी। कोई गलत तरीके या जाली कागजात के सहारे वोटर लिस्ट में शामिल होगा तो वैधानिक कार्रवाई होगी।’ निर्वाचक निबंधन पदाधिकारी (ERO) 1 अगस्त 2025 को प्रारूप निर्वाचक नामावली प्रकाशित करेंगे और उसमें किसी भी सूची में सुधार के लिए सुझाव आमंत्रित करेंगे। इसमें सुधार के लिए राजनीतिक दलों/मतदाताओं को एक महीने का समय दिया जाएगा। चुनाव आयोग के मुताबिक, यदि किसी मतदाता को ERO के निर्णय से कोई आपत्ति हो तो वह जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 24 के तहत जिला मजिस्ट्रेट एवं मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के समक्ष अपील कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक जिम्मेदारी बताया, फाइनल
सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिन पहले वोटर लिस्ट रिवीजन जारी रखने की अनुमति दी थी। अदालत ने इसे संवैधानिक जिम्मेदारी बताया था। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) यानी वोटर लिस्ट रिवीजन के लिए SIR के दौरान आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड को भी पहचान पत्र माना जाए। दूसरी ओर बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट का फाइनल फैसला आज (सोमवार) को आ सकता है। आयोग ने इस प्रक्रिया को लोकतंत्र की शुचिता के लिए जरूरी बताया है। दूसरी ओर बोगस वोटर का मतदाता सूची से नाम कटने के कारण राजद सांसद मनोज झा अंट-शंट आरोप लगा रहे हैं। इससे पहले 10 जुलाई को कोर्ट ने कहा था कि आधार, राशन कार्ड और वोटर आईडी को पहचान पत्र के रूप में माना जा सकता है।

बिहार में अभियान की सफलता के बाद पूरे देश में लागू करने की तैयारी
चुनाव आयोग ने इस सफलता का श्रेय राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, 38 जिलों के डीएम, 243 ERO, 2,976 AERO, 77,895 BLO, और 12 प्रमुख राजनीतिक दलों के 1.60 लाख BLA को दिया है। इस दौरान BLA की संख्या में 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। अब अगले चरण में, 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 के बीच ऐसे सभी योग्य नागरिक जिनका नाम किसी कारणवश सूची में शामिल नहीं हो सका है, उन्हें ड्राफ्ट लिस्ट में नाम जुड़वाने का मौका मिलेगा। वहीं जिनके नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज हैं, उनका नाम केवल एक स्थान पर रखा जाएगा। आयोग ने यह भी बताया कि बिहार में इस अभियान की सफलता को देखते हुए इसे अब पूरे भारत में लागू करने की योजना बनाई जा रही है।

VVS लक्ष्मण की जगह अपने नाम पर करवाया स्टैंड, अब हैदराबाद स्टेडियम से हटेगा अज़हरुद्दीन का नाम: HCA को आदेश, कांग्रेस के हैं कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष


‘हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन’ (HCA) को राजीव गाँधी इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम के नॉर्थ पवेलियन स्टैंड से भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन का नाम हटाने के लिए कहा गया है। उनपर HCA का अध्यक्ष रहते पक्षपात के आरोप लगे हैं।

HCA के नैतिकता अधिकारी व लोकपाल पूर्व न्यायाधीश V ईश्वरैया ने ये आदेश दिया। ‘लॉर्ड्स क्रिकेट क्लब’ ने इस संबंध में शिकायत करते हुए कहा था कि मोहम्मद अज़हरुद्दीन ने HCA अध्यक्ष रहते अपने नाम पर उप्पल स्टेडियम के स्टैंड का नाम करवा लिया था। जस्टिस ईश्वरैया ने कहा कि जनरल बॉडी द्वारा इस फ़ैसले को लेकर कुछ नहीं करना ये बताता है कि पूर्व कप्तान ने अपने पद का दुरुपयोग किया।

25 पन्नों के आदेश में इसे हितों के टकराव का स्पष्ट मामला बताया गया। IPL 2025 के 5 मैच अभी हैदराबाद में होने हैं, ऐसे में मोहम्मद अज़हरुद्दीन के नाम से टिकट भी प्रिंट न करने का आदेश दिया गया है। इससे पहले इस स्टैंड का नाम VVS लक्ष्मण के नाम पर था, जिन्हें भारतीय टेस्ट बल्लेबाजी में निचले क्रम में सबसे उम्दा बल्लेबाज व कलाइयों के जादूगर के रूप में जाना जाता रहा है।

मोहम्मद अज़हरुद्दीन पिछले 5 वर्षों से HCA के अध्यक्ष हैं और एक दशक से तेलंगाना कांग्रेस  कमिटी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं। साथ ही वो उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद से कांग्रेस के सांसद भी रहे हैं।

उत्तर प्रदेश : वाराणसी में साईं प्रतिमाओं को गंगा में कर रहे प्रवाहित

             कई मंदिरों से साईं की मूर्ति हटा कर गंगा नहीं में किया जा रहा विसर्जित (चित्र- वायरल वीडियो स्क्रीनशॉट)
उत्तर प्रदेश की धर्मनगरी काशी में कई मंदिरों से शिरडी साईं की प्रतिमाएँ हटाई जा रही हैं। अब तक 14 मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटा दी गई हैं। यह कदम केंद्रीय ब्राह्मण सभा के विरोध के बाद उठाया गया है, जिसमें साईं की पूजा को सनातन धर्म विरोधी बताया गया था। मूर्तियाँ हटाने से पहले संबंधित मंदिरों की सहमति ली गई है और उन्हें विधि-विधान से गंगा में विसर्जित किया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, वाराणसी के जिन प्रमुख मंदिरों से साईं की प्रतिमाएँ हटाई गई हैं, उनमें बड़ा गणेश मंदिर, त्र्यंबकेश्वर मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर और पुरुषोत्तम मंदिर समेत 14 मंदिर शामिल हैं। सनातन रक्षक दल के प्रदेश अध्यक्ष अजय शर्मा ने बताया कि कुल 100 मंदिरों की सूची बनाई गई है, जहाँ से साईं की मूर्तियों को हटाया जाएगा। इनमें अगस्त्यकुंडा और भूतेश्वर जैसे पौराणिक स्थल भी शामिल हैं।

अजय शर्मा ने दावा है कि काशी महादेव शिव की नगरी है, और अनजाने में लोग साईं की पूजा करने लगे थे। उनका दावा है कि जिन मंदिरों से साईं की मूर्तियाँ हटाई जा रही हैं, उन्हें 2013 में स्थापित किया गया था। मूर्तियों को हटाने के बाद गंगा नदी में विधिपूर्वक विसर्जित किया जा रहा है। बड़ा गणेश मंदिर में साईं की मूर्ति की जगह माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की जाएगी।

अजय शर्मा ने यह भी कहा कि साईं की पूजा करने वालों को अपने घर में पूजा करने की छूट है, या वे चाहें तो एक अलग मंदिर का निर्माण कर सकते हैं।

मंदिरों से मूर्तियाँ हटाने से पहले मंदिर प्रबंधन की सहमति ली जा रही है। बड़ा गणेश मंदिर के महंत रम्मू गुरु का कहना है कि लोग अज्ञानता के कारण साईं की पूजा कर रहे थे। अन्नपूर्णा मंदिर के महंत शंकर पुरी ने भी इस कदम का समर्थन किया, उनका कहना है कि शास्त्रों में शिरडी साईं की पूजा का कोई विधान नहीं है। हालाँकि, समाजवादी पार्टी के MLC आशुतोष सिंह और कुछ अन्य लोग इस कदम का विरोध कर रहे हैं।

‘जानवर, लाश और बच्ची से सेक्स जायज, नहाना भी ज़रूरी नहीं’: दारुल उलूम में बच्चों को दी जा रही स्तरहीन शिक्षा

NCPCR के संज्ञान के बाद दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट से हटाए गए 'बहिश्ती जेवर' के फतवे (साभार- ABP न्यूज़ और हिंदुस्तान)
प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद एक बार फिर से चर्चा में है। दरअसल, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने शरई मसलों पर लिखी गई एक किताब ‘बहिश्ती जेवर’ के फतवों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए देवबंद के डीएम और एसपी को नोटिस भेजा था। इसमें दारुल उलूम देवबंद में बच्चों को दी जा रही तालीम पर सवाल उठाए गए थे। जिस पर कार्रवाई करते हुए शासन ने देवबंद की वेबसाइट से उन विवादित अंशो को हटवा दिया है। जिसकी जानकरी अधिकारियों ने आयोग को 19 अक्टूबर, 2023 को दी।

शासन द्वारा की गई कार्रवाई की जानकारी देते हुए NCPCR के चेयरपर्सन प्रियंक कानूनगो ने रविवार (22 अक्टूबर, 2023) को पोस्ट किया, “नाबालिग बच्चियों के यौन शोषण के तौर तरीक़े बताने वाली मौलाना अशरफ़ अली थानवी की किताब बाहिश्ती ज़ेवर,मदरसा दारुल उलूम देवबंद सहारनपुर द्वारा फ़तवे जारी करने व बच्चों को सिखाने के काम में ली जा रही थी। जिस पर NCPCR ने संज्ञान ले कर ज़िला प्रशासन को नोटिस जारी किया था। ज़िला प्रशासन सहारनपुर ने तत्परता पूर्वक कार्यवाही करते हुए अवगत करवाया है कि उक्त किताब का उपयोग बंद करवा दिया गया है व संबंधित फ़तवे भी दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट से हटवा दिए गए हैं। शेष जाँच जारी है।”

दरअसल, दारुल उलूम के मदरसों में ऐसा पाठ्यक्रम पढ़ाया जा रहा था, जिसमें कई विवादित संदर्भ व फतवे शामिल थे। जैसे जानवरों से रेप, मृत महिलाओं और नाबालिग बच्चियों से यौन सम्बन्ध के तौर तरीके बताए गए थे एवं उन्हें जायज ठहराया गया था। यहाँ तक कि नहाना भी जरुरी नहीं था। जिस पर दिल्ली की सामाजिक संस्था मानुषी सदन ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग में शिकायत की थी। इसके बाद ही NCPCR की नोटिस के बाद अब इसे वेबसाइट व पाठ्यक्रम से हटा दिया गया है।

मानुषी सदन संस्था ने गत 7 जुलाई, 2023 को शिकायत की थी कि इस्लामिक विद्वान दिवंगत मौलाना अशरफ अली थानवी की 100 साल पुरानी किताब “बहिश्ती जेवर” के जरिए दारुल उलूम छात्रों को नाबालिगों पर आपराधिक हमले, अवैध संबंध, दुष्कर्म और नाबालिगों की शादी की पढ़ाई करा रहा है।

जिसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सहारनपुर के डीएम व एसएसपी को जाँच करने व दारुल उलूम की वेबसाइट पर उपलब्ध ऐसी विवादित सामग्री को हटाने के लिए कहा था। साथ ही अधिकारियों को आयोग में तलब भी किया था।

आयोग की तरफ से जारी नोटिस में कहा गया था कि बच्चों को दारुल उलूम की तरफ से जारी फतवों को पढ़ाया जा रहा है। बच्चों को वो फतवे पढ़ाए जा रहे हैं जो वेबसाइट पर मौजूद हैं। और यह बाल अधिकार के खिलाफ है। 

आयोग ने कहा कि उन्हें दारुल उलूम देवबंद की तरफ से जारी फतवों के खिलाफ एक शिकायत भी मिली है। फतवे में ‘बहिश्ती जेवर’ नामक पुस्तक का जिक्र है, जो बच्चों के लिए आपत्तिजनक, अनुचित और अवैध है। 

इसी मामले में 19 जुलाई, 2023 को बाल संरक्षण आयोग के निर्देश पर एसडीएम संजीव कुमार के नेतृत्व में सीओ रामकरण सिंह, डीआईओएस योगराज सिंह, डीएसओ डॉ. विनिता, बीईओ डॉ. संजय डबराल की टीम दारुल उलूम पहुँची थी। टीम ने संस्था के नायब मौलाना अब्दुल खालिक मद्रासी और सद्र-मुदर्रिस मौलाना अरशद मदनी से मुलाकात की थी और पूरे मामले की जाँच की थी।

इस मामले में दारुल उलूम के जिम्मेदारों ने टीम को बताया था कि पुस्तक से संस्था का कोई वास्ता नहीं है। जिसके बाद उन्हें वेबसाइट से हटवा दिया गया। वहीं अब 19 अक्टूबर, 2023 को आयोग में प्रस्तुत होकर अधिकारियों ने बताया कि चार सदस्यीय टीम की जाँच के बाद विवादित सभी फतवों और पुस्तक को दारुल उलूम समेत अन्य सभी वेबसाइट से हटवा दिया गया है।

जब इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री बनते ही पिता डॉ.के. सुब्रमण्‍यम को हटा दिया, राजीव ने जूनियर को दी वरीयता: डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री

                                                               साभार ANI 
आज कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर प्रश्न करने से पहले अपने शासन की कारगुजारी पर क्यों नहीं नज़र डालती? 
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर  (Dr. S.Jaishankar) ने न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) के साथ पोडकास्ट इंटरव्यू में कई मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। इस दौरान उन्होंने बताया कि किस तरह पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और फिर राजीव गाँधी के कार्यकाल के दौरान उनके पिता डॉ.के. सुब्रमण्‍यम के साथ नाइंसाफी हुई थी। साक्षातकार के दौरान विदेश मंत्री ने बताया कि विदेश मंत्री का पद दिए जाने के साथ उन पर भाजपा ज्वाइन करने का कोई दबाव नहीं था।

एएनआई को दिए अपने इंटरव्यू के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने विदेश सचिव (Foreign Secretary) से लेकर विदेश मंत्री (Foreign Minister) बनने तक के सफर पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने बताया कि वे ब्यूरोक्रेट्स के परिवार से आते हैं और हमेशा एक बेहतरीन ऑफिसर बनना चाहते थे। अपने पिता को याद करते हुए जयशंकर ने बताया कि उनके पिता सचिव पद (1979) तक पहुँच गए थे।

एस जयशंकर ने अनुसार, जब 1980 में इंदिरा गाँधी की सरकार बनी तो उनके पिता के जयशंकर को उनके पद से हटा दिया गया। के जयशंकर उस वक्त डिफेंस प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में सचिव थे। जयशंकर ने बताया कि उनके पिता संभवतः पहले सचिव थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने सरकार बनने के बाद सबसे पहले हटाया था। एस जयशंकर ने बताया कि राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री रहते हुए भी के. जयशंकर को नज़रअंदाज किया गया और उनके जूनियर को कैबिनेट सचिव बनाया गया।

एएनआई को दिए तकरीबन पौने 2 घंटे के साक्षातकार में यह हिस्सा 12 वें मिनट से सुना जा सकता है। इस दौरान एस. जयशंकर ने अपने विदेश सचिव से विदेश मंत्री बनने तक के घटनाक्रम पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें 2019 में कैबिनेट का हिस्सा बनने के लिए कॉल किया था। जयशंकर ने कहा कि यह पूरी तरह से चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्हें भाजपा ज्वाइन करने को लेकर जोर नहीं दिया गया।

एस जयशंकर ने कहा कि बीजेपी में शामिल होने का फैसला उनका अपना था। उन्होंने कहा कि यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन अपने उत्तरदायित्व के ईमानदारी के साथ निर्वहन और नेतृत्व का सहयोग प्राप्त करने के लिए उन्होंने भाजपा को चुना।

एस. जयशंकर कहते हैं कि उनके पिता एक ईमानदार व्यक्ति थे। हो सकता है इसकी वजह से समस्या हुई हो। उसके बाद वो कभी सचिव नहीं बने। जयशंकर ने बताया कि परिवार में इस बात को लेकर कभी चर्चा तो नहीं हुई लेकिन जब उनके बड़े भाई सचिव बने तो पिता काफी खुश हुए थे। बाद में एस. जयशंकर भी विदेश सचिव बने, हालाँकि तब तक उनके पिता का निधन हो चुका था। पिता ने भले ही उन्हें सचिव के पद पर नहीं देखा, लेकिन पिता के रहते जयशंकर ग्रेड वन तक पहुँच चुके थे जो सेक्रेटरी के बराबर का ही रैंक होता है।

पैगंबर मुहम्मद की बेटी पर बनी फिल्म का विरोध करने पर UK ने इमाम को हटाया

                      पैगंबर मुहम्मद की बेटी पर बनी फिल्म का विरोध करने पर UK ने इमाम को हटाया
भारत में पैगम्बर पर हंगामा अभी थमा भी नहीं, कि ब्रिटैन में उसी फातिमा पर फिल्म बनने पर विवाद शुरू हो गया है। देखना यह है कि "क्या वहां भी फिल्म निर्माता और निर्देशक का तन से सर जुदा आदि की मांग होगी? बरहाल, यूनाइटेड किंगडम ने पैगंबर मुहम्मद की बेटी पर बनी फिल्म का विरोध करने वाले इमाम को सलाहकार पद से हटा दिया है। इस फिल्म पर ‘ईशनिंदा (Blasphemy)’ का आरोप लगाते हुए ब्रिटेन में हजारों मुस्लिम सड़क पर हैं। इसी क्रम में इमाम कारी मुहम्मद असीम ने भी सिनेमा  हॉल्स को ये फिल्म न लगाने को कहा था। लीड्स स्थित मक्का मस्जिद के मुखिया इमाम कारी मुहम्मद असीम को इस्लामोफोबिया पर सरकार ने सलाहकार बनाया हुआ था।

साथ ही वो ‘एंटी मुस्लिम हेट्रेड वर्किंग ग्रुप (मुस्लिम विरोधी घृणा कार्यकारी समूह)’ का अध्यक्ष भी था। इस पद से भी उसे मुक्त कर दिया गया है। ये सारा विवाद ‘The Lady Of Heaven’ नामक फिल्म को लेकर हो रहा है, जिसमें पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा की कहानी दिखाई गई है। इंग्लैंड के कई शहरों में इस फिल्म की स्क्रीनिंग के खिलाफ मुस्लिम भीड़ प्रदर्शन करने में लगी हुई है। इमाम ने इस फिल्म को इस्लाम को नीचे दिखाने वाला बताया था।

उसने कहा था कि इससे मुस्लिमों को काफी दर्द पहुँचा है और उनकी भावनाएँ आहत हुई हैं। यूके सरकार ने एक पत्र में कहा है कि उसकी सेवाएँ त्वरित रूप से ख़त्म करने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं बचा है। सरकार ने कहा है कि फिल्म के विरोध में चल रहे अभियान से सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ है और इमाम ने इस अभियान को समर्थन देकर फ्री स्पीच के विरुद्ध काम किया है। इसीलिए, सांप्रदायिक अमन-चैन कायम करने के सरकार के प्रयासों में उसका कोई रोल न बताते हुए उसे हटा दिया गया है।

यूके सरकार ने कहा, “कई सिनेमाघरों के बाहर जो दृश्य हैं, उन्हें आपने देखा-सुना होगा। इसमें मजहबी नारों के साथ शिया समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाई जा रही है। इसका हमें विरोध करना चाहिए, अगर हमें मुस्लिम विरोधी घृणा से निपटना है तो। आप इस तरह की करतूतों की निंदा करने में विफल रहे हैं।” बता दें कि ‘Cineworld’ थिएटर चेन ने सबसे पहले इस फिल्म की स्क्रीनिंग्स को रद्द किया। कारी इमाम ने कई इमामों के साथ मिल कर सिनेमघरों से बात कर के और प्रदर्शन कर के स्क्रीनिंग्स रद्द कराने की योजना बनाई थी।

इस फिल्म में ईराक में युद्ध की कहानी दिखाते हुए 1400 साल पहले पैगंबर मुहम्मद की बेटी फातिमा की कहानी बताई गई है, जिन्हें बुर्के में दिखाया गया है। फिल्म के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर मलिक शिबाक को सोशल मीडिया पर जान से मार डालने की धमकियाँ मिली हैं। उन्होंने कहा कि इस देश में बोलने और अभिव्यक्त करने की आज़ादी है, इसीलिए फिल्म को रोकना सही नहीं है। उन्हें काफिर बताया जा रहा है। हालाँकि, उनका कहना है कि वो इन सबसे डरने वाले नहीं हैं।

‘हलाल’ शब्द सरकारी दस्तावेज से एक झटका में गायब: इस्लामी संस्थाओं के सर्टिफिकेट का खेल बंद

                        APEDA ने अपने 'रेड मीट मैनुअल' दस्तावेज से हटाया 'हलाल' शब्द
भारत सरकार के ‘कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority)’ या APEDA ने अपने रेड मीट मैन्युअल में से ‘हलाल’ शब्द को ही हटा दिया है और इसके बिना ही दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके लिए लम्बे समय से अभियान चला रहे हरिंदर एस सिक्का ने सोशल मीडिया पर इस सम्बन्ध में जानकारी दी।

उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री पीयूष गोयल को धन्यवाद दिया। सरकार के इस कदम के बाद अब ‘हलाल’ सर्टिफिकेट की ज़रूरत समाप्त हो जाएगी और सभी प्रकार के वैध मीट कारोबारी अपना पंजीकरण करा सकेंगे। हरिंदर सिक्का ने इसे बिना किसी भेदभाव के ‘एक देश, एक नियम’ के तहत लिया गया फैसला बताया और कहा कि ये ‘हलाल’ मीट परोस रहे रेस्टॉरेंट्स के लिए भी एक संदेश है।

APEDA ने अपने ‘फूड सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम’ के स्टैंडर्ड्स और क्वालिटी मैनेजमेंट के डॉक्यूमेंट में बदलाव किया है। पहले इसमें लिखा हुआ था कि जानवरों को ‘हलाल’ प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करते हुए जबह किया जाता है, जिसमें इस्लामी मुल्कों की ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाता है। अब इसकी जगह लिखा गया है, “मीट को जहाँ आयात किया जाना है, उन मुल्कों की ज़रूरतों के हिसाब से जानवरों का जबह किया गया है।”

ये बदलाव इस डॉक्यूमेंट के पेज संख्या 8 में किया गया है। वहीं दूसरी तरफ पेज 30 पर जहाँ पहले लिखा था, “इस्लामी संगठनों की मौजूदगी में जानवरों को हलाल प्रक्रिया के तहत जबह किया गया है। प्रतिष्ठित इस्लामी संगठनों के सर्टिफिकेट लेकर मुस्लिम मुल्कों की जरूरतों का ध्यान रखा गया है”, वहाँ अब लिखा है, “आयातक देश के ज़रूरतों के अनुसार जानवरों को जबह किया गया है।” पेज संख्या 35, 71 और 99 पर भी बदलाव किया गया है।

पेज संख्या 35 पर पहले लिखा था कि इस्लामी शरीयत के हिसाब से पंजीकृत इस्लामी संगठन की कड़ी निगरानी में हलाल प्रक्रिया के तहत जानवरों को जबह किया गया है और उनकी निगरानी में ही इसका सर्टिफिकेट भी लिया जाता है। इस पूरी पंक्ति को ही हटा दिया गया है।

वहीं पेज संख्या 71 पर जेलेटीन बोन चिप्स को स्वस्थ भैंस को हलाल प्रक्रिया के तहत जबह किए जाने के बाद तैयार किए जाने की बात लिखी थी। इसे बदल कर भी ‘आयातक देश की ज़रूरतों के अनुरूप’ कर दिया गया है। साथ ही ‘हलाल’ शब्द को हटा कर लिखा गया है कि पोस्टमॉर्टम जाँच के बाद ही इसे तैयार किया गया है।

पेज संख्या 99 पर पूरी प्रक्रिया का फ्लो चार्ट था, जहाँ ‘हलाल’ शब्द को ‘Slaughter’ (जबह) से रिप्लेस कर दिया गया है। अब APEDA के रेड मीट मैन्युअल में आपको कहीं ‘हलाल’ शब्द नहीं मिलेगा। सिर्फ एक मीट प्रोसेसिंग कम्पनी ‘हलाल इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से रजिस्टर्ड है, जिसका जिक्र है।

हलाल पर बवाल

करीब 6 महीने पहले सोशल मीडिया पर सरकारी दस्तावेजों में हलाल शब्द को लेकर बवाल हुआ था। तब सरकारी विभाग को इस पर आकर सफाई भी देनी पड़ी थी।

तब APEDA को ऊपर वायरल हुए इमेज पर सफाई देते हुए कहना पड़ा था कि हलाल मीट के निर्यात को लेकर भारत सरकार की ओर से कोई जबरन नियम नहीं था बल्कि यह आयात करने वाले देशों (जो ज्यादातर मुस्लिम देश हैं) के नियमों के अनुरूप था। हालाँकि APEDA के रेड मीट मैन्युअल को कुछ ऐसे लिखा गया था, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती थी और यह लगता था कि भारत सरकार ही मीट को हलाल तरीके से प्रोसेस करने के लिए बाध्य करती है। इसी भ्रम को दूर करने के लिए भारत सरकार ने उपरोक्त बदलाव किया है।

क्या होगा बदलाव

APEDA के रेड मीट मैन्युअल के कारण मीट व्यापार में धार्मिक भेदभाव होता था। हलाल प्रक्रिया का पालन करने के कारण हिंदू नाम के बिजनेसमैन चाह कर भी इसमें आगे नहीं बढ़ पाते थे। हलाल सर्टिफिकेशन की आड़ में भी उनका शोषण होता था। रोजगार में गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव होता था।

इसका कारण था हलाल के लिए थोपे गए इस्लामी नियम। इसके सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल मांस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, गैर-मुस्लिम, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यह आर्थिक पक्ष हलाल को केवल एक भोजन पद्धति ही नहीं, एक पूरी समानांतर अर्थव्यवस्था बना देता है, जो गैर-मुस्लिमों को न केवल हाशिये पर धकेलती है, बल्कि परिदृश से ही बाहर कर देती है।

हाल ही में ये भी खबर आई थी कि दिल्ली के ऐसे होटल या मीट की दुकान जो SDMC (दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन) के अंतर्गत आते हैं, उन्हें अब हलाल या झटका बोर्ड टाँग कर रखना जरूरी होगा। SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी ने यह प्रस्ताव गुरुवार (24 दिसंबर 2020) को पास कर दिया। इस प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि हिंदू और सिख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है।