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भारत की विदेश नीति और इजरायल संकट

 

डॉ राकेश कुमार आर्य 

इसरायल और फिलिस्तीनियों के बीच दुश्मनी की आग दशकों पुरानी है। इसराइल के अस्तित्व को मिटाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर षड़यंत्र चलते रहते हैं । जिनके चलते यह आग भीतर ही भीतर सुलगती ही रहती है। अनुकूल अवसर आते ही यह आग भड़क उठती है। अब भी ऐसा ही हुआ है। इस बार पूर्व नियोजित तैयारी के अंतर्गत फिलिस्तीन मिलिटेंट ग्रुप हमास ने गाजा इलाके से इजरायल पर रॉकेटों से धुआंधार हमला करते हुए सारी दुनिया को यह संदेश दे दिया कि आतंकवाद अपने घृणित स्वरूप में जिंदा है। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि दुनिया को इस गफलत में नहीं रहना चाहिए कि आतंकवाद को शांति सम्मेलनों और उपदेशों से समाप्त किया जा सकता है। इसके समूल विनाश के लिए दुनिया को एकजुट होना पड़ेगा। उधर इसराइल ने भी अपने स्वभाव के अनुसार मजबूती से डटे रहकर आतंकवाद का जवाब देना आरंभ कर दिया है। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इजरायल के साथ है। 

इधर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट कह दिया है कि वह इस हमले के समय अपने मित्र इजरायल के साथ मजबूती से खड़ा है। यद्यपि अबसे पूर्व ऐसे अवसर भी आए जब भारत ने फिलीस्तीन के साथ खड़े रहने में अपनी भलाई देखी थी, पर अब परिस्थितियां बदल गई हैं और भारत की विदेश नीति में भी व्यापक परिवर्तन हुआ है। समय की आवश्यकता को देखते हुए भारत ने इस समय इजराइल का साथ देना उचित माना है।

भारत की वर्तमान विदेश नीति इस बात पर अडिग है कि जो भी देश कहीं पर आतंकवाद की घटना को अंजाम देगा या उसका समर्थन करेगा या इसका प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करेगा, भारत उसका विरोध करेगा। संपूर्ण मानवता के हित में भारत की यह विदेश नीति पूर्णतः न्यायसंगत और समय के अनुकूल है। यदि इसी प्रकार की मानवतावादी विदेश नीति को सभी देश अपना लें तो निश्चित रूप से संसार से आतंकवाद जैसे भयानक शत्रु को मिटाया जा सकता है। कुछ लोग आतंकवाद का संप्रदाय के आधार पर समर्थन करते हैं, कुछ किसी आतंकवादी देश से अपने मित्रतापूर्ण संबंधों के चलते हुए ऐसा करते हैं तो कुछ आतंकवाद से पीड़ित किसी देश से अपना कोई पुराना वैर साधने के लिए आतंकवाद का समर्थन करते हैं। भारत ने अपने स्टैंड से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल और केवल आतंकवाद के विरुद्ध है और इसके लिए वह कुछ भी नहीं देखेगा। 

भारत ने अपने इस स्टैंड से यह भी स्पष्ट किया है कि वह इस बात की केवल घोषणा ही नहीं करता है कि वह किसी भी किस्म के आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा बल्कि वह इस पर चलकर भी दिखाना चाहता है। सारे संसार के देशों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि एक आतंकवादी संगठन हमास किस प्रकार ताकत प्राप्त करता है और इस स्थिति में आ जाता है कि संसार भर के देशों की तमाम कोशिशों के उपरांत भी वह एक देश पर आतंकवादी हमला कर देता है। बात स्पष्ट है कि या तो संसार के देशों की ये घोषणाएं खोखली थीं कि वह आतंकवाद का डटकर एकजुटता के साथ सामना करेंगे या फिर अंदर ही अंदर इस आतंकवादी संगठन को वही देश दूध पिलाने का काम करते रहे जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की आलोचना करते रहे हैं ? इन दोगली चालों के कारण ही अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थिति बन नहीं पाती है। आज भारत की नीतियों को अपनाकर चलने का समय आ गया है। जब हर देश को अपनी घोषणाओं के अनुसार अपनी योजनाओं को भी बनाने के लिए सोचना पड़ेगा। अबकी बार जिस प्रकार से इसराइल पर आक्रमण किया गया है वह अपने आप में एक अप्रत्याशित घटना है। यदि इस प्रकार की कार्यवाही को किसी भी प्रकार से वैधानिक या उचित ठहराने का प्रयास किया जाता है तो यह कतई गलत होगा। यही कारण है कि भारत इस प्रकार की घटनाओं के विरोध में इसराइल के साथ खड़ा है।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अभी कुछ समय पहले ही दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन हुआ था। उसमें इंडिया मिडल ईस्ट इकोनामिक कॉरिडोर बनाने की घोषणा भी की गई थी। उस घोषणा में इसराइल भी सम्मिलित है। भारत इजरायल विरोधी शक्तियां उस घोषणा से तिलमिला गई हैं। अतः इसराइल पर किया गया इस प्रकार का हमला भारत के लिए भी एक संकेत हो सकता है। इसराइल ने अपनी मजबूती दिखाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह प्रतिशोध लेगा और प्रतिक्रियास्वरूप किसी भी स्थिति तक जाने के लिए तैयार है, अपनी घोषणा के अनुसार इजरायल ने ऐसा ही करना भी आरंभ कर दिया है। इससे स्पष्ट है कि गाजा पट्टी की यह घटना भविष्य में कहां तक जाएगी और क्या स्वरूप लेगी ? - इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

यह एक भयंकर महाविनाश की चिंगारी भी हो सकती है। यह सब इजरायल के धैर्य और महाशक्तियों की कूटनीतिक चालों पर लगने वाले विराम या संभावित रूप से उनमें आने वाली तेजी पर निर्भर करता है कि हम भयंकर विनाश की ओर जा रहे हैं या कुछ समय बाद इन परिस्थितियों में ठहराव आ जाएगा। वर्तमान परिस्थितियों में इतना स्पष्ट हो रहा है कि मिडिल ईस्ट एक गंभीर संकट में फंस चुका है।

  इस ताजा घटनाक्रम के संदर्भ में हमें यह भी समझना चाहिए कि कुछ समय पहले तक यह संभावना व्यक्त की जा रही थी कि इसराइल और सऊदी अरब के बीच नए सिरे से नए संबंधों की परिभाषा को गढ़ा जा सकता है। अमेरिका का वर्तमान नेतृत्व इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा था। इसराइल पर किए गए इस आतंकी हमले के पीछे इसराइल और सऊदी अरब के बीच बन रहे नए संबंधों को झटका देने का उद्देश्य भी हो सकता है।

जो लोग जो देश शांतिपूर्वक अपने काम पर नजर रखते हैं और शांति को ही वैश्विक विकास की एकमात्र गारंटी मानते हैं , उनके लिए वर्तमान स्थिति बड़ी परेशानकुन है, पर वे कुछ कर नहीं सकते। उन्हें अपने क्षेत्र में स्थिरता की आवश्यकता है , क्योंकि किसी भी प्रकार की अस्थिरता व्यापार और लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होती है।

  वैश्विक राजनीति और कूटनीति का यह तकाजा होता है कि शत्रु हमेशा आप पर उस समय वार करता है जब आप सर्वाधिक असावधान होते हैं। तो क्या यह माना जा सकता है कि इजरायल जो कि अपने चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ है, वह वर्तमान में असावधान हो गया था? जिस इजराइल से बड़े देश भय खाते हैं , बड़े बड़े देश हथियार खरीदते देखे जाते हैं और जो अपने पौरुष और पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है उसका इस प्रकार असावधान होना जंचता नहीं, पर लगता यही है कि वह असावधान था। उसका इंटेलिजेंस बुरी तरह निष्फल सिद्ध हो गया। इतने बड़े हमले को आतंकवादी अंजाम देते हैं और इजरायल की पूरी इंटेलिजेंस उस पर कुछ नहीं कर पाती या उसकी सूचना उसके पास पहले से उपलब्ध नहीं होती , इसका कोई ना कोई तो कारण है। आज नहीं तो कल यह सवाल इजराइल में अवश्य पूछा जाएगा कि वहां की सुरक्षा एजेंसियां आखिर इतने बड़े हमले के प्रति असावधान क्यों रहीं ?

 इस प्रकार के सवालों से वर्तमान इजरायली नेतृत्व भी अछूता नहीं रहेगा। समय आने पर उसे भी जवाब देना होगा।

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

G20 शिखर सम्मलेन से पहले पूर्व PM मनमोहन सिंह भी हुए मोदी सरकार के मुरीद, कहा- भारत के लिए आशा अधिक, चिंता कम: आर्थिक महाशक्ति बनने का भी भरोसा


UPA सरकार में प्रधानमंत्री रहे कॉन्ग्रेस के नेता डॉक्टर मनमोहन सिंह ने पीएम नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की जमकर सराहना की है। उन्होंने कहा कि पहले की तुलना में आज घरेलू राजनीति के लिए विदेश नीति और अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो गई है। इसके अलावा, उन्होंने कई मुद्दों पर वर्तमान भाजपा सरकार की तारीफ की।

इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में डॉक्टर मनमोहन सिंह ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर नई विश्व व्यवस्था बदल-सी गई है। इस व्यवस्था को संचालित करने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों से शांति की अपील करते हुए भारत ने अपने संप्रभु और आर्थिक हितों को पहले स्थान पर रखकर सही काम किया है।

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि वह भारत के भविष्य के बारे में चिंतित होने की तुलना में आशावादी अधिक हैं। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद से निर्मित संवैधानिक मूल्यों के साथ एक शांतिपूर्ण बड़े लोकतंत्र और एक बड़ी बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में भारत को अब विश्व स्तर पर बहुत अधिक सम्मान मिल रहा है।

ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत की भूमिका पर बोलते हुए देश के पहले अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि वर्तमान में डी-ग्लोबलाइजेशन और नए प्रकार के व्यापार प्रतिबंधों की बात हो रही है। ये मौजूदा ऑर्डर को बाधित कर सकते हैं, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत के लिए नए अवसर भी खोल सकते हैं।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत बदलती विश्व व्यवस्था में एक अद्वितीय आर्थिक अवसर के मुहाने पर खड़ा है। एक बड़े बाजार और प्रचुर मानव और प्राकृतिक संसाधनों के साथ एक शांतिपूर्ण लोकतंत्र के रूप में भारत आने वाले दशकों में सेवाओं, विनिर्माण और उत्पादन पर जोर देकर दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बन सकता है।

भारत को विनिर्माण क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी सरकार पहले से ही प्रयासरत है। इसके कारण चीन की नींद उड़ी हुई है। विश्व की कई दिग्गज क्षेत्र की कंपनियाँ भारत में उत्पादन शुरू कर चुकी हैं। वहीं, विश्व स्तर पर भारत जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन आदि में कटौती को लेकर भारत का स्टैंड साफ कर चुका है।

भारत को विनिर्माण क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी सरकार पहले से ही प्रयासरत है। इसके कारण चीन की नींद उड़ी हुई है। विश्व की कई दिग्गज क्षेत्र की कंपनियाँ भारत में उत्पादन शुरू कर चुकी हैं। वहीं, विश्व स्तर पर भारत जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन आदि में कटौती को लेकर भारत का स्टैंड साफ कर चुका है।

इस तरह एक दशक तक (2004-2014) तक देश के प्रधानमंत्री रहे एक विख्यात अर्थशास्त्री का यह बयान उस वक्त में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है, जब विश्व के 20 शक्तिशाली देशों के नेता जी-20 में शामिल होने के लिए दिल्ली में पहुँचना शुरू हो चुके हैं। इसे वर्तमान सरकार की नीतियों की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है।

जब इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री बनते ही पिता डॉ.के. सुब्रमण्‍यम को हटा दिया, राजीव ने जूनियर को दी वरीयता: डॉ. एस. जयशंकर, विदेश मंत्री

                                                               साभार ANI 
आज कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर प्रश्न करने से पहले अपने शासन की कारगुजारी पर क्यों नहीं नज़र डालती? 
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर  (Dr. S.Jaishankar) ने न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) के साथ पोडकास्ट इंटरव्यू में कई मुद्दों पर खुलकर चर्चा की। इस दौरान उन्होंने बताया कि किस तरह पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और फिर राजीव गाँधी के कार्यकाल के दौरान उनके पिता डॉ.के. सुब्रमण्‍यम के साथ नाइंसाफी हुई थी। साक्षातकार के दौरान विदेश मंत्री ने बताया कि विदेश मंत्री का पद दिए जाने के साथ उन पर भाजपा ज्वाइन करने का कोई दबाव नहीं था।

एएनआई को दिए अपने इंटरव्यू के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर ने विदेश सचिव (Foreign Secretary) से लेकर विदेश मंत्री (Foreign Minister) बनने तक के सफर पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने बताया कि वे ब्यूरोक्रेट्स के परिवार से आते हैं और हमेशा एक बेहतरीन ऑफिसर बनना चाहते थे। अपने पिता को याद करते हुए जयशंकर ने बताया कि उनके पिता सचिव पद (1979) तक पहुँच गए थे।

एस जयशंकर ने अनुसार, जब 1980 में इंदिरा गाँधी की सरकार बनी तो उनके पिता के जयशंकर को उनके पद से हटा दिया गया। के जयशंकर उस वक्त डिफेंस प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में सचिव थे। जयशंकर ने बताया कि उनके पिता संभवतः पहले सचिव थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने सरकार बनने के बाद सबसे पहले हटाया था। एस जयशंकर ने बताया कि राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री रहते हुए भी के. जयशंकर को नज़रअंदाज किया गया और उनके जूनियर को कैबिनेट सचिव बनाया गया।

एएनआई को दिए तकरीबन पौने 2 घंटे के साक्षातकार में यह हिस्सा 12 वें मिनट से सुना जा सकता है। इस दौरान एस. जयशंकर ने अपने विदेश सचिव से विदेश मंत्री बनने तक के घटनाक्रम पर भी चर्चा की। उन्होंने बताया कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें 2019 में कैबिनेट का हिस्सा बनने के लिए कॉल किया था। जयशंकर ने कहा कि यह पूरी तरह से चौंकाने वाला था। उन्होंने कहा कि इस दौरान उन्हें भाजपा ज्वाइन करने को लेकर जोर नहीं दिया गया।

एस जयशंकर ने कहा कि बीजेपी में शामिल होने का फैसला उनका अपना था। उन्होंने कहा कि यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन अपने उत्तरदायित्व के ईमानदारी के साथ निर्वहन और नेतृत्व का सहयोग प्राप्त करने के लिए उन्होंने भाजपा को चुना।

एस. जयशंकर कहते हैं कि उनके पिता एक ईमानदार व्यक्ति थे। हो सकता है इसकी वजह से समस्या हुई हो। उसके बाद वो कभी सचिव नहीं बने। जयशंकर ने बताया कि परिवार में इस बात को लेकर कभी चर्चा तो नहीं हुई लेकिन जब उनके बड़े भाई सचिव बने तो पिता काफी खुश हुए थे। बाद में एस. जयशंकर भी विदेश सचिव बने, हालाँकि तब तक उनके पिता का निधन हो चुका था। पिता ने भले ही उन्हें सचिव के पद पर नहीं देखा, लेकिन पिता के रहते जयशंकर ग्रेड वन तक पहुँच चुके थे जो सेक्रेटरी के बराबर का ही रैंक होता है।

हर्ष मंदर का इतालवी कनेक्शन : API से जुड़े हैं CAA पर उकसाने वाले के तार

हर्ष मंदरऑपइंडिया हमेशा से विदेशों से फंड प्राप्त करने वाले एनजीओ और उनके काम करने के तौर-तरीकों, उनकी मंशा पर विस्तार से विमर्श और रिपोर्टिंग करता रहा है। हम बताते रहे हैं कि कैसे हर्ष मंदर जैसे लोगों की मदद से विदेश से फंड हासिल करने वाले एनजीओ देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए न्यायपालिका का दुरुपयोग करने की कोशिश करते रहते हैं। सिविल सोसायटी के नाम पर विदेशी फंड प्राप्त करने वाले एनजीओ द्वारा भारत की सम्प्रभुता और आंतरिक सुरक्षा को खतरा पहुँचाने के लिए देसी संगठनों के साथ सॉंठगॉंठ पर भी हम लगातार विस्तार से रिपोर्ट करते रहे हैं।
इन सबके साथ जिस एक व्यक्ति पर हमारा फोकस रहा है, वह सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज से जुड़े हर्ष मंदर हैं। उनका जॉर्ज सोरोस से संबध रहा है। मनमोहन सरकार के जमाने में सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली नेशनल एडवायजरी काउंसिल के भी वे सदस्य रहे हैं। इसी काउंसिल ने हिन्दू विरोधी सांप्रदायिक हिंसा बिल का ड्राफ्ट तैयार किया था। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में भी मंदर सक्रिय रहे हैं। उनके हाल में विडियो भी सामने आए हैं जिसमें वे प्रदर्शनकारियों को उकसाते नजर आए हैं।
हर्ष मंदर के बारे में जाँच पड़ताल करने पर हमें एक बेहद अज्ञात से संगठन Ara Pacis Initiative (API), के बारे में पता चला। मंदर इसके वरिष्ठ सदस्य हैं। वे एपीआई की ‘कॉउन्सिल फॉर डिग्निटी, फॉरगिवनेस, जस्टिस एंड रिकन्शीलिएशन’ के सदस्य हैं।
इस संगठन के बारे में और गहराई से जानकारी जुटाने पर हमें कुछ ऐसे तथ्य मिले जिससे मंदर के खतरनाक मंसूबों का पता चलता है। एपीआई की स्थापना एक अज्ञात इटालियन एक्ट्रेस ने की थी जो शायद वहाँ के शक्ति केंद्रों से काफी नजदीकी रखती है। इसके अलावा इसके फॉउन्डिग मेंबरों में से एक नोबल पुरस्कार विजेता का नाम भी शामिल है। लेकिन इन तथ्यों के अलावा कुछ और तथ्य भी मिले जो इसके इटली सरकार के एक अंग के रूप में काम करने की तरफ इशारा करते हैं।
एपीआई की वेबसाइट से

इस संगठन की वेबसाइट पर साफ़ तौर पर लिखा है कि इसका उद्घाटन 21 अप्रैल 2010 को रोम के मेयर द्वारा किया गया। इसको इटली के राष्ट्रपति का वरदहस्त प्राप्त है। इटली के प्रधानमंत्री तथा विदेश मंत्री कार्यालयों का सहयोग मिला हुआ है। इससे पता चलता है कि एपीआई इटली सरकार का एक अहम कार्यालय है जो उसके हितों की पूर्ति के लिए कार्य करता है।
हमारे संदेह को और पुख्ता किया इस संगठन की प्रेसीडेंट रह चुकी Gaida के लिंक्डइन प्रोफाइल ने। इसमें एपीआई को ‘ग्लोबल नॉट फॉर प्रॉफिट ऑर्गेनाइजेशन डेडिकेटेड टू ह्यूमन डायमेंशन ऑफ़ पीस’ कहा गया है। इसमें ‘गैर सरकारी’ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ।
इसके अलावा हमें रायटर्स की एक रिपोर्ट भी हाथ लगी जिसमें एपीआई को इतालवी सरकार द्वारा समर्थित एक संगठन बताया गया है जो “कनफ्लिक्ट प्रिवेंशन एंड रेसोलुशन के लिए समर्पित” है। रायटर्स की इस रिपोर्ट के बाद अब इस बात पर कोई शक ही नहीं रह गया कि हर्ष मंदर जिस संगठन के लिए काम करता है वो इतालवी हितों के लिए सक्रिय है।
Gaida की लिंक्ड इन प्रोफाइल से
इस संगठन के लीबिया इनिशिएटिव से संबंधित दूसरी रिपोर्ट्स से भी यह पता चलता है कि हर्ष मंदर इतालवी सरकार और उसकी सीक्रेट सर्विसेज से जुड़े उस संगठन का सदस्य है जो लीबिया से इटली में होने वाले माइग्रेशन पर रोक लगाने की दिशा में काम कर रहा है। यही हर्ष मंदर हैं, जो भारत में घुसपैठियों के खिलाफ किसी कार्यवाही को रोकने के लिए अति उत्सुक दिखाई पड़ते हैं।
मंदर का यह दोहरा चरित्र अभी हाल के नए नागरिकता कानून के विरोध में होते हिंसक प्रदर्शनों के दौरान स्पष्ट तौर से देखा जा सकता है। मंदर और उनका एनजीओ कारवाँ-ए-मोहब्बत इन प्रोटेस्ट्स में काफी सक्रिय भूमिका निभाता देखा गया है। कारवाँ-ए-मोहब्बत ने लोगों से शाहीन बाग़ विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने को भी कहा था।
बीजेपी नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने को कोर्ट पहुँचे मंदर का एक वीडियो भी वायरल हुआ है जिसमें वो प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए कहते हैं, “ये लड़ाई सुप्रीम कोर्ट में नहीं जीती जाएगी, क्योंकि हमने सुप्रीम कोर्ट को देखा है- एनआरसी के मामले में, कश्मीर के मामले में, अयोध्या के मामले में। उन्होंने (सुप्रीम कोर्ट) इंसानियत, समानता और सेक्युलरिज्म की रक्षा नहीं की है।” वे आगे कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में हम कोशिश जरूर करेंगे। लेकिन इसका फैसला न संसद में होगा, न सुप्रीम कोर्ट में होगा, बल्कि ये फैसला सड़कों पर होगा। इस वायरल विडियो को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उनसे सफाई भी माँगी है।

भारतीय खाद्य तेल कंपनियों ने किया बहिष्कार तो गिड़गिड़ाया मलेशिया: पाकिस्तान का किया था कश्मीर पर समर्थन

भारत, मलेशिया
पाक के समर्थन पर मलेशिया को तिया तगड़ा झटका
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
मोदी सरकार से पूर्व भारत तुष्टिकरण के कारण पाकिस्तान, मुस्लिम देशों के आगे कुछ नहीं बोलता था, कहीं हमारा मुस्लिम वोटबैंक नाराज न हो जाए, जिस कारण पाकिस्तान भारत में बेगुनाहों के खून से धरती लाल करता रहा, आज उसी पाकिस्तान को उसी के आतंकवादी जाल में बांध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व में अलग-थलग कर अब पाकिस्तान को समर्थन देने वाले देशों के विरुद्ध कमर कस ली है। 
तुर्की के बाद अब मलेशिया को भी पाकिस्तान के समर्थन का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। मलेशिया ने भी तुर्की की ही तरह एफएटीएफ में पाकिस्तान का समर्थन किया था और संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में जम्मू कश्मीर को लेकर भारत-विरोधी रुख अपनाया था। अब भारत के एडिबल ऑइल इंडस्ट्री की प्रमुख संस्था ने एक एडवाइजरी जारी करके कहा है कि वो मलेशिया से पाम ऑइल का इम्पोर्ट न करें। ‘साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन’ के अध्यक्ष अतुल चतुर्वेदी ने बताया कि सभी सदस्यों को आगाह कर दिया गया है कि पाम ऑइल के इम्पोर्ट के लिए मलेशिया का रुख न करें।
संस्था ने कहा है कि मलेशिया के गड़बड़ रवैये और भारत के साथ उसके तनावपूर्ण रिश्ते को देखते हुए ऑइल इंडस्ट्री ने ये फ़ैसला लिया है क्योंकि इससे पहले भारी मात्रा में एडिबल ऑइल वहाँ से इम्पोर्ट किया जाता रहा है। संस्था ने कहा है कि मलेशिया के प्रधानमंत्री के जम्मू कश्मीर पर दिए गए बयान को हमारे देश ने गंभीरता से लिया है और सरकार ज़रूर इसका सही जवाब देगी। अब जब तक भारत और मलेशिया के रिश्ते स्थित नहीं हो जाते, भारत वहाँ से पाम ऑइल नहीं ख़रीदेगा।

भारतीय ऑइल इंडस्ट्री के इस फ़ैसले के बाद मलेशिया के बाजार पर ख़ासा नुकसान पड़ा है और अब वहाँ की सरकार डैमेज कण्ट्रोल में जुट गई है। मलेशिया ने ऑफर दिया है कि वह भारत से भारी मात्रा में चीनी और भैंस का माँस ख़रीदेगा। नवंबर और दिसंबर के शिपमेंट के लिए कई भारतीय कम्पनियाँ पाम ऑइल के लिए मलेशिया की जगह अब इंडोनेशिया का रुख कर रही हैं। हालाँकि, भारत को मलेशिया और इंडोनेशिया, दोनों ही देशों से पाम ऑइल ख़रीदने की ज़रूरत पड़ती है लेकिन भारत सरकार जल्द ही इस सम्बन्ध में कोई बड़ा निर्णय लेगी।
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तुर्की दौरे की योजना पर लगाया ब्रेक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना तुर्की दौरा रद्द कर दिया है। तुर्की द्वारा ....

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 दिन के दौरे पर तुर्की जाने वाले थे लेकिन वहाँ के राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में अनुच्छेद 370 निरस्त करने के ख़िलाफ़ दिए गए बयान को भारत ने गंभीरता से लिया क्योंकि यह भारत का आंतरिक मामला है। इसके साथ ही पीएम मोदी ने अपना तुर्की दौरा रद्द कर दिया। तुर्की द्वारा जम्मू कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को समर्थन दिए जाने के बाद भारत ने अपनी विदेश नीति में बड़ा बदलाव करते हुए तुर्की की आलोचना की थी। 

अब भारत बर्दाश्त नहीं करेगा पाक का समर्थन, मोदी हुए सख्त

नरेंद्र मोदी, तुर्की
तुर्की दौरे की योजना पर लगाया ब्रेक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना तुर्की दौरा रद्द कर दिया है। तुर्की द्वारा जम्मू कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को समर्थन दिए जाने के बाद भारत ने अपनी विदेश नीति में बड़ा बदलाव करते हुए तुर्की की आलोचना की थी। तुर्की लगातार कुर्दिश और सीरिया के लोगों की हत्या कर रहा है, जिसकी भारत ने आलोचना की थी। भारत ने कुर्द की स्वतंत्रता का समर्थन किया था। साथ ही पीएम नरेंद्र मोदी ने साइप्रस के राष्ट्रपति से मुलाक़ात कर उसकी सम्प्रभुता को समर्थन दिया था। बता दें कि तुर्की ने साइप्रस के एक बड़े भाग पर कब्ज़ा कर रखा है। पीएम मोदी का तुर्की दौरा रद्द होने से वहाँ के राष्ट्रपति रेसेप तैयब अर्दोगान को करारा झटका लगा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 दिन के दौरे पर तुर्की जाने वाले थे लेकिन वहाँ के राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में अनुच्छेद 370 निरस्त करने के ख़िलाफ़ दिए गए बयान को भारत ने गंभीरता से लिया है क्योंकि यह भारत का आंतरिक मामला है। यहाँ तक कि एफएटीएफ (फाइनेंसियल एक्शन टास्क फाॅर्स) की पेरिस में आयोजित बैठक में भी तुर्की ने पाकिस्तान का समर्थन किया। इससे पहले तुर्की, चीन और मलेशिया के समर्थन के कारण ही पाकिस्तान एफएटीएफ में ब्लैकलिस्ट होने से बच गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्टूबर 27-28 को सऊदी में एक बड़े निवेश समिट में भाग लेने जा रहे हैं। वो वहीं से तुर्की जाने वाले थे। हालाँकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने जानकारी दी है कि इस दौरे को अभी तक अंतिम रूप दिया ही नहीं गया था, इसीलिए दौरा कैंसल करने वाली बात उठती ही नहीं। पीएम मोदी इससे पहले 2015 जी-20 समिट में भाग लेने तुर्की गए थे। तुर्की के राष्ट्रपति भी जुलाई 2018 में भारत दौरे पर आए थे। लेकिन, तुर्की के राष्ट्रपति ने जम्मू कश्मीर में ‘भारत द्वारा मानवाधिकार हनन’ की बातें कर के दोनों देशों के रिश्तों में खटास ला दी।


हाल ही में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी तुर्की की आलोचना की थी। तुर्की की राष्ट्रपति को भेजे गए एक अजीबोगरीब पत्र में उन्होंने धमकी दी थी कि अगर वो एक डील पर सहमत न हुए तो तुर्की की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया जाएगा। भारत ने भी तुर्की को लताड़ लगाते हुए सलाह दी थी कि जम्मू कश्मीर पर बिना परिस्थितियों को समझे किसी देश के पूर्णरूपेण आंतरिक मुद्दे पर नकारात्मक टिप्पणी करना सही नहीं है। हालाँकि, तुर्की ने कुर्द पर बमबारी का सिलसिला अभी रोका नहीं है और वहाँ के राष्ट्रपति को कई हत्याओं का जिम्मेदार माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी बने दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
छद्दम समाजवादियों और धर्म-निरपेक्षों ने लगभग 1987/88 से भारत में हो रही चर्चित फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस द्वारा 1555 में की गयी भविष्यवाणी को तुष्टिकरण के पुजारी होने के नाते कभी गंभीरता से नहीं लिया। 2014 चुनाव में मनोनीत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बहुत हलके में ले लिया। परन्तु 2019 का चुनाव आने तक होश में आने की बजाए केवल मोदी विरोध ही करते नज़र आये। जबकि प्रधानमंत्री मोदी आलोचनाओं को नज़रअंदाज़ कर, नॉस्त्रेदमस की भविष्यवाणियों को चरितार्थ करते विश्व में भारत का मान बढ़ाने में तल्लीन रहे। विश्व भारत के प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति के आगे झुकती नज़र आ रही थी, लेकिन यहाँ उनके विरोधी जनता को भ्रमित करते रहे। मोदी विरोधियों ने सीआईए की उस रपट को भी नज़रअंदाज़ कर दिया जो मोदी के प्रधानमन्त्री बनने के लगभग दो ही वर्ष उपरान्त पेंटागन को दी थी।(नीचे इसी ब्लॉग पर प्रकाशित लेख का लिंक देखिए) अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक ही 5-वर्षीय सत्र समाप्त होकर दूसरा सत्र शुरू हुआ है कि पिछले पांच वर्षों में देशहित में किए कार्य उजागर होने ही शुरू हुए हैं, आगे आगे देखिए होता है क्या। 
जिस पाकिस्तान के आगे नतमस्तक होते रहे, आतंकवादियों को संरक्षण देते, बेकसूर हिन्दू साधु/संत और साध्वियों को "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम पर झूठे आरोपों में जेलों में डाल हिन्दुओं को अपमानित करने के कारण कभी विश्व ने आतंकवाद के मुद्दे पर गंभीरता नहीं दिखाई। परन्तु आज वही भारत है, जिसके वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा विश्व पटल पर उठाई आतंकवाद के मुद्दे को अतिगम्भीरता से लेने के ही कारण वही पाकिस्तान विश्व में अलग-थलग पड़ गया। 
विश्व में बढ़ती लोकप्रियता 
दुनियाभर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश का रुतबा लगातार बढ़ रहा है। अब प्रधानमंत्री मोदी को ब्रिटिश हेराल्ड के एक पोल में दुनिया का सबसे ताकतवर शख्स चुना गया है। इस पोल में उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी पीछे छोड़ दिया है। इस पोल में प्रधानमंत्री मोदी को सबसे ज्यादा 30.9 प्रतिशत वोट मिले। रूस के राष्ट्रपति पुतिन को 29.9 प्रतिशत, अमेरिकी राष्ट्रपति को 21.9 प्रतिशत और चीन के राष्ट्रपति को 18.1 प्रतिशत वोट मिले। प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर ब्रिटिश हेराल्ड मैगजीन के जुलाई संस्करण के कवर पेज पर भी प्रकाशित की जाएगी।
ब्रिटिश हेराल्ड के मुताबिक हाल के महीनों में नरेन्द्र मोदी को भारतीयों की ओर से बेहद ज्यादा अप्रूवल रेटिंग्स मिली हैं।
मोदी के लीडरशिप में भारत न केवल विश्व क्षितिज पर दमदार स्थिति में आया है बल्कि ग्लोबल ताकत बन गया है। आइये हम ऐसे ही कुछ उदाहरण देखते हैं-
अमेरिका और रूस से एक साथ दोस्ती 
अमेरिका और रुस की अदावत सभी जानते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की के कूटनीतिक कौशल के कारण आज दोनों ही देश भारत के साथ खड़े दिखते हैं। ब्रिक्स सम्मेलन में जिस तरह से रुस ने भारत का साथ देते हुए चीन की हेकड़ी गुम कर दी वह काबिले तारीफ है। ठीक इसी तरह पाकिस्तानपरस्त रहे अमेरिका को भारत की तरफ ले आना भी बड़ी बात है। आज अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने का खतरा मंडरा रहा है। अमेरिका ने भारत से दोस्ती की खातिर आज पाकिस्तान को हर मंच पर अकेला छोड़ दिया है।

‘कट्टर तिकड़ी’ को एक साथ साध गए पीएम मोदी
प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धियां आंकी जाए तो इस बात से अंदाजा लग जाएगा कि किस तरह उन्होंने इजरायल और फिलीस्तीन जैसे आपस में दुश्मन देशों के बीच संतुलन स्थापित किया। विशेष यह कि प्रधानमंत्री ने बारी-बारी दोनों ही देशों का दौरा किया और भारत की विदेश नीति के अपने स्टैंड पर कायम रहे। दोनों ही देशों ने भारत के बारे में सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। जब प्रधानमंत्री ने फिलीस्तीन का दौरा किया तो ऐसा अद्भुत नजारा दिखा जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। जॉर्डन के हेलिकॉप्टर पर सवार प्रधानमंत्री मोदी फिलीस्तीन के आसमान में उड़ रहे थे और उन्हें सुरक्षा प्रदान कर रही थी इजरायल की वायुसेना। विश्व राजनीति के लिए ऐसा अनोखा काम कोई और नही हो सकता है।

Asean देशों को चीन के ‘चंगुल’ से छुड़ाया
26 जनवरी, 2018 को नई दिल्ली के राजपथ पर विश्व ने एक और अनोखा दृश्य तब देखा जब आसियान देशों के 10 राष्ट्राध्यक्ष भारत की जमीन पर एक साथ दिखे। थाइलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिपींस, सिंगापुर, म्यांमार, कंबोडिया, लाओस और ब्रुनेई आसियान के नेताओं ने भारत को अपनी इस इच्छा से अवगत कराया है कि रणनीतिक तौर पर अहम भारत-प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा मुखर भूमिका निभाए। साफ है कि आसियान देशों के नेताओं का पीएम मोदी पर भरोसा व्यक्त किया जाना विश्व राजनीति में भारत के दबदबे को दिखा रहा है।

जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व पर भरोसा
जलवायु परिवर्तन पर काम करने के लिए भारत वैश्विक नेतृत्व को प्रेरित कर रहा है क्योंकि भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरत का 40% हिस्सा 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य तय किया है। भारत ने ऊर्जा के लिए कोयले से सौर की तरफ रूख करने के लिए ठोस प्रयास किए हैं। सौर और पवन ऊर्जा में भारी निवेश से बिजली की कीमतें भी कम हुई हैं। इसके अतिरिक्त मोदी सरकार यह साहस भी दिखाया है जब अमेरिका ने खुद को पेरिस समझौते से अलग किया तो दुनिया की नजर भारत पर ठहर गई। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत विश्व मंच पर अपनी ताकतवर उपस्थिति दर्ज करा दी है। प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर ही इंटरनेशनल सोलर एलायंस (ISA) का गठन हुआ जिसमें 121 देश शामिल हैं।

आतंकवाद पर दुनिया ने स्वीकारा पीएम मोदी का आह्वान
आतंकवाद अच्छा या बुरा नहीं होता, आतंकवाद तो बस आतंकवाद होता है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में भारत की यही बात पहले अनसुनी रह जाती थी, लेकिन अब भारत की बातों को दुनिया मानने लगी है और एक सुर में आतंक की निंदा कर रही है। आतंक के खिलाफ आज अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, नार्वे, कनाडा, ईरान जैसे देश हमारे साथ खड़े हैं। पाकिस्तान को छोड़कर सार्क के सभी सदस्य देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव और नेपाल हमारे साथ हैं। जी-20 हो या हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन, एससीओ हो, ब्रिक्स हो या सार्क समिट सभी ने हमारे साथ आतंकवाद को मानवता का दुश्मन बताते हुए दुनिया को इसके खिलाफ एक होने का आह्वान किया है।

भारत ने जीता अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन का चुनाव
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का दबदबा लगातर बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत को एक और कामयाबी मिली है। भारत ने अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन का चुनाव जीत लिया है। कुल 10 सदस्यों वाले इस संगठन का भारत 1959 से सदस्य है। फिलहाल जो चुनाव हुआ है वह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन की एक काउंसिल के लिए हुआ है। यहां वह काउंसिल कैटेगरी बी की है जिसके लिए पहली बार चुनाव हुआ है। नौवहन मंत्री नितिन गडकरी ने खुद लंदन जाकर IMO के वार्षिक समारोह में हिस्सा लिया था और भारत के लिए सपोर्ट भी मांगा था। IMO यूएन की ऐसी एजेंसी है जो नौवहन के बचाव और सुरक्षा पर नजर रखती हैं। यह एजेंसी जहाजों द्वारा फैलाए जाने वाले प्रदूषण पर भी नजर रखती है। भारत और जर्मनी के साथ ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, कनाडा, स्पेन, ब्राजील, स्वीडन, नीदरलैंड और यूएई इसके सदस्य हैं।

ICJ में भारत का झंडा बुलंद
संयुक्त राष्ट्र में भारत को बड़ी जीत तब मिली जब दलवीर भंडारी लगातार दूसरी बार अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट ऑफ जस्टिस में जज बन गए। दलवीर भंडारी का मुकाबला ब्रिटेन के क्रिस्टोफर ग्रीनवुड से था, लेकिन आखिरी दौर में अपनी हार देखते हुए उन्हें नाम वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। दरअसल शुरुआती ग्यारह राउंड में दलवीर भंडारी संयुक्त राष्ट्र महासभा की वोटिंग में ग्रीनवुड पर भारी बढ़त बनाए हुए थे, लेकिन सुरक्षा परिषद में ग्रीनवुड आगे हो जाते थे। यूएन महासभा में दलवीर भंडारी को 183 वोट मिले, जबकि उन्हें सुरक्षा परिषद के सभी 15 वोट मिले। गौर करें तो यह जीत भंडारी की नहीं बल्कि भारत के उस बढ़े कद की है जो पिछले पांच सालों में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बढ़ा है। कभी दुनिया पर राज करने वाला ब्रिटेन आज भारत के सामने बौना साबित हो रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर बना ‘अंतरराष्ट्रीय सौर संगठन’
दुनिया ग्लोबल वॉर्मिंग को कम करने के लिए चिंता जता रही थी, लेकिन भारत ने बड़ी पहल की और वैश्विक स्तर पर अमेरिका और फ्रांस के साथ इसके लिए इनोवेशन की तरफ कदम बढ़ाया गया। 26 जनवरी, 2016 को गुरुग्राम में जब प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने ‘इंटरनेशनल सोलर अलायंस’ (आईएसए) के अंतरिम सचिवालय का उद्घाटन किया तो एक ‘नये अध्याय’ की शुरुआत हुई। दरअसल ‘अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई पहल का परिणाम है और इसकी घोषणा भारत और फ्रांस द्वारा 30 नवंबर 2015 को पेरिस में की गई थी। आईएसए के गठन का लक्ष्य सौर संसाधन समृद्ध देशों में सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना और इसे बढ़ावा देना है। 

डोकलाम पर चीन ने देखी भारत की धमक
अमेरिका के प्रतिष्ठित थिंक-टैंक हडसन इंस्टिट्यूट के सेंटर ऑन चाइनीज स्ट्रैटजी के डायरेक्टर माइकल पिल्स्बरी नो कहा कि चीन की बढ़ती ताकत के समक्ष मोदी अकेले खड़े हैं। दरअसल ये टिप्पणी उन्होंने ‘वन बेल्ट, वन रोड’ परियोजना को ध्यान में रखते हुए कही थी। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी और उनकी टीम चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के इस महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट के खिलाफ मुखर रही है। दरअसल अमेरिकी थिंक टैंक का मानना बिल्कुल सही है, क्योंकि भारत ने चीन को डोकलाम विवाद में भी अपनी दृढ़ता का परिचय करा दिया है और चीन को अपनी सेना को वापस बुलाने पर मजबूर होना पड़ा। चीन ने भारत को युद्ध की भी धमकी दी लेकिन पीएम मोदी की नीतियों से चीन अकेला हो गया और पश्चिमी देशों ने उसे संयम बरतने की सलाह दी। अमेरिका, फ्रांस, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत के साथ खड़े रहे।

अंतरिक्ष कूटनीति से सार्क को दी नई दिशा
प्रधानमंत्री मोदी की उम्दा कूटनीति की मिसाल है दक्षिण एशिया संचार उपग्रह। इसकी पेशकश उन्होंने 2014 में काठमांडू में हुए सार्क सम्मेलन में की थी। यह उपग्रह सार्क देशों को भारत का तोहफा है। सार्क के आठ सदस्य देशों में से सात यानी भारत, नेपाल, श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव इस परियोजना का हिस्सा बने जबकि पाकिस्तान ने अपने को इससे यह कहकर अलग कर लिया कि इसकी उसे जरूरत नहीं है वह अंतरिक्ष तकनीक में सक्षम है। 5 मई 2017 के सफल प्रक्षेपण के बाद इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने जिस तरह खुशी का इजहार करते हुए भारत का शुक्रिया अदा किया उससे उपग्रह से जुड़ी कूटनीतिक कामयाबी का संकेत मिल जाता है। लेकिन पाकिस्तान ने अपने अलग-थलग पड़ने का दोष भारत पर यह कहते हुए मढ़ दिया कि भारत परियोजना को साझा तौर पर आगे बढ़ाने को राजी नहीं था।

प्रधानमंत्री मोदी की नीति से पस्त हुआ पाकिस्तान
मोदी सरकार की स्पष्ट और दूरदर्शी विदेशनीति के प्रभाव से पाकिस्तान विश्व बिरादरी में अलग-थलग पड़ गया है। प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति में ऐसा घिरा है कि उसे विश्व पटल पर भारत के खिलाफ अपने साथ खड़ा होने वाला कोई एक सहयोगी देश नहीं मिल रहा। चीन तक भारत के खिलाफ उसका साथ देने को तैयार नहीं है। हाल में ही जब चीन ने पाकिस्तान की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें पाकिस्तान ने भारत पर ओबीओआर को नुकसान पहुंचाने के लिए भारत की साजिश की बात कही थी। दूसरी ओर अमेरिका की अफगान नीति से उसे बाहर किया जा चुका है तथा वह पाकिस्तान से सहयोग में भी लगातार कटौती कर रहा है। पाक को आतंकवाद का गढ़ कहते हुए अफगानिस्तान और बांग्लादेश भी अब पाकिस्तान का साथ पूरी तरह से छोड़ चुके हैं।

सर्जिकल स्ट्राइक पर भारत को दुनिया का साथ
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत का दुनिया में जो स्थान बन गया है वह निश्चित ही भारत के बढ़ते प्रभुत्व को बयां करता है। जम्मू-कश्मीर के उरी में 18 सितंबर, 2016 को हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने 29 सितम्बर 2016 को सर्जिकल स्ट्राइक कर पाकिस्तान के आतंकवादी ठिकानों और लॉन्चपैठ को तबाह किया तो विश्व समुदाय भारत के साथ खड़ा रहा। इस के साथ ही पहली बड़ी सफलता 28 सितंबर को तब मिली जब पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन के बहिष्कार की घोषणा के तुरंत बाद तीन अन्य देशों (बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान) ने उसका समर्थन करते हुए सम्मेलन में ना जाने की बात कही। वहीं नेपाल ने सम्मेलन की जगह बदलने का प्रस्ताव दिया और पाकिस्तान के आंतकवाद के कारण सार्क सम्मेलन न हो सका। इसके अलावा चीन ने भी पाक के द्वारा कश्मीर में अंतराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग पर इसे द्विपक्षीय मामला कहकर कन्नी काट ली।

सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता को कई देशों का समर्थन
2014-15 में प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न देशों की यात्राएं कीं। कई लोगों ने इन यात्राओं पर तंज भी कसे और कुछ ने तो उन्हें ‘एनआरआई प्रधानमंत्री’ तक कह डाला, लेकिन इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी नुख्ताचीनी पर बिना ध्यान दिये अपनी यात्रा को व्यापक बना रहे थे। इन यात्राओं में वे तीन प्रमुख एजेंडों के साथ आगे बढ़ रहे थे। अलग-अलग देशों के साथ संबंधों में सुधार, निवेश आमंत्रित करने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में भारत की स्थायी सीट के लिए समर्थन जीतना उनका प्रमुख उद्देश्य था। दरअसल भारतीय इतिहास में कोई और प्रधानमंत्री नहीं जिन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए इतनी मेहनत की है। अमेरिका, जर्मनी, रूस, फ्रांस और जापान जैसे देशों के राजदूत और नेताओं को भारत के पक्ष में लाकर उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के लिए लगभग सभी देशों का समर्थन हासिल कर लिया। यह समर्थन इस अंतरराष्ट्रीय मंच की स्थिति के लिए भारत की पात्रता दिखाने के उनके प्रयासों का प्रत्यक्ष परिणाम था।

पीएम मोदी के आह्वान से योग को दुनिया ने दिया समर्थन
प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर 21 जून, 2015 को विश्व के 192 देश जब ‘योगपथ’ पर चल पड़े तो सारे संसार में योग का डंका बजने लगा। आधुनिकता के साथ अध्यात्म का मोदी मंत्र दुनिया के देशों को भी भाया और इसी कारण पीएम मोदी की पहल को 192 देशों का समर्थन मिला। 177 देश योग के सह प्रायोजक के तौर पर इस आयोजन से जुड़ भी गए। अब पूरी दुनिया योग शक्ति से आपस में जुड़ी हुई महसूस होने लगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनथक प्रयास से योग को आज पूरी दुनिया में एक नई दृष्टि से देखा जाने लगा है। यह अनायास नहीं है कि पूरी दुनिया में योग का डंका बज रहा है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भारत की नीति और भारतीय होने पर गौरव की अनुभूति से प्रभावित प्रधानमंत्री मोदी ने योग का पूरी दुनिया में प्रसार किया है।

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पेंटागन को सौंपी गयी इस ख़ुफ़िया सुचना का टाइटल ही है की, “अमरीका के बाद भारत दूसरा देश हो सकता है जिसने किसी पर परम.....

जाहिर है प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया की एक ऐसी शक्ति बनकर उभरा है जिसे झुकाया नहीं जा सकता। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का अहम स्थान है, तो सामरिक क्षेत्र में भी भारत ने अपनी हनक का अहसास कराया है। सामाजिक समस्याओं को सुलझाने में भारत ने जहां अपनी जिम्मेदारी निभाई है, वहीं पर्यावरण संतुलन जैसे मुद्दे पर भी भारत की पहल सराहनीय रही है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के रुख ने जहां देश-दुनिया को सोचने को मजबूर किया है, वहीं विश्व शांति की ओर भारत के प्रयासों को दुनिया के देशों ने मान्यता दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत का दुनिया में जो स्थान बन गया है वह निश्चित ही भारत के बढ़ते प्रभुत्व को बयां करता है। विदेश नीति के तौर पर उनकी उपलब्धियां आंकी जाए तो पीएम मोदी के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का दबदबा लगातार बढ़ रहा है।

भारत के लिए खतरा बनने जा रहे चीन का मालदीव ने पलट दिया पूरा खेल

MON ECN INTE china was going to be a threat to india but maldives reversed the entire game
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
भारत में मोदी विरोधी मोदी के विदेशी दौरों पर हज़ारों प्रश्नचिन्ह लगाते रहते हैं कि जब देखो भारत से बाहर घूमते रहते हैं, देश में क्या हो रहा है, उसकी चिन्ता नहीं। परन्तु उन्ही विदेशी दौरों का प्रभाव शायद विरोधी देख नहीं पा रहे या फिर नज़रअंदाज़ करने का ड्रामा कर रहे हैं। प्राप्त समाचारों के अनुसार, मालदीव ने भारत के पक्ष में खड़े होकर चीन के इरादों को चकनाचूर कर दिया है। 
इससे पूर्व आतंकवाद के मुद्दे पर भी केवल चीन को छोड़ पाकिस्तान के विरुद्ध भारत के साथ खड़ा है। आतंकवाद की समस्या पर हर सम्भव मदद भी करने को तैयार है। जबकि भारत में तुष्टिकरण पुजारी अपनी कुर्सी की खातिर इस्लामिक आतंकियों को संरक्षण देने की खातिर हिन्दू धर्म को ही बदनाम नहीं बल्कि कलंकित करने का कोई अवसर गँवाना नहीं चाहते।  
हिंद महासागर पर भारत के वर्चस्व के लिहाज से अहम रहे द्वीपीय देश मालदीव से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजदीकियां एक बार फिर रंग लाई हैं। दरअसल मालदीव ने लगभग 4 साल पुराना कानून रद्द करके चीन को बड़ा झटका दिया है। इससे चीन की भारत के वर्चस्व वाले हिंद महासागर में दखलंदाजी की कोशिशें नाकाम हो गई हैं। अगर चीन मालदीव में जमीन खरीदने में कामयाब हो जाता, तो उसे इंडियन नेवी की एक्टिविटीज पर नजर रखना आसान हो जाता।

4 साल पुराना कानून किया रद्द

मालदीव सरकार ने हाल में अपनी संप्रभुता को नुकसान होने की चिंताओं को जाहिर करते हुए उसकी संसद द्वारा 2015 में पारित कानून को रद्द कर दिया। इस कानून से मालदीव में विदेशियों द्वारा संपत्ति खरीदने का रास्ता साफ हो गया था।

मालदीव में चीन ने किया है भारी निवेश

मालदीव दुनिया की व्यस्ततम शिपिंग लेन्स में से एक के नजदीक है। इसे प्रभाव में लेने के लिए भारत और चीन के बीच खासी होड़ देखने को मिलती है। चीन ने पिछली सरकार में मालदीव में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खासा निवेश किया है, जिसके पीछे उसकी मंशा भारत की मालदीव पर पकड़ कमजोर करना थी।

मालदीव में जमीन नहीं खरीद सकेगा चीन

वर्ष 2015 में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की अगुआई के नियंत्रण वाली सरकार ने मालदीव के भूमि स्वामित्व कानून में बड़ा बदलाव किया था। इसके तहत 1 अरब डॉलर (7 हजार करोड़ रुपए) के निवेश के इच्छुक विदेशी जमीन खरीद सकते थे। हालांकि कानून के अस्तित्व में आने के बाद बीते चार साल में किसी विदेशी ने वहां पर निवेश नहीं किया है।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार भारत में विरोधी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर नितरोज कोई न कोई आरोप लगा रहे हैं, वही द...

सैन्य इस्तेमाल की थी आशंका

चीन समर्थिक यामीन के इस फैसले से विदेशी शक्तियों द्वारा उसकी जमीन सैन्य उद्देश्यों से इस्तेमाल की आशंकाएं पैदा हो गई तीं। इसी हफ्ते मालदीव की संसद में इस कानून को रद्द करने वाला प्रस्ताव पेश किया था। पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने बीते चाल चुनाव प्रचार के दौरान इसका वादा भी किया था।
राष्ट्रपति के प्रवक्ता इब्राहिम हुड ने बुधवार को कहा, ‘जमीन मालदीव के सबसे मूल्यवान स्रोतों में से एक है और यह काफी सीमित हैं। कुदरती तौर पर यह हमारी पहचान से भी जुड़ा हुआ है। किसी अन्य कमोडिटी की तरह अपनी पहचान को बेचना खासा मुश्किल है।’ हुड ने कहा, ‘राष्ट्रपति इस जुड़ाव और इससे संबंधित भावनाओं को समझते हैं।’