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‘सीजफायर के लिए गिड़गिड़ाते हुए आया था पाकिस्तान’: सिंगापुर के भारतीय हाई कमिश्नर ने कश्मीर पर अमेरिकी पेशकश ठुकराई, कहा- सिर्फ PoK पर होगी बात

 

                         शिल्पक अंबुले, सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त (फोटो साभार: YT/Bloomberg)
जिस मुल्क का जन्म ही झूठ, फरेब और जालसाजी से हुआ हो उससे उत्पात की उम्मीद की जा सकती है। भारत के ब्रह्ममस्त आदि गोलों से दहला पाकिस्तान एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे रहम की भीख मांगता नज़र आया। भारत की लड़ाई आतंकवाद से है फ़ौज ऐसे लड़ी जैसे असली आतंकवादी वही है। लेकिन पाकिस्तान में पागल जेहादी अब अपनी जीत का दावा ठोक अपनी उस अवाम को पागल बना रहे है जो भारतीय गोलों के फटने से ऐसी कम्पन महसूस कर रहे थे जैसे भूचाल आ रहे हों। ये तो 
डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) ने तरस खा लिया वरना पाकिस्तानी नेताओं और फौज को कहीं छुपने की जगह नहीं मिलती। जिस देश का रक्षा मंत्री अपनी ही संसद में कहे कि मदरसों से लड़कों को सरहद पर भेजना पड़ेगा यानि रक्षा मंत्री ने साबित कर दिया कि मदरसों में इस्लामिक तालीम की जगह क्या पढ़ाया जाता है।  

भारत के सिंगापुर में उच्चायुक्त (हाई कमिश्नर) शिल्पक अंबुले ने सोमवार (12 मई 2025) को कहा कि भारत-पाकिस्तान के हाल के झगड़े में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता की कोई बात नहीं है। सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त शिल्पक अंबुले ने सोमवार (12 मई 2025) को ब्लूमबर्ग टीवी पर हसलिंदा अमीन से बातचीत में कहा, “हमारे लिए कश्मीर एक द्विपक्षीय मुद्दा है, न कि अंतरराष्ट्रीय। कश्मीर के मामले में मध्यस्थता शब्द हमारे लिए काम नहीं करता।”

ऑपरेशन सिंदूर पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने पहले हमला शुरू किया था। इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान की 11 वायुसेना ठिकानों पर जोरदार हमले किए, जिसके बाद पाकिस्तान को सीजफायर (युद्धविराम) के लिए मजबूर होना पड़ा। यह बयान तब आया जब अमेरिका ने कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की इच्छा जताई थी। भारत ने हमेशा से कश्मीर को अपने और पाकिस्तान के बीच का मामला माना है और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को सिरे से खारिज किया है।

अंबुले ने कहा कि भारत नहीं चाहता था कि मामला बढ़े। लेकिन पाकिस्तान ने भारत के नागरिक और सैन्य ठिकानों, जैसे अस्पतालों और धार्मिक स्थलों पर हमले शुरू किए। उन्होंने कहा, “अब पाकिस्तान को सोचना है। हमने सिर्फ सीमा पार आतंकी ठिकानों को नष्ट करने के लिए जवाब दिया। लेकिन पाकिस्तान ने नागरिकों पर हमले करके मामला और बिगाड़ा, तो हमें भी जवाबी हमला करना पड़ा।”

उन्होंने बताया कि कई दिनों की सीमा पर गोलीबारी के बाद पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) ने भारत के DGMO से बात की। अंबुले ने कहा, “पाकिस्तान का DGMO हमारे DGMO के पास गिड़गिड़ाने आया, जब हमने उनके 11 वायुसेना ठिकानों को तबाह कर दिया। तब जाकर उन्होंने सीजफायर माना।”

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा था कि उन्होंने सीजफायर में भूमिका निभाई। लेकिन अंबुले ने इन दावों को साफ नकार दिया। उन्होंने कहा, “कश्मीर का मसला भारत और पाकिस्तान के बीच का है। हम दूसरों से अपनी बात समझाते हैं, लेकिन मध्यस्थता की कोई गुंजाइश नहीं। कश्मीर कोई अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं है।”

सिंधु जल समझौते और पीओके पर भी रखी बात

इंडस वाटर ट्रीटी (सिंधु जल समझौता) के बारे में अंबुले ने कहा कि पाकिस्तान के आतंकवाद को बढ़ावा देने की वजह से भारत ने इस समझौते को रोक दिया है। इस मुद्दे पर अंबुले ने कहा, “यह समझौता पहले से ही पाकिस्तान की तरफ ज्यादा झुका था। जब तक सीमा पार आतंकवाद चलता रहेगा, यह समझौता लागू नहीं होगा।” पाकिस्तान के साथ बातचीत के सवाल पर उन्होंने भारत का पुराना रुख दोहराया, “आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं हो सकते। एकमात्र मुद्दा है – पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK) जो गैरकानूनी है।”

इससे पहले, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने शनिवार (10 मई 2025) को दावा किया था कि दोनों देश तटस्थ स्थान पर बातचीत के लिए सहमत हुए हैं। लेकिन अंबुले ने इसे साफ तौर पर खारिज करते हुए कहा, “भारत ने कभी ऐसा नहीं किया। आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते।” यह बयान भारत की उस नीति को दर्शाता है, जो आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस और कश्मीर पर अपनी संप्रभुता को प्राथमिकता देती है।

अंबुले ने कहा कि भारत तब तक पाकिस्तान पर दबाव बनाए रखेगा, जब तक वह सीमा पार आतंकवाद को बंद नहीं करता। दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों खासकर DGMO के बीच बातचीत जारी रहने की उम्मीद है। उन्होंने कहा, “अगर पाकिस्तान आतंकवाद रोक दे, तो हम बातचीत के लिए तैयार हैं। लेकिन ध्यान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और 22 अप्रैल 2025 के हमले के पीड़ितों को इंसाफ दिलाने पर रहेगा।”

गौरतलब है कि चार दिन की तीखी झड़पों के बाद शनिवार (10 मई 2025) को दोनों देशों ने युद्धविराम पर सहमति जताई। युद्धविराम (Ceasefire) से पहले भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाकर पाकिस्तानी वायुसेना की कमर तोड़ दी और आतंक के ठिकानों को चुन-चुन कर नष्ट कर दिया। भारत के आक्रमण से घबराए पाकिस्तान ने ही सीजफायर की गुहार लगाई। सिंगापुर में भारत के हाई कमिश्नर शिल्पक अंबुले ने भी इस बात को दोहराया।

शिल्पक अंबुले ने कहा कि पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस ने अपने भारतीय समकक्ष से संपर्क किया, जिसके बाद यह युद्धविराम संभव हुआ। इसमें किसी तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं पड़ी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत ने “आतंकी ठिकानों को नष्ट करने” का अपना उद्देश्य हासिल कर लिया।

भारत की विदेश नीति और इजरायल संकट

 

डॉ राकेश कुमार आर्य 

इसरायल और फिलिस्तीनियों के बीच दुश्मनी की आग दशकों पुरानी है। इसराइल के अस्तित्व को मिटाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर षड़यंत्र चलते रहते हैं । जिनके चलते यह आग भीतर ही भीतर सुलगती ही रहती है। अनुकूल अवसर आते ही यह आग भड़क उठती है। अब भी ऐसा ही हुआ है। इस बार पूर्व नियोजित तैयारी के अंतर्गत फिलिस्तीन मिलिटेंट ग्रुप हमास ने गाजा इलाके से इजरायल पर रॉकेटों से धुआंधार हमला करते हुए सारी दुनिया को यह संदेश दे दिया कि आतंकवाद अपने घृणित स्वरूप में जिंदा है। इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि दुनिया को इस गफलत में नहीं रहना चाहिए कि आतंकवाद को शांति सम्मेलनों और उपदेशों से समाप्त किया जा सकता है। इसके समूल विनाश के लिए दुनिया को एकजुट होना पड़ेगा। उधर इसराइल ने भी अपने स्वभाव के अनुसार मजबूती से डटे रहकर आतंकवाद का जवाब देना आरंभ कर दिया है। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इजरायल के साथ है। 

इधर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट कह दिया है कि वह इस हमले के समय अपने मित्र इजरायल के साथ मजबूती से खड़ा है। यद्यपि अबसे पूर्व ऐसे अवसर भी आए जब भारत ने फिलीस्तीन के साथ खड़े रहने में अपनी भलाई देखी थी, पर अब परिस्थितियां बदल गई हैं और भारत की विदेश नीति में भी व्यापक परिवर्तन हुआ है। समय की आवश्यकता को देखते हुए भारत ने इस समय इजराइल का साथ देना उचित माना है।

भारत की वर्तमान विदेश नीति इस बात पर अडिग है कि जो भी देश कहीं पर आतंकवाद की घटना को अंजाम देगा या उसका समर्थन करेगा या इसका प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन करेगा, भारत उसका विरोध करेगा। संपूर्ण मानवता के हित में भारत की यह विदेश नीति पूर्णतः न्यायसंगत और समय के अनुकूल है। यदि इसी प्रकार की मानवतावादी विदेश नीति को सभी देश अपना लें तो निश्चित रूप से संसार से आतंकवाद जैसे भयानक शत्रु को मिटाया जा सकता है। कुछ लोग आतंकवाद का संप्रदाय के आधार पर समर्थन करते हैं, कुछ किसी आतंकवादी देश से अपने मित्रतापूर्ण संबंधों के चलते हुए ऐसा करते हैं तो कुछ आतंकवाद से पीड़ित किसी देश से अपना कोई पुराना वैर साधने के लिए आतंकवाद का समर्थन करते हैं। भारत ने अपने स्टैंड से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल और केवल आतंकवाद के विरुद्ध है और इसके लिए वह कुछ भी नहीं देखेगा। 

भारत ने अपने इस स्टैंड से यह भी स्पष्ट किया है कि वह इस बात की केवल घोषणा ही नहीं करता है कि वह किसी भी किस्म के आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं करेगा बल्कि वह इस पर चलकर भी दिखाना चाहता है। सारे संसार के देशों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि एक आतंकवादी संगठन हमास किस प्रकार ताकत प्राप्त करता है और इस स्थिति में आ जाता है कि संसार भर के देशों की तमाम कोशिशों के उपरांत भी वह एक देश पर आतंकवादी हमला कर देता है। बात स्पष्ट है कि या तो संसार के देशों की ये घोषणाएं खोखली थीं कि वह आतंकवाद का डटकर एकजुटता के साथ सामना करेंगे या फिर अंदर ही अंदर इस आतंकवादी संगठन को वही देश दूध पिलाने का काम करते रहे जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की आलोचना करते रहे हैं ? इन दोगली चालों के कारण ही अंतरराष्ट्रीय शांति की स्थिति बन नहीं पाती है। आज भारत की नीतियों को अपनाकर चलने का समय आ गया है। जब हर देश को अपनी घोषणाओं के अनुसार अपनी योजनाओं को भी बनाने के लिए सोचना पड़ेगा। अबकी बार जिस प्रकार से इसराइल पर आक्रमण किया गया है वह अपने आप में एक अप्रत्याशित घटना है। यदि इस प्रकार की कार्यवाही को किसी भी प्रकार से वैधानिक या उचित ठहराने का प्रयास किया जाता है तो यह कतई गलत होगा। यही कारण है कि भारत इस प्रकार की घटनाओं के विरोध में इसराइल के साथ खड़ा है।

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अभी कुछ समय पहले ही दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन हुआ था। उसमें इंडिया मिडल ईस्ट इकोनामिक कॉरिडोर बनाने की घोषणा भी की गई थी। उस घोषणा में इसराइल भी सम्मिलित है। भारत इजरायल विरोधी शक्तियां उस घोषणा से तिलमिला गई हैं। अतः इसराइल पर किया गया इस प्रकार का हमला भारत के लिए भी एक संकेत हो सकता है। इसराइल ने अपनी मजबूती दिखाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि वह प्रतिशोध लेगा और प्रतिक्रियास्वरूप किसी भी स्थिति तक जाने के लिए तैयार है, अपनी घोषणा के अनुसार इजरायल ने ऐसा ही करना भी आरंभ कर दिया है। इससे स्पष्ट है कि गाजा पट्टी की यह घटना भविष्य में कहां तक जाएगी और क्या स्वरूप लेगी ? - इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

यह एक भयंकर महाविनाश की चिंगारी भी हो सकती है। यह सब इजरायल के धैर्य और महाशक्तियों की कूटनीतिक चालों पर लगने वाले विराम या संभावित रूप से उनमें आने वाली तेजी पर निर्भर करता है कि हम भयंकर विनाश की ओर जा रहे हैं या कुछ समय बाद इन परिस्थितियों में ठहराव आ जाएगा। वर्तमान परिस्थितियों में इतना स्पष्ट हो रहा है कि मिडिल ईस्ट एक गंभीर संकट में फंस चुका है।

  इस ताजा घटनाक्रम के संदर्भ में हमें यह भी समझना चाहिए कि कुछ समय पहले तक यह संभावना व्यक्त की जा रही थी कि इसराइल और सऊदी अरब के बीच नए सिरे से नए संबंधों की परिभाषा को गढ़ा जा सकता है। अमेरिका का वर्तमान नेतृत्व इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा था। इसराइल पर किए गए इस आतंकी हमले के पीछे इसराइल और सऊदी अरब के बीच बन रहे नए संबंधों को झटका देने का उद्देश्य भी हो सकता है।

जो लोग जो देश शांतिपूर्वक अपने काम पर नजर रखते हैं और शांति को ही वैश्विक विकास की एकमात्र गारंटी मानते हैं , उनके लिए वर्तमान स्थिति बड़ी परेशानकुन है, पर वे कुछ कर नहीं सकते। उन्हें अपने क्षेत्र में स्थिरता की आवश्यकता है , क्योंकि किसी भी प्रकार की अस्थिरता व्यापार और लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होती है।

  वैश्विक राजनीति और कूटनीति का यह तकाजा होता है कि शत्रु हमेशा आप पर उस समय वार करता है जब आप सर्वाधिक असावधान होते हैं। तो क्या यह माना जा सकता है कि इजरायल जो कि अपने चारों ओर से शत्रुओं से घिरा हुआ है, वह वर्तमान में असावधान हो गया था? जिस इजराइल से बड़े देश भय खाते हैं , बड़े बड़े देश हथियार खरीदते देखे जाते हैं और जो अपने पौरुष और पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है उसका इस प्रकार असावधान होना जंचता नहीं, पर लगता यही है कि वह असावधान था। उसका इंटेलिजेंस बुरी तरह निष्फल सिद्ध हो गया। इतने बड़े हमले को आतंकवादी अंजाम देते हैं और इजरायल की पूरी इंटेलिजेंस उस पर कुछ नहीं कर पाती या उसकी सूचना उसके पास पहले से उपलब्ध नहीं होती , इसका कोई ना कोई तो कारण है। आज नहीं तो कल यह सवाल इजराइल में अवश्य पूछा जाएगा कि वहां की सुरक्षा एजेंसियां आखिर इतने बड़े हमले के प्रति असावधान क्यों रहीं ?

 इस प्रकार के सवालों से वर्तमान इजरायली नेतृत्व भी अछूता नहीं रहेगा। समय आने पर उसे भी जवाब देना होगा।

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)