Showing posts with label modi govt. Show all posts
Showing posts with label modi govt. Show all posts

‘हलाल’ शब्द सरकारी दस्तावेज से एक झटका में गायब: इस्लामी संस्थाओं के सर्टिफिकेट का खेल बंद

                        APEDA ने अपने 'रेड मीट मैनुअल' दस्तावेज से हटाया 'हलाल' शब्द
भारत सरकार के ‘कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority)’ या APEDA ने अपने रेड मीट मैन्युअल में से ‘हलाल’ शब्द को ही हटा दिया है और इसके बिना ही दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके लिए लम्बे समय से अभियान चला रहे हरिंदर एस सिक्का ने सोशल मीडिया पर इस सम्बन्ध में जानकारी दी।

उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री पीयूष गोयल को धन्यवाद दिया। सरकार के इस कदम के बाद अब ‘हलाल’ सर्टिफिकेट की ज़रूरत समाप्त हो जाएगी और सभी प्रकार के वैध मीट कारोबारी अपना पंजीकरण करा सकेंगे। हरिंदर सिक्का ने इसे बिना किसी भेदभाव के ‘एक देश, एक नियम’ के तहत लिया गया फैसला बताया और कहा कि ये ‘हलाल’ मीट परोस रहे रेस्टॉरेंट्स के लिए भी एक संदेश है।

APEDA ने अपने ‘फूड सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम’ के स्टैंडर्ड्स और क्वालिटी मैनेजमेंट के डॉक्यूमेंट में बदलाव किया है। पहले इसमें लिखा हुआ था कि जानवरों को ‘हलाल’ प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करते हुए जबह किया जाता है, जिसमें इस्लामी मुल्कों की ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाता है। अब इसकी जगह लिखा गया है, “मीट को जहाँ आयात किया जाना है, उन मुल्कों की ज़रूरतों के हिसाब से जानवरों का जबह किया गया है।”

ये बदलाव इस डॉक्यूमेंट के पेज संख्या 8 में किया गया है। वहीं दूसरी तरफ पेज 30 पर जहाँ पहले लिखा था, “इस्लामी संगठनों की मौजूदगी में जानवरों को हलाल प्रक्रिया के तहत जबह किया गया है। प्रतिष्ठित इस्लामी संगठनों के सर्टिफिकेट लेकर मुस्लिम मुल्कों की जरूरतों का ध्यान रखा गया है”, वहाँ अब लिखा है, “आयातक देश के ज़रूरतों के अनुसार जानवरों को जबह किया गया है।” पेज संख्या 35, 71 और 99 पर भी बदलाव किया गया है।

पेज संख्या 35 पर पहले लिखा था कि इस्लामी शरीयत के हिसाब से पंजीकृत इस्लामी संगठन की कड़ी निगरानी में हलाल प्रक्रिया के तहत जानवरों को जबह किया गया है और उनकी निगरानी में ही इसका सर्टिफिकेट भी लिया जाता है। इस पूरी पंक्ति को ही हटा दिया गया है।

वहीं पेज संख्या 71 पर जेलेटीन बोन चिप्स को स्वस्थ भैंस को हलाल प्रक्रिया के तहत जबह किए जाने के बाद तैयार किए जाने की बात लिखी थी। इसे बदल कर भी ‘आयातक देश की ज़रूरतों के अनुरूप’ कर दिया गया है। साथ ही ‘हलाल’ शब्द को हटा कर लिखा गया है कि पोस्टमॉर्टम जाँच के बाद ही इसे तैयार किया गया है।

पेज संख्या 99 पर पूरी प्रक्रिया का फ्लो चार्ट था, जहाँ ‘हलाल’ शब्द को ‘Slaughter’ (जबह) से रिप्लेस कर दिया गया है। अब APEDA के रेड मीट मैन्युअल में आपको कहीं ‘हलाल’ शब्द नहीं मिलेगा। सिर्फ एक मीट प्रोसेसिंग कम्पनी ‘हलाल इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से रजिस्टर्ड है, जिसका जिक्र है।

हलाल पर बवाल

करीब 6 महीने पहले सोशल मीडिया पर सरकारी दस्तावेजों में हलाल शब्द को लेकर बवाल हुआ था। तब सरकारी विभाग को इस पर आकर सफाई भी देनी पड़ी थी।

तब APEDA को ऊपर वायरल हुए इमेज पर सफाई देते हुए कहना पड़ा था कि हलाल मीट के निर्यात को लेकर भारत सरकार की ओर से कोई जबरन नियम नहीं था बल्कि यह आयात करने वाले देशों (जो ज्यादातर मुस्लिम देश हैं) के नियमों के अनुरूप था। हालाँकि APEDA के रेड मीट मैन्युअल को कुछ ऐसे लिखा गया था, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती थी और यह लगता था कि भारत सरकार ही मीट को हलाल तरीके से प्रोसेस करने के लिए बाध्य करती है। इसी भ्रम को दूर करने के लिए भारत सरकार ने उपरोक्त बदलाव किया है।

क्या होगा बदलाव

APEDA के रेड मीट मैन्युअल के कारण मीट व्यापार में धार्मिक भेदभाव होता था। हलाल प्रक्रिया का पालन करने के कारण हिंदू नाम के बिजनेसमैन चाह कर भी इसमें आगे नहीं बढ़ पाते थे। हलाल सर्टिफिकेशन की आड़ में भी उनका शोषण होता था। रोजगार में गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव होता था।

इसका कारण था हलाल के लिए थोपे गए इस्लामी नियम। इसके सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल मांस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, गैर-मुस्लिम, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यह आर्थिक पक्ष हलाल को केवल एक भोजन पद्धति ही नहीं, एक पूरी समानांतर अर्थव्यवस्था बना देता है, जो गैर-मुस्लिमों को न केवल हाशिये पर धकेलती है, बल्कि परिदृश से ही बाहर कर देती है।

हाल ही में ये भी खबर आई थी कि दिल्ली के ऐसे होटल या मीट की दुकान जो SDMC (दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन) के अंतर्गत आते हैं, उन्हें अब हलाल या झटका बोर्ड टाँग कर रखना जरूरी होगा। SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी ने यह प्रस्ताव गुरुवार (24 दिसंबर 2020) को पास कर दिया। इस प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि हिंदू और सिख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है।

कोरोना वायरस : मोदी सरकार पिता के साए जैसी: इटली से लौटी युवती के पिता

नरेंद्र मोदी
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
कोरोना वायरस का प्रसार रोकने के लिए भारत की तैयारियों और प्रभावित देशों से अपने नागरिकों को लाने की केंद्र सरकार की कोशिशों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना हो रही है। जबकि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी भले इस वैश्विक महामारी को मोदी सरकार पर हमले के मौके की तरह तलाश कर रहे हैं, लेकिन सोशल मीडिया में सरकार की तारीफ करते हुए कुछ लोगों ने जो आपबीती शेयर की है वह बेहद मार्मिक है। इटली से लाई गई एक युवती के पिता ने अपनी भावना साझा करते हुए कहा है कि वो सालों से सरकार की आलोचना कर रहे थे। लेकिन, अब उन्हें एहसास हो रहा है कि मोदी सरकार पिता के साए (fatherly figure) जैसी है। विदेश से लाए गए एक युवक ने कहा है कि ऐसी व्यवस्था तो उसने जर्मनी जैसे यूरोपीय मुल्कों में भी नहीं देखी है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने इटली से लौटी युवती के पिता का पत्र शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने इंडियन एंबेसी, भारत सरकार और विशेषत: नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। पिता के मुताबिक उनकी बेटी मास्टर की पढ़ाई करने इटली के मिलान गई थी। वहॉं हालात बिगड़ने पर उसे वापस लौटने को कहा। जब वह लौटने लगी तो उससे भारत वापस जाने का सर्टिफिकेट माँगा गया। उन्होंने खुद इंडियन एंबेसी को संपर्क करने की कोशिश की। मगर मिलान में एंबेसी का कार्यालय बंद होने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने इंडियन एंबेसी के अन्य लोगों को मेल के जरिए संपर्क किया और रात के 10:30 बजे उनकी बेटी ने फोन पर बताया कि उसकी बात दूतावास में हो गई है और वह अगली फ्लाइट से भारत लौट रही है।
पिता के मुताबिक, वे सालों से भारतीय सरकार को कोस रहे थे। लेकिन मोदी सरकार में पिता का चेहरा है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी 15 मार्च को भारत आई और आईटीबीपी अस्पताल में उसकी स्वास्थ्य संबंधी, खान-पान संबंधी सभी जरूरतों का ख्याल रखा गया। गौरतलब है कि इटली उन देशों में शामिल है जो कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित हैं।


भारत सरकार इन दिनों लगातार विदेशों से लौटने वाले अपने नागरिकों को स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करवाने में प्रयासरत है। सोशल मीडिया में वायरल हुए एक विडियो में विदेश से लौटा शख्स मिली सुविधाओं के बारे में बता रहा है। इस विडियो को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने भी शेयर किया था। इसमें व्यक्ति बता रहा है कि सरकार ने करीब 70 किलोमीटर दूर सभी पैसेंजर को कोरोन्टाइन किया है। बिल्डिंग को लगातार सैनेटाइज किया जा रहा है। बड़े-बड़े अधिकारी मौक़े पर तैनात हैं। उन्हें 24 घंटे की देखरेख में रखा है। साथ ही जहाँ उन्हें रखा गया है वहाँ सरकार ने बहुत अच्छी व्यवस्था की है। सबको अलग से रूम मिले हैं। इसमें उन्हें पानी, चप्पल, बेड, खाना, नई तौलिया सब मुहैया कराया जा रहा है। इसलिए वे नरेंद्र मोदी, स्वास्थ्य मंत्री समेत पुलिस प्रशासन और डॉक्टरों का धन्यवाद करते हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कोरोना वायरस के संक्रमण से निबटने के लिए सरकार ने 400 बेड का कोरोन्टाइन वार्ड तैयार करवाया है। यहाँ विदेश से लौटने वालों को सीधे दिल्ली एयरपोर्ट से लेकर जाया जाएगा। यहाँ इन सभी लोगों की 14 तक की निगरानी होगी और अगर इनमें कोरोना के लक्षण मिलते हैं तो इन्हें आइसोलेट कर छोड़ा जाएगा। ये कोरोन्टाइन वार्ड नोयडा के सेक्टर 39 में स्थित जिला अस्पताल की नई बिल्डिंग में बना है। यहाँ पर्याप्त संख्या में पैरामेडिकल स्टॉफ तैनात हैं।
नरेंद्र मोदी, जम्मू कश्मीर, कोरोना वायरसमोदी ने वो कर दिखाया, जो हमारे लिए किसी ने नहीं किया : वुहान से लौटी कश्मीरी छात्रा  जम्मू-कश्मीर के कई छात्र चीन में फँसे हुए थे। इन्हें मोदी सरकार सकुशल देश वापस लाने में सफल रही। कोरोना वायरस से प्रभावित इलाक़ों से वापस लौटने के बाद कश्मीरी छात्रों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं है। वे सभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को धन्यवाद देते नहीं थक रहे। ऐसी ही एक छात्र ने मीडिया से बातचीत के दौरान अपने मन की बात साझा की। कश्मीरी छात्रा ने कहा कि बचपन से लेकर अब तक वो हिंसा की कई वारदातों को देख चुकी थीं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है जब भारत सरकार ने उनके लिए इतना बड़ा क़दम उठाया।
चैनल ‘सीएनएन न्यूज़ 18’ से बातचीत करते हुए कश्मीरी छात्रा ने कहा कि चीन में फँसे भारतीय छात्रों को वापस लेकर आना कोई साधारण बात नहीं थी। ये बहुत बड़ी बात है। उसने कहा कि ऐसा पहली बार हुआ है जब बाहर फँसे कश्मीरियों के लिए भारत सरकार ने इतना बड़ा काम किया है। उसने कहा कि मोदी ने वो कर दिखाया है, जो आज तक किसी ने नहीं किया। जम्मू कश्मीर के कुछ अन्य छात्रों ने भी मोदी सरकार की तारीफ़ की, जिन्हें वहाँ से बचा कर लाया गया।

चीन के हुबेई प्रान्त की राजधानी वुहान में कोरोना वायरस का संक्रमण सबसे ज्यादा है। वहाँ कई भारतीय छात्र फँसे हुए थे, जिनमें से कई कश्मीरी भी थे। जनवरी के अंतिम हफ्ते में जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री अल्ताफ बुखारी ने पीएम मोदी से गुहार लगाई थी कि कश्मीरी छात्रों को वहाँ से वापस लाया जाए। इसके बाद मोदी सरकार ने उन्हें वापस लाने में सफलता प्राप्त की। जम्मू-कश्मीर से वापस लाए गए छात्र-छात्रों का दिल्ली एयरपोर्ट पर और फिर कश्मीर में चेक-अप किया गया। उनमें कोई संक्रमण नहीं दिखा।
अवलोकन करें:-
अब तक ईरान से 389 भारतीय नागरिकों को वापस लाया जा चुका है। सोमवार (मार्च 16, 2020) को 53 भारतीय नागरिकों का चौथा जत्था ईरान से भारत पहुँचा। केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्वीट कर के इस सम्बन्ध में जानकारी दी। यह समाचार उन सभी नागरिक संशोधन बिल के विरोधियों पर इतने जोर का थप्पड़ है, जिसकी गूंज तक विरोधी सुन नहीं पा रहे कि जिस मोदी सरकार पर मुसलमानों को भारत से निकालने का दुष्प्रचार किया जा रहा है, वही मोदी सरकार अपने भारतीय मुस्लिम नागरिकों को वापस भारत ला रही है। क्या जरुरत है उन्हें वापस लाने की, लेकिन मोदी सरकार आसानी से किसी भी भारतीय को मरने नहीं देना चाहती।

NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
भारतीय मुसलमानों को विशेष विमान से ईरान से लाया जा रहा है आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार भारत में कुछ कट्टरपंथी कोरो....
जहाँ तक कोरोना वायरस की बात है, अब तक इससे चीन में 1868 लोगों की जान जा चुकी है। यूरोप के फ्रांस में भी कोरोना से पहली मौत की पुष्टि हुई है। स्थिति इतनी भयंकर है कि वुहान में एक हॉस्पिटल के डायरेक्टर की ही इस वायरस से मौत हो गई, जिसके अस्पताल में बड़े पैमाने पर कोरोना से पीड़ित मरीज भर्ती थे। अब तक इस खतरनाक वायरस से 72,436 लोगों के संक्रमित होने की ख़बर है। इस वायरस से प्रभावित हो चुके 12,522 मरीज ठीक भी हो चुके हैं। अब तक 25 देशों में इसके फैलने की रिपोर्ट आई है।

रिजर्व बैंक ने सरकार को अपना रिजर्व देने से किया मना

modi government wants to utilise rbi contingency fundकेंद्र सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के टकराव की खबरें छन-छनकर बाहर आ रही थीं। लेकिन अब इस टवराव की असल वजह खुलकर सामने आ गई है। दोनों के बीच तल्खी की वजह सरकार का एक प्रस्ताव रहा, जिसमें केंद्र सरकार ने आरबीआई से रिजर्व पूंजी में से सरप्लस के 3.6 लाख करोड़ रुपए देने का प्रस्ताव रखा था, जो कि कुल सरप्लस 9.59 लाख करोड़ का एक तिहाई है। आरबीआई ने सरकार के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और दलील दी कि इससे माइक्रो इकोनॉमी को खतरा हो सकता है। 
फंड ट्रांसफर का सिस्टम है पुराना 
केंद्र सरकार ने सुझाव दिया था कि सरप्लस को सरकार और आरबीआई दोनों मिलकर मैनेंज करें, क्योंकि वित्त मंत्रालय की नजर में आरबीआई का फंड ट्रांसफर से जुड़ा सिस्टम काफी पुराना है। वहीं आरबीआई का मानना है कि सरकार की आरबीआई से इस तरह से इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ेगा। साथ ही अर्जेंटीना जैसी आर्थिक हालात में सरप्लस की रकम मददगार साबित होगी। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने 26 अक्टूबर की अपनी स्पीच में इस मुद्दे का जिक्र किया था। 
आरबीआई का निर्णय एकतरफा
वित्त मंत्रालय के मुताबिक सरप्लस ट्रांसफर करने का मौजूदा फ्रेमवर्क एकतरफा था, जिसे आरबीआई की ओर से जुलाई 2017 में लागू किया है। वित्त मंत्रालय का कहना है कि जिस सरप्लस ट्रांसफर के मुद्दे पर मीटिंग हुई, उस वक्त सरकार की ओर नॉमिनेटेड दोनों सदस्य शामिल नहीं थे। ऐसे सरकार इस फ्रेमवर्क को मानने से इनकार कर रही है और आरबीआई से इस मामले में चर्चा करना चाहती है। सरकार की मानें तो आरबीआई के पास कैपिटल रिजर्व जरूरत से ज्यादा है। ऐसे में उससे 3.6 लाख करोड़ रुपए सरकार दो दिए जाएं।
बैंकों के हालात सुधारने में मिलेगी मदद
सरकार का कहना है कि आरबीआई को 2017-18 के सरप्लस को सरकार को देना देना चाहिए। सरकार सरप्लस की रकम से अपना चालू खाता घाटा(CAD) कम करना चाहेगी। साथ ही पब्लिक सेक्टर की बैकों के हालत सुधारने में मदद मिलेगी। बता दें कि आरबीआई की ओर से 2017-18 में सरकार को 50 हजार करोड़ रुपए सरप्लस ट्रांसफर किया गया था। इसी तरह 2016-17 में 30 हजार करोड़ सरप्लस ट्रांसफर किया था। हालांकि आरबीआई की दलील है कि सरप्लस को आपात स्थिति या फिर वित्तीय जोखिम के लिए बचाककर रखा गया है। यूएस, यूके, अर्जेंटीना, फ्रांस, सिंगापुर की केंद्रीय बैंकों में अपनी कुल संपत्ति का कम से कम कैपिटल रिजर्व रखा जाता है, जबकि मलेशिया, नार्वे और रूस भारत से ज्यादा रिजर्व रखती हैं। 

RBI के 2.5 लाख करोड़ पर है मोदी सरकार की नजर

मोदी सरकार की नजर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 2.5 लाख करोड़ रुपए पर है। मोदी सरकार रिजर्व बैंक के इस आपात फंड से अपना वित्तीय घाटा पूरा करना चाहती है। हालांकि रिजर्व बैंक मोदी सरकार के इस प्लान से सहमत नहीं है। रिजर्व बैंक मानना है कि सरकार के इस कदम से देश की अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और वैश्विक निवेशकों का भरोसा भी अर्थव्यवस्था से कम होगा। इसी वजह से रिजर्व बैंक और मोदी सरकार के बीच टकराव बढ़ गया है। सीनियर इकोनॉमिक जर्नलिस्ट एमके वेणु ने moneybhaskar.com से रिजर्व बैंक और सरकार के बीच जारी टकराव के मुद्दे पर बातचीत की है। 
रिजर्व बैंक के काम में दखल दे रही है सरकार 
एमके वेणु का कहना है कि आरबीआई के पास लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए का कांटिजेंसी फंड है। सरकार इस फंड का इस्तेमाल वित्तीय घाटा कम करने में करना चाहती है। सरकार ने इसके लिए आरबीआई एक्ट के सेक्शन 7 के तहत रिजर्व बैंक को तीन पत्र लिखे हैं। ऐसा लगता है कि इसके बाद ही रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपनी स्पीच में रिजर्व बैंक के काम काज में सरकार के दखल का मामला उठाया है। डिप्टी गचर्नर की स्पीच को लेकर गवर्नर उर्जित पटेल की भी सहमति थी। वेणु का कहना है कि इसीलिए विरल आचार्य ने अर्जेंटीना का उदाहरण दिया कि किस तरह से वहां की सरकार ने सेंट्रल बैंक के काम में दखल दिया जिससे अजेंटीना की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ा। 
बड़े इंडस्ट्री समूह के डिफॉल्ट पर सख्त एक्शन चाहता है रिजर्व बैंक 
एमके वेणु के मुताबिक देश के शीर्ष 6-7 इंडस्ट्री ग्रुप पर 6 लाख करोड़ रुपए का लोन बकाया है। इसमें से लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक का लोन डिफॉल्ट हो चुका है। रिजर्व बैंक ने इस डिफॉल्ट पर सख्त एक्शन चाहता है। रिजर्व बैंक ने इन इंडस्ट्री ग्रुप को साफ कर दिया है कि या तो लोन चुकाएं या आपका मामला एनसीएलटी में जाएगा। वहीं सरकार 2019 चुनाव से पहले बड़े औद्योगिक घरानों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाना चाहती है। वेणु का कहना है कि सरकार एक तरफ आईबीसी कोड को अपनी उपलिब्ध बता रही है कि इसके जरिए बड़े कारोबारियों से कर्ज की वसूली होगी। वहीं सरकार बड़े औद्योगिक घरानों के मामले को एनसीएलटी में नहीं ले जाना चाहती है। वहीं रिजर्व बैंक इस मसले पर कंप्रोमाइज नहीं करना चाहता है।
आरबीआई को मजबूर किया गया तो और खराब हो सकते हैं हालात 
वेणु का कहना है कि अब भी सरकार के पास समय और उसे मौजूदा समय में जारी टकराव से पीछे हट जाना चाहिए, क्योंकि अगर सरकार सेक्शन 7 के तहत रिजर्व बैंक के सिर पर बंदूक रखकर अपनी बात मनवाती है तो इसके बहुत बुरे नतीजे हो सकते हैं। अगर पूरी दुनिया में यह मैसेज चला गया कि भारतीय रिजर्व बैंक का तंत्र मजबूत नहीं है और वह अपने हिसाब से काम नहीं कर पा रहा है तो इससे विदेशी निवेशकों का विश्वास कमजोर होगा। साथ ही पूरी दुनिया में भारत को लेकर नकारात्मक इमेज बनेगी। (साभार)

राफेल का ठेका ‘अनस्किल्ड’ लोगों को देना ही PM का ‘स्किल इंडिया’ : राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल मामले को लेकर सितम्बर 26 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फिर निशाना साधा और आरोप लगाया कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से 30 हजार करोड़ रुपये का ठेका लेकर एक ‘अकुशल’ व्यक्ति को देना ही प्रधानमंत्री का ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम है.
गांधी ने भारत में बेरोजगारी की स्थिति से जुड़ी एक खबर शेयर करते हुए ट्वीट किया, ‘एचएएल से 30,000 करोड़ रुपये को चुराकर एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया जिसके पास कोई कौशल नहीं है. इस बीच, करोड़ों कुशल नौजवान 20 वर्षों में सबसे उच्च स्तर की बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं.”

दरअसल, गांधी और कांग्रेस पिछले कई महीनों से यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि मोदी सरकार ने फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट से 36 राफेल लड़ाकू विमान की खरीद का जो सौदा किया है, उसका मूल्य पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में विमानों की दर को लेकर जो सहमति बनी थी उसकी तुलना में बहुत अधिक है. इससे सरकारी खजाने को हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है.
क्या राफेल खरीद में घोटाला हुआ है? 
राफेल विमान सौदे को लेकर मची सियासी तू तू-मैं मैं के बीच हर किसी के दिमाग में यह सवाल है कि क्या वाकई कोई घोटाला हुआ है? अगर हां तो कैसे और अगर ना तो कैसे? जो लोग हर हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी का विरोध करते हैं वो लोग मानते हैं कि घोटाला हुआ है, जबकि बीजेपी समर्थक हर हाल में मानने को तैयार नहीं कि कोई घोटाला हुआ है। लेकिन सच क्या है यह जानना आम लोगों के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ सवाल है। यहां हम आपको बता दें कि मीडिया चाहे तो इस मामले का सच बता सकता है, लेकिन उसकी इसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। क्योंकि आम तौर पर ऐसे मामलों में मीडिया भी राजनीतिक रूप से बंट जाता है। हम आपको इस मामले में कांग्रेस के सारे आरोप और उनसे जुड़े तथ्यों के बारे में बताएंगे और यह फैसला आप पर छोड़ते हैं कि राफेल सौदे में वाकई कोई गड़बड़ी हुई है या नहीं।

आरोप नंबर 1- महंगा खरीदा गया विमान

कांग्रेस का सबसे बड़ा आरोप है कि 2008 में जब उसने इस विमान के बारे में समझौता किया था तब कीमत काफी कम थी, लेकिन जब 2016 में बीजेपी ने इस सौदे पर मोलभाव किया तो कीमतें करीब तीन गुना हो गईं। हालांकि राहुल गांधी अलग-अलग ट्वीट में कीमत को लेकर अलग-अलग बातें कर रहे हैं। 16 मार्च 2018 को ट्वीट में उन्होंने कहा कि राफेल बनाने वाली डेसॉल्ट कंपनी ने सरकार के झूठ का पर्दाफाश कर दिया है और अपनी रिपोर्ट में राफेल की कीमत बता दी है। जिसके मुताबिक भारत से 1670 करोड़ में डील हुई है। जबकि मनमोहन सिंह सरकार ने 570 करोड़ रुपये में सौदा किया था। राहुल की गणित के मुताबिक हर हवाई जहाज पर 1100 करोड़ रुपया ज्यादा दिया गया जो कि 36 विमान के हिसाब से छत्तीस हजार करोड़ रुपया है। 
अवलोकन करें:--

यह रकम देश के रक्षा बजट का 10 फीसदी है। इसके बाद दूसरे ट्वीट में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि राफेल सौदे की वजह से सरकारी खजाने को 40 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। कुछ दिनों बाद आए राहुल के ट्वीट में इसे 58 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया गया। हाल ही में उन्होंने अपने एक ट्वीट में इसे 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया। अब वो यह कह रहे हैं कि यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। यहां हम आपको बता दें कि यूपीए सरकार के दौरान हुए कुल घोटालों की सीएजी द्वारा बताई गई कीमत 5 लाख 74 करोड़ रुपये बैठती है।
सच्चाई क्या है? तथ्य यह है कि यूपीए के वक्त राफेल का कोई सौदा हुआ ही नहीं था। शुरुआती बातचीत में कंपनी ने एक लड़ाकू विमान की कीमत 538 करोड़ रुपये मांगी थी, लेकिन यह विमान ऐसा था, जिसमें कोई हथियार या दूसरा डिफेंस सिस्टम नहीं लगा हुआ था। यानी उसे अलग से लगवाना पड़ता। यूरो और रुपये के दामों में उतार-चढ़ाव के हिसाब से देखें तो मई 2015 में 538 करोड़ रुपये का वही विमान 737 करोड़ रुपये का हो गया होता। जबकि 2019 में जब इसकी डिलिवरी होगी तब सौदे के हिसाब से इसकी कीमत 938 करोड़ रुपये बैठती। लेकिन मनमोहन सरकार कंपनी से सौदा नहीं कर सकी और मामला लटका रहा। जब मोदी सरकार आई तो उसने कंपनी के साथ नए सिरे से मोलभाव शुरू किया। विमान के साथ हथियार और दूसरे डिफेंस सिस्टम भी फिट करके देने की बात तय हुई। लेकिन अगर कांग्रेस की तरह खाली विमान से तुलना करें तो 2019 में यही विमान 794 करोड़ रुपये का बैठेगा। यानी कांग्रेस सरकार के मुकाबले 144 करोड़ रुपये कम। यह वो कीमत है जिसे बताने में मोदी सरकार आनाकानी नहीं कर रही। विवाद तब पैदा हो रहा है जब कांग्रेस उस हथियारबंद विमान का दाम पूछ रही है जो वास्तव में फ्रांस से बनकर 2019 में भारत आएगा। चूंकि इसमें सारे हथियार और मिसाइल्स लगे हुए होंगे लिहाजा इनकी कीमत अधिक होगी। लेकिन कितनी होगी, यह बताने को सरकार तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसा करते ही चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को पता चल जाएगा कि इसमें किस तरह के हथियार होंगे।

आरोप नंबर 2- HAL की अनदेखी की

दूसरा बड़ा आरोप यह है कि 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा करते समय भारत की अपनी सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की अनदेखी की गई। कांग्रेस ने अप्रैल 2015 का एक वीडियो जारी किया है जिसमें मोदी की फ्रांस यात्रा से 17 दिन पहले डेसॉल्ट एविएशन के चेयरमैन कह रहे हैं कि भारत में एचएएल की ओर से 108 राफेल लड़ाकू विमान बनाने का करार जल्द होने वाला है। उस समय के विदेश सचिव एस जयशंकर ने 8 अप्रैल को प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि एचएएल बातचीत में शामिल है। सवाल है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि एचएएल इस सौदे से बाहर हो गई और भारत ने 108 के बजाय 36 लड़ाकू विमान खरीदने सौदा सीधे वहां की सरकार के साथ कर लिया?
सच्चाई क्या है? दरअसल डेसॉल्ट और एचएएल के बीच बात नहीं बनी। एचएएल की क्षमता को लेकर पहले 2013 में भी सवाल उठ चुका था। जब 2015 में दोबारा बातचीत हुई तो टेक्नॉलाजी ट्रांसफर को लेकर बात अटक गई। डेसॉल्ट एविएशन ने कह दिया कि अगर 108 लड़ाकू विमान भारत में एचएएल की वर्कशॉप में बनाए जाएंगे तो उनकी क्वालिटी की जिम्मेदारी वो नहीं लेगा। यानी कोई खराबी आई तो उसका नुकसान भारत को उठाना होगा। एचएएल के पास जो सुविधाएं हैं उनमें समय भी बहुत ज्यादा लगता जिससे डेसॉल्ट को एतराज था। जहां तक एक सरकारी कंपनी का हक़ छीनकर प्राइवेट कंपनी को देने की बात है, यह सरासर गलत है। दरअसल एचएएल को यूपीए के वक्त हर साल औसतन 10 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए गए। जबकि मोदी सरकार ने उसे हर साल औसत 22 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए। सेना के लिए कुल 83 लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट बनाने का 50 हजार करोड़ का ऑर्डर भी मोदी सरकार ने दिया है। कंपनी अभी सिर्फ 8 विमान ही बना रही है, लिहाजा उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए और निवेश किए जाने की तैयारी है। यानी एचएएल के पास पहले से ही काफी काम है।

आरोप नंबर 3- सरकार ने अंबानी की मदद की

एक बड़ा आरोप है कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस इंड्रस्ट्रीज की मदद की और इसे राफेल बनाने वाली कंपनी डेसॉल्ट एविएशन से ऑफसेट कांट्रेक्ट दिलवाया। ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट एक तरह का आपसी हित का समझौता होता है, जिसमें सप्लाई करने वाली कंपनी वादा करती है कि एक तय अनुपात में सामान हथियार खरीदने वाले देश की कंपनियों से खरीदेगी।
सच्चाई क्या है? दरअसल फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद इस आरोप को बल मिला। हालांकि खुद ओलांद अब कह चुके हैं कि यह दो कंपनियों का करार था इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह बात तकनीकी रूप से सही भी है। तो सवाल उठता है कि ओलांद ने यह बात क्यों कही कि भारत सरकार ने ही रिलायंस से सौदे के लिए दबाव डाला था? दरअसल अपने देश में ओलांद खुद इन आरोपों में फंसे हैं कि उनकी गर्लफ्रेंड ने अनिल अंबानी की एंटरटेनमेंट कंपनी में पैसा लगाया है। इसके बदले में उन्होंने अंबानी को यह सौदा दिलवाया। अब इस आरोप से अपना पल्ला झाड़ने के लिए उन्होंने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। जबकि अनिल अंबानी से फायदा उन्होंने लिया है। वैसे भी ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट को समझना जरूरी है। ये नियम खुद यूपीए सरकार ने 2006 में बनाए थे। सारा हल्ला रिलायंस को लेकर है जबकि सच यह है कि उनके जैसी कुल 72 कंपनियों ने डेसॉल्ट के साथ समझौते किए हैं। इसके तहत इन 72 भारतीय कंपनियों को 3 अरब यूरो से अधिक का काम मिलेगा। इससे करीब 1 लाख रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यानी देश में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को पहली बार विश्व की अग्रणी हथियार कंपनी के साथ काम करने का मौका मिलेगा। हो सकता है कि आगे चलकर इन्हीं में से कोई कंपनी इतनी बड़ी हो जाए कि दुनिया भर को वो अपने बनाए हथियार बेचने के काबिल हो जाए। जहां तक रिलायंस डिफेंस इंडस्ट्रीज का सवाल है इस बात के पूरे दस्तावेज सामने आ चुके हैं कि उसके और डेसॉल्ट के बीच पार्टनरशिप 2012 में ही हो गई थी। तब यह समझौता भारत को राफेल बेचने के लिए नहीं, बल्कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत हुआ था। उन दिनों ये कंपनी बड़े भाई मुकेश अंबानी के पास हुआ करती थी। बाद में पारिवारिक सुलह-सफाई में इसे छोटे भाई अनिल अंबानी को दे दिया गया। यह कहना गलत है कि ये कंपनी सौदे के ठीक पहले बनी थी।

Colgate again: मोदीराज में अडानी ने किया 29 हजार करोड़ का कोयला आयत घोटाला

Image result for मोदी राज में कोयला घोटालास्वामी विवेकानन्द का एक कथन है "उपदेशक नहीं बल्कि उसके उपदेश को मानो", आज भारत की राजनीती में चरितार्थ होने को लालायित है। आम आदमी पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल जो अपनी "hit and run" नीति के कारण बदनाम है, लेकिन जब वह प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पर अम्बानी और अडानी की गिरफ्त में होने का आरोप लगाते हैं, आखिर कुछ तो सच्चाई है।
कांग्रेस राज में हुए घोटालों में एक था, कोयला घोटाला, जिस पर बहुत शोर हुआ था। लेकिन अब मोदी सरकार में वही कोयला घोटाला उजागर हो रहा है। राफेल में हुए कथाकथित घोटाले से मुक्ति मिली नहीं कि एक और घोटाला सामने आया है, और वह घोटाला भी छोटा मोटा नही है पूरे 29 हज़ार करोड़ का घोटाला है। छत्तीसगढ़ को अडानी के हाथों बेच दिया गया है ढाई हजार मिलियन टन क्षमता वाले छह कोल ब्लॉक को नीलाम न करके तीन भाजपा शासित राज्यों की सार्वजनिक क्षेत्र वाली कंपनियों को आवंटित कर दिया गया है।

कांग्रेस का दावा: मोदीराज में अडानी ने किया 29 हजार करोड़ का कोयला आयत घोटाला

कांग्रेस ने दावा किया कि प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के करीबी उद्योगपति गौतम अडानी ने कोयला आयत में 29 हज़ार करोड़ का घोटाला किया है। पार्टी ने दावा किया कि उसके पास इस घोटाले के पुख्ता सबूत मौजूद हैं।
एक प्रेस कांफ्रेस में पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि इस बारे में एक पत्र के जवाब में सिंगापुर से एसबीआई ब्रांच का जवाब दिया गया कि सिंगापुर के कानून के मुताबिक यह दस्तावेज किसी को नहीं दिए जा सकते हैं। कांग्रेस नेता ने कहा कि आखिर जब भारतीय कंपनी और भारतीय बैंक के बीच इस घोटाले को अंजाम दिया गया, तो कैसे मामले को सिंगापुर के कानून के तहत देखा जा रहा है।
जयराम रमेश ने कहा कि बीते तीन साल के दौरान पीएम नरेन्द्र मोदी तीन बार सिंगापुर गए लेकिन जांच को आगे बढ़ाने के लिए यह दस्तावेज सिगापुर से नहीं लाया जा सका।
इस दौरान अडानी समूह के गौतम अडानी सिंगापुर की अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए गुहार लगाते हैं कि मामले से जुड़े दस्तावेज भारत सरकार को न दिए जाएं जिसके बाद कुछ महीनों तक सिंगापुर हाईकोर्ट ने सुनवाई की लेकिन डेढ़ महीने पहले गौतम अडानी की याचिका को खारिज कर दिया। जब अडानी सिंगापुर हाईकोर्ट में हार गये तो ये स्वाभाविक है कि डीआरआई को कोयला आयात घोटाले से जुड़े दस्तावेज मिलने चाहिए।
मुंबई हाई कोर्ट में दायर की है याचिका
कांग्रेस नेता ने बताया कि अब अडानी मुंबई हाईकोर्ट में याचिका में गुहार लगाई है कि डीआरआई के लेटर रोगेटरी को मंजूरी न दी जाए। इस मामले में मुंबई हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी ने मांग की है कि केन्द्र सरकार को किसी बड़े वकील को नियुक्त करते हुए हाईकोर्ट में अडानी की याचिका का विरोध करना चाहिए जिससे 29,000 करोड़ रुपये के उस घोटाले से पर्दा उठाया जा सके।
कई जांच हो चुकी हैं प्रभावित
कांग्रेस नेता का आरोप है कि अडानी समूह पीएम नरेन्द्र मोदी से अपनी नजदीकी के चलते कई जांच को प्रभावित करने का काम कर चुके हैं। पिछले दो तीन साल में जब कहीं अडानी कंपनी के बारे में जांच शुरू हुई तो केन्द्र सरकार ने जल्द से जल्द उस जांच को बंद करा दिया है।
उन्होंने कहा कि पॉवर उपकरण के आयात का पहला मामला डीआरआई की एक नोटिस से सामने आया। इस मामले में डीआरआई ने लगभग 6600 करोड़ के घोटाला की बात कही थी। 2014 में डीआरआई ने कहा कि जिस मूल्य पर पावर उपकरण का आयात होना चाहिए था उससे 6600 करोड़ रुपये अधिक दिया गया लेकिन यह मामला बंद कर दिया गया।

Modi ने DRI में किया 29 हजार करोड़ का कोयला घोटाला। कांग्रेस ने दिए सबूतों से BJP की हालत पतली

by News Reaction TV   2 weeks ago
कहने को कोल ब्लॉक्स कागजों में तो सार्वजनिक क्षेत्र वाली कंपनियों के हैं, लेकिन उनकी असली संपत्ति एक निजी कंपनी अडानी को माइन डेवलप एंड ऑपरेट (एमडीओ) नियुक्त करके सौंप दी गई है।
इसका मतलब यह है कि प्रदेश में कुल 88 मिलियन टन प्रति वर्ष कोयला निकालने का काम या तो अडानी के पास पहुंच चुका है या फिर इसकी तैयारी अंतिम चरणों में है।
उदाहरण पतुरिया गिधमुड़ी कोल ब्लॉक भैया थान पॉवर प्रोजेक्ट के लिए आवंटित किया गया है। यह पॉवर प्रोजेक्ट इंडिया बुल्स के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ सरकार को बनाना था लेकिन यह परियोजना शुरु ही नहीं हो सकी और इंडिया बुल्स वापस चली गई। लेकिन इस कोल ब्लॉक से कोयला निकालने की तैयारी हो रही है जब परियोजना ही नहीं है तो फिर कोयला क्यों निकाला जाएगा ? किसके लिए निकाला जाएगा ? छत्तीसगढ़ सरकार कोयला व्यापारी तो है नहीं तो फिर यह मोदीजी के इशारे पर अडानी को उपकृत करने के अलावा और क्या है ? और इन्हीं आधार पर अडानी कह रहे हैं कि कि अगले दशक में उनका कोयला उत्पादन 150 मिलियन टन हो जाएगा।
अवलोकन करें:--
nigamrajendra.blogspot.com
कांग्रेस ने राफेल विमान सौदे पर भाजपा को कठघरे में खड़ा तो कर दिया, लेकिन 2019 के…
जिन खदानों से जुड़े हुए कोल ब्लॉक में हिंडाल्को 3500 रु प्रति टन कोयला निकाल रही हैं वही अडानी को मात्र 100 रु प्रति टन में ठेका दिया गया है कहने को तो यह आरोप कांग्रेस के छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष भूपेश पटेल लगा रहे है लेकिन स्वतंत्र स्त्रोतों से भी इसकी पुष्टि होती है कि किस तरह से सरकारी अधिसूचनाओ में मनमाने परिवर्तन करा कर अडानी किस तरह से कोयले को खुले बाजार में बेच कर अरबो खरबो के मुनाफे का खेल खेलने को तैयार बैठे है।
दिन रात 2 जी स्कैम ,राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, कोल ब्लॉक में भ्रष्टाचार आदि घोटाले की राग रागनियों को गा कर जो लोग सत्ता में आये थे वो ही आज नया कोयला घोटाला करने से बाज नही आ रहे है।
पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस आदि पर दाम बढ़ने पर भाजपा खूब शोर मचाती थी, लेकिन आज उसी भाजपा के राज में इन्ही चीजों के दाम आसमान छूने को लालायित हैं। इसके पीछे  गहरी राजनीती है। चुनाव में धन लगाने वाले कारोबारियों को धन संचय करवाया जा रहा है, जो चुनाव घोषित होने पर इन्ही चीजों के दाम कल्पना के विपरीत ऐसे गिरने शुरू हो जाएँगे। जो मतदान तिथि आने तक उम्मीद से अधिक नीचे आ जायेंगे और जनता इस समय हुई वृद्धि को भूल, पुनः भाजपा को वोट देने के लिए विवश हो जायेंगे।
और जहाँ तक घोटालों की बात है, वह तो थमने का नाम नहीं ले रहे। उधर मध्य प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने व्यापम घोटाले को पुनः जीवित कर दिया है। 
व्यापम घोटाले में बढ़ सकती है शिवराज की बढ़ी मुश्किलें, दिग्विजय ने ठोका मुकदमा
मध्यप्रदेश में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश से जुड़े और लम्बे समय तक विवादों में घिरे व्यापमं घोटाला मामले में अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुश्किलें बढ़ सकती है।  मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने हाल ही में इस मामले में  विशेष न्यायालय में एक मुकदमा दर्ज करवाया है। 
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सितम्बर 19 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह समेत कई अन्य अधिकारीयों पर व्यापमं कांड से जुडी एक एक्सेल शीट में फेरबदल करने का आरोप लगते हुए विशेष न्यायालय में एक मुकदमा दर्ज करवाया है। इस मुक़दमे में उन्होंने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और कई अन्य  पुलिस अधिकारियों के खिलाफ एक 27,000 हजार पन्नों का परिवाद दायर किया है। 
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष न्यायालय ने इससे जुडी सुनवाई के 22 सितंबर 2018 की तिथि नियत की है। इसके साथ ही  विशेष न्यायालय पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को सामन भेज कर कहा है कि वे इस तिथि से पहले न्यायालय में उपस्थित होकर अपने बयान दर्ज करे। आपको बता दें कि इस विशेष न्यायलय का गठन व्यापम घोटाले से जुड़े  मामलों के लिए ही किया गया है। इस मामले की अगली सुनवाई  विशेष न्यायालय के न्यायाधीश सुरेश सिंह द्वारा की जायेगी।