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कांग्रेस राज में मिले एक लाख करोड़ के ठेके तो क्या आपकी सरकार बेईमानों के साथ थी? : अनिल अम्बानी ने राहुल गाँधी से पूछा

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
रिलायंस समूह ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से सवाल किया है कि यूपीए शासनकाल में उनकी कंपनियों को एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के ठेके मिले थे तो क्या वह सरकार क्रोनी कैपिटलिस्टों और बेइमान व्यापारियों की मदद कर रही थी? रिलायंस समूह ने कहा कि राहुल गांधी उनके खिलाफ अपने मिथ्याचार, दुष्प्रचार और दुर्भावना प्रेरित झूठ को जारी रखे हुए हैं। रिलायंस समूह ने एक बयान में कहा, ‘उन्होंने हमारे समूह के चेयरमैन अनिल अंबानी पर क्रोनी कैपिटलिस्ट होने और बेईमान कारोबारी होने का आरोप लगाया है। ये सभी निश्चित तौर पर असत्य बयान हैं।’ बयान में कहा गया है कि कांग्रेसी सरकार के कार्यकाल में 2004 से 2014 के बीच उसे बिजली, दूरसंचार, सड़क, मेट्रो आदि जैसे बुनियादी संरचना क्षेत्रों में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक के ठेके मिले तो क्या उनकी अपनी सरकार 10 साल तक एक कथित क्रोनी कैपिटलिस्ट और बेईमान कारोबारी की मदद कर रही थी।
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अंबानी पर मेहरबान थी राहुल गांधी की कांग्रेस सरकार
लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी बार-बार एक ही रट लगाए हुए हैं कि मोदी सरकार शुरू से अनिल अंबानी पर मेहरबान रही है, लेकिन आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि अनिल अंबानी पर मोदी सरकार नहीं बल्कि सोनिया-राहुल गांधी की यूपीए सरकार मेहरबान थी। राहुल गांधी की यूपीए सरकार ने अपने 10 साल के शासन में आखिर के सात वर्षों में अंबानी की रिलायंस कंपनी को एक लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं दी थी। अंग्रेजी अखबार Economic Times ने पिछले दिनों खुलासा किया था कि कांग्रेस ने किस तरह उद्योगपतियों से सांठगांठ कर देश को लाखों करोड़ का चूना लगाया।
प्रक्रिया का पालन नहीं
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने ऐसी कंपनियों को ठेके दिए जिन्होंने जरूरी प्रक्रियाओं का पालन ही नहीं किया था। कांग्रेस सरकार ने सरकारी कंपनियों से कई प्रोजेक्ट्स छीन कर अनिल अंबानी की कंपनियों को दे दिए थे। एक लाख करोड़ से अधिक के ये प्रोजेक्ट्स तो कांग्रेस शासन के आखिरी 7 वर्षों में ही दिए गए।
ज्ञात हो, रोड ट्रांसपोर्ट एंड हाइवेज, टेलिकॉम, NHAI, मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी और DMRC जैसी सरकारी इकाइयों से ये प्रोजेक्ट्स छीने गए थे। इसी मिलीभगत का नतीजा था कि कांग्रेस के पांच साल में ही अनिल अंबानी की इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी देश की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी बन गई थी। इस दौरान 16500 करोड़ रुपये के 12 प्रॉजेक्ट्स शुरू किए गए, जिससे आर-इंफ्रा देश में सबसे बड़ी प्राइवेट रोड डेवलपर बन गई थी।
रिलायंस कम्युनिकेशंस के लिए रेगुलेटरी अप्रूवल्स तो तमाम प्रक्रियाओं को दरकिनार कर दिया गया था। अनिल अंबानी ग्रुप की 6 कंपनियों रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस कैपिटल, रिलायंस पावर, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर, रिलायंस नेचुरल रिसोर्सेज लिमिटेड और रिलायंस मीडियावर्क्स भी इसमें शामिल थी।
स्मरण हो कि प्रोजेक्ट्स हासिल करने से पहले इनमें से कई कंपनियों को उस क्षेत्र का अनुभव भी नहीं था। जाहिर है ये सब इसलिए संभव हो पाया कि अनिल अंबानी के ‘सोनिया गांधी एंड फैमिली’ से करीबी रिश्ते थे।
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जब लोकसभा चुनाव का सिर्फ दो चरण बचे हैं ऐसे में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ....

कांग्रेस सरकार के 10 साल में घोटालों का खेल
दरअसल यूपीए चेयर पर्सन सोनिया गांधी की सरपरस्ती में कांग्रेस और उनसे ताल्लुक रखने वाली कंपनियों ने लूट का खेल खेला। 


                            यूपीए सरकार में ‘लूट ही लूट’
                घोटालों के नाम                  ‘लूट’ की रकम
             कोल ब्लॉक आवंटन, 2012                 1.86 लाख करोड़ रुपये
               2 जी स्पेक्ट्रम, 2008                1.76 लाख करोड़ रुपये
           महाराष्ट्र इरीगेशन स्कैम,2012                 70,000  करोड़ रुपये
              कॉमनवेल्थ गेम्स, 2010                   35,000 करोड़ रुपये
            सत्यम कम्प्यूटर स्कैम, 2009                   14,000 करोड़ रुपये
              स्कॉर्पियन पनडुब्बी, 2005                   1,100 करोड़ रुपये
               अगस्ता वेस्ट लैंड, 2012                   3,600 करोड़ रुपये
                टेट्रा ट्रक स्कैम, 2012                       3,000 करोड़ रुपये
बहरहाल मोदी सरकार ऐसे कई उद्योगपतियों और कंपनियों पर शिकंजा कसा है और उनसे लूट की रकम वापस भी वसूली जा रही है। खास तौर पर एनपीए का बहाना ढूंढ रही कंपनियों को मोदी सरकार ने अपने निशाने पर लिया है। आइए एक नजर डालते हैं कि कैसे मोदी सरकार की सख्ती के बाद कंपनियों को अपनी संपत्ति बेचकर अपने कर्ज की रकम चुकानी पड़ रही है। 
मोदी राज में सूट-बूट वालों की ‘लूट’ पर लगी ब्रेक
बैंकों के कर्ज वापसी के लिए मजबूर हुए उद्योगपति

जिंदल स्टील
अक्टूबर, 2017
रायगढ़ और अंगूल स्टील प्लांट के दो यूनिट को 1,121 करोड़ में बेचना पड़ा
अगस्त 2017
6 हजार करोड़ वसूलने के लिए SBI ने अंगूल में जिंदल इंडिया थर्मल पावर प्लांट का टेंडर मंगवाया

एस्सार ऑयल
अगस्त 2017
ESSAR ऑयल को अपना 49 प्रतिशत शेयर रुस की Rosneft कंपनी को बेचना पड़ा 
SBI, ICICI, Axis, IDBI और Standard Chartered बैंकों का 70,000 करोड़ रुपया चुकाना पड़ा

जीवीके पॉवर एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर
जुलाई, 2017
बकाया चुकाने के लिए 3,439 करोड़ रुपये में बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट बेचना पड़ा

डीएलएफ
दिसंबर, 2017
DCCDL को अपना 40 प्रतिशत हिस्सा बेच कर बैंकों का 7100 करोड़ रुपया चुकाना पड़ा

जेपी एसोसिएट्स
40 हजार करोड़ का कर्ज चुकाने के लिए 15,000 करोड़ में Ultratech और ACC को बेचना पड़ा
बैंकों ने जेपी ग्रुप की 13, 000 करोड़ की जमीन बेचने की प्रक्रिया शुरू की

टाटा ग्रुप
जनवरी, 2018
टाटा ग्रुप ने बैंकों के 23 हजार करोड़ में से 17 हजार करोड़ चुका दिए 
सितंबर, 2018
टीसीएस के लाभांश से टाटा मोटर्स और टाटा टेलिसर्विसेज लिमिटेड का कर्ज चुकाएंगे

जीएमआर
37,480 करोड़ रुपये में 18,480 हजार करोड़ वापस किए, बकाया 19,000 करोड़ रुपये जल्द चुकाएंगे

वीडियोकॉन
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में बैंकरप्सी के तहत कंपनी बेचकर वसूला जाएगा बकाया 20 हजार करोड़

रिलायंस
45,000 करोड़ रुपये बकाये की वापसी के लिए अपने Assets बेचकर कर्ज चुकाएगी कंपनी

राफेल का ठेका ‘अनस्किल्ड’ लोगों को देना ही PM का ‘स्किल इंडिया’ : राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल मामले को लेकर सितम्बर 26 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फिर निशाना साधा और आरोप लगाया कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से 30 हजार करोड़ रुपये का ठेका लेकर एक ‘अकुशल’ व्यक्ति को देना ही प्रधानमंत्री का ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम है.
गांधी ने भारत में बेरोजगारी की स्थिति से जुड़ी एक खबर शेयर करते हुए ट्वीट किया, ‘एचएएल से 30,000 करोड़ रुपये को चुराकर एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया जिसके पास कोई कौशल नहीं है. इस बीच, करोड़ों कुशल नौजवान 20 वर्षों में सबसे उच्च स्तर की बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं.”

दरअसल, गांधी और कांग्रेस पिछले कई महीनों से यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि मोदी सरकार ने फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट से 36 राफेल लड़ाकू विमान की खरीद का जो सौदा किया है, उसका मूल्य पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में विमानों की दर को लेकर जो सहमति बनी थी उसकी तुलना में बहुत अधिक है. इससे सरकारी खजाने को हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है.
क्या राफेल खरीद में घोटाला हुआ है? 
राफेल विमान सौदे को लेकर मची सियासी तू तू-मैं मैं के बीच हर किसी के दिमाग में यह सवाल है कि क्या वाकई कोई घोटाला हुआ है? अगर हां तो कैसे और अगर ना तो कैसे? जो लोग हर हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी का विरोध करते हैं वो लोग मानते हैं कि घोटाला हुआ है, जबकि बीजेपी समर्थक हर हाल में मानने को तैयार नहीं कि कोई घोटाला हुआ है। लेकिन सच क्या है यह जानना आम लोगों के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ सवाल है। यहां हम आपको बता दें कि मीडिया चाहे तो इस मामले का सच बता सकता है, लेकिन उसकी इसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। क्योंकि आम तौर पर ऐसे मामलों में मीडिया भी राजनीतिक रूप से बंट जाता है। हम आपको इस मामले में कांग्रेस के सारे आरोप और उनसे जुड़े तथ्यों के बारे में बताएंगे और यह फैसला आप पर छोड़ते हैं कि राफेल सौदे में वाकई कोई गड़बड़ी हुई है या नहीं।

आरोप नंबर 1- महंगा खरीदा गया विमान

कांग्रेस का सबसे बड़ा आरोप है कि 2008 में जब उसने इस विमान के बारे में समझौता किया था तब कीमत काफी कम थी, लेकिन जब 2016 में बीजेपी ने इस सौदे पर मोलभाव किया तो कीमतें करीब तीन गुना हो गईं। हालांकि राहुल गांधी अलग-अलग ट्वीट में कीमत को लेकर अलग-अलग बातें कर रहे हैं। 16 मार्च 2018 को ट्वीट में उन्होंने कहा कि राफेल बनाने वाली डेसॉल्ट कंपनी ने सरकार के झूठ का पर्दाफाश कर दिया है और अपनी रिपोर्ट में राफेल की कीमत बता दी है। जिसके मुताबिक भारत से 1670 करोड़ में डील हुई है। जबकि मनमोहन सिंह सरकार ने 570 करोड़ रुपये में सौदा किया था। राहुल की गणित के मुताबिक हर हवाई जहाज पर 1100 करोड़ रुपया ज्यादा दिया गया जो कि 36 विमान के हिसाब से छत्तीस हजार करोड़ रुपया है। 
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यह रकम देश के रक्षा बजट का 10 फीसदी है। इसके बाद दूसरे ट्वीट में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि राफेल सौदे की वजह से सरकारी खजाने को 40 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। कुछ दिनों बाद आए राहुल के ट्वीट में इसे 58 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया गया। हाल ही में उन्होंने अपने एक ट्वीट में इसे 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया। अब वो यह कह रहे हैं कि यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। यहां हम आपको बता दें कि यूपीए सरकार के दौरान हुए कुल घोटालों की सीएजी द्वारा बताई गई कीमत 5 लाख 74 करोड़ रुपये बैठती है।
सच्चाई क्या है? तथ्य यह है कि यूपीए के वक्त राफेल का कोई सौदा हुआ ही नहीं था। शुरुआती बातचीत में कंपनी ने एक लड़ाकू विमान की कीमत 538 करोड़ रुपये मांगी थी, लेकिन यह विमान ऐसा था, जिसमें कोई हथियार या दूसरा डिफेंस सिस्टम नहीं लगा हुआ था। यानी उसे अलग से लगवाना पड़ता। यूरो और रुपये के दामों में उतार-चढ़ाव के हिसाब से देखें तो मई 2015 में 538 करोड़ रुपये का वही विमान 737 करोड़ रुपये का हो गया होता। जबकि 2019 में जब इसकी डिलिवरी होगी तब सौदे के हिसाब से इसकी कीमत 938 करोड़ रुपये बैठती। लेकिन मनमोहन सरकार कंपनी से सौदा नहीं कर सकी और मामला लटका रहा। जब मोदी सरकार आई तो उसने कंपनी के साथ नए सिरे से मोलभाव शुरू किया। विमान के साथ हथियार और दूसरे डिफेंस सिस्टम भी फिट करके देने की बात तय हुई। लेकिन अगर कांग्रेस की तरह खाली विमान से तुलना करें तो 2019 में यही विमान 794 करोड़ रुपये का बैठेगा। यानी कांग्रेस सरकार के मुकाबले 144 करोड़ रुपये कम। यह वो कीमत है जिसे बताने में मोदी सरकार आनाकानी नहीं कर रही। विवाद तब पैदा हो रहा है जब कांग्रेस उस हथियारबंद विमान का दाम पूछ रही है जो वास्तव में फ्रांस से बनकर 2019 में भारत आएगा। चूंकि इसमें सारे हथियार और मिसाइल्स लगे हुए होंगे लिहाजा इनकी कीमत अधिक होगी। लेकिन कितनी होगी, यह बताने को सरकार तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसा करते ही चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को पता चल जाएगा कि इसमें किस तरह के हथियार होंगे।

आरोप नंबर 2- HAL की अनदेखी की

दूसरा बड़ा आरोप यह है कि 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा करते समय भारत की अपनी सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की अनदेखी की गई। कांग्रेस ने अप्रैल 2015 का एक वीडियो जारी किया है जिसमें मोदी की फ्रांस यात्रा से 17 दिन पहले डेसॉल्ट एविएशन के चेयरमैन कह रहे हैं कि भारत में एचएएल की ओर से 108 राफेल लड़ाकू विमान बनाने का करार जल्द होने वाला है। उस समय के विदेश सचिव एस जयशंकर ने 8 अप्रैल को प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि एचएएल बातचीत में शामिल है। सवाल है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि एचएएल इस सौदे से बाहर हो गई और भारत ने 108 के बजाय 36 लड़ाकू विमान खरीदने सौदा सीधे वहां की सरकार के साथ कर लिया?
सच्चाई क्या है? दरअसल डेसॉल्ट और एचएएल के बीच बात नहीं बनी। एचएएल की क्षमता को लेकर पहले 2013 में भी सवाल उठ चुका था। जब 2015 में दोबारा बातचीत हुई तो टेक्नॉलाजी ट्रांसफर को लेकर बात अटक गई। डेसॉल्ट एविएशन ने कह दिया कि अगर 108 लड़ाकू विमान भारत में एचएएल की वर्कशॉप में बनाए जाएंगे तो उनकी क्वालिटी की जिम्मेदारी वो नहीं लेगा। यानी कोई खराबी आई तो उसका नुकसान भारत को उठाना होगा। एचएएल के पास जो सुविधाएं हैं उनमें समय भी बहुत ज्यादा लगता जिससे डेसॉल्ट को एतराज था। जहां तक एक सरकारी कंपनी का हक़ छीनकर प्राइवेट कंपनी को देने की बात है, यह सरासर गलत है। दरअसल एचएएल को यूपीए के वक्त हर साल औसतन 10 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए गए। जबकि मोदी सरकार ने उसे हर साल औसत 22 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए। सेना के लिए कुल 83 लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट बनाने का 50 हजार करोड़ का ऑर्डर भी मोदी सरकार ने दिया है। कंपनी अभी सिर्फ 8 विमान ही बना रही है, लिहाजा उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए और निवेश किए जाने की तैयारी है। यानी एचएएल के पास पहले से ही काफी काम है।

आरोप नंबर 3- सरकार ने अंबानी की मदद की

एक बड़ा आरोप है कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस इंड्रस्ट्रीज की मदद की और इसे राफेल बनाने वाली कंपनी डेसॉल्ट एविएशन से ऑफसेट कांट्रेक्ट दिलवाया। ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट एक तरह का आपसी हित का समझौता होता है, जिसमें सप्लाई करने वाली कंपनी वादा करती है कि एक तय अनुपात में सामान हथियार खरीदने वाले देश की कंपनियों से खरीदेगी।
सच्चाई क्या है? दरअसल फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद इस आरोप को बल मिला। हालांकि खुद ओलांद अब कह चुके हैं कि यह दो कंपनियों का करार था इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह बात तकनीकी रूप से सही भी है। तो सवाल उठता है कि ओलांद ने यह बात क्यों कही कि भारत सरकार ने ही रिलायंस से सौदे के लिए दबाव डाला था? दरअसल अपने देश में ओलांद खुद इन आरोपों में फंसे हैं कि उनकी गर्लफ्रेंड ने अनिल अंबानी की एंटरटेनमेंट कंपनी में पैसा लगाया है। इसके बदले में उन्होंने अंबानी को यह सौदा दिलवाया। अब इस आरोप से अपना पल्ला झाड़ने के लिए उन्होंने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। जबकि अनिल अंबानी से फायदा उन्होंने लिया है। वैसे भी ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट को समझना जरूरी है। ये नियम खुद यूपीए सरकार ने 2006 में बनाए थे। सारा हल्ला रिलायंस को लेकर है जबकि सच यह है कि उनके जैसी कुल 72 कंपनियों ने डेसॉल्ट के साथ समझौते किए हैं। इसके तहत इन 72 भारतीय कंपनियों को 3 अरब यूरो से अधिक का काम मिलेगा। इससे करीब 1 लाख रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यानी देश में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को पहली बार विश्व की अग्रणी हथियार कंपनी के साथ काम करने का मौका मिलेगा। हो सकता है कि आगे चलकर इन्हीं में से कोई कंपनी इतनी बड़ी हो जाए कि दुनिया भर को वो अपने बनाए हथियार बेचने के काबिल हो जाए। जहां तक रिलायंस डिफेंस इंडस्ट्रीज का सवाल है इस बात के पूरे दस्तावेज सामने आ चुके हैं कि उसके और डेसॉल्ट के बीच पार्टनरशिप 2012 में ही हो गई थी। तब यह समझौता भारत को राफेल बेचने के लिए नहीं, बल्कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत हुआ था। उन दिनों ये कंपनी बड़े भाई मुकेश अंबानी के पास हुआ करती थी। बाद में पारिवारिक सुलह-सफाई में इसे छोटे भाई अनिल अंबानी को दे दिया गया। यह कहना गलत है कि ये कंपनी सौदे के ठीक पहले बनी थी।

राफेल डील: डसॉल्ट एविएशन ने किया रिलायंस का चयन--फ्रांस सरकार

Representative Imageराफेल डील को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के एक बयान से भारत में सियासी घमासान मच गया है। ओलांद ने मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत सरकार ने ही राफेल डील में डसॉल्ट एविएशन के पार्टनर के लिए रिलायंस डिफेंस का नाम प्रस्तावित किया था और ऐसे में डसॉल्ट एविएशन कंपनी के पास दूसरा विकल्प नहीं था। अब ओलांद के इस बयान पर फ्रांस सरकार ने सफाई दी है।
फ्रांस की सरकार किसी भी तरह से फ्रेंच कंपनी की ओर से चुनी गई, चुनी जा रही या जाने वाले भारतीय पार्टनर के चयन में शामिल नहीं है. हमारे यहां की निजी कंपनी को पूरा हक़ है कि वह ऑफ़सेट के लिए किसी भी स्थानीय पार्टनर यानी भारतीय कंपनी को चुने और फिर उसे भारत सरकार के सामने मंज़ूरी के लिए रखे ताकि भारतीय नियमों के हिसाब से ये भरोसा मिल सके कि ये कंपनी क़रार पूरा करने की योग्यता रखती है. 
राफेल डील को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने बड़ा ख़ुलासा किया है. उनका कहना है कि अनिल अंबानी के रिलायंस का नाम उन्हें भारत सरकार ने सुझाया था. उनके पास और कोई विकल्प नहीं था. एक फ़्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में ओलांद ने कहा कि भारत सरकार के नाम सुझाने के बाद ही दसॉल्ट एविएशन ने अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस से बात शुरू की. बता दें कि अप्रैल 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए थे तब फ्रांस्वा ओलांद ही राष्ट्रपति थे. उन्हीं के साथ राफेल विमान का करार हुआ था. 'मीडियापार्ट फ्रांस' नाम के अख़बार ने पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद से पूछा कि रिलायंस को किसने चुना और क्यों चुना तो फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि भारत की सरकार ने ही रिलायंस को प्रस्तावित किया था.
फ्रांस सरकार ने कहा है कि भारत और फ्रांस की सरकार के बीच 23 सितंबर 2016 को एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे जिसके तहत भारत को 36 राफेल विमानों की सप्लाई की जानी है। फ्रांस की सरकार इन लड़ाकू विमानों की आपूर्ति और गुणवत्ता सुनिश्चित करती है। फ्रांस सरकार कहा कि फ्रेंच कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट के लिए भारतीय कंपनी का चुनाव करने की पूरी आजादी रही है और इसमें फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं है। 
फ्रांस सरकार के बयान के मुताबिक , भारतीय नियमों और कानूनों के तहत फ्रेंच कंपनी के पास अपना भारतीय साझेदार चुनने की पूरी आजादी है। फ्रांस सरकार ने यह भी कहा कि डेसॉल्ट ने सबसे बेहतर विकल्प को चुना।
The report referring to fmr French president Mr. Hollande's statement that GOI insisted upon a particular firm as offset partner for the Dassault Aviation in Rafale is being verified.
It is reiterated that neither GoI nor French Govt had any say in the commercial decision.
इससे पहले ओलांद के बयान पर रक्षा मंत्रालय ने सफाई देते हुए ट्वीट कर कहा था, 'फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के बयान संबंधी रपट में कहा गया है कि भारत सरकार ने राफेल में डसॉल्ट एविएशन के ऑफसेट पार्टनर के रूप में किसी खास निजी कंपनी की तरफदारी की। इसकी जांच की जा रही है। यह दोहराया गया है कि व्यावसायिक फैसले से न तो भारत सरकार का कोई लेना-देना है और न ही फ्रांस की सरकार का।'
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स्वामी विवेकानन्द का एक कथन है "उपदेशक नहीं बल्कि उसके उपदेश को मानो", आज भारत की राजनीती में चरितार्थ होने को लालाय...

ओलांद के इस बयान के बाद कांग्रेस ने सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, 'प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत तौर पर इस मामले में मोलभाव किया और बंद दरवाजों के पीछे राफेल डील में बदलाव किया। फ्रांस्वा ओलांद का धन्यवाद, अब हमें पता चला कि उन्होंने (पीएम) ने व्यक्तिगत तौर पर दिवालिया अनिल अंबानी को अरबों रुपये की डील दिलवाई थी। पीएम ने देश को धोखा दिया है। उन्होंने सैनिकों के खून का अपमान किया है।' 
ओलांद के इस खुलासे के बाद कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश के साथ विश्वासघात किया, तो वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केजरीवाल ने कहा कि 'प्रधानमंत्री जी सच बोलिए. इस बीच रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि हम फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के बयान से जुड़ी इस रिपोर्ट की जांच कर रहे हैं. 

HAL और राफेल बनाने वाली कंपनी के बीच शुरू से थे ‘गंभीर मतभेद

राफेल डील को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के ख़ुलासे के बाद एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है. यूपीए सरकार जब पहली बार फ्रांस की कंपनी दसाल्ट एविएशन से राफेल विमानों की खरीद को लेकर बातचीत कर रही थी तभी हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटिड (HAL) और दसाल्ट के बीच भारत में इन जंगी विमानों के उत्पादन को लेकर ‘गंभीर मतभेद’ थे. सरकारी सूत्रों ने यह जानकारी दी है. दरअसल, यूपीए सरकार ने 2012 में दसाल्ट एविएशन कंपनी से 126 मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बेट विमान (राफेल) खरीदने के लिए बातचीत शुरू की थी. योजना यह थी कि दसाल्ट एविएशन 18 राफेल विमान तैयार हालत में देगी जबकि कंपनी HAL के साथ भारत में 108 विमानों का निर्माण कराएगी.
हालांकि यह करार नहीं हो पाया था. सूत्रों ने बताया कि 11 अक्टूबर 2012 को HAL ने रक्षा मंत्रालय को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में HAL ने दसाल्ट एविएशन के साथ काम को साझा करने को लेकर विभिन्न असहमतियों को सामने रखा था. सूत्रों ने बताया कि इसके बाद, जुलाई 2014 में मंत्रालय को लिखे पत्र में HAL ने विमानों के निर्माण के लाइसेंस के लिए दसाल्ट और एचएएल के बीच जिम्मेदारी साझा करने के एक मुख्य अनसुलझे मुद्दे को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों की राय थी कि एचएएल राफेल जेट बनाने के लिए सक्षम है जो गलत थी. सूत्रों ने बताया कि जब यूपीए सरकार फ्रांसीसी कंपनी के साथ करार को लेकर बातचीत कर रही थी तब एचएएल और दसाल्ट एविएशन के बीच गंभीर मतभेद थे.