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राफेल पर कहां है CAG की रिपोर्ट, सरकार PAC को दिखाए-- राहुल गाँधी

Rahul Gandhiराफेल डील को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में खारिज होने के बाद भाजपा जहां कांग्रेस पर हमलावर है, वहीं राहुल गांधी ने सरकार से नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के बारे में पूछा है। राहुल ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी का हवाला दिया जिसमें शीर्ष न्यायालय ने कहा कि राफेल की कीमत की चर्चा सीएजी की रिपोर्ट में है और यह रिपोर्ट संसद की पीएसी के पास है। राहुल ने इस रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह की कोई रिपोर्ट पीएसी के सामने नहीं आई है। 
सुप्रीम कोर्ट ने दिसम्बर 14 को अपने फैसले में कहा कि राफेल पर‘निर्णय लेने की प्रक्रिया पर वास्तव में संदेह करने की कोई वजह’नहीं है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने सर्वसम्मति से इस सौदे में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने तथा शीर्ष अदालत की निगरानी में इसकी जांच कराने के लिये दायर याचिकाएं खारिज कीं। भारतीय वायु सेना के लिए 58,000 करोड़ रुपए की अनुमानित कीमत से 36 राफेल विमान खरीदने के लिये दोनों देशों की सरकार के बीच अंतर-सरकारी समझौता हुआ था।
कांग्रेस पार्टी मुख्यालय में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए राहुल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसेल में कहा है कि राफेल की कीमत से जुड़ी रिपोर्ट पीएसी में है। सरकार ने शीर्ष न्यायालय को रिपोर्ट के बारे में बताया है लेकिन पीएसी में यह रिपोर्ट मौजूद नहीं है। पीएसी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे हैं लेकिन उन्हें इस तरह की रिपोर्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं है। 
राहुल के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले का आधार है कि राफेल की कीमत की चर्चा सीएजी रिपोर्ट में की गई है लेकिन पीएसी के चेयरमैन खड़गे को इसकी जानकारी नहीं है। उन्होंने इस तरह की कोई रिपोर्ट नहीं देखी है। यहां तक कि पीएसी के किसी सदस्य के पास इस तरह की कोई रिपोर्ट नहीं आई है।
राहुल ने कहा, 'सरकार को हमें यह बताना होगा कि यह सीएजी रिपोर्ट कहां पर है। अगर है तो इसे सीएजी के चेयरमैन खड़गे को दिखाया जाए।' कांग्रेस अध्यक्ष ने तंज कसते हुए कहा, 'हो सकता है कि एक अलग संसद में पीएसी के समानांतर एक अलग पीएसी चल रही हो। हो सकता है कि यह पीएसी फ्रांस में हो और यह भी हो सकता है कि मोदी जी ने पीएमओ में अपनी एक अलग पीएसी बनाई हो।' View image on Twitter
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Congress President Rahul Gandhi: How can it be possible that the foundation of SC judgement saying that pricing has been discussed in CAG report...PAC chairman (M Kharge) is sitting here, how come he never saw it. No one in PAC ever saw it. But Supreme Court saw it.
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R Gandhi: Govt will have to explain to us where is the CAG report. Show it to PAC chairman Kharge ji. Maybe a different PAC is running parallelly, maybe in a different Parliament, maybe in Parliament of France. It's possible Modi ji has constituted his own PAC in PMO.
उन्होंने कहा, 'जिस दिन राफेल मामले में संसदीय जांच हो गई उस दिन दो नाम नरेंद्र मोदी और अनिल अंबानी के निकलेंगे। पूरा हिंदुस्तान समझता है कि चौकीदार चोर है और हम इसे साबित करके दिखाएंगे।' 
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राफेल डील की जांच से जुड़ी सभी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट से खारिज होने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय ....

राफेल डील : सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस को किया बेनकाब

Amit Shah
राफेल डील की जांच से जुड़ी सभी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट से खारिज होने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा। शाह ने कहा कि राहुल गांधी अपना वह स्रोत बताएं जिसके आधार पर उन्होंने डील पर आरोप लगाए हैं। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि यह दुर्भाग्य है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी लोगों को गुमराह कर रही है। कांग्रेस पार्टी झूठ की राजनीति कर रही है।
एक संवाददाता सम्मोलन को संबोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष ने कहा, 'हम राफेल डील पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। सच्चाई की विजय हुई है। राफेल डील पर देश की सबसे पुरानी पार्टी लोगों को गुमराह कर रही है।' अमित शाह ने कहा कि लोगों को गुमराह करने के लिए राहुल गांधी को माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'मैं राहुल गांधी से पूछना चाहता हूं कि उन्होंने किस आधार पर इस तरह के आरोप लगाए हैं। आरोप लगाने का उनका स्रोत क्या है, वह उसके बारे में बताएं।'
BJP President Amit Shah: If Congress had all the proof then why did they not go to the Supreme Court with it? Their B team was already there. JPC is formed only when there is a discussion in the house(Parliament), I challenge Congress for a discussion on it
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BJP President Amit Shah:Suraj ke oopar kitna bhi keechad ya kitni bhi mitti ucchal lein vo swayam pe hi girti hai. Aage se vo(Rahul Gandhi) aise bachkaane aarop se bachein
शाह ने कहा, 'सूरज के ऊपर कितना भी कीचड़ या कितनी भी मिट्टी उछाल लें, वह खुद पर ही गिरती है। राहुल गांधी आगे से ऐसे बचकाने आरोप से बचें।' भाजपा अध्यक्ष ने पूछा कि अगर कांग्रेस पार्टी के पास यदि सबूत थे तो वह उसके साथ सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं गई? कांग्रेस की बी टीम पहले से ही वहां मौजूद है। जेपीसी की गठन के लिए पहले उस पर संसद भवन में चर्चा होती है। अमित शाह ने कहा, 'मैं राफेल डील पर चर्चा के लिए कांग्रेस को चुनौती देता हूं।'
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अलग अलग दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने हैं। कांग्रेस ने कहा कि वो तो पहले से ही कहते रहे हैं कि इस विषय के लिए अदालत सही फोरम नहीं है। देश को सच जानने का अधिकार है और वो सच जेपीसी जांच के जरिए ही सामने आ सकती है। लेकिन पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने ट्वीट करते हुए एक शब्द में कहा कि सत्यमेव जयते।

पार्टी अध्यक्ष शरद पवार के बयान से नाराज तारिक अनवर ने संसद और NCP से दिया इस्तीफा

राफेल डील पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद पवार द्वारा पीएम मोदी के पक्ष में दिए गए बयान से नाराज पार्टी के महासचिव व कटिहार से सांसद तारिक अनवर ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता के साथ ही लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। अब उनके कांग्रेस ज्वाइन करने के कयास लग रहे हैं। दरअसल, सितम्बर 27 को राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने कहा था कि लोगों को राफेल सौदे में प्रधानमंत्री की मंशा पर कोई संदेह नहीं है।

एेेसे में पार्टी अध्यक्ष शरद पवार का बयान नरेंद्र मोदी के बचाव में है जिससे मैं पूरी तरह से असहमत हूं और मैं पार्टी तथा लोकसभा सीट से अपना इस्तीफा दे रहा हूं। अनवर ने कहा कि शरद पवार का मैं व्यक्तिगत रूप से सम्मान करता हूं लेकिन इस मुद्दे पर उनके बयान को दुर्भाग्यपूर्ण है। इस बयान से मैं आहत हूं और मैंने ये कदम उठाया है।
अनवर जल्द ही लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से मिलकर अपना इस्तीफा सौंप देंगे। मालूम हो कि विपक्ष राफेल डील पर केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रह रहा है। जबकि शरद पवार इसमें कोई गड़बड़ी नहीं देख रहे हैं। पवार ने कहा कि इस मामले में पीएम नरेंद्र मोदी की मंशा पर शक नहीं किया जा सकता है। 
कांग्रेस में शामिल होने की संभावना 
तारिक की घोषणा के साथ ही उनके फिर से कांग्रेेस में शामिल होने की संभावना जाहिर की जा रही है। कांग्रेस से उनका पुराना रिश्ता रहा है। अनवर ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत थाना कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की हैसियत से की थी। पहली बार 1972 में पीरबहोर थाना कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने।
1977 में कांग्रेस ने उन्हें कटिहार लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया। वह पहला चुनाव हार गए। 1980 में कटिहार से उनकी जीत हुई। पार्टी ने उन्हें बिहार प्रदेश कमेटी का अध्यक्ष बनाया। वे युवा कांग्रेस के प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक के पद पर रहे। अनवर तीन बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे हैं। 
कांग्रेस में सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद उनके विदेशी मूल के मुद्दे पर विवाद हुआ था। शरद पवार के साथ पीए संगमा और तारिक अनवर कांग्रेस से अलग हो गए। एनसीपी का गठन हुआ तो अनवर को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया। एनसीपी ने उन्हें पहली बार 2004 और दूसरी बार 2010 में राज्यसभा भेजा।
यूपीए 2 की सरकार में अनवर को 2012 में केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री बनाया गया। कटिहार से तीसरी बार एनसीपी के टिकट पर उनकी जीत हुई। उस समय उन्हें कांग्रेस और राजद का भी समर्थन मिला हुआ था।

राफेल का ठेका ‘अनस्किल्ड’ लोगों को देना ही PM का ‘स्किल इंडिया’ : राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल मामले को लेकर सितम्बर 26 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फिर निशाना साधा और आरोप लगाया कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से 30 हजार करोड़ रुपये का ठेका लेकर एक ‘अकुशल’ व्यक्ति को देना ही प्रधानमंत्री का ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम है.
गांधी ने भारत में बेरोजगारी की स्थिति से जुड़ी एक खबर शेयर करते हुए ट्वीट किया, ‘एचएएल से 30,000 करोड़ रुपये को चुराकर एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया जिसके पास कोई कौशल नहीं है. इस बीच, करोड़ों कुशल नौजवान 20 वर्षों में सबसे उच्च स्तर की बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं.”

दरअसल, गांधी और कांग्रेस पिछले कई महीनों से यह आरोप लगाते आ रहे हैं कि मोदी सरकार ने फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट से 36 राफेल लड़ाकू विमान की खरीद का जो सौदा किया है, उसका मूल्य पूर्ववर्ती यूपीए सरकार में विमानों की दर को लेकर जो सहमति बनी थी उसकी तुलना में बहुत अधिक है. इससे सरकारी खजाने को हजारों करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है.
क्या राफेल खरीद में घोटाला हुआ है? 
राफेल विमान सौदे को लेकर मची सियासी तू तू-मैं मैं के बीच हर किसी के दिमाग में यह सवाल है कि क्या वाकई कोई घोटाला हुआ है? अगर हां तो कैसे और अगर ना तो कैसे? जो लोग हर हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी का विरोध करते हैं वो लोग मानते हैं कि घोटाला हुआ है, जबकि बीजेपी समर्थक हर हाल में मानने को तैयार नहीं कि कोई घोटाला हुआ है। लेकिन सच क्या है यह जानना आम लोगों के लिए बेहद जरूरी है। क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ सवाल है। यहां हम आपको बता दें कि मीडिया चाहे तो इस मामले का सच बता सकता है, लेकिन उसकी इसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं है। क्योंकि आम तौर पर ऐसे मामलों में मीडिया भी राजनीतिक रूप से बंट जाता है। हम आपको इस मामले में कांग्रेस के सारे आरोप और उनसे जुड़े तथ्यों के बारे में बताएंगे और यह फैसला आप पर छोड़ते हैं कि राफेल सौदे में वाकई कोई गड़बड़ी हुई है या नहीं।

आरोप नंबर 1- महंगा खरीदा गया विमान

कांग्रेस का सबसे बड़ा आरोप है कि 2008 में जब उसने इस विमान के बारे में समझौता किया था तब कीमत काफी कम थी, लेकिन जब 2016 में बीजेपी ने इस सौदे पर मोलभाव किया तो कीमतें करीब तीन गुना हो गईं। हालांकि राहुल गांधी अलग-अलग ट्वीट में कीमत को लेकर अलग-अलग बातें कर रहे हैं। 16 मार्च 2018 को ट्वीट में उन्होंने कहा कि राफेल बनाने वाली डेसॉल्ट कंपनी ने सरकार के झूठ का पर्दाफाश कर दिया है और अपनी रिपोर्ट में राफेल की कीमत बता दी है। जिसके मुताबिक भारत से 1670 करोड़ में डील हुई है। जबकि मनमोहन सिंह सरकार ने 570 करोड़ रुपये में सौदा किया था। राहुल की गणित के मुताबिक हर हवाई जहाज पर 1100 करोड़ रुपया ज्यादा दिया गया जो कि 36 विमान के हिसाब से छत्तीस हजार करोड़ रुपया है। 
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यह रकम देश के रक्षा बजट का 10 फीसदी है। इसके बाद दूसरे ट्वीट में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि राफेल सौदे की वजह से सरकारी खजाने को 40 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। कुछ दिनों बाद आए राहुल के ट्वीट में इसे 58 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया गया। हाल ही में उन्होंने अपने एक ट्वीट में इसे 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपये का घोटाला बताया। अब वो यह कह रहे हैं कि यह भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। यहां हम आपको बता दें कि यूपीए सरकार के दौरान हुए कुल घोटालों की सीएजी द्वारा बताई गई कीमत 5 लाख 74 करोड़ रुपये बैठती है।
सच्चाई क्या है? तथ्य यह है कि यूपीए के वक्त राफेल का कोई सौदा हुआ ही नहीं था। शुरुआती बातचीत में कंपनी ने एक लड़ाकू विमान की कीमत 538 करोड़ रुपये मांगी थी, लेकिन यह विमान ऐसा था, जिसमें कोई हथियार या दूसरा डिफेंस सिस्टम नहीं लगा हुआ था। यानी उसे अलग से लगवाना पड़ता। यूरो और रुपये के दामों में उतार-चढ़ाव के हिसाब से देखें तो मई 2015 में 538 करोड़ रुपये का वही विमान 737 करोड़ रुपये का हो गया होता। जबकि 2019 में जब इसकी डिलिवरी होगी तब सौदे के हिसाब से इसकी कीमत 938 करोड़ रुपये बैठती। लेकिन मनमोहन सरकार कंपनी से सौदा नहीं कर सकी और मामला लटका रहा। जब मोदी सरकार आई तो उसने कंपनी के साथ नए सिरे से मोलभाव शुरू किया। विमान के साथ हथियार और दूसरे डिफेंस सिस्टम भी फिट करके देने की बात तय हुई। लेकिन अगर कांग्रेस की तरह खाली विमान से तुलना करें तो 2019 में यही विमान 794 करोड़ रुपये का बैठेगा। यानी कांग्रेस सरकार के मुकाबले 144 करोड़ रुपये कम। यह वो कीमत है जिसे बताने में मोदी सरकार आनाकानी नहीं कर रही। विवाद तब पैदा हो रहा है जब कांग्रेस उस हथियारबंद विमान का दाम पूछ रही है जो वास्तव में फ्रांस से बनकर 2019 में भारत आएगा। चूंकि इसमें सारे हथियार और मिसाइल्स लगे हुए होंगे लिहाजा इनकी कीमत अधिक होगी। लेकिन कितनी होगी, यह बताने को सरकार तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसा करते ही चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मनों को पता चल जाएगा कि इसमें किस तरह के हथियार होंगे।

आरोप नंबर 2- HAL की अनदेखी की

दूसरा बड़ा आरोप यह है कि 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा करते समय भारत की अपनी सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की अनदेखी की गई। कांग्रेस ने अप्रैल 2015 का एक वीडियो जारी किया है जिसमें मोदी की फ्रांस यात्रा से 17 दिन पहले डेसॉल्ट एविएशन के चेयरमैन कह रहे हैं कि भारत में एचएएल की ओर से 108 राफेल लड़ाकू विमान बनाने का करार जल्द होने वाला है। उस समय के विदेश सचिव एस जयशंकर ने 8 अप्रैल को प्रेस कांफ्रेंस में कहा था कि एचएएल बातचीत में शामिल है। सवाल है कि फिर ऐसा क्या हुआ कि एचएएल इस सौदे से बाहर हो गई और भारत ने 108 के बजाय 36 लड़ाकू विमान खरीदने सौदा सीधे वहां की सरकार के साथ कर लिया?
सच्चाई क्या है? दरअसल डेसॉल्ट और एचएएल के बीच बात नहीं बनी। एचएएल की क्षमता को लेकर पहले 2013 में भी सवाल उठ चुका था। जब 2015 में दोबारा बातचीत हुई तो टेक्नॉलाजी ट्रांसफर को लेकर बात अटक गई। डेसॉल्ट एविएशन ने कह दिया कि अगर 108 लड़ाकू विमान भारत में एचएएल की वर्कशॉप में बनाए जाएंगे तो उनकी क्वालिटी की जिम्मेदारी वो नहीं लेगा। यानी कोई खराबी आई तो उसका नुकसान भारत को उठाना होगा। एचएएल के पास जो सुविधाएं हैं उनमें समय भी बहुत ज्यादा लगता जिससे डेसॉल्ट को एतराज था। जहां तक एक सरकारी कंपनी का हक़ छीनकर प्राइवेट कंपनी को देने की बात है, यह सरासर गलत है। दरअसल एचएएल को यूपीए के वक्त हर साल औसतन 10 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए गए। जबकि मोदी सरकार ने उसे हर साल औसत 22 हजार करोड़ रुपये के ऑर्डर दिए। सेना के लिए कुल 83 लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट बनाने का 50 हजार करोड़ का ऑर्डर भी मोदी सरकार ने दिया है। कंपनी अभी सिर्फ 8 विमान ही बना रही है, लिहाजा उसकी क्षमता बढ़ाने के लिए और निवेश किए जाने की तैयारी है। यानी एचएएल के पास पहले से ही काफी काम है।

आरोप नंबर 3- सरकार ने अंबानी की मदद की

एक बड़ा आरोप है कि मोदी सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस इंड्रस्ट्रीज की मदद की और इसे राफेल बनाने वाली कंपनी डेसॉल्ट एविएशन से ऑफसेट कांट्रेक्ट दिलवाया। ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट एक तरह का आपसी हित का समझौता होता है, जिसमें सप्लाई करने वाली कंपनी वादा करती है कि एक तय अनुपात में सामान हथियार खरीदने वाले देश की कंपनियों से खरीदेगी।
सच्चाई क्या है? दरअसल फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के बयान के बाद इस आरोप को बल मिला। हालांकि खुद ओलांद अब कह चुके हैं कि यह दो कंपनियों का करार था इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह बात तकनीकी रूप से सही भी है। तो सवाल उठता है कि ओलांद ने यह बात क्यों कही कि भारत सरकार ने ही रिलायंस से सौदे के लिए दबाव डाला था? दरअसल अपने देश में ओलांद खुद इन आरोपों में फंसे हैं कि उनकी गर्लफ्रेंड ने अनिल अंबानी की एंटरटेनमेंट कंपनी में पैसा लगाया है। इसके बदले में उन्होंने अंबानी को यह सौदा दिलवाया। अब इस आरोप से अपना पल्ला झाड़ने के लिए उन्होंने इसके लिए भारत सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। जबकि अनिल अंबानी से फायदा उन्होंने लिया है। वैसे भी ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट को समझना जरूरी है। ये नियम खुद यूपीए सरकार ने 2006 में बनाए थे। सारा हल्ला रिलायंस को लेकर है जबकि सच यह है कि उनके जैसी कुल 72 कंपनियों ने डेसॉल्ट के साथ समझौते किए हैं। इसके तहत इन 72 भारतीय कंपनियों को 3 अरब यूरो से अधिक का काम मिलेगा। इससे करीब 1 लाख रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। यानी देश में प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को पहली बार विश्व की अग्रणी हथियार कंपनी के साथ काम करने का मौका मिलेगा। हो सकता है कि आगे चलकर इन्हीं में से कोई कंपनी इतनी बड़ी हो जाए कि दुनिया भर को वो अपने बनाए हथियार बेचने के काबिल हो जाए। जहां तक रिलायंस डिफेंस इंडस्ट्रीज का सवाल है इस बात के पूरे दस्तावेज सामने आ चुके हैं कि उसके और डेसॉल्ट के बीच पार्टनरशिप 2012 में ही हो गई थी। तब यह समझौता भारत को राफेल बेचने के लिए नहीं, बल्कि मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत हुआ था। उन दिनों ये कंपनी बड़े भाई मुकेश अंबानी के पास हुआ करती थी। बाद में पारिवारिक सुलह-सफाई में इसे छोटे भाई अनिल अंबानी को दे दिया गया। यह कहना गलत है कि ये कंपनी सौदे के ठीक पहले बनी थी।

राफेल डील: डसॉल्ट एविएशन ने किया रिलायंस का चयन--फ्रांस सरकार

Representative Imageराफेल डील को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के एक बयान से भारत में सियासी घमासान मच गया है। ओलांद ने मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि भारत सरकार ने ही राफेल डील में डसॉल्ट एविएशन के पार्टनर के लिए रिलायंस डिफेंस का नाम प्रस्तावित किया था और ऐसे में डसॉल्ट एविएशन कंपनी के पास दूसरा विकल्प नहीं था। अब ओलांद के इस बयान पर फ्रांस सरकार ने सफाई दी है।
फ्रांस की सरकार किसी भी तरह से फ्रेंच कंपनी की ओर से चुनी गई, चुनी जा रही या जाने वाले भारतीय पार्टनर के चयन में शामिल नहीं है. हमारे यहां की निजी कंपनी को पूरा हक़ है कि वह ऑफ़सेट के लिए किसी भी स्थानीय पार्टनर यानी भारतीय कंपनी को चुने और फिर उसे भारत सरकार के सामने मंज़ूरी के लिए रखे ताकि भारतीय नियमों के हिसाब से ये भरोसा मिल सके कि ये कंपनी क़रार पूरा करने की योग्यता रखती है. 
राफेल डील को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने बड़ा ख़ुलासा किया है. उनका कहना है कि अनिल अंबानी के रिलायंस का नाम उन्हें भारत सरकार ने सुझाया था. उनके पास और कोई विकल्प नहीं था. एक फ़्रेंच अखबार को दिए इंटरव्यू में ओलांद ने कहा कि भारत सरकार के नाम सुझाने के बाद ही दसॉल्ट एविएशन ने अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस से बात शुरू की. बता दें कि अप्रैल 2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ्रांस की यात्रा पर गए थे तब फ्रांस्वा ओलांद ही राष्ट्रपति थे. उन्हीं के साथ राफेल विमान का करार हुआ था. 'मीडियापार्ट फ्रांस' नाम के अख़बार ने पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद से पूछा कि रिलायंस को किसने चुना और क्यों चुना तो फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि भारत की सरकार ने ही रिलायंस को प्रस्तावित किया था.
फ्रांस सरकार ने कहा है कि भारत और फ्रांस की सरकार के बीच 23 सितंबर 2016 को एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए थे जिसके तहत भारत को 36 राफेल विमानों की सप्लाई की जानी है। फ्रांस की सरकार इन लड़ाकू विमानों की आपूर्ति और गुणवत्ता सुनिश्चित करती है। फ्रांस सरकार कहा कि फ्रेंच कंपनी को कॉन्ट्रैक्ट के लिए भारतीय कंपनी का चुनाव करने की पूरी आजादी रही है और इसमें फ्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं है। 
फ्रांस सरकार के बयान के मुताबिक , भारतीय नियमों और कानूनों के तहत फ्रेंच कंपनी के पास अपना भारतीय साझेदार चुनने की पूरी आजादी है। फ्रांस सरकार ने यह भी कहा कि डेसॉल्ट ने सबसे बेहतर विकल्प को चुना।
The report referring to fmr French president Mr. Hollande's statement that GOI insisted upon a particular firm as offset partner for the Dassault Aviation in Rafale is being verified.
It is reiterated that neither GoI nor French Govt had any say in the commercial decision.
इससे पहले ओलांद के बयान पर रक्षा मंत्रालय ने सफाई देते हुए ट्वीट कर कहा था, 'फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के बयान संबंधी रपट में कहा गया है कि भारत सरकार ने राफेल में डसॉल्ट एविएशन के ऑफसेट पार्टनर के रूप में किसी खास निजी कंपनी की तरफदारी की। इसकी जांच की जा रही है। यह दोहराया गया है कि व्यावसायिक फैसले से न तो भारत सरकार का कोई लेना-देना है और न ही फ्रांस की सरकार का।'
इस सन्दर्भ में अवलोकन करें:--


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स्वामी विवेकानन्द का एक कथन है "उपदेशक नहीं बल्कि उसके उपदेश को मानो", आज भारत की राजनीती में चरितार्थ होने को लालाय...

ओलांद के इस बयान के बाद कांग्रेस ने सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, 'प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत तौर पर इस मामले में मोलभाव किया और बंद दरवाजों के पीछे राफेल डील में बदलाव किया। फ्रांस्वा ओलांद का धन्यवाद, अब हमें पता चला कि उन्होंने (पीएम) ने व्यक्तिगत तौर पर दिवालिया अनिल अंबानी को अरबों रुपये की डील दिलवाई थी। पीएम ने देश को धोखा दिया है। उन्होंने सैनिकों के खून का अपमान किया है।' 
ओलांद के इस खुलासे के बाद कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने मोदी सरकार पर जमकर निशाना साधा है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने देश के साथ विश्वासघात किया, तो वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केजरीवाल ने कहा कि 'प्रधानमंत्री जी सच बोलिए. इस बीच रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि हम फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के बयान से जुड़ी इस रिपोर्ट की जांच कर रहे हैं. 

HAL और राफेल बनाने वाली कंपनी के बीच शुरू से थे ‘गंभीर मतभेद

राफेल डील को लेकर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के ख़ुलासे के बाद एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है. यूपीए सरकार जब पहली बार फ्रांस की कंपनी दसाल्ट एविएशन से राफेल विमानों की खरीद को लेकर बातचीत कर रही थी तभी हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटिड (HAL) और दसाल्ट के बीच भारत में इन जंगी विमानों के उत्पादन को लेकर ‘गंभीर मतभेद’ थे. सरकारी सूत्रों ने यह जानकारी दी है. दरअसल, यूपीए सरकार ने 2012 में दसाल्ट एविएशन कंपनी से 126 मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बेट विमान (राफेल) खरीदने के लिए बातचीत शुरू की थी. योजना यह थी कि दसाल्ट एविएशन 18 राफेल विमान तैयार हालत में देगी जबकि कंपनी HAL के साथ भारत में 108 विमानों का निर्माण कराएगी.
हालांकि यह करार नहीं हो पाया था. सूत्रों ने बताया कि 11 अक्टूबर 2012 को HAL ने रक्षा मंत्रालय को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में HAL ने दसाल्ट एविएशन के साथ काम को साझा करने को लेकर विभिन्न असहमतियों को सामने रखा था. सूत्रों ने बताया कि इसके बाद, जुलाई 2014 में मंत्रालय को लिखे पत्र में HAL ने विमानों के निर्माण के लाइसेंस के लिए दसाल्ट और एचएएल के बीच जिम्मेदारी साझा करने के एक मुख्य अनसुलझे मुद्दे को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों की राय थी कि एचएएल राफेल जेट बनाने के लिए सक्षम है जो गलत थी. सूत्रों ने बताया कि जब यूपीए सरकार फ्रांसीसी कंपनी के साथ करार को लेकर बातचीत कर रही थी तब एचएएल और दसाल्ट एविएशन के बीच गंभीर मतभेद थे. 

राफेल लड़ाकू विमान: मोदी के लिए अम्बानी अम्बानी अम्बानी

Related imageकांग्रेस ने राफेल विमान सौदे पर भाजपा को कठघरे में खड़ा तो कर दिया, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में इसे मुद्दा बनाने की उसकी कोशिशें अब तक कारगर नहीं हो पाई हैं. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) में शामिल पार्टियों ने भी इसे अभियान की तरह नहीं लिया, बस औपचारिक बयानबाजियों और मांगों में ही वे कांग्रेस के साथ शामिल रहीं. दूसरे दल जो संप्रग में शामिल नहीं होते हुए भी कांग्रेस के साथ हैं, उनकी भी बोली कम निकली, चुप्पी अधिक छाई रही.
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ गठबंधन बना कर विधानसभा चुनाव लड़ने वाली समाजवादी पार्टी ने राफेल विमान सौदे के मसले पर ऐसा ही रुख रखा कि जैसे उनका इस सौदे से कोई लेना-देना नहीं और कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सोनिया गांधी से गलबहियां लेने वाली बसपा नेता मायावती ऐसे चुप रहीं कि जैसे वे राफेल विमान सौदे के बारे में कुछ जानती ही नहीं. वामपंथी दलों के रवैये से भी ऐसा लगा कि यह तो कांग्रेस का मसला है, लिहाजा थोड़ा-बहुत बोल कर किनारे का रास्ता पकड़ लिया. राफेल सौदे पर संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की कांग्रेस की मांग इन्हीं वजहों से अपेक्षित मजबूती नहीं दिखा पाई. विपक्ष का यह बिखराव या भटकाव भाजपा के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है. देश का मीडिया भी स्वस्थ-तटस्थ पर्यवेक्षक की भूमिका में नहीं है. कोई धुर-विरोध में है तो कोई धुर-समर्थन में. यही वजह है कि देश के सारे जरूरी मसले अधूरे छूट जा रहे हैं.
Related imageअभी हाल ही लखनऊ में हुए स्मार्ट-सिटी महोत्सव और इन्वेस्टर्स-समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बात बार-बार कही कि उद्योगपतियों के साथ उठने-बैठने में हर्ज क्या है. मुश्किल से दो महीने पहले लखनऊ के सार्वजनिक मंच से मोदी ने जो सफाई पेश की, उसपर आप फिर से ध्यान देते चलें. मोदी ने कहा था, ‘अगर नीयत साफ हो तो उद्योगपतियों के साथ खड़े होने से दाग नहीं लगता. हम उन लोगों में से नहीं हैं, जो उद्योगपतियों के साथ खड़े होने या फोटो खिंचवाने से डरते हैं. बापू को बिड़ला के यहां रहने में कभी संकोच नहीं हुआ, क्योंकि उनकी नीयत साफ थी. जिस तरह देश को बनाने में किसान, मजदूर, कारीगर, सरकारी कर्मचारी, बैंकर की मेहनत होती है, वैसे ही देश को बनाने में उद्योगपतियों की भी मेहनत है. हम उन्हें चोर-लुटेरा कहेंगे, उन्हें अपमानित करेंगे? यह कौन सा तरीका है? कुछ लोग हमारे पीछे पड़े हैं. जो लोग मेरे खिलाफ मामले ढूंढ़ रहे हैं, उनके खिलाफ सबसे ज्यादा मामले निकलेंगे. मेरे खाते में तो बस चार साल हैं, जबकि उन के खाते में 70 साल हैं.’
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फ्रांस के प्रमुख अखबार ‘फ्रांस-24’ ने जो खबर छापी है, उसे देखें तो आपको जुलाई महीने में मोदी द्वारा दी जाने वाली सफाई के निहित अर्थ समझ में आएंगे. ‘फ्रांस-24’ अखबार ने लिखा है कि ‘राफेल करार’ के दरम्यान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उद्योगपति अनिल अम्बानी भी मौजूद थे. इस फ्रेंच अखबार ने भारत सरकार के रक्षा प्रतिष्ठान हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करार से अलग कर उसमें अनिल अम्बानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस को शामिल किए जाने पर गंभीर सवाल उठाए हैं. ‘फ्रांस-24’ लिखता है कि ‘राफेल करार’ में हुआ यह अहम बदलाव हैरान करने वाला है. भारत में हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड के पास सैन्य विमानों के निर्माण का पुराना अनुभव है. लेकिन ‘दसॉल्ट’ ने एचएएल से करार तोड़ कर सैन्य निर्माण क्षेत्र में गैर-अनुभवी निजी कंपनी रिलायंस डिफेंस से करार कर लिया. ‘फ्रांस-24’ अखबार ने यह भी दावा किया है कि राफेल विमान बनाने वाली कंपनी ‘दसॉल्ट’ ने एचएएल को छोड़ कर जिस निजी कंपनी को तरजीह दी, वह कंपनी ‘राफेल करार’ से महज 15 दिन पहले ही स्थापित की गई थी. कंपनी की स्थापना की तारीख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्रांस दौरे से महज 13 दिन पहले की है.
Image result for rafale dealफ्रांसीसी अखबार ‘फ्रांस-24’ जो आज लिख रहा है, ‘चौथी दुनिया’ उसे 2016 में लिख चुका है. ‘चौथी दुनिया’ के 21 से 27 नवंबर 2016 के अंक में राफेल-करार पर संदेह जताते हुए लिखा गया था कि नरेंद्र मोदी की सरकार राफेल विमान को उसकी तय कीमत से दोगुना दाम देकर खरीद रही है. इस करार में अनिल अम्बानी की रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को हिस्सेदार बना दिया गया है, जिससे रिलायंस कंपनी हज़ारों करोड़ का मुनाफा कमाएगी. राफेल-करार में घपलेबाजी की आशंका को लेकर सबसे पहले भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने आवाज़ उठाई थी. स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव और वकील प्रशांत भूषण ने भी राफेल-करार पर सवाल उठाए. उनका आरोप है कि जिस विदेशी कंपनी को काली सूची में डालना चाहिए था, उसी के साथ केंद्र सरकार ने राफेल विमान का समझौता किया.
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उल्लेखनीय है कि पहली बार जब फ्रांस के साथ राफेल लड़ाकू विमान की खरीद का करार हुआ था, तब 126 विमानों को 10.2 बिलियन डॉलर में खरीदना तय हुआ था. इस हिसाब से प्रत्येक विमान की कीमत करीब 81 मिलियन डॉलर थी. पुरानी डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की भी शर्त शामिल थी. मोदी सरकार ने राफेल विमान खरीदने के लिए जो करार किया, उसमें सिर्फ 36 विमानों को 8.74 बिलियन डॉलर में खरीदा जाना तय हुआ है. यानि, एक विमान की कीमत 243 मिलियन डॉलर होगी, वह भी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के बगैर.
राफेल विमानों की खरीद की प्रक्रिया कांग्रेस सरकार ने 2010 में शुरू की थी. 2012 से लेकर 2015 तक इस करार पर बातचीत का दौर चलता रहा. 126 विमानों की खरीद पर बात चल रही थी और शर्त यह थी कि 18 विमान भारत खरीदेगा और 108 विमान भारत सरकार की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड उसे भारत में ‘असेम्बल’ करेगी. विमान बनाने के लिए भारत को टेक्नोलॉजी भी मिलने वाली थी. अप्रैल 2015 में मोदी ने पेरिस में घोषणा की कि भारत सरकार 126 विमानों के सौदे को रद्द कर रही है. इसके बदले 36 विमान फ्रांस से सीधे खरीदे जाएंगे और एक भी राफेल विमान भारत में नहीं बनेगा.
Image result for rafale dealयह बात रेखांकित करने वाली है कि राफेल विमान बनाने वाली कंपनी ‘दसॉल्ट’ बंद होने के कगार पर थी. इस विमान को खरीदने वाले ख़रीदार नहीं मिल रहे थे, क्योंकि इतनी कीमत पर दुनिया के कई अन्य बेहतर लड़ाकू विमान उपलब्ध हैं. संदेह है कि ‘दसॉल्ट’ को बंद होने से बचाने के लिए भारत सरकार ने विमान खरीदने का करार किया. यह भी तथ्य है कि भारत के साथ डील होते ही ‘दसॉल्ट’ कंपनी के शेयर आसमान में उछलने लगे थे. रक्षा खरीद मामलों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस लिमिटेड और ‘दसॉल्ट’ कंपनी का ज्वाइंट-वेंचर, ‘दसॉल्ट’ को बंद होने से बचाने और रिलायंस को फायदा पहुंचाने के इरादे से हुआ. ध्यान देने की बात है कि 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने से पहले सरकार के पास उससे सस्ता और सक्षम लड़ाकू विमान का विकल्प भी था. वह विकल्प ‘यूरोफाइटर टाइफून’ लड़ाकू विमान का था, जिसे 453 करोड़ रुपए में खरीदा जा सकता था.
इसके अलावा ब्रिटेन, इटली और जर्मनी की सरकारों ने यह वादा किया था कि वे विमान के साथ पूरी टेक्नोलॉजी भी देंगे. वर्ष 2012 में राफेल और यूरोफाइटर दोनों लड़ाकू विमानों को भारतीय वायुसेना की जरूरतों के अनुकूल पाया गया था. तत्कालीन यूपीए सरकार ने फ्रांस के साथ राफेल विमान खरीद को लेकर जो करार किया था, उसमें देरी हो रही थी. मोदी सरकार ने आते ही उसे रद्द कर दिया. जब ब्रिटेन, जर्मनी और इटली को पता चला तो उन्होंने 20 प्रतिशत कम दाम पर लड़ाकू विमान देने की पेशकश की, मगर सरकार ने उसकी अनदेखी कर दी. सरकार के पास उन देशों का ऑफर जुलाई 2014 से लेकर 2015 के आखिर तक पड़ा रहा.
Image result for rafale dealसंदेह की इन्हीं वजहों के कारण कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दल यह मांग कर रहे हैं कि मोदी सरकार राफेल-करार की जानकारियों को सार्वजनिक करे, लेकिन केंद्र सरकार रक्षा-गोपनीयता का आधार बना कर इससे बच रही है. कांग्रेस राफेल-करार की जानकारियां तो मांग रही है, लेकिन जब केंद्र में खुद कांग्रेस की सरकार थी, तब कांग्रेस सरकार ने रक्षा सौदों की जानकारी सार्वजनिक करने से इन्कार कर दिया था. मोदी सरकार ने कहा भी कि वह 2008 में भारत और फ्रांस के बीच हस्ताक्षरित समझौते के तहत गोपनीय प्रावधानों का पालन कर रही है.
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रक्षा मंत्रालय ने कहा राफेल विमान के पुर्जे-पुर्जे की कीमत बताना, विमान के निर्माण और ‘कस्टमाइजेशन एंड वेपन-सिस्टम’ के बारे में सूचनाएं देना देश की सैन्य तैयारियों और सुरक्षा संवेदनशीलता के मद्देनजर उचित नहीं है. यूपीए सरकार ने भी अपने कार्यकाल में यही गोपनीयता बरती थी. राज्यसभा के दस्तावेज बताते हैं कि गोपनीयता का मोदी सरकार का स्टैंड कोई पहली बार नहीं हुआ है. पूर्व में कांग्रेस की सरकार भी रक्षा सौदों की जानकारी सार्वजनिक करने से इन्कार करती रही है. कांग्रेस सरकार में रक्षा मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी और एके एंटनी ने क्रमश: वर्ष 2005 और 2008 में रक्षा सौदों से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक करने से इन्कार कर दिया था.
Image result for rafale deal2005 में प्रणब मुखर्जी रक्षा मंत्री थे, तब कांग्रेस के सांसद जनार्दन पुजारी ने रक्षा खरीद से जुड़ी सूचनाएं मांगी थीं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर प्रणब मुखर्जी ने मांग ठुकरा दी थी. तीन वर्ष बाद 2008 में जब एके एंटनी रक्षा मंत्री बने, तब सीपीएम के दो सांसदों प्रसंता चटर्जी और मोहम्मद आमीन ने बड़े रक्षा सौदों के सप्लायर्स देश और उनसे हुई खरीद की जानकारी मांगी थी, लेकिन एंटनी ने सप्लायर्स देशों का नाम बताने के अतिरिक्त और कुछ नहीं बताया था. एंटनी ने इससे अधिक जानकारी देने से साफ मना कर दिया था. वर्ष 2007 में सीताराम येचुरी ने भी इजराइल से मिसाइल खरीद की जानकारी मांगी थी, तो उन्हें भी जवाब में इन्कार ही मिला था. तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने कहा था कि इस खरीद का ब्यौरा सदन में रखना राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं है. उसी कांग्रेस पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल-करार का विवरण सार्वजनिक करने की लगातार मांग कर रहे हैं.
राफेल लड़ाकू विमान को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच जमकर तकरार हो रही है. इस तकरार में भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी भी शामिल होकर राफेल-करार की जानकारियां सार्वजनिक करने की मांग करने लगे हैं. राफेल विमान खरीदने की डील 23 सितम्बर 2016 को राजधानी दिल्ली में फ्रांस के रक्षा मंत्री ज्यां ईव द्रियां और भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के हस्ताक्षर से हुई थी.
Related imageडील के मुताबिक, भारत सरकार 36 राफेल फाइटर जेट विमान खरीदेगी. पहला विमान सितम्बर 2019 तक मिलेगा. बाकी के विमान बीच-बीच में 2022 तक मिलेंगे. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का आरोप है कि मोदी सरकार ने फ्रांस की कंपनी से 58,000 करोड़ (7.8 अरब यूरो) में 36 राफेल विमान खरीदने का समझौता किया. जबकि वर्ष 2012 में यूपीए सरकार ने यह विमान तीन गुना कम कीमत पर खरीदने का करार किया था. यूपीए सरकार ने यह सौदा 10.2 अरब डॉलर में तय किया था, जबकि मोदी सरकार इसी सौदे के लिए 30.45 अरब डॉलर दे रही है.
राहुल कहते हैं कि मोदी सरकार ने रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को फायदा पहुंचाने के लिए यह करार किया. राहुल के इन आरोपों के जवाब में भाजपा का कहना है कि अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआइपी हेलीकॉप्टर घोटाले में पूछताछ के डर से कांग्रेस लोगों का ध्यान भटकाना चाहती है. फ्रांस ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया है. फ्रांस का कहना है कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का पालन किया गया है. संसद के मानसून सत्र में भी कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि संप्रग सरकार के समय राफेल लड़ाकू विमान के लिए जो सौदा किया गया था उस वक्त प्रत्येक विमान की कीमत 520 करोड़ रुपए थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के फ्रांस जाने पर उसी विमान की कीमत 1600 करोड़ रुपए प्रति विमान हो गई. राहुल ने यह दावा किया कि उनकी मुलाकात फ्रांस के राष्ट्रपति से हुई थी. बकौल राहुल, फ्रांस के राष्ट्रपति ने उनसे कहा कि राफेल विमान सौदे को लेकर भारत और फ्रांस के बीच गोपनीयता की कोई शर्त नहीं है.
राहुल गांधी के इस बयान के बरक्स ‘इंडिया टुडे’ में प्रकाशित और समाचार चैनल पर प्रसारित फ्रांस के राष्ट्रपति का इंटरव्यू उल्लेखनीय है. उस इंटरव्यू में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों साफ-साफ कहते हैं कि दोनों देशों के बीच जब किसी मामले पर बेहद ‘सेंसिटिव बिजनेस इंटरेस्ट’ संलग्न हो तो इसका खुलासा करना उचित नहीं रहता. इस डील में ‘कमर्शियल एग्रीमेंट’ के तहत प्रतियोगी कंपनियों को डील की बारीकियों की जानकारी नहीं होनी चाहिए. लिहाजा इन पर गोपनीयता बरतना जायज है. डील की किन बातों को विपक्षी दलों के सामनेया संसद में लाना है, यह वहां की सरकार तय करे. जहां तक करार का सवाल है तो डील के तहत राफेल के कई कलपुर्जे अब भारत में ही बनेंगे. राफेल विमान सुरक्षा श्रेणी के बेहद उन्नत विमान हैं. मौजूदा वक्त में इसका कोई मुकाबला नहीं है. फ्रांस के नजरिए से देखें तो यह सौदा हमारे लिए भी बहुत खास है.
Image result for rafale dealमोदी ने अम्बानी-हित के लिए देश-हित को तहस-नहस कर डाला
वर्ष 2001 के बाद से भारतीय वायुसेना को लगभग 200 मध्यम मल्टीरोल लड़ाकू (एसएमआरसीए) विमानों की सख्त आवश्यकता थी. तत्कालीन यूपीए सरकार ने वर्ष 2007 में भारतीय वायुसेना की इस मांग को मंजूरी दे दी और विभिन्न कंपनियो से टेंडर आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू हुई. भारतीय वायुसेना ने विभिन्न मध्यम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट निर्माताओं के विभिन्न उत्पादों का बड़े पैमाने में परीक्षण किया. इसमें अमेरिकी एफ-16 और एफ-18, रूस के मिग-35, स्वीडेन के साब ग्रिपन सहित यूरोफाइटर टाइफुन और फ्रांसीसी ‘दसॉल्ट’ एविएशन कंपनी के राफेल विमानों का परीक्षण किया गया. अंतिम फैसला लेने से पहले चार वर्ष तक अलग-अलग जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों में विमानों की विश्वसनीयता और संचालन सम्बन्धी क्षमता और गुणवत्ता जांचने के लिए टेस्ट किया गया.
इन परीक्षणों के बाद यूरोफाइटर और राफेल को आखिरी तौर पर चुना गया. यूरोफाइटर और राफेल के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा में राफेल ने सबसे कम बोली लगा कर सौदा जीता. ‘दसॉल्ट’ 10.2 अरब डॉलर में 126 राफेल विमान देने वाली थी, जिसमें 18 विमानों को रेडी-टू-फ्लाई हालत में दिया जाना था और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के जरिए बाकी के 108 विमान भारत में बनाता. ‘दसॉल्ट’ के साथ समझौते में भारत में 50 प्रतिशत राजस्व निवेश करने की भी शर्त थी.
संप्रग सरकार के बाद केंद्र की सत्ता में आई राजग सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मूल सौदे को ही बदल डाला. मोदी ने घोषणा कर दी कि उनकी सरकार 36 राफेल लड़ाकू विमान मूल सौदे की कीमत से लगभग तीन गुना अधिक कीमत पर खरीदेगी. टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत में एचएएल द्वारा 108 विमानों का निर्माण मूल सौदे का सबसे अहम पहलू था, लेकिन इसे मोदी ने खत्म कर दिया. भारत ने जैसे ही ‘दसॉल्ट’ के साथ करार पर हस्ताक्षर किए, रिलायंस ‘दसॉल्ट’ संयुक्त उद्यम ने तुरंत ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट हासिल कर लिया, जो भारत सरकार की कंपनी हिंदुस्तान एयरनॉटिक्स लिमिटेड को मिलना चाहिए था.
रिलायंस और ‘दसॉल्ट’ का साझा उद्यम पहले चरण में विमान के स्पेयर पार्ट्स बनाएगा और द्वितीय चरण में ‘दसॉल्ट’ एयरक्राफ्ट का निर्माण शुरू करेगा. विशेषज्ञ बताते हैं कि रिलायंस को 30,000 करोड़ रुपए में से 21,000 करोड़ रुपए मिलेंगे. खर्च अलग करने के बाद रिलायंस इस सौदे से लगभग 1.9 अरब यूरो (लगभग 1,42,97,50,00,000 भारतीय रुपए) का शुद्ध मुनाफ़ा कमाएगा. ‘दसॉल्ट’ अम्बानी की साझेदारी ने सारा परिदृश्य ही बदल डाला. ‘दसॉल्ट’ 126 राफेल विमान 10 से 12 अरब अमेरिकी डॉलर में देने को तैयार था, जिसमें 18 विमान ‘रेडी- टू-फ्लाइट कंडीशन’ में होते और शेष 108 विमान एचएएल द्वारा भारत में तैयार किए जाते, मोदी ने उस करार का बंटाधार कर दिया.
उसी ‘दसॉल्ट’ कंपनी ने टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और हथियार सिस्टम के लिए अतरिक्त पैसे की मांग की और सौदा 18-22 अरब डॉलर तक पहुंच गया. ‘दसॉल्ट’ ने एचएएल को तकनीक देने से भी इन्कार कर दिया. केंद्रीय सत्ता गलियारे के जानकार कहते हैं कि मोदी के इस रवैये से तत्कालीन रक्षा मंत्री अरुण जेटली से लेकर मनोहर पर्रीकर तक रुष्ट थे. भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तो प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर अपना रोष जताया था और जनहित याचिका दायर करने तक की धमकी दी थी. लेकिन मोदी ने सबको चुप करा दिया. स्वामी राज्यसभा में मनोनीत हो गए और अरुण जेटली फिर मनोहर पर्रीकर रक्षा मंत्रालय से क्रमशः विदा कर दिए गए.
Image result for rafale dealराफेल प्रसंग भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया
राफेल विमान करार का मसला भी अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र, न्यायाधीश एएम खानविलकर और न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने इस मामले में दाखिल याचिका पर सुनवाई करने की स्वीकृति दे दी. याचिका में डील को रद्द करने और कानूनी कार्रवाई करने की मांग की गई है. डील में भ्रष्टाचार की शिकायत की गई है और कहा गया है कि यह करार अनुच्छेद 253 के तहत संसद के माध्यम से नहीं किया गया है. इसी तरह की एक अन्य याचिका में भी राफेल सौदे की स्वतंत्र जांच कराने का आग्रह किया गया है.
संदेह राफेल की खरीद प्रक्रिया पर है, गुणवत्ता पर नहीं
राफेल लड़ाकू विमानों की गुणवत्ता पर किसी को भी कोई संदेह नहीं है. विपक्षी दलों का संदेह और आरोप खरीद को लेकर अपनाई गई प्रक्रिया पर है. खरीद के करार से पहले राफेल विमानों की गुणवत्ता परखने फ्रांस गए लड़ाकू विमानों के विशेषज्ञ अधिकारियों की टीम के एक सदस्य ने बताया कि राफेल विमान दो इंजन वाला लड़ाकू विमान है. इस विमान की लम्बाई 15.27 मीटर है और इसमें एक या दो पायलट साथ-साथ बैठ सकते हैं. राफेल विमानों को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने में महारत हासिल है. यह एक मिनट में 60 हजार फुट की ऊंचाई तक जा सकता है. यह अधिकतम साढ़े 24 हजार किलोग्राम भार उठाकर उड़ने की क्षमता रखता है.
राफेल विमान में ईंधन क्षमता 4700 किलोग्राम है. इसकी अधिकतम रफ्तार 2500 किलोमीटर प्रतिघंटा है और इसकी फायरिंग रेंज 3700 किलोमीटर है. इस विमान में 1.30 मिलीमीटर की एक गन लगी होती है जो एक मिनट में 125 राउंड गोलियां फायर करती है. इसके अलावा इस विमान में कई अन्य घातक किस्म की मिसाइलें भी लगी होती हैं. राफेल विमान अत्याधुनिक किस्म की रडार प्रणाली (थाले आरबीई-2 रडार) और युद्दक प्रणाली (थाले स्पेक्ट्रा वारफेयर सिस्टम) से युक्त होता है. इसमें ऑप्ट्रॉनिक सिक्योर फ्रंटल इंफ्रा-रेड सर्च और ट्रैक सिस्टम भी लगा होता है. भारतीय वायुसेना के उप प्रमुख एयर मार्शल एसबी देव ने भी कहा है कि राफेल एक ताकतवर विमान है और इससे देश की हवाई सुरक्षा में जबरदस्त बढ़ोत्तरी होगी. वायुसेना उप प्रमुख ने यह भी कहा कि वर्ष 2030-35 तक ‘जगुआर’ और ‘मिराज़ 2000’ लड़ाकू विमानों को भी अपग्रेड कर दिया जाएगा.
कांग्रेस पर जवाबी हमले की तैयारी में जुटी भाजपा सरकार
राफेल-करार पर कांग्रेस के आरोपों पर जवाबी हमले की भाजपा तैयारी कर रही है. इस तैयारी में भाजपा सरकार के मंत्रियों को समुचित सूचनाओं के साथ तैयार किया जा रहा है. भाजपा सरकार के मंत्री राफेल-करार पर कांग्रेस के आरोपों की सच्चाई जनता के बीच रखेंगे. मोदी सरकार के सभी मंत्रियों को पिछले दिनों बाकायदा एक प्रेजंटेशन के जरिए राफेल-करार से जुड़े तथ्यों की विस्तार से जानकारी दी गई. प्रधानमंत्री के सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने विशेष तौर पर मंत्रियों को अलग से ब्रीफिंग दी. पांच सितम्बर की शाम को बुलाई गई मिनिस्टर ऑफ काउंसिल की बैठक में लगभग सभी कैबिनेट और राज्यमंत्री मौजूद थे. राफेल विमान खरीद को लेकर दिए गए प्रेजेंटेशन में मंत्रियों को बताया गया कि यह डील किस तरह से भारत के हित में है और राफेल विमान आने से भारत की सुरक्षा व्यवस्था कितनी पुख्ता होगी.
राफेल डील पर विपक्ष के हमले का जवाब देने के लिए मंत्रियों के समूह को सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और रक्षा सचिव संजय मित्रा ने भी संबोधित किया. सुरक्षा से जुड़े दूसरे कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी मंत्रियों के समूह को राफेल फाइटर जेट विमान डील के बारे में जानकारियां दीं. बैठक ढाई घंटे से अधिक समय तक चली. मंत्रियों को बताया गया कि राफेल-करार भारत और फ्रांस की दो सरकारों के बीच की डील है, इसमें कोई प्राइवेट पार्टी शामिल नहीं है. मंत्रियों को बताया गया कि डील में भ्रष्टाचार का रत्ती भर भी स्थान नहीं है.
विवाद अपनी जगह, राफेल विमान पहुंचा अपनी जगह
राफेल विमान खरीद सौदे पर मचे राजनीतिक घमासान के बीच ही पहली बार फ्रांस के तीन राफेल लड़ाकू विमान भारत पहुंचे. ये तीनों राफेल लड़ाकू विमान ग्वालियर एयरबेस पर तीन दिन रहे और भारतीय वायुसेना के पायलटों ने इसे जाना और इस पर उड़ान भरी. ऐसे समय में जब कांग्रेस राफेल को लेकर देशभर में हायतौबा मचा रही है, फ्रांस के तीन राफेल लड़ाकू विमान मध्य प्रदेश के ग्वालियर एयरबेस पहुंचे. फ्रांस वायुसेना के तीन राफेल लड़ाकू विमान ऑस्ट्रेलिया में एक अंतरराष्ट्रीय युद्धाभ्यास में शामिल होने गए थे और वापसी में ग्वालियर में रुके.
तीन राफेल लड़ाकू विमानों के अलावा फ्रांस वायुसेना का एक एटलस-400-एम मिलिट्री ट्रांसपोर्ट विमान, एक सी-135 रिफ्यूलर विमान और एक एयरबस कार्गो विमान भी आस्ट्रेलिया से लौटते हुए ग्वालियर एयर बेस पहुंचा. वर्ष 2015 में बेंगलुरू में हुए एयरो-शो में भी राफेल लड़ाकू विमानों ने हिस्सा लिया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राफेल विमानों की हवा में कलाबाजियां लेने की अभूतपूर्व क्षमता का निरीक्षण किया था.
ऑस्ट्रेलिया में हुए युद्धाभ्यास में भारतीय वायुसेना ने भी हिस्सा लिया था. उसी साझा अभियान के तहत भारतीय वायुसेना के पायलटों ने ग्वालियर में राफेल लड़ाकू विमान उड़ाए और विमान को नजदीक से जाना. फ्रांस वायुसेना के पायलटों ने भारत के मिराज-2000 लड़ाकू विमानों पर हाथ आजमाया. ऑस्ट्रेलिया में हुए ‘पिच ब्लैक’ युद्धाभ्यास में भारतीय वायुसेना के ट्रांसपोर्ट और सुखोई-30 विमानों ने हिस्सा लिया था. वायुसेना के एक आला अधिकारी ने बताया कि राफेल विमानों की पहली खेप 36 विमानों की होगी, जो सितम्बर 2019 से भारत में आना शुरू होंगे. 36 राफेल लड़ाकू विमानों को भारतीय वायुसेना के दो स्न्वाड्रनों में बांटा जाएगा. एक स्न्वाड्रन पाकिस्तान से मुकाबले के लिए हरियाणा के अंबाला में तैनात होगी, जबकि चीन का जवाब देने के लिए दूसरी स्न्वाड्रन पश्चिम बंगाल के हाशिमारा एयरबेस में तैनात की जाएगी. (साभार: चौथी दुनिया)