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बिहार चुनाव : ‘अशांत’ हुआ प्रशांत का दल: गुंडे की तरह पीसकर छोड़ देंगे, धांधली हो रही है…. ‘प्रत्याशी सुझाव पत्र’ में घपले से भड़के टिकट दावेदारों के समर्थक, जन सुराज में अराजकता भारी

                                            जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर (साभार: आज तक)
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है, दोनों प्रमुख गठबंधन अपनी-अपनी तैयारी में जुटे हैं और पूर्व चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अपनी नए नवेले दल ‘जन सुराज’ के सहारे तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस चुनाव में खुद को दोनों प्रमुख गठबंधनों से अलग दिखाने के नाम पर प्रशांत किशोर ने आक्रामकता का सहारा लिया है।

प्रशांत गुस्से में हर किसी को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव लड़ने और चुनावी तैयारियों को लेकर भी आक्रामक हैं। उन्होंने तो यहाँ तक एलान कर दिया था कि वो बिहार में सबसे पहले अपने उम्मीदवारों का एलान कर देंगे। चुनावों की तारीखों का एलान हो गया है लेकिन अब तक प्रशांत के उम्मीदवारों का कहीं अता-पता नहीं है। अलबत्ता उम्मीदवारी को लेकर जन सुराज के नेता-कार्यकर्ता अभी से आपस में भिड़ने लगे हैं।

जन सुराज: लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र

जन सुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने जब राजनीतिक दल बनाने का एलान किया था तो उन्होंने दल के भीतर सबसे अधिक लोकतंत्र बनाने जैसे दावे किए थे। इसके अलावा अलग-अलग मंचों पर भी वह ऐसे दावे करते रहे हैं। यहाँ तक कि उम्मीदवारों के चयन में पूरी पारदर्शिता बरतने का भी उन्होंने दावा किया था।

प्रशांत किशोर ने अपने दल को लोकतांत्रिक दिखाने के लिए तय किया कि वह उम्मीदवारों का चयन भी लोगों की मर्जी से ही करेंगे। तय हुआ कि वह इसके लिए लोगों की राय लेंगे। इसके लिए उनके दल द्वारा ‘प्रत्याशी सुझाव प्रपत्र’ छपवाए गए हैं, इन पर उस विधानसभा क्षेत्र के कई संभावित उम्मीदवारों के नाम होते हैं। लोगों को इसमें से अपनी राय रखते हुए अपने द्वारा समर्थित जन सुराज के उम्मीदवार के नाम पर मुहर लगानी होती है।

यूँ तो इन पर्चे से जन सुराज अपनी पार्टी का लोकतंत्र दिखाना चाहती थी लेकिन इन्हीं की वजह से पार्टी के भीतर मौजूद भीड़ तंत्र का चेहरा सामने आ गया। बिहार में कई जगहों पर इन पर्चों को लेकर संभावित प्रत्याशियों के समर्थक ही आपस में भिड़ गए। कहीं, एक ही संभावित प्रत्याशी के समर्थकों को ज्यादा पर्चे दिए जाने की बात पर हंगामा हुआ तो कहीं अपने लोग बंद कमरे में अपने चहेते प्रत्याशी के नाम पर दनादन पर्चे भरते दिखे।

मुजफ्फरपुर के औराई विधानसभा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है जिसमें एक कमरे में बैठे 3-4 लोग अपने पसंदीदा प्रत्याशी के नाम के दर्जनों-सैकड़ों फॉर्म भरते नजर आ रहे हैं। इस वीडियो में फॉर्म भर रहे ये लोग खुद इस बात को मान भी रहे हैं कि किसके समर्थन में वो पर्चे भर रहे हैं। यह वीडियो सामने आने के बाद दावा किया जा रहा है कि प्रशांत किशोर की पार्टी के ये प्रपत्र लोगों तक पहुँच ही नहीं रहे हैं। संभावित प्रत्याशी खुद ही अपने नाम पर मुहर लगवा रहे हैं।

इसमें जब वीडियो बना रहे लोगों ने मुहर लगा रहे लोगों से पूछा कि आप खुद ही क्यों छाप रहे हैं तो इस पर उन्होंने कहा कि जनता को पता ही नहीं है इसलिए हम खुद ही यह कर रहे हैं। ये लोग करीब 300 पर्चों पर मुहर लगा रहे थे।

यह कोई अकेली-इकलौती घटना नहीं है, ऐसा कई जगहों पर हुआ है और यह आम होता जा रहा है। दरभंगा में भी ऐसा ही मामला देखने को मिला। वहाँ भी प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के दौरान जमकर बवाल हुआ है। बैलेट पर हस्ताक्षर को लेकर शुरू हुआ विवाद मारपीट में बदल गया और कार्यकर्ता एक-दूसरे पर कुर्सियाँ फेंकने लगे। इस घटना में कई लोग घायल भी हो गए हैं।

बेनीपुर में हंगामा कर रहे लोगों ने यह दावा किया कि उनको पर्चे नहीं दिए गए हैं। लोगों ने धांधली का आरोप भी लगाया है। एक शख्स ने दावा किया कि एक व्यक्ति के समर्थकों को बंडल के बंडल दिए गए हैं। खूब गाली गलौज तक की गई है। एक अन्य शख्स के दावा कि कुछ-कुछ लोगों को 6-6 पर्चे दिए जा रहे हैं जबकि कुछ लोगों को एक भी नहीं मिल रहा है।

बिस्फी में भी जन सुराज के कार्यकर्ता सम्मेलन में वोटिंग को लेकर जमकर हंगामा हुआ है। बिस्फी में नागेंद्र यादव, मोहम्मद कलीन और वशिष्ठ नारायण को पार्टी की तरफ से संभावित प्रत्याशी बनाया गया है। तीनों के नाम के पर्चे जनता को दिए गए लेकिन वे आपस में ही भिड़ गए। संभावित प्रत्याशियों ने एक-दूसरे पर गुंडे तक बुलाने का आरोप लगा दिया है। दावा किया गया है कि यहाँ वशिष्ठ नारायण को पहले ही इस वोटिंग को लेकर बता दिया गया था लेकिन अन्य संभावित प्रत्याशियों को इसकी जानकारी नहीं दी गई थी।

वशिष्ठ नारायण झा का कहना है कि वो वोटिंग के समर्थन में थे और वो ताल ठोककर तैयार हैं। उन्होंने कहा कि अगर कोई गुंडागर्दी करेगा तो उसे गुंडे की तरह पीसकर छोड़ दिया जाएगा। अन्य संभावित उम्मीदवारों ने नाराजगी जताई है।

अब यह आपसी फूट ही जन सुराज की हकीकत बन गया है। यानी बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर अपनी पार्टी के भीतर ही लोकतंत्र नहीं बना पा रहे हैं।

क्यों टिकट बँटवारे में हुई देरी

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार में अपनी बड़ी उपस्थिति और ‘नई राजनीति’ का दावा तो बहुत पहले कर दिया था लेकिन जब बात टिकट बाँटने की बारी आई तो पार्टी के अंदर ही कई परतें खुलने लगीं।

हालाँकि, प्रशांत किशोर ने महीनों पहले ऐलान किया था कि जन सुराज अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, सबसे पहले टिकटों की घोषणा होगी मगर अब तक टिकटों की घोषणा नहीं हो पाई है। इसके पीछे कई वजहें हैं।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि जन सुराज को खुद भी एहसास है कि फिलहाल उसका जनाधार वोट कटवा से ज्यादा नहीं है। पार्टी के भीतर भी कई कार्यकर्ता इस बात को समझते हैं कि अगर टिकट बाँटे गए और चुनाव लड़ा गया, तो अधिकतर सीटों पर मुकाबला तीसरे या चौथे स्थान से आगे नहीं बढ़ पाएगा।

ऐसे में प्रशांत किशोर अन्य दलों के टिकट बाँटे जाने का इंतजार कर रहे हैं। ताकि किसी बड़े दल से असंतुष्ट और जनाधार वाले नेता या गुट उनके साथ जुड़ सके। उनका मत है कि जन सुराज के संगठन को चलाने वाले स्थानीय लोग। जन सुराज का पूरा संगठन उन्हीं लोगों के हाथ में है जो शुरू से इस अभियान से जुड़े रहे हैं। इन कार्यकर्ताओं ने गाँव-गाँव में सर्वे किए, बैठकें कीं और पार्टी की नींव डाली। यही लोग जमीन पर पैसा भी खर्च करते हैं।

अब जब टिकट वितरण की घड़ी आई है, तो वही पुराने कार्यकर्ता खुद दावेदार बन बैठे हैं। ऐसे में अगर किसी को टिकट नहीं मिला या पक्षपात दिखा, तो बगावत तय है। ऐसे में प्रशांत किशोर इस बगावत से अपनी पार्टी को बचाने के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। खुद को अलग दिखाने का दावा करने वाले प्रशांत के सामने अभी पूरी तैयार भी ना हो सके संगठन को संभालने की जिम्मेदारी है।

बिहार : तेज Vs तेज : लालू यादव के घर में ही बगावत से राजद के वोटों की लुटिया डूबेगी

कहावत है अपनी नाव वहां डूबी जहाँ पानी काम था, वरना किसी में इतना दम था, दूसरे दिल के फफोले जल उठे सीने की आग से, इस घर को आग लग गई घर के चिराग से ये दोनों ही लालू यादव के परिवार और पार्टी RJD पर सटीक बैठती हैं।      
बिहार के विधानसभा चुनाव में सीएम बनने के मुंगेरीलाल बने तेजस्वी यादव के हसीन सपनों पर खुद उनके अपनों ने ही वज्रपात कर दिया है। बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने नया सियासी दांव खेला है। राजद से छह साल के निकाले जाने के बाद तेज प्रताप ने ‘टीम तेज प्रताप’ के बैनर तले पांच पार्टियों-विकास वंचित इंसान पार्टी (VVIP), भोजपुरिया जन मोर्चा, प्रगतिशील जनता पार्टी, वाजिब अधिकार पार्टी और संयुक्त किसान विकास पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान कर दिया है। उनके इस कदम ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव से पहले ही राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का कुनबा बिखर गया है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान तेजस्वी यादव को ही होने जा रहा है। क्योंकि तेजप्रताप उन्हीं के लिए ‘वोट कटुआ’ साबित होंगे। यही वजह है कि बिहार की सियासत में तेज प्रताप यादव का नया गठबंधन सुर्खियों का केंद्र बन गया है।

विधानसभा चुनाव से पहले ही लालू यादव का कुनबा आमने-सामने

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कुछ माह पहले ही अपने ‘लाल’ से नाता तोड़ लिया था। लालू-राबड़ी के बेटे तेज प्रताप यादव ने अपना रिलेशनशिप वाला शिगुफा क्या छोड़ा, उससे पिता लालू यादव समेत सारी पार्टी ही असहज हो गई। उन्हें लगा कि इससे चुनाव में विरोधियों को अच्छा मौका मिल जाएगा। सत्ता पाने के लालच में आखिरकार लालू प्रसाद यादव को कड़ा फैसला लेना ही पड़ा। तेज प्रताप यादव को पार्टी से परिवार से निकाले जाने की घोषणा करते हुए लालू के जो सोशल मीडिया पोस्ट किया। लालू यादव ने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया। जिसके बाद से ही तेज प्रताप के राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें तेज हो गई थीं। अब तेज प्रताप ने अलग चुनाव लड़ने के ऐलान और पांच पार्टियों के साथ गठबंधन करके अपने अगले कदम से सबको चौंका दिया है। इस बीच लालू यादव की बहू ऐश्वर्या ने दावा किया कि उनके पति तेज प्रताप यादव को पार्टी से निष्कासित करना आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया गया एक ‘नाटक’ है। भाजपा और अन्य दलों ने भी लालू के इस कदम को चुनाव के लिए उठाया गया राजनीतिक स्टंट करार दिया। यह तय है कि तेजप्रताप को लेकर लालू-तेजस्वी को विधानसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ेगा।

तेजप्रताप निर्दलीय लड़ें या पार्टी से, नुकसान राजद को ही होगा
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक भले ही तेज प्रताप यादव का नया गठबंधन छोटे दलों के साथ है, लेकिन वे उनके बागी तेवरों ने आरजेडी के भीतर टेंशन बढ़ा दी है। अगर तेज प्रताप निर्दलीय या नई पार्टी से चुनाव लड़ते हैं तो वोटों का बंटवारा राजद को नुकसान पहुंचा सकता है। तेज प्रताप ने निषाद नेता प्रदीप निषाद की VVIP पार्टी से गठजोड़ कर निषाद समुदाय को लुभाने की कोशिश की है। प्रदीप निषाद पहले मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के साथ थे, लेकिन अब उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई है। बता दें कि बिहार में निषाद समुदाय की आबादी लगभग 14 प्रतिशत है जो कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है। तेज प्रताप यादव का यह गठबंधन निषाद वोटों को एकजुट करने की रणनीति हो सकती है।

विक्टिम कार्ड: बिहार और देश जानता है कि मेरे साथ अन्याय हुआ
RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे और हसनपुर विधायक तेजप्रताप यादव ने पटना के होटल में पीसी में अपने खिलाफ विक्टिम कार्ड भी खेला। उन्होंने कहा कि VVIP ही ओरिजिनल पार्टी है। VIP वाला तो बहरूपिया है। बेकार का पार्टी बना कर घूम रहा है। तेजप्रताप ने कहा, ‘बहुत सारी चुनौती है। पूरा बिहार और देश जानता है कि किस तरह से मेरे साथ अन्याय हुआ है। राजद में बैठे कुछ विभीषणों ने ही उनके साथ खेल किया है और चुनाव में वो उनकी पोल खोलकर रहेंगे। हमने महुआ से चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। महुआ के लिए हमने बहुत काम किया है’। ‘मैं आगे बिहार के लिए लड़ाई लड़ूंगा। मेरे दुश्मन बहुत लोग हैं। आपलोगों के चैनल के माध्यम से वो सुनेंगे तब बुरा लगेगा। तेजस्वी मेरा चैनल देख रहे होंगे।

पांच दलों के गठजोड़ से तेजस्वी यादव की राजद को होगा नुकसान
दरअसल, तेजप्रताप को पार्टी के निष्कासित करते समय राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को भी इसका अहसास नहीं था कि तेज प्रताप इतने कम समय में ही पूरे दम-खम के साथ उनके खिलाफ ताल ठोंक देंगे। राजद से निष्कासित होने के बाद तेज प्रताप ने ‘टीम तेज प्रताप’ के बैनर तले निषाद नेता प्रदीप निषाद की पार्टी सहित पांच दलों से गठजोड़ किया है। बिहार की सियासत में ये सवाल गूंज रहा है कि तेज प्रताप अपने छोटे भाई और उनकी पार्टी को विधानसभा चुनाव में कितना ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे। इसके साथ ही उनके एक और कदम ने तब खलबली मचा दी जब उन्होंने राजद और कांग्रेस को भी गठबंधन में शामिल होने का न्योता दिया और साथ ही यह भी कह दिया कि, जिसको जो सोचना है सोचे। जानकार कहते हैं कि तेज प्रताप का यह बयान उनके भाई तेजस्वी यादव और राजद के प्रति उनकी नाराजगी को बता रहा है। इससे उनके बीच दरार और बढ़ने वाली है।

बिहार में 14 प्रतिशत निषाद वोट कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक
तेज प्रताप ने निषाद नेता प्रदीप निषाद की VVIP पार्टी से गठजोड़ कर निषाद समुदाय को लुभाने की शानदार राजनीतिक कोशिश की है। प्रदीप निषाद पहले मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के साथ थे, लेकिन अब उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई है। बता दें कि बिहार में निषाद समुदाय की आबादी लगभग 14 प्रतिशत है जो कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसे में तेज प्रताप यादव का यह गठबंधन निषाद वोटों को एकजुट करने की अहम रणनीति हो सकती है। तेज प्रताप के इस गठबंधन से मुकेश सहनी की VIP की इस समुदाय में पकड़ कमजोर हो सकती है। तेज प्रताप यादव का मुकेश सहनी पर सियासी हमला करते हुए उन्हें ‘बहरूपिया’ बताया है। तेज प्रताप का यह तंज भी सहनी और तेजस्वी यादव को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा है।

‘टीम तेज प्रताप’ और महुआ से चुनाव लड़ने की घोषणा बगावती तेवर
जानकार कहते हैं कि राजद से निष्कासन और परिवार से दूरी ने तेज प्रताप को सियासी तौर पर एक नई पहचान दिलाने का अवसर दिया है। उनकी ‘टीम तेज प्रताप’ और महुआ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा उनके ऐसे ही बगावती तेवर दिखाती है। वे एक ओर गठबंधन के साथ अलग-अलग जाति के वोटों को जोड़ रहे हैं, दो दूसरी ओर तेजस्वी के कोर वोटर में भी सेंध लगाने में लगे हैं। उनकी यह दोहरी राजनीतिक रणनीति राजद और तेजस्वी यादव को मुश्किल में डाल सकती है। राजनीति के जानकार कहते हैं कि दरअसल, तेजस्वी यादव की बौखलाहट यह है कि वे किसी भी रूप में तेज प्रताप को उभरने नहीं देना चाहते। इसीलिए तेज प्रताप की कथित प्रेमिका प्रकरण को इतने जोर-शोर से उठाया गया है।

राजद की संगठनात्मक संरचना को तेजप्रताप की सेंध से बचाना चुनौती
तेजस्वी यादव के सामने तेज प्रताप के आने के बाद से सबसे बड़ी चुनौती राजद की संगठनात्मक संरचना को तेज प्रताप की सेंध से बचाना है। राजद सूत्रों का ही कहना है कि पार्टी में कई लोग तेज प्रताप के निष्कासन से खुश नहीं हैं। उनका मानना है कि चुनाव जीतने के लिए तेजस्वी यादव और तेज प्रताप को मिलकर लड़ना चाहिए था। लेकिन अब एक-दूसरे के सामने आने से ज्यादा नुकसान तेजस्वी यादव को ही होगा। क्योंकि तेज प्रताप यादव के पास को खोने के लिए कुछ नहीं है। तेज प्रताप ने जो कुछ भी हासिल किया यह उनकी जीत के रूप में ही देखा जाएगा। इसीलिए तेज प्रताप कथित रूप से राजद के कोर वोट बैंक- यादव, मुस्लिम और पिछड़ा वर्ग में सेंध लगाने के समीकरणों में जुटे हुए हैं।

तेजप्रताप ने ताल ठोंककर कहा कि तेजस्वी महुआ से नहीं लड़ेंगे चुनाव
महुआ से तेजस्वी यादव के चुनाव लड़ने वाले सवाल पर तेज प्रताप ने ताल ठोंककर कहा कि तेजस्वी वहां से किसी भी सूरत में कभी भी चुनाव नहीं लड़ेंगे। आप लोग अगर मगर छोड़ दीजिए। तेजप्रताप यादव ने कुछ दिन पहले ही महुआ सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि ‘टीम तेज प्रताप एक प्लेटफार्म है, जो चुनाव में युवाओं को समर्थन देगी। जो लड़ना चाहेंगे, उन्हें पूरा सपोर्ट मिलेगा’। तेज प्रताप बोले कि महुआ सीट को अमानत के तौर पर हमने मुकेश रौशन को सौंपा था। उस समय कुछ पॉलिटिकल सिनेरियो बना था, जिस कारण मुझे हसनपुर से लड़ना पड़ा था।

मंडल को अब कमंडल ले कर बनारस जाना चाहिए – तेजप्रताप
राजद प्रदेश अध्यक्ष मांगनी लाल मंडल ने कहा कि था कि तेज प्रताप यादव का कोई अस्तित्व नहीं है। तेज प्रताप यादव ने इसका जवाब देते हुए कहा कि वो अपने अस्तित्व की चिंता करें। मांगनी लाल मंडल जी को इस उम्र में कमंडल लेकर बनारस जाना चाहिए। बता दें कि 29 जून 2025 को मुकेश सहनी के पीए और काफी नजदीकी रहे प्रदीप निषाद ने नई पार्टी वीवीआईपी के गठन की घोषणा की थी। प्रदीप निषाद पहले ही कह चुके हैं कि वे 70 फीसदी सीटें मल्लाह समाज के उम्मीदवार को देंगे।

पत्नी ऐश्वर्या बोली- बिहार विधानसभा चुनाव के लिए लालू का नाटक
बिहार में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसके लिए सभी दलों ने अभी से कमर कस ली है। लेकिन चुनावी तैयारियों से पहले ही लालू यादव के कुनबे में बम फूट गया था। लालू प्रसाद ने अपने बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को कथित रूप से ‘गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार’ के कारण छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया और उनके साथ सभी पारिवारिक संबंध भी तोड़ दिए। इस बीच तेज की पत्नी ऐश्वर्या ने संवाददाताओं से बात करते हुए अपने ससुराल वालों पर एक ऐसे व्यक्ति से उनकी शादी कराकर जीवन बर्बाद करने का आरोप लगाया, जिसका व्यवहार ‘असामान्य’ है। ऐश्वर्या ने यह भी जोर देकर कहा, ‘इस परिवार का यह नाटक चुनावों को ध्यान में रखकर किया गया है। मुझे लगता कि ये लोग दरार से ज्यादा दिखावा कर रहे हैं। वे सभी मिले हुए हैं। मुझे यकीन है कि आज नहीं तो कल राबड़ी देवी (ऐश्वर्या की सास) ने तेजप्रताप के आंसू पोंछकर और यह आश्वस्त करके उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करेंगी। तेजप्रताप और ऐश्वर्या ने 2018 में शादी की थी, लेकिन बाद में ऐश्वर्या ने शारीरिक और भावनात्मक यातना का आरोप लगाते हुए ससुराल छोड़ दिया।

महाराष्ट्र : शरद पवार भी 40 विधायकों के साथ 1978 में वसंतदादा पाटील को धोखा देकर बने थे मुख्यमंत्री

इतिहास खुद को दोहराता है। 2 जुलाई 2023 को महाराष्ट्र की राजनीति ने नई करवट ली। राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार को मात देते हुए भतीजे अजित पवार ने एनसीपी पार्टी में बगावत की और बीजेपी का दामन थाम लिया। उन्होंने सरकार में उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली और उनके कुछ साथी विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली। उन्हें एनसीपी के 53 में से 40 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। इस घटना के बाद महाविकास अघाड़ी के साथ ही विपक्षी एकता पर सवाल खड़े हुए। इससे तिलमिलाए शिवसेना के प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा कि अजित पवार ने महाराष्ट्र की पीठ में खंजर भोंका है। अगर ऐसा है तो फिर तो यह भी कहना पड़ेगा कि शरद पवार ने भी 1978 में यही काम किया था। कुछ इसी तरह की घटना महाराष्ट्र की राजनीति में 1978 में घटी थी। उस समय पवार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटील को धोखा देकर 40 विधायकों(आज अजित पवार भी 40 ही विधायकों के साथ अलग हुए हैं) के साथ अलग हो गए थे और मुख्यमंत्री बन गए थे। 

1978 में 40 विधायकों के साथ बगावत कर मुख्यमंत्री बने थे पवार
शरद पवार लगभग 45 साल पहले कांग्रेस से बगावत करते हुए 40 विधायकों को लेकर अलग हो गए थे। इसके चलते वसंतदादा पाटील की सरकार गिर गई थी। पवार ने 18 जुलाई, 1978 को प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी, जिसमें कई विपक्षी दल शामिल थे।

वसंतदादा ने मुख्यमंत्री पद से दिया था इस्तीफा
1978 में विधानमंडल सत्र चल रहा था। तत्कालीन गृह मंत्री नासिक राव तिरपुडे ने मुख्यमंत्री पाटील को उद्योग मंत्री पवार से उनकी सरकार को खतरे के बारे में चेतावनी दी थी। वसंतदादा ने उनसे कहा था कि शरद अभी मुझसे मिले थे। उसी दिन बाद में वसंतदादा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

महाराष्ट्र की राजनीति में घूम गया चक्र
महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़े नाटकीय घटनाक्रम के तहत 2 जुलाई 2023 को राकांपा नेता अजित पवार ने पार्टी में विभाजन की स्थिति पैदा कर दी। वह राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री बन गए। इस कदम ने उनके चाचा शरद पवार को चौंका दिया। उन्‍होंने 24 साल पहले पार्टी की स्थापना की थी। दक्षिण मुंबई के राजभवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के आठ नेताओं ने भी मंत्री पद की शपथ ली।

शरद पवार के करीबी भी अजित पवार के साथ आए
दोनों घटनाओं की समानता यहीं पर खत्म नहीं होती। शरद पवार जिस तरह कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं गोविंदराव आदिक और सुशील कुमार शिंदे को अपने साथ लेकर गए थे, उसी तरह अजित पवार भी दिलीप वलसे पाटिल और छगन भुजबल को साथ लेकर गए हैं। दिलीप वलसे पाटिल और भुजबल को पवार का वफादार माना जाता रहा है।

अगले चुनाव में वो एनसीपी के नाम से उतरेंगेः अजित पवार
उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद एक प्रेंस कॉन्फ्रेंस कर अजित पवार ने कहा कि उन्होंने एनसीपी के नेता के रूप में ही महाराष्ट्र की सरकार को अपना समर्थन दिया है। उन्होंने कहा कि अगले चुनाव में वो एनसीपी के नाम और एनसीपी के चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेंगे। प्रेस कॉन्फ़्रेंस में अजित पवार और छगन भुजबल के साथ प्रफुल्ल पटेल भी मौजूद थे। प्रफुल्ल पटेल को कुछ दिनों पहले ही शरद पवार ने पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था।

हम सभी लोग मोदी के साथ जाना चाहते हैंः छगन भुजबल
शरद पवार के करीबी छगन भुजबल ने कहा कि हमें कुछ दिन पहले शरद पवार साहब ने कहा था कि मोदी प्रधानमंत्री के तौर पर वापस आने वाले हैं। अगर ऐसा है तो एक सकारात्मक कदम लेते हुए हमने विकास के उद्देश्य से उनकी सरकार में शामिल होने का फ़ैसला लिया है। उन्होंने कहा कि कई लोगों का कहना है कि हमारे नेताओं में से कई लोगों के ख़िलाफ़ ईडी के केस चल रहे हैं लेकिन ऐसा नहीं है। शपथ लेने वाले नेताओं के नाम आप देख सकते हैं। हम सभी लोग मोदी के साथ जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि 1984 के बाद ऐसा कोई नेता नहीं आया जिसके नेतृत्व में देश आगे बढ़ सका, लेकिन बीते 9 सालों से हम मोदी को देख रहे हैं कि देश तेज़ी से विकास कर रहा है।