Showing posts with label #not land of waqf board property. Show all posts
Showing posts with label #not land of waqf board property. Show all posts

हर कब्र-दरगाह वक्फ की प्रॉपर्टी नहीं: सिर्फ इस्लाम से जुड़े होने के कारण बोर्ड नहीं कर सकता कब्जा: मद्रास हाई कोर्ट

                           दरगाह पर मद्रास हाईकोर्ट का फैसला (प्रतिकात्मक फोटो, साभार- chatgpt)
मद्रास हाई कोर्ट ने 5 जून को दरगाह और वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि किसी दरगाह का किसी जगह पर होना ही इस बात का सबूत नहीं है कि जिस जमीन पर वो है, वो वक्फ की प्रॉपर्टी बन जाए। कोर्ट ने साफ किया कि वक्फ बोर्ड को जमीन पर अपना हक साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स और प्रोसिजर को फॉलो करना होगा।

240 साल पुरानी दरगाह से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने देखा कि जमीन का ना तो वक्फ सर्वे हुआ था और न ही उसे वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर नोटिफाइड किया गया था। इसी आधार पर दरगाह के रजिस्ट्रेशन के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी के मामले में न्यायमूर्ति के गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने कहा कि वक्फ बोर्ड को कानूनी रूप से भूमि पर स्वामित्व साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा, किसी दरगाह होने मात्र से वह वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता, जब तक कि कानून के मुताबिक वह भूमि वक्फ की संपत्ति माना न जाए।

न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ की संपत्ति नहीं बन जाती। उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए जब कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति को पूरी तरह से दे देता है, तब वह वक्फ बोर्ड का होता है।

कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें ट्रिप्लिकेन में मौजूद सैय्यद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए बोर्ड ने एक मुतवल्ली नियुक्त किया था। बोर्ड ने बगैर सर्वेक्षण पूरा किए वक्फ अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन का भी निर्देश दिया था।

240 साल पुराने दरगाह का 40 साल से परिवार कर रहा देखरेख

ये मामला ट्रिप्लिकेन के 240 साल पुराने दरगाह से जुड़ा हुआ है।इसकी देखरेख याचिकाकर्ता का परिवार पिछले 40 साल से कर रहा है। उसने वक्फ बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जमीन लोक निर्माण विभाग की है, न की वक्फ बोर्ड की।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किए बगैर संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी मुतवल्ली को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड को नहीं है।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि भूमि और आसपास का क्षेत्र दरगाह का है और बाद में यह लोकनिर्माण विभाग में आ गया।

लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट को बताया कि यह सरकारी भूमि था और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के आवंटित किया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की भूमि को धोखाधड़ी से पंजीकृत कराया था।

कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि संपत्ति वक्फ बोर्ड की है। इसलिए वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि हर कब्र और दरगाह को खुद ब खुद वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है और कोर्ट को निजी पारिवारिक कब्र और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य वाली जमीन में अंतर करना होगा।

कोर्ट ने कहा, ” यदि किसी दरगाह का कभी सर्वेक्षण नहीं किया गया है, उसे पंजीकृत नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड सामान्यतः केवल इसलिए स्वतः नियंत्रण ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्था है।”

वक्फ बोर्ड को किसी संस्था पर नियंत्रण रखने से पहले उस पर उसका अधिकार है, इससे जुड़े दस्तावेज और दूसरे सबूत देने होंगे। ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो कि संपत्ति वक्फ बोर्ड को दी गई थी या यह बोर्ड की संपत्ति थी। बिना सर्वे के दरगाह को पंजीकृत कराना गलत है।