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उत्तर प्रदेश : कलावा बाँध छिपाई पहचान, ईरम ने ‘महक’ नाम रखकर किया आकाओं के लिए काम: भारत में ISI कैसे खेल रहा जासूसी वाला खेल, वामपंथी सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करने में जुटे

                                 हिंदू नाम की आड़ में जासूसी करने वालों से कौन पूछेगा धर्म?
गाजियाबाद से सामने आया जासूसी नेटवर्क सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस नैरेटिव पर भी सीधा निशाना है जो एक खास दिशा में गढ़ा जाता रहा है। यह मामला बताता है कि सच्चाई कितनी परतों में छिपी होती है और कैसे उसे चुन-चुनकर तोड़ा-मरोड़ा जाता है।

हिन्दुओं को आतंकवादी हरकतों में बदनाम करने का पाकिस्तान ही नहीं भारत में सनातन विरोधी का बहुत गहरा रिश्ता है। अगर कसाब जिन्दा नहीं पकड़ा गया होता हिन्दू आतंकवाद और भगवा आतंकवाद कहकर हिन्दुत्व को बदनाम करने वाले हिन्दू विरोधी पीछे नहीं हटते। भारत में पाकिस्तान के स्लीपर सेल ही नहीं हिन्दुत्व का चोला ओढे कालनेमियों की भी कमी नहीं। टीवी पर एक से बढ़कर एक श्लोक/चौपाई सुनाकर लोगों को भ्रमित करने वाले ही हिन्दुत्व और देश के दुश्मन हैं। मुस्लिम की मौत होने पर कोहराम मचाते हैं लेकिन जब किसी हिन्दू की मोबलीचिंग में हत्या होने पर इन सबकी बोलती ऐसे बंद रहती है जैसे कि इनके घरों में शोक हो।   

कौशांबी और साहिबाबाद से पकड़े गए इस गिरोह के तार सीधे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े मिले। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि ये लोग जासूसी कर रहे थे, बल्कि यह थी कि ये सब हिंदू नाम और पहचान की आड़ लेकर भारत के खिलाफ काम कर रहे थे। सरफराज ने खुद को जोरा सिंह बना लिया, शहजाद ने भट्टी और वकार ने विक्की जट नाम रख लिया। कौशांबी से पकड़े गए सुहेल ने खुद का नाम रोमियो, नौशाद ने लालू, समीर ने शूटर और एक औरत साने इरम बन गई महक।

यह सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं था। सुहेल कलावा बाँधता था, गले में रुद्राक्ष पहनता था, माथे पर टीका लगाता था। नौशाद और समीर भी इसी तरह की हिंदू पहचान लेकर घूमते थे। यानी साजिश यह थी कि हिंदू बनकर जासूसी करो और हिंदुओं का भरोसा जीतो और फिर उनसे भी जासूसी करवाओ। क्योंकि इस गिरोह में युवक गणेश और महिला मीरा का भी नाम सामने आया।

अब जब गाजियाबाद का पूरा नेटवर्क खुलकर सामने आ चुका है और साफ दिख रहा है कि किस तरह हिंदू नाम और पहचान को ढाल बनाकर जासूसी की जा रही थी, तब वे लोग कहाँ चले गए जो हर बार हिंदू नाम देखते ही उछल पड़ते हैं? वही लोग जो किसी एक नाम के आधार पर पूरी चर्चा का रुख मोड़ देते हैं, इस संगठित साजिश पर चुप रहे। न तो मजहब के आधार पर हेडलाइन बनी, न कोई किसी मजगब को निशाना बनाया गया और यहाँ तक कि देश हित में भी सवाल नहीं पूछे गए। यही बताता है कि समस्या नजरिए की है।

राजस्थान का ही मामला सामने रखिए। एयरफोर्स में काम करने वाला प्राइवेट कर्मचारी सुमित कुमार जासूसी के आरोप में पकड़ा गया। रिपोर्ट्स में साफ बताया गया कि उसका ब्रेनवॉश पाकिस्तानी हैंडलर्स ने किया था और उसे इसलिए चुना गया क्योंकि वह हिंदू था। उससे सत्संग और धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए दूसरे हिंदुओं को ब्रेनवॉश करवाने की योजना बनाई गई। यानी यहाँ भी एक बड़ी साजिश थी, जिसमें हिंदू पहचान का इस्तेमाल एक औजार की तरह किया जा रहा था।  

लेकिन जैसे ही सुमित कुमार का नाम सामने आया, मीडिया और सोशल मीडिया पर वामपंथी अकाउंट्स ने बिना देर किए हेडलाइन बना दी- हिंदू निकला पाकिस्तानी जासूस। न कोई गहराई देखी गई, न कोई सोर्स जाँचा गया, न यह सवाल कि उसके पीछे कौन है? बस नाम देखा और हिंदुओं को बदनाम करने का पूरा नैरेटिव सेट कर दिया।

ये दो मामले सामने रखकर देखा जाए तो यही दोहरा रवैया सामने आ जाता है। जब गाजियाबाद में पूरा जासूसी नेटवर्क हिंदू नाम की आड़ में काम करता पकड़ा गया, तब यह बात नहीं उठती कि यह हिंदुओं को बदनाम करने की साजिश है। तब यह नहीं कहा जाता कि देखो कैसे हिंदू पहचान का इस्तेमाल ढाल की तरह किया जा रहा है। लेकिन जैसे ही ऐसे मामलों में एक व्यक्ति का नाम हिंदू निकलता है, पूरी कहानी उसी पर टिक जाती है।

क्या कभी यह सवाल उठाया जाएगा कि जिन पाकिस्तानी आकाओं के इशारों पर ये सारे लोग काम कर रहे थे, उनकी मजहबी पहचान क्या है? क्या तब भी उतनी ही तेजी से हेडलाइन बनेगी? या फिर वहाँ चुप्पी ही साध ली जाएगी?

समस्या यह है कि कुछ लोगों के लिए सच्चाई मायने नहीं रखती, उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका हिंदुओं को घेरने का, उन्हें कटघरे में खड़ा करने का। और जैसे ही ऐसा कोई मौका दिखता है, पूरा इकोसिस्टम एक्टिव हो जाता है। तथ्यों की जाँच बाद में होती है, पहले फैसला सुना दिया जाता है।

गाजियाबाद का मामला इस पूरे खेल को उजागर करता है। यह दिखाता है कि कैसे दुश्मन ताकतें सिर्फ सीमापार पर ही नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक समाज के भीतर घुसकर भी काम कर रही हैं। और उससे भी ज्यादा खतरनाक यह है कि उनके इस खेल में देश की गिनी-चुनी मीडिया और वामपंथी लोग अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

गाजियाबाद की घटना एक चेतावनी है, हिंदुओं के लिए। यह उस सोच के लिए भी जो हर बार एक ही दिशा में देखने की आदत डाल चुकी है। अग अब भी यह नहीं समझा गया, तो अगली बार कोई और ‘हिंदू नाम’ फिर से इस्तेमाल होगा और कहानी फिर से उसी तरह मोड़ी जाएगी।

राहुल की Hit and run पॉलिसी ने मजबूर किया पूर्व जजों-ब्यूरोक्रेट्स समेत 272 हस्तियों को खुला खत लिखने को, कहा- चुनावी जीत नहीं मिली, हो रहा ‘ड्रामा’: चुनाव आयोग को बदनाम कर रहे राहुल गाँधी और वामपंथी NGOs: चुनाव आयुक्तों को क्यों धमकी दी?

                                              प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गाँधी (फोटो: मिंट)
राहुल गाँधी और अब प्रियंका वाड्रा द्वारा चुनाव आयुक्तों को धमकी देकर क्या देश में गुंडागर्दी का माहौल बना चाहते हैं? कांग्रेस में बुद्धिजीवी क्यों खामोश है? बिहार में देख ली कांग्रेस की दुर्गति। क्या परिवार भक्ति में देश को आग में झोंकना चाहती है कांग्रेस? डायन भी दस घर छोड़ देती है लेकिन इतने साल देश पर राज करनी वाली पार्टी ही देश को बर्बाद करने उत्तेजक बयान दे रही है। क्या सत्ता नहीं मिलने की वजह से देश की संवैधानिक संस्थाओं को धमकाओगे? कहाँ है राहुल को जमानत देने वाले जज? अगर कांग्रेस का यही हाल रहा वो दिन भी दूर नहीं होगा जब सुप्रीम कोर्ट तक आग की चिंगारियां पहुंचेंगी। कांग्रेस को ऐसी गन्दी सियासत को छोड़ना होगा नहीं तो देखते हैं कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील राहुल ठोकेगा या प्रियंका? 
यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन राहुल और प्रियंका जिस आग को लगा रहे थे लग गयी और ये जा रही कांग्रेस कार्यालय, राहुल और प्रियंका के बंगलों में और ये वो आग जिसे कोई फायर ब्रिगेड भी बुझा पाएगी। क्योकि इस आग को लगा रहा समाज का बुद्धिजीवी वर्ग।    
अभी भी समय है कांग्रेस संभल जाए। अभी तो 272 पूर्व जजों-ब्यूरोक्रेट्स ने जेताया है, सुप्रीम कोर्ट को इसका संज्ञान लेना चाहिए। अगर भड़काऊ भाषा नहीं बदली यही लिस्ट हज़ारों में, लाखों में और बहुत जल्दी करोड़ों में पहुँच जाएगी। इस संकेत को समझे कांग्रेस। बहुत गंभीर संकेत है। देश की और जनता की असली समस्यों को उठाओ नाकि संवैधानिक संस्थाओं में बैठे अधिकारियों और उनके परिवारों को बलि का बकरा बनाया जाए।         
कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग के खिलाफ की जा रही बयानबाजी को लेकर 272 हस्तियों ने खुला खत लिखा है। इन हस्तियों ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी द्वारा चुनाव आयोग पर बार-बार किए जा रहे हमलों को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की है। इन हस्तियों में 16 जज, 14 राजदूतों सहित 123 सेवानिवृत्त नौकरशाह और 133 सेवानिवृत्त सशस्त्र बल अधिकारी शामिल हैं।

पत्र में क्या कहा गया है?

इसमें कहा गया है, “भारत का लोकतंत्र किसी हथियार से नहीं बल्कि उसकी बुनियादी संस्थाओं के खिलाफ फैल रही जहरीली बयानबाजी से चोट खा रहा है। कुछ राजनीतिक नेता असली नीतियों का विकल्प देने के बजाय, बिना सबूत के गंभीर आरोप लगाते रहते हैं।” पत्र में आगे लिखा है, “पहले उन्होंने भारतीय सेना की बहादुरी पर सवाल उठाए, फिर न्यायपालिका, संसद और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को निशाना बनाया और अब चुनाव आयोग की बारी आ गई है।”

पत्र में राहुल गाँधी पर सीधा हमला करते हुए लिखा गया है, “लोकसभा में विपक्ष के नेता ने बार-बार चुनाव आयोग पर हमला करते हुए दावा किया है कि उनके पास सबूत है कि चुनाव आयोग वोट चोरी करा रहा है और उनकी बात 100% प्रमाणित है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त रिटायर भी हो जाएँ, तो वह उन्हें भी छोड़ेंगे नहीं।” क्या मतलब है इस धमकी का?  

आगे पत्र में कहा गया है, “इतने गंभीर आरोप लगाने के बावजूद उन्होंने अब तक कोई औपचारिक शिकायत, या शपथपत्र के साथ, दर्ज नहीं कराई। जिससे उन्हें अपनी बात के लिए जवाबदेह न होना पड़े।” राहुल और राहुल के सलाहकार अच्छी तरह जानते हैं कि जिस दिन औपचारिक शिकायत, या शपथपत्र के साथ, दर्ज करवा दी और गलत साबित हो गयी कोई कपिल, सिंघवी या फिर प्रशांत जेल जाने से रोक नहीं पाएगा। ये Hit and run पॉलिसी कांग्रेस को पाताल लोक पहुंचा रही है। इस पत्र में कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों, वामपंथी झुकाव वाले NGOs और कई अन्य लोगों की EC के खिलाफ तीखी भाषा को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

पत्र में कहा गया, “चुनाव आयोग ने अपनी SIR प्रक्रिया सार्वजनिक की है, कोर्ट से अनुमति लेकर सत्यापन कराया है, फर्जी नाम हटाए हैं और नए योग्य मतदाता जोड़े हैं। इससे साफ लगता है कि ये आरोप एक राजनीतिक हार को संकट का नाम देने की कोशिश है।”

पत्र में कहा गया है, “यह व्यवहार ‘बौखलाए हुए गुस्से’ की निशानी है जो लगातार चुनावी हार और जनता से दूर हो जाने के कारण पैदा हुआ है। जब नेता जनता की आकांक्षाओं को समझ नहीं पाते, तो वे अपनी कमियों को सुधारने की जगह संस्थाओं पर हमला करना शुरू कर देते हैं। गंभीर विश्लेषण की जगह ड्रामा ले लेता है।”

इसमें आगे लिखा है, “विडंबना यह है कि जब कुछ राज्यों में चुनाव नतीजे विपक्षी दलों के पक्ष में आते हैं, तब चुनाव आयोग पर कोई सवाल नहीं उठता। जहाँ नतीजे उनके पक्ष में नहीं आते, वहीं आयोग हर कहानी का खलनायक बन जाता है। इस तरह का गुस्सा केवल अवसरवाद दिखाता है।”

पत्र में लोगों से चुनाव आयोग के साथ खड़ा होने को कहा गया है। इसमें लिखा है, “अब समय है कि देश के लोग चुनाव आयोग के साथ मजबूती से खड़े हों चापलूसी के लिए नहीं बल्कि विश्वास और सिद्धांत के कारण। समाज को यह माँग उठानी चाहिए कि नेता बेबुनियाद आलोचनाओं और नाटकीय भाषणबाजी से इस संस्था को बदनाम न करें।”

इसमें कहा गया है, “एक बड़ा सवाल यह भी है कि देश की मतदाता सूची में कौन होना चाहिए। नकली वोटर, फर्जी लोग, गैर-नागरिक या वे जिनका भारत के भविष्य से कोई वैध संबंध नहीं उन्हें सरकार चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनावों में शामिल होने देना देश की संप्रभुता और स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है। दुनिया के बड़े लोकतंत्र भी अवैध प्रवासियों के मामले में बहुत सख्त होते हैं।”

पत्र लिखने वाले लोगों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और NGT के चैयरमेन आर्दश कुमार गोयल, संजीव त्रिपाठी पूर्व RAW प्रमुख और NIA के पूर्व डायरेक्टर योगेश चंदेर मोदी जैसे लोग भी शामिल हैं।

अडानी पर सुप्रीम कोर्ट ने वामपंथी मंडली का तो जैसे “गर्भपात” कर दिया ; ये केस चलना ही गलत था

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के CJI डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने अडानी पर हिंडेनबर्ग की “फर्जी” रिपोर्ट में लगाए गए सभी आरोपों पर क्लीन चिट दे दी और वामपंथी याचिकाकर्ताओं की CBI और SIT से जांच की मांग खारिज कर दी। अदालत ने SEBI की जांच में कोई खामी नहीं पाई और साफ़ कहा कि मीडिया और OCCPR जैसी “थर्ड पार्टी” की “unverified” रिपोर्ट को SEBI की जांच पर उंगली उठाने का आधार नहीं माना जा सकता 

ज्ञात हो, भारत में उद्योगपतियों का शुरू से बोलबाला रहा है। ब्रिटिश युग में भारत में दो उद्योगपतियों सेठ छुन्ना मल और सत्यनारायण गुड़वाले, स्वतन्त्रता के बाद आगमन हुआ, टाटा और बिरला का और अब कुछ समय से अम्बानी और अडानी। यानि ब्रिटिश युग से लेकर आज तक हर सरकार, सरकार किसी भी पार्टी की हो, उद्योगपतियों के इर्दगिर्द ही घूमती दिखी है। लेकिन अम्बानी और अडानी का विरोध केवल इसलिए हो रहा है कि केंद्र में मोदी सरकार है। जबकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार नहीं है, वहां की सरकारों द्वारा अम्बानी और अडानी के निवेश से मुंह नहीं मोड़ा, कहने का मतलब केवल इतना ही है कि मोदी-योगी-अमित के विरोध में विपक्ष असली मुद्दों से भटक, इन उद्योगपतियों के विरोध में उतर जनता को गुमराह कर रही है। 

करीब एक वर्ष पहले जब George Soros प्रायोजित हिंडेनबर्ग रिपोर्ट अडानी को निशाना बनाने के लिए राहुल कालनेमि & कंपनी लेकर आई और प्रशांत भूषण समेत कांग्रेस और वामपंथी मंडली ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके विधवा विलाप किया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने जांच बिठा कर इस मंडली को “उम्मीद” से कर दिया था - बस ये मंडली प्रतीक्षा में बैठी थी कि कब सुप्रीम कोर्ट का फैसला अडानी के खिलाफ आए और उनकी “delivery” हो लेकिन आज के फैसले ने तो उस मंडली का जैसे “गर्भपात” ही कर दिया -

X पर इस वामपंथी मंडली के लोगों का विधवा विलाप देखिए कैसे तड़प रहे हैं और कैसे चंद्रचूड़ को कोस रहे हैं - कुछ तो मोदी को “पनौती” बता रहे हैं जबकि सच्चाई तो यह है कि चीन से लेकर अमेरिका के सभी उन लोगों के लिए अडानी स्वयं एक “पनौती” बन गया जिसे ये सब उखाड़ फेंकना चाहते थे - महुआ मोइत्रा की तो अडानी की “पनौती” नौकरी ही ले गई -

लेखक 

वामपंथी मंडली बस यह चाहती है कि इधर इसके लोग सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाएं और उधर तुरंत अदालत मोदी की बिना सोचे समझे one two three कर दे - 

जो फैसला हुआ वह अच्छा हुआ परंतु मैं ऐसा पहले भी लिख चुका हूं और आज फिर कहता हूं कि अडानी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को यह जांच बैठाने की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि जो हिंडनबर्ग और मीडिया रिपोर्ट को ख़ारिज करने का आधार अदालत ने आज बताया है, वह उस दिन भी था जब याचिका दायर हुई थी - इसलिए यह याचिका उस दिन सुनवाई के लिए स्वीकार ही नहीं होनी चाहिए थी -

सुप्रीम कोर्ट ने अडानी के खिलाफ याचिका सुनवाई के स्वीकार करते हुए एक शक का बीज तो पैदा कर ही दिया जिससे हिंडनबर्ग की रिपोर्ट की वजह से पहले से नुकसान झेल रहे अडानी को और ज्यादा नुकसान हुआ - जब Third Party और media की रिपोर्ट भरोसे के काबिल थी ही नहीं तो जांच का मतलब ही नहीं था - लेकिन सुप्रीम कोर्ट को भी हर मामले में “पंचायत” लगाने का चसका लगा हुआ है -

अभी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में विशाल तिवारी वकील ने लगाई है जिसमें उसने 3 आपराधिक कानूनों को चुनौती दी है और आधार बनाने के लिए कहा है कि संसद के जब 150 सदस्य निलंबित थे तो कानून पास करना गलत है - सुप्रीम कोर्ट को इस याचिका को सुनने के लिए स्वीकार करने से पहले फैसला कर लेना चाहिए कि क्या वह इमरजेंसी में संसद द्वारा पास किये गए सभी कानूनों को खारिज कर सकती है क्योंकि उस समय में सांसद “निलंबित” नहीं थे बल्कि जेल में ठूंस दिए गए थे - 

एक याचिका “secular socialist” शब्द संविधान में जोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अभी भी लंबित है - इसलिए कहता हूं हर मामले में टांग अड़ाना बंद कीजिए, वकीलों का गिरोह काम कर रहा है, उस पर लगाम लगनी चाहिए  

कश्मीर विश्वविद्यालय का हिंदू विरोधी अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के साथ समझौता

कश्मीर विश्वविद्यालय ने हाल ही में क्वालिटी एजुकेशन को बढ़ावा देने के नाम पर पर हिंदू विरोधी अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के साथ समझौता किया है। क्वालिटी एजुकेशन के नाम पर किया गया यह गठबंधन देश के लिए अच्छा नहीं है क्योंकि अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय से जुड़े ज्यादातर प्रोफेसर इस्लामिक कट्टरपंथी को बढ़ावा देते हैं वहीं हिंदू विरोध को हवा देते रहे हैं और देश में नफरत का माहौल बनाने में योगदान देते रहे हैं। कश्मीर विश्वविद्यालय, अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय बैंगलोर और श्रीनगर नगर निगम (एसएमसी) ने 83 चिन्हित प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ावा देने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इस तरह छोटे बच्चों में हिंदुओं के खिलाफ राजनीतिक पक्षपात और नफरत की भावना भरना निकट भविष्य में कश्मीर में एक नई समस्या को जन्म दे सकती है।

इस त्रिपक्षीय एमओयू में तीन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में संयुक्त सहयोग की बात कही गई है। जिसमें एसएमसी कोर ग्रुप के साथ विजन वर्कशॉप, जोनल शिक्षा अधिकारियों, स्कूल लीडर्स और स्कूल शिक्षकों के लिए निरंतर व्यावसायिक विकास कार्यक्रम शामिल हैं। इसके अलावा एसएमसी के दायरे में काम करने वाले इन स्कूलों के लिए पाठ्यपुस्तकों जैसी शैक्षणिक सामग्री का विकास शामिल है।

इस समझौते के तहत कश्मीर विश्वविद्यालय मॉड्यूल को अंतिम रूप देने और प्रासंगिक बनाने के लिए सभी शैक्षणिक और तकनीकी सहायता प्रदान करेगा वहीं अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय पहल के लिए आवश्यक तकनीकी संसाधन लाएगा। एसएमसी अपनी ओर से वांछित उद्देश्यों की प्राप्ति में आवश्यक सहायता प्रदान करेगी।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय इस्लामिक कटटरपंथियों के साथ 

इस्लामिक कटटरपंथियों ने षड्यंत्र कर हिन्दू छात्र को निलंबित करवाया

हिंदूपोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु के अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में एक आश्चर्यजनक घटना घटी है, एक हिन्दू छात्र ऋषि तिवारी ने आरोप लगाया है कि इस्लामिक कटटरपंथियों और वामपंथी छात्रों ने उसके साथ भेदभाव किया, और उसके हिन्दू होने के कारण उन्हें परेशान किया। इन लोगों ने षड्यंत्र रच कर विश्वविद्यालय प्रशासन को प्रभावित किया, जिस कारण 2 मई, 2022 को, कॉलेज प्रशासन ने ऋषि को भविष्य की अकादमिक गतिविधियों में भाग लेने से निष्कासित कर दिया है।

ऋषि तिवारी उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के बल्लन गांव के रहने वाले एमए विकास विषय के स्नातकोत्तर छात्र हैं। उनके अनुसार, 2020 में अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने के पश्चात उन्हें हिंदू होने के कारण परिसर में भेदभाव का सामना करना पड़ा है। तिवारी को संस्थान के प्रोफेसरों और अन्य शिक्षण कर्मचारियों द्वारा उनके बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध होने पर भी निशाना बनाया जाता रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की हिंदू विरोधी मानसिकता

छोटे बच्चों के दिमाग में जहर घोला जाएगा तो भविष्य क्या होगा 

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के शिक्षकों और प्राध्यापकों की विचारधारा को खंगाले तो पाएंगे कि उनमें से लगभग सभी वामपंथी विचारधारा के हैं और उनमें से कई हिंदुओं के प्रति घृणा से भरे हुए हैं। इनमें से कुछ बहुत ही जातिवादी हैं और वे भारत में जाति व्यवस्था पर हमले लोगों को भड़काने का काम करते रहते हैं। इस तरह की मानसिकता के साथ अगर वे छोटी उम्र के छात्रों के दिमाग में नफरत का जहर घोलेंगे तो सोचिए भविष्य क्या होगा।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय से जुड़ी प्रोफेसर के कल्याणी हिंदू विरोधी भावना जाहिर करती रही हैं। हिंदू धर्म के खिलाफ उनकी नफरत को समझने के लिए उनके ट्वीट और रीट्वीट को देख सकते हैं।

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक और असिस्टेंट प्रोफेसर समीरा जुनैद भी पीएम मोदी की आस्था पर व्यंग्य करने के साथ ही हिंदू विरोध पर अपनी टिप्पणी करती रही हैं।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में एक अन्य संकाय सदस्य सृष्टि यादव हैं और वह भी हिंदू विरोधी टिप्पणी करती रहती हैं।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय एक अन्य संकाय सदस्य आनंद श्रीवास्तव भी हिंदू विरोधी मानसिकता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने तो बाकायदा पेपर लिखा है- हिंदू-मुस्लिम दंगा से राज्यों के चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ जाता है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के पूर्व संकाय सदस्य आकाश भी हिंदू विरोधी हैं। ऐसा लगता है कि आकाश अब सीपीआईएम का पूर्णकालिक सदस्य बन गए है!

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के पूर्व संकाय सदस्य आकाश भी हिंदू विरोधी हैं। ऐसा लगता है कि आकाश अब सीपीआईएम का पूर्णकालिक सदस्य बन गए है!

अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में भौतिकी के शिक्षक प्रोटीक मल्लिक से मिलें। वह भी उसी इकोसिस्टम का हिस्सा हैं। उन्होंने सीमा चिश्ती के बाबरी ढांचे से जुड़े लेख को अपने सोशल मीडिया से शेयर किया है। इससे उनकी मानसिकता समझी जा सकती है।  

अब अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में एक और फैकल्टी अप्रिल हुसैन से मिलिए और उनके ट्वीट और रीट्वीट देखें! इसे सीएए, एनआरसी, एनपीआर पर उनके ट्वीट से समझा जा सकता है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में अगले प्रोफेसर सुक्रीत नागपाल से मिलिए। सोशल मीडिया पर उनके ट्वीट में हिंदुओं के खिलाफ नफरत साफ देखा जा सकता है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो हिंदू विरोधी हैं। ये सभी लोग नफरत से भरे हुए हैं। जरा सोचिए इन लोगों द्वारा अगर छोटे उम्र के छात्रों का ब्रेनवाश किया जाएगा तो भविष्य क्या होगा।

इससे यह भी पता चलता है कि अजीम प्रेमजी सिर्फ वामपंथी प्रचार वेबसाइटों को फंडिंग देने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय हिंदू द्वेषी लोगों से भरा पड़ा है! वे हिंदू विरोधी और नफरत का भाव भरने वाले एक भावी पीढ़ी का निर्माण कर रहे हैं और इसके बारे में कोई नहीं जानता!