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उत्तर प्रदेश : कलावा बाँध छिपाई पहचान, ईरम ने ‘महक’ नाम रखकर किया आकाओं के लिए काम: भारत में ISI कैसे खेल रहा जासूसी वाला खेल, वामपंथी सिर्फ हिंदुओं को बदनाम करने में जुटे

                                 हिंदू नाम की आड़ में जासूसी करने वालों से कौन पूछेगा धर्म?
गाजियाबाद से सामने आया जासूसी नेटवर्क सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि उस नैरेटिव पर भी सीधा निशाना है जो एक खास दिशा में गढ़ा जाता रहा है। यह मामला बताता है कि सच्चाई कितनी परतों में छिपी होती है और कैसे उसे चुन-चुनकर तोड़ा-मरोड़ा जाता है।

हिन्दुओं को आतंकवादी हरकतों में बदनाम करने का पाकिस्तान ही नहीं भारत में सनातन विरोधी का बहुत गहरा रिश्ता है। अगर कसाब जिन्दा नहीं पकड़ा गया होता हिन्दू आतंकवाद और भगवा आतंकवाद कहकर हिन्दुत्व को बदनाम करने वाले हिन्दू विरोधी पीछे नहीं हटते। भारत में पाकिस्तान के स्लीपर सेल ही नहीं हिन्दुत्व का चोला ओढे कालनेमियों की भी कमी नहीं। टीवी पर एक से बढ़कर एक श्लोक/चौपाई सुनाकर लोगों को भ्रमित करने वाले ही हिन्दुत्व और देश के दुश्मन हैं। मुस्लिम की मौत होने पर कोहराम मचाते हैं लेकिन जब किसी हिन्दू की मोबलीचिंग में हत्या होने पर इन सबकी बोलती ऐसे बंद रहती है जैसे कि इनके घरों में शोक हो।   

कौशांबी और साहिबाबाद से पकड़े गए इस गिरोह के तार सीधे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े मिले। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि ये लोग जासूसी कर रहे थे, बल्कि यह थी कि ये सब हिंदू नाम और पहचान की आड़ लेकर भारत के खिलाफ काम कर रहे थे। सरफराज ने खुद को जोरा सिंह बना लिया, शहजाद ने भट्टी और वकार ने विक्की जट नाम रख लिया। कौशांबी से पकड़े गए सुहेल ने खुद का नाम रोमियो, नौशाद ने लालू, समीर ने शूटर और एक औरत साने इरम बन गई महक।

यह सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं था। सुहेल कलावा बाँधता था, गले में रुद्राक्ष पहनता था, माथे पर टीका लगाता था। नौशाद और समीर भी इसी तरह की हिंदू पहचान लेकर घूमते थे। यानी साजिश यह थी कि हिंदू बनकर जासूसी करो और हिंदुओं का भरोसा जीतो और फिर उनसे भी जासूसी करवाओ। क्योंकि इस गिरोह में युवक गणेश और महिला मीरा का भी नाम सामने आया।

अब जब गाजियाबाद का पूरा नेटवर्क खुलकर सामने आ चुका है और साफ दिख रहा है कि किस तरह हिंदू नाम और पहचान को ढाल बनाकर जासूसी की जा रही थी, तब वे लोग कहाँ चले गए जो हर बार हिंदू नाम देखते ही उछल पड़ते हैं? वही लोग जो किसी एक नाम के आधार पर पूरी चर्चा का रुख मोड़ देते हैं, इस संगठित साजिश पर चुप रहे। न तो मजहब के आधार पर हेडलाइन बनी, न कोई किसी मजगब को निशाना बनाया गया और यहाँ तक कि देश हित में भी सवाल नहीं पूछे गए। यही बताता है कि समस्या नजरिए की है।

राजस्थान का ही मामला सामने रखिए। एयरफोर्स में काम करने वाला प्राइवेट कर्मचारी सुमित कुमार जासूसी के आरोप में पकड़ा गया। रिपोर्ट्स में साफ बताया गया कि उसका ब्रेनवॉश पाकिस्तानी हैंडलर्स ने किया था और उसे इसलिए चुना गया क्योंकि वह हिंदू था। उससे सत्संग और धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए दूसरे हिंदुओं को ब्रेनवॉश करवाने की योजना बनाई गई। यानी यहाँ भी एक बड़ी साजिश थी, जिसमें हिंदू पहचान का इस्तेमाल एक औजार की तरह किया जा रहा था।  

लेकिन जैसे ही सुमित कुमार का नाम सामने आया, मीडिया और सोशल मीडिया पर वामपंथी अकाउंट्स ने बिना देर किए हेडलाइन बना दी- हिंदू निकला पाकिस्तानी जासूस। न कोई गहराई देखी गई, न कोई सोर्स जाँचा गया, न यह सवाल कि उसके पीछे कौन है? बस नाम देखा और हिंदुओं को बदनाम करने का पूरा नैरेटिव सेट कर दिया।

ये दो मामले सामने रखकर देखा जाए तो यही दोहरा रवैया सामने आ जाता है। जब गाजियाबाद में पूरा जासूसी नेटवर्क हिंदू नाम की आड़ में काम करता पकड़ा गया, तब यह बात नहीं उठती कि यह हिंदुओं को बदनाम करने की साजिश है। तब यह नहीं कहा जाता कि देखो कैसे हिंदू पहचान का इस्तेमाल ढाल की तरह किया जा रहा है। लेकिन जैसे ही ऐसे मामलों में एक व्यक्ति का नाम हिंदू निकलता है, पूरी कहानी उसी पर टिक जाती है।

क्या कभी यह सवाल उठाया जाएगा कि जिन पाकिस्तानी आकाओं के इशारों पर ये सारे लोग काम कर रहे थे, उनकी मजहबी पहचान क्या है? क्या तब भी उतनी ही तेजी से हेडलाइन बनेगी? या फिर वहाँ चुप्पी ही साध ली जाएगी?

समस्या यह है कि कुछ लोगों के लिए सच्चाई मायने नहीं रखती, उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका हिंदुओं को घेरने का, उन्हें कटघरे में खड़ा करने का। और जैसे ही ऐसा कोई मौका दिखता है, पूरा इकोसिस्टम एक्टिव हो जाता है। तथ्यों की जाँच बाद में होती है, पहले फैसला सुना दिया जाता है।

गाजियाबाद का मामला इस पूरे खेल को उजागर करता है। यह दिखाता है कि कैसे दुश्मन ताकतें सिर्फ सीमापार पर ही नहीं, बल्कि भारत की धार्मिक समाज के भीतर घुसकर भी काम कर रही हैं। और उससे भी ज्यादा खतरनाक यह है कि उनके इस खेल में देश की गिनी-चुनी मीडिया और वामपंथी लोग अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

गाजियाबाद की घटना एक चेतावनी है, हिंदुओं के लिए। यह उस सोच के लिए भी जो हर बार एक ही दिशा में देखने की आदत डाल चुकी है। अग अब भी यह नहीं समझा गया, तो अगली बार कोई और ‘हिंदू नाम’ फिर से इस्तेमाल होगा और कहानी फिर से उसी तरह मोड़ी जाएगी।