Showing posts with label #Supreme- Court. Show all posts
Showing posts with label #Supreme- Court. Show all posts

अडानी पर सुप्रीम कोर्ट ने वामपंथी मंडली का तो जैसे “गर्भपात” कर दिया ; ये केस चलना ही गलत था

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट के CJI डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने अडानी पर हिंडेनबर्ग की “फर्जी” रिपोर्ट में लगाए गए सभी आरोपों पर क्लीन चिट दे दी और वामपंथी याचिकाकर्ताओं की CBI और SIT से जांच की मांग खारिज कर दी। अदालत ने SEBI की जांच में कोई खामी नहीं पाई और साफ़ कहा कि मीडिया और OCCPR जैसी “थर्ड पार्टी” की “unverified” रिपोर्ट को SEBI की जांच पर उंगली उठाने का आधार नहीं माना जा सकता 

ज्ञात हो, भारत में उद्योगपतियों का शुरू से बोलबाला रहा है। ब्रिटिश युग में भारत में दो उद्योगपतियों सेठ छुन्ना मल और सत्यनारायण गुड़वाले, स्वतन्त्रता के बाद आगमन हुआ, टाटा और बिरला का और अब कुछ समय से अम्बानी और अडानी। यानि ब्रिटिश युग से लेकर आज तक हर सरकार, सरकार किसी भी पार्टी की हो, उद्योगपतियों के इर्दगिर्द ही घूमती दिखी है। लेकिन अम्बानी और अडानी का विरोध केवल इसलिए हो रहा है कि केंद्र में मोदी सरकार है। जबकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार नहीं है, वहां की सरकारों द्वारा अम्बानी और अडानी के निवेश से मुंह नहीं मोड़ा, कहने का मतलब केवल इतना ही है कि मोदी-योगी-अमित के विरोध में विपक्ष असली मुद्दों से भटक, इन उद्योगपतियों के विरोध में उतर जनता को गुमराह कर रही है। 

करीब एक वर्ष पहले जब George Soros प्रायोजित हिंडेनबर्ग रिपोर्ट अडानी को निशाना बनाने के लिए राहुल कालनेमि & कंपनी लेकर आई और प्रशांत भूषण समेत कांग्रेस और वामपंथी मंडली ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके विधवा विलाप किया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने जांच बिठा कर इस मंडली को “उम्मीद” से कर दिया था - बस ये मंडली प्रतीक्षा में बैठी थी कि कब सुप्रीम कोर्ट का फैसला अडानी के खिलाफ आए और उनकी “delivery” हो लेकिन आज के फैसले ने तो उस मंडली का जैसे “गर्भपात” ही कर दिया -

X पर इस वामपंथी मंडली के लोगों का विधवा विलाप देखिए कैसे तड़प रहे हैं और कैसे चंद्रचूड़ को कोस रहे हैं - कुछ तो मोदी को “पनौती” बता रहे हैं जबकि सच्चाई तो यह है कि चीन से लेकर अमेरिका के सभी उन लोगों के लिए अडानी स्वयं एक “पनौती” बन गया जिसे ये सब उखाड़ फेंकना चाहते थे - महुआ मोइत्रा की तो अडानी की “पनौती” नौकरी ही ले गई -

लेखक 

वामपंथी मंडली बस यह चाहती है कि इधर इसके लोग सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाएं और उधर तुरंत अदालत मोदी की बिना सोचे समझे one two three कर दे - 

जो फैसला हुआ वह अच्छा हुआ परंतु मैं ऐसा पहले भी लिख चुका हूं और आज फिर कहता हूं कि अडानी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट को यह जांच बैठाने की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि जो हिंडनबर्ग और मीडिया रिपोर्ट को ख़ारिज करने का आधार अदालत ने आज बताया है, वह उस दिन भी था जब याचिका दायर हुई थी - इसलिए यह याचिका उस दिन सुनवाई के लिए स्वीकार ही नहीं होनी चाहिए थी -

सुप्रीम कोर्ट ने अडानी के खिलाफ याचिका सुनवाई के स्वीकार करते हुए एक शक का बीज तो पैदा कर ही दिया जिससे हिंडनबर्ग की रिपोर्ट की वजह से पहले से नुकसान झेल रहे अडानी को और ज्यादा नुकसान हुआ - जब Third Party और media की रिपोर्ट भरोसे के काबिल थी ही नहीं तो जांच का मतलब ही नहीं था - लेकिन सुप्रीम कोर्ट को भी हर मामले में “पंचायत” लगाने का चसका लगा हुआ है -

अभी एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में विशाल तिवारी वकील ने लगाई है जिसमें उसने 3 आपराधिक कानूनों को चुनौती दी है और आधार बनाने के लिए कहा है कि संसद के जब 150 सदस्य निलंबित थे तो कानून पास करना गलत है - सुप्रीम कोर्ट को इस याचिका को सुनने के लिए स्वीकार करने से पहले फैसला कर लेना चाहिए कि क्या वह इमरजेंसी में संसद द्वारा पास किये गए सभी कानूनों को खारिज कर सकती है क्योंकि उस समय में सांसद “निलंबित” नहीं थे बल्कि जेल में ठूंस दिए गए थे - 

एक याचिका “secular socialist” शब्द संविधान में जोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अभी भी लंबित है - इसलिए कहता हूं हर मामले में टांग अड़ाना बंद कीजिए, वकीलों का गिरोह काम कर रहा है, उस पर लगाम लगनी चाहिए