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प्रधानमंत्री मोदी का संविधान दिवस पर खुला पत्र: कर्तव्य पालन और लोकतांत्रिक भागीदारी बढ़ाने की अपील


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संविधान दिवस के अवसर पर आज 26 नवंबर को देशवासियों को संबोधित करते हुए एक खास पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने 1949 में संविधान के अंगीकार की 76वीं वर्षगांठ को याद किया है। इसमें उन्होंने संविधान की महत्ता और उसके देश के विकास में स्थायी भूमिका पर प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2015 में सरकार ने इस पवित्र दस्तावेज के सम्मान में 26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित किया था। प्रधानमंत्री ने कहा कि संविधान की शक्ति ने सामान्य परिवार से आने वाले व्यक्ति को भी देश का नेतृत्व करने का अवसर दिया है। इस विशेष अवसर पर उन्होंने नागरिकों से अपने संवैधानिक कर्तव्यों को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया। उन्होंने विशेष रूप से पहली बार वोट देने वाले युवाओं का सम्मानित कर उन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संविधान हमें अधिकारों के साथ-साथ हमारे कर्तव्यों की भी याद दिलाता है, जो एक मजबूत लोकतंत्र की आधारशिला हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने एक पोस्ट में उन्होंने लिखा है कि “संविधान दिवस पर मैंने देशभर के अपने परिवारजनों के नाम एक पत्र लिखा है। इसमें हमारे संविधान की महानता, जीवन में मौलिक कर्तव्यों का महत्त्व और हमें पहली बार मतदाता बनने का उत्सव क्यों मनाना चाहिए, ऐसे कई विषयों पर अपने विचार साझा किए हैं… “

संविधान दिवस पर प्रधानमंत्री का पत्र:-

‘मेरे प्रिय देशवासी,

नमस्कार!

26 नवंबर हर भारतीय के लिए बहुत गौरवशाली दिन है। इसी दिन 1949 में संविधान सभा ने भारत के संविधान को अंगीकार किया था। इसलिए एक दशक पहले, साल 2015 में NDA सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था।

हमारा संविधान एक ऐसा पवित्र दस्तावेज है, जो निरंतर देश के विकास का सच्चा मार्गदर्शक बना हुआ है। ये भारत के संविधान की ही शक्ति है जिसने मुझ जैसे गरीब परिवार से निकले साधारण व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचाया है। संविधान की वजह से मुझे 24 वर्षों से निरंतर सरकार के मुखिया के तौर पर काम करने का अवसर मिला है। मुझे याद है, साल 2014 में जब मैं पहली बार संसद भवन में प्रवेश कर रहा था, तो सीढ़ियों पर सिर झुकाकर मैंने लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को नमन किया। साल 2019 में जब चुनाव परिणाम के बाद मैं संसद के सेंट्रल हॉल में गया था, तो सहज ही मैंने संविधान को सिर माथे लगा लिया था।

संविधान दिवस पर हम डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद समेत उन सभी महान विभूतियों का स्मरण करते हैं, जिन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में अपना अहम योगदान दिया है। डॉक्टर बाबासाहेब अम्बेडकर की भूमिका को भी हम सभी याद करते हैं, जिन्होंने असाधारण दूरदृष्टि के साथ इस प्रक्रिया का निरंतर मार्गदर्शन किया। संविधान सभा में कई प्रतिष्ठित महिला सदस्य भी थीं, जिन्होंने अपने प्रखर विचारों और दृष्टिकोण से हमारे संविधान को समृद्ध बनाया।

साल 2010 में जब संविधान के 60 वर्ष हुए थे, तब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था। हमने संविधान के प्रति कृतज्ञता और निष्ठा प्रकट करने के लिए एक प्रयास किया। 2010 के उस साल में गुजरात में ‘संविधान गौरव यात्रा’ निकाली गई थी। इस पवित्र ग्रंथ की प्रतिकृति को एक हाथी के ऊपर रखकर मैंने उस भव्य यात्रा की अगुवाई की थी।

जब संविधान के 75 वर्ष पूरे हुए, तो ये हमारी सरकार के लिए ऐतिहासिक अवसर बनकर आया। हमें देशभर में विशेष अभियान चलाने का सौभाग्य मिला। संविधान के 75 वर्ष होने पर हमारी सरकार ने संसद का विशेष सत्र आयोजित किया और राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान भी चलाया। ये अभियान जन-भागीदारी का बड़ा उत्सव बन गया।

इस वर्ष का संविधान दिवस कई कारणों से विशेष है:

यह वर्ष सरदार पटेल जी और भगवान बिरसा मुंडा जी की 150वीं जयंती का है। सरदार पटेल जी के नेतृत्व और सूझबूझ ने देश का राजनीतिक एकीकरण सुनिश्चित किया। ये सरदार पटेल जी की ही प्रेरणा है जिसने हमारी सरकार को जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 की दीवार गिराने के लिए प्रेरित किया। आर्टिकल 370 हटने के बाद वहां भारत का संविधान पूरी तरह लागू हो गया है और लोगों को संविधान प्रदत्त सभी अधिकार मिले हैं।

भगवान बिरसा मुंडा जी का जीवन आज भी हमें जनजातीय समुदाय के लिए न्याय, गरिमा और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने की प्रेरणा देता है।
इस साल हम वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव भी मना रहे हैं। वंदे मातरम हर दौर में प्रासंगिक रहा है। इसके शब्दों में हम भारतीयों के सामूहिक संकल्प की गूंज निरंतर सुनाई देती रही है। इस वर्ष हम श्री गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के 350वें वर्ष को भी मना रहे हैं। उनका जीवन और शहादत की गाथा आज भी हमें प्रेरित करती है।

इन सभी का जीवन हमें उस कर्तव्य को सर्वोपरि रखने की प्रेरणा देता है, जिसे हमारे संविधान ने भी सबसे अहम बताया है। हमारे संविधान का आर्टिकल 51A मौलिक कर्तव्यों को समर्पित है। ये कर्तव्य हमें सामाजिक और आर्थिक प्रगति प्राप्त करने का रास्ता दिखाते हैं। महात्मा गांधी ने हमेशा नागरिकों के कर्तव्यों पर बल दिया था। वे मानते थे कि जब हम ईमानदारी से कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो हमें अधिकार भी स्वत: मिल जाते हैं।

देखते ही देखते इस सदी के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब आने वाला समय हमारे लिए और भी महत्वपूर्ण है। साल 2047 तक आजादी के 100 वर्ष हो जाएंगे। साल 2049 में संविधान निर्माण के 100 वर्ष पूरे हो जाएंगे। हम आज जो नीतियां बनाएंगे, जो निर्णय लेंगे, उसका प्रभाव आने वाले वर्षों पर…आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। हमारे सामने विकसित भारत का लक्ष्य है इसलिए हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि रखते हुए ही आगे बढ़ना है।

हमें राष्ट्र के प्रति, समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना होगा। देश ने हमें कितना कुछ दिया है। इसके लिए हम सबके मन में कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। जब हम इस भावना से जीवन जीते हैं, तो कर्तव्य अपने आप जीवन का स्वभाव बन जाता है। अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए हमें अपने हर काम को पूरी क्षमता और पूरी निष्ठा से करने का प्रयास करना होगा। हमारा हर कार्य संविधान की शक्ति बढ़ाने वाला हो। हमारा हर कार्य देशहित से जुड़े उद्देश्यों को पूरा करने वाला हो। हमारे संविधान निर्माताओं ने जो सपने देखे थे, उन्हें पूरा करने का दायित्व हम सबका है। जब हम अपने काम को कर्तव्य की भावना के साथ करेंगे तो देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति कई गुना बढ़ जाएगी।

संविधान ने हमें मतदान का अधिकार दिया है। एक नागरिक के तौर पर हमारा कर्तव्य है कि मतदान का कोई अवसर छोड़े नहीं। हमें 26 नवंबर को स्कूलों में, कॉलेजों में उन युवाओं के लिए विशेष सम्मान समारोह आयोजित करने चाहिए, जो 18 वर्ष के हो रहे हैं। हमें उन्हें यह महसूस कराना चाहिए कि वे अब केवल छात्र या छात्रा नहीं, बल्कि नीति निर्माण की प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी हैं। स्कूलों में हर वर्ष 26 नवंबर को फर्स्ट-टाइम वोटर्स का सम्मान करने की परंपरा विकसित होनी चाहिए। जब हम इस तरह युवाओं में जिम्मेदारी और गर्व का भाव जगाएंगे, तो वे जीवनभर लोकतंत्र के मूल्यों के प्रति समर्पित रहेंगे। यही समर्पण एक सशक्त राष्ट्र की नींव बनता है।

आइए, इस संविधान दिवस पर हम अपने महान राष्ट्र के कर्तव्यनिष्ठ नागरिक के रूप में अपने दायित्वों का पालन करने का संकल्प दोहराएं। ऐसा करके ही हम विकसित और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम योगदान दे सकेंगे।

आपका,
नरेन्द्र मोदी’

राहुल की Hit and run पॉलिसी ने मजबूर किया पूर्व जजों-ब्यूरोक्रेट्स समेत 272 हस्तियों को खुला खत लिखने को, कहा- चुनावी जीत नहीं मिली, हो रहा ‘ड्रामा’: चुनाव आयोग को बदनाम कर रहे राहुल गाँधी और वामपंथी NGOs: चुनाव आयुक्तों को क्यों धमकी दी?

                                              प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राहुल गाँधी (फोटो: मिंट)
राहुल गाँधी और अब प्रियंका वाड्रा द्वारा चुनाव आयुक्तों को धमकी देकर क्या देश में गुंडागर्दी का माहौल बना चाहते हैं? कांग्रेस में बुद्धिजीवी क्यों खामोश है? बिहार में देख ली कांग्रेस की दुर्गति। क्या परिवार भक्ति में देश को आग में झोंकना चाहती है कांग्रेस? डायन भी दस घर छोड़ देती है लेकिन इतने साल देश पर राज करनी वाली पार्टी ही देश को बर्बाद करने उत्तेजक बयान दे रही है। क्या सत्ता नहीं मिलने की वजह से देश की संवैधानिक संस्थाओं को धमकाओगे? कहाँ है राहुल को जमानत देने वाले जज? अगर कांग्रेस का यही हाल रहा वो दिन भी दूर नहीं होगा जब सुप्रीम कोर्ट तक आग की चिंगारियां पहुंचेंगी। कांग्रेस को ऐसी गन्दी सियासत को छोड़ना होगा नहीं तो देखते हैं कांग्रेस के ताबूत में आखिरी कील राहुल ठोकेगा या प्रियंका? 
यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन राहुल और प्रियंका जिस आग को लगा रहे थे लग गयी और ये जा रही कांग्रेस कार्यालय, राहुल और प्रियंका के बंगलों में और ये वो आग जिसे कोई फायर ब्रिगेड भी बुझा पाएगी। क्योकि इस आग को लगा रहा समाज का बुद्धिजीवी वर्ग।    
अभी भी समय है कांग्रेस संभल जाए। अभी तो 272 पूर्व जजों-ब्यूरोक्रेट्स ने जेताया है, सुप्रीम कोर्ट को इसका संज्ञान लेना चाहिए। अगर भड़काऊ भाषा नहीं बदली यही लिस्ट हज़ारों में, लाखों में और बहुत जल्दी करोड़ों में पहुँच जाएगी। इस संकेत को समझे कांग्रेस। बहुत गंभीर संकेत है। देश की और जनता की असली समस्यों को उठाओ नाकि संवैधानिक संस्थाओं में बैठे अधिकारियों और उनके परिवारों को बलि का बकरा बनाया जाए।         
कांग्रेस द्वारा चुनाव आयोग के खिलाफ की जा रही बयानबाजी को लेकर 272 हस्तियों ने खुला खत लिखा है। इन हस्तियों ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी द्वारा चुनाव आयोग पर बार-बार किए जा रहे हमलों को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की है। इन हस्तियों में 16 जज, 14 राजदूतों सहित 123 सेवानिवृत्त नौकरशाह और 133 सेवानिवृत्त सशस्त्र बल अधिकारी शामिल हैं।

पत्र में क्या कहा गया है?

इसमें कहा गया है, “भारत का लोकतंत्र किसी हथियार से नहीं बल्कि उसकी बुनियादी संस्थाओं के खिलाफ फैल रही जहरीली बयानबाजी से चोट खा रहा है। कुछ राजनीतिक नेता असली नीतियों का विकल्प देने के बजाय, बिना सबूत के गंभीर आरोप लगाते रहते हैं।” पत्र में आगे लिखा है, “पहले उन्होंने भारतीय सेना की बहादुरी पर सवाल उठाए, फिर न्यायपालिका, संसद और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को निशाना बनाया और अब चुनाव आयोग की बारी आ गई है।”

पत्र में राहुल गाँधी पर सीधा हमला करते हुए लिखा गया है, “लोकसभा में विपक्ष के नेता ने बार-बार चुनाव आयोग पर हमला करते हुए दावा किया है कि उनके पास सबूत है कि चुनाव आयोग वोट चोरी करा रहा है और उनकी बात 100% प्रमाणित है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त रिटायर भी हो जाएँ, तो वह उन्हें भी छोड़ेंगे नहीं।” क्या मतलब है इस धमकी का?  

आगे पत्र में कहा गया है, “इतने गंभीर आरोप लगाने के बावजूद उन्होंने अब तक कोई औपचारिक शिकायत, या शपथपत्र के साथ, दर्ज नहीं कराई। जिससे उन्हें अपनी बात के लिए जवाबदेह न होना पड़े।” राहुल और राहुल के सलाहकार अच्छी तरह जानते हैं कि जिस दिन औपचारिक शिकायत, या शपथपत्र के साथ, दर्ज करवा दी और गलत साबित हो गयी कोई कपिल, सिंघवी या फिर प्रशांत जेल जाने से रोक नहीं पाएगा। ये Hit and run पॉलिसी कांग्रेस को पाताल लोक पहुंचा रही है। इस पत्र में कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों, वामपंथी झुकाव वाले NGOs और कई अन्य लोगों की EC के खिलाफ तीखी भाषा को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

पत्र में कहा गया, “चुनाव आयोग ने अपनी SIR प्रक्रिया सार्वजनिक की है, कोर्ट से अनुमति लेकर सत्यापन कराया है, फर्जी नाम हटाए हैं और नए योग्य मतदाता जोड़े हैं। इससे साफ लगता है कि ये आरोप एक राजनीतिक हार को संकट का नाम देने की कोशिश है।”

पत्र में कहा गया है, “यह व्यवहार ‘बौखलाए हुए गुस्से’ की निशानी है जो लगातार चुनावी हार और जनता से दूर हो जाने के कारण पैदा हुआ है। जब नेता जनता की आकांक्षाओं को समझ नहीं पाते, तो वे अपनी कमियों को सुधारने की जगह संस्थाओं पर हमला करना शुरू कर देते हैं। गंभीर विश्लेषण की जगह ड्रामा ले लेता है।”

इसमें आगे लिखा है, “विडंबना यह है कि जब कुछ राज्यों में चुनाव नतीजे विपक्षी दलों के पक्ष में आते हैं, तब चुनाव आयोग पर कोई सवाल नहीं उठता। जहाँ नतीजे उनके पक्ष में नहीं आते, वहीं आयोग हर कहानी का खलनायक बन जाता है। इस तरह का गुस्सा केवल अवसरवाद दिखाता है।”

पत्र में लोगों से चुनाव आयोग के साथ खड़ा होने को कहा गया है। इसमें लिखा है, “अब समय है कि देश के लोग चुनाव आयोग के साथ मजबूती से खड़े हों चापलूसी के लिए नहीं बल्कि विश्वास और सिद्धांत के कारण। समाज को यह माँग उठानी चाहिए कि नेता बेबुनियाद आलोचनाओं और नाटकीय भाषणबाजी से इस संस्था को बदनाम न करें।”

इसमें कहा गया है, “एक बड़ा सवाल यह भी है कि देश की मतदाता सूची में कौन होना चाहिए। नकली वोटर, फर्जी लोग, गैर-नागरिक या वे जिनका भारत के भविष्य से कोई वैध संबंध नहीं उन्हें सरकार चुनने का अधिकार नहीं होना चाहिए। ऐसे लोगों को चुनावों में शामिल होने देना देश की संप्रभुता और स्थिरता के लिए बड़ा खतरा है। दुनिया के बड़े लोकतंत्र भी अवैध प्रवासियों के मामले में बहुत सख्त होते हैं।”

पत्र लिखने वाले लोगों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और NGT के चैयरमेन आर्दश कुमार गोयल, संजीव त्रिपाठी पूर्व RAW प्रमुख और NIA के पूर्व डायरेक्टर योगेश चंदेर मोदी जैसे लोग भी शामिल हैं।

प्रिय आरफा, ‘I Love Muhammad’ की आड़ में किस कारण इस्लामी भीड़ हिंदुओं और पुलिस पर क्यों टूट रही है? आरफा इस वीडियो को भी देख लो

                                       हिंदुओं पर हमले को लेकर आरफा खानम शरेवानी की चुप्पी
प्रिय आरफा खानम शेरवानी,

यह देखकर अच्छा लगता है कि आप ‘तीन सरल शब्दों – आई लव मोहम्मद’ के सम्मान के लिए इतनी गंभीरता दिखा रही हैं। यह निश्चित रूप से धार्मिक पहचान का एक भाव है। यह बात भी सही है कि हर भारतीय नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है लेकिन जब आप यह कहती हैं कि भारतीय नागरिकों को अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है, तो क्या इसमें हिंदू भी शामिल होते हैं आरफा खानम शेरवानी? और अगर आप मानती हैं कि हिंदुओं को भी अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है, तो फिर आप तब चुप क्यों रहती हैं जब आपके ही समुदाय के लोग हिंदुओं को ‘आई लव महादेव’ कहने पर निशाना बनाते हैं?

सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो को देख बताओ कि क्या ‘I Love Muhammad’ के पीछे कोई षड़यंत्र है? 

गुजरात के गांधीनगर जिले के दहेगाम तालुका के बहीयाल गाँव में 24 सितंबर 2025 की रात हिंदुओं पर गरबा उत्सव के दौरान हमला हुआ। हिंसा की शुरुआत एक हिंदू युवक की सोशल मीडिया पोस्ट से हुई, जिसमें उसने लिखा था- ‘आई लव महादेव’। आपकी ही कौम के लोगों को यह पोस्ट नागवार गुजरी और वे युवक की दुकान पर पहुँच गए। इसके चलते उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा। उसके न होने पर दुकान में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई। CCTV फुटेज में साफ दिखा कि कई मुस्लिम युवक दुकान में घुसकर नुकसान पहुँचा रहे थे।

यह झगड़ा जल्दी ही बड़े पैमाने पर हिंसा में बदल गया। पत्थर फेंके गए, लाठियाँ और रॉड चलाई गईं और गरबा कार्यक्रम में हिंदुओं के वाहन जला दिए गए। 8 से ज्यादा गाड़ियाँ तोड़ी-फोड़ी गईं और एक दुकान पूरी तरह जला दी गई। इसके बाद हालात काबू करने पहुँची पुलिस पर भी हमला किया गया जिसमें दो पुलिस वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। एक वीडियो में साफ दिखा कि मुस्लिम युवक पत्थर बरसा रहे थे और उसी बीच एक हिंदू माँ अपने बेटे को ढूँढते हुए रो रही थी। यह तस्वीर उस भीड़ के खौफ को दिखाने के लिए काफी है।

स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस वक्त बाहर बैठे एक दुकानदार ने बताया कि करीब 5,000 लोगों की भीड़ रात में गाँव पर टूट पड़ी और उसकी दुकान को जानबूझकर निशाना बनाया। उसने बताया कि उसके गाँव में केवल 80 हिंदू परिवार रहते हैं और चारों तरफ मुसलमानों की आबादी है। भीड़ पत्थरों और हथियारों के साथ पहुँची और उसकी दुकान को तहस-नहस कर दिया जबकि मुस्लिम दुकानों को छुआ तक नहीं। उसने यह भी बताया कि हमलावरों में नाबालिग लड़के भी शामिल थे।

यह घटना साफ तौर पर हिंदू समाज को निशाना बनाने के लिए की गई थी। एक हिंदू युवक की भगवान शिव के प्रति आस्था दिखाने की बात ही हिंसा का बहाना बन गई। यह कोई झड़प नहीं थी बल्कि हिंदुओं और उनकी भक्ति से असहिष्णुता को लेकर सांप्रदायिक हमला था।

तो बताइए, शेरवानी, अगर तीन साधारण शब्द कभी भी खतरनाक नहीं माने जाने चाहिए तो फिर हिंदुओं को ‘आई लव महादेव’ कहने पर हिंसक सजा क्यों दी गई? उस समय आपका आक्रोश कहाँ चला गया था?

जरा सोचिए आरफा खानम शेरवानी जी, अगर वह हिंदू युवक भागा ही नहीं होता तो? क्या आपको लगता है कि आपके ही धर्म के वो लोग, जो उसकी दुकान तोड़ रहे थे और हिंसा कर रहे थे, उस हिंदू लड़के को नुकसान नहीं पहुँचाते? और अगर सच में वे उसे चोट पहुँचा देते, तो क्या आप यह कहतीं कि यह उनका हक है क्योंकि मुसलमानों को इतना आहत महसूस होने का विशेष अधिकार है कि वे गैर-मुसलमानों की स्वतंत्रता छीन लें?

क्या आपको सच में लगता है कि हिंदू सिर्फ अपनी भक्ति जताए तो वह आपके धर्म का अपमान है? क्या सिर्फ हिंदुओं का होना ही आपके समाज के लिए हिंसा करने का कारण बन जाता है? बताइए आरफा, क्या आप मानती हैं कि केवल मुसलमानों को ही अपनी धार्मिक पहचान जताने का अधिकार है जबकि अक्सर यह धार्मिक पहचान दूसरों के धर्म को कुचलने पर आधारित होती है।

आप बहुत परेशान नजर आती हैं जब मुसलमानों को ‘आई लव मोहम्मद’ कहने पर अपराधी बताया जाता है। लेकिन ज़रा देखिए कि यही तीन ‘भोले-भाले’ शब्द आपके ही समुदाय के कुछ लोगों ने देशभर में कैसी तबाही मचाने के लिए इस्तेमाल किए हैं। ये शांति और मोहब्बत के नारे नहीं रहे। इन्हें मजहबी उन्मादियों ने जंग का नारा बना दिया है। हमने कई बार देखा है कि भीड़ इन नारों को ‘सर तन से जुदा’, पत्थरबाजी, आगजनी, तोड़फोड़ और यहाँ तक कि पुलिस पर सीधे हमले के लिए इस्तेमाल करती है।

जरा इस पोस्टर को ही देख लीजिए।

                                                       ‘I Love Muhammad’ का पोस्टर

मैं 100% सहमत हूँ कि आपका ‘I Love Muhammad’ वाला पोस्टर लगाने का हक है क्योंकि यह आपके धर्म की अभिव्यक्ति है और इसे सम्मान किया जाना चाहिए। पर एक हिंदू होने के नाते, जिसकी कम्युनिटी और उसके लोग परेशानी में हैं, मैं आपसे पूछती हूँ आपकी कम्युनिटी को यह बात जोड़ने की जरूरत क्यों महसूस होती है कि ‘अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुजदिल भी पहली सफ में खड़े मिलेंगे’?

आरफा, आपकी कम्युनिटी कौन सी जंग लड़ रही है? यह जंग किसके खिलाफ है? आपकी कम्युनिटी जीतकर क्या करेगी? क्या आप जानती हैं कि किसने भी इस काल्पनिक ‘जंग’ की बात की थी? PFI ने। आप जानती हैं उन्होंने क्या लिखा? उन्होंने एक दस्तावेज में बताया कि जो आने वाली जंग होगी, उसके मतलब हिंदुओं का सफाया है जिसमें हिंदुओं की लिस्ट बनाना और उन्हें मार देना शामिल है। भारत को एक इस्लामी मुल्क बनाने की बात की गई, जहाँ गैर-मुसलमानों की खासकर हिंदुओं की कोई जगह न रहे। आरफा, क्या आप PFI और अपने कुछ साथियों से कहेंगी कि ‘अपनी रणनीति बदल लो, अपनी विचारधारा नहीं’ जैसा कि आपने शाहीन बाग के जिहादियों से कहा था, ताकि आप अपना सेक्युलर लबादा ओढ़े दिखें।

उत्तरी प्रदेश, उतराखंड और गुजरात समेत कई राज्यों में हिंसा भड़की है। शहरों में मार्च के दौरान पुलिस पर हमला हुआ और उन पर पत्थर फेंके गए और लोग जोर-जोर से ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगा रहे थे। एक मौलवी ने तो बरेली में एक इंस्पेक्टर को जान से मारने की धमकी भी दी थी।

यह नारा इबादत का ही प्रतीक हो सकता है और मुस्लिम समुदाय को अपने धर्म को खुलकर जताने का अधिकार होना चाहिए। समस्या यह है कि कुछ इस्लामी कट्टरपंथी मजहब को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, वे इसे अलगाववादी और श्रेष्ठतावादी सोच के लिए प्रयोग करते हैं। इसका नतीजा अक्सर यही होता है कि हिंदुओं पर हमला होता है, उन्हें सताया जाता है, दबाया जाता है और कभी-कभी तो उनका कत्लेआम भी कर दिया जाता है।

हिंदुओं ने कहा- ‘आई लव महादेव’। मुसलमानों ने उसका जवाब पत्थरबाजी, आगजनी और चुन-चुनकर हिंदू दुकानों पर हमले से दिया। मुसलमानों ने कहा- ‘आई लव मोहम्मद’ लेकिन इसके साथ दंगे हुए, सिर काटने की धमकियाँ दी गईं और पुलिस से हिंसक झड़पें की गईं। तो क्या आपको नहीं लगता कि भारतीय राज्य या हिंदुओं पर सवाल उठाने के बजाय आपको उन लोगों से सवाल करना चाहिए जिन्होंने उसी मजहब का नाम कलंकित कर दिया है जिसे आप बड़े प्यार से मानती हैं?

सितंबर 2024 में आपने ‘लव जिहाद, थूक जिहाद और लैंड जिहाद’ जैसे दर्ज मामलों को ‘फर्जी प्रोपेगेंडा’ कहकर खारिज कर दिया और उन हिंदू पीड़ितों की गवाही जानबूझकर नजरअंदाज कर दी जो इससे पीड़ित थे। फिर जनवरी 2025 में आपने ‘द वायर’ की उस रिपोर्टिंग का बचाव किया जिसमें हमीरपुर में जबरन धर्मांतरण के आरोप में पकड़े गए मुस्लिमों को बचाने की कोशिश की गई थी। आपने पुलिस पर सवाल खड़े किए लेकिन उन हिंदू परिवारों की पीड़ा को नहीं माना जिन्हें जबरदस्ती धर्म बदलने के लिए मजबूर किया या। ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण हैं, इस सूची का कोई अंत नहीं है।

असल में आरफा, आप कभी उन मुस्लिमों जैसी नहीं बन पाएँगी जो डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे थे। आप कभी अरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों की इज्जत नहीं करेंगी। आप कभी उन मुसलमानों के लिए खड़ी नहीं होंगी जो पहले भारत को रखते हैं और दिल से हिंदुओं को अपना भाई समझते हैं। आरफा आप केवल तब बोलेंगी जब कट्टर इस्लामी भीड़ हिंदुओं पर हमला करेगी। आरफा आप जिहादियों की वैचारिक रीढ़ हैं

(साभार: https://www.opindia.com/2025/09/open-letter-arfa-khanum-sherwani-i-love-muhammad-harmless-chant-then-why-is-it-leading-to-muslim-violence/#google_vignette)

पूर्व राष्ट्रपति, प्रणव मुखर्जी को कांग्रेस समर्थक ने कहा ‘रंगीन चू#^%’… बेटी शर्मिष्ठा ने राहुल गाँधी को लिखा खुला खत

मोदी-योगी विरोध में कांग्रेस की बुद्धि भी भ्रष्ट हो गयी है। किस को क्या बोलना है, कुछ पता नहीं, बस बोल दो। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी को खुला पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें और उनके पिता को उस कांग्रेस समर्थक द्वारा गाली दी जा रही है जिसे कई कांग्रेसी नेता भी फॉलो करते हैं।

वैसे शर्मिष्ठा मुखर्जी को पत्र कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़के को लिखना था, राहुल गाँधी को पत्र लिखने का मतलब है अध्यक्ष का खुलेआम उपहास। दूसरे, राहुल को पत्र लिखकर शायद यह सिद्ध करने की कोशिश है कि खड़के का रिमोट तो राहुल के ही हाथ है, फिर क्यों इधर-उधर भागा जाए। परिवार भक्ति भी हो जाएगी और शायद अपना काम। 

अपने पत्र में उन्होंने राहुल गाँधी को बताया है कि उनकी किताब पब्लिश होने के बाद से उनके साथ ये ट्रोलिंग हो रही है। उनको निरंतर दुर्व्यवहार और यौन अपमान का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस समर्थक उनकी किताब की निंदा कर रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति को ‘चू&^%#’ जैसे शब्द कहे जा रहे हैं।”

उन्होंने इस शिकायतपत्र को सोशल मीडिया पर भी डाला है। अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा कि नवीन शाही नाम पर कांग्रेस समर्थक उनके लिए ऐसा कह रहा है। अपनी खबर में उन्होंने ट्वीट भी जोड़े। इन ट्विट्स में देख सकते हैं नवीन शाही प्रणव मुखर्जी के लिए लिखता है- चु&^% को चु&^% बोलना कहाँ मना है? रंगीन था वो, कु&^% भी मंजूर थी उसे।

एक अगले ट्वीट में नवीन शाही लिखता है, “जिंदगी भर कांग्रेस के सहारे ऐश करने और छुप-छुप के रंगीनियाँ करने वाले की बेटी जब कांग्रेस पर बोलेगी तो सच बोलना ही पड़ेगा।”

इन ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए शर्मिष्ठा मुखर्जी ने लिखा, “राहुल गाँधी न्याय की बात कर रहे हैं। मैं उनसे न्याय माँगती हूँ। अगर ये शख्स कोई साधारण भी कांग्रेस समर्थक भी है तो इसके विरुद्ध पुलिस शिकायत होनी चाहिए आखिर वो मेरा और मेरे पिता का अपमान उन्हीं के नाम (राहुल गाँधी) पर कर रहा है।”

बता दें कि शर्मिष्ठा द्वारा ये ट्वीट किए जाने के बाद नवीन शाही, जिसके खिलाफ उन्होंने शिकायत करने की अपील की है, उसने ट्वीट के नीचे माफी माँगी है।

अपने ट्वीट में उस शख्स ने लिखा, “मैं उस ट्वीट के लिए माफी माँगता हूँ जिससे आपको दुख पहुँचा है…मैं प्रार्थना करता हूँ कि भावनाओं में बहकर मैंने जो कुछ भी लिखा, उसे क्षमा करें। कांग्रेस मेरी माँ की तरह है।”

शर्मिष्ठा मुखर्जी ने जो पत्र राहुल गाँधी को लिखा है उसमें उन्होंने राहुल को लिखा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक होने के नाते, राहुल गाँधी को उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो उन्हें और उनके पिता को गाली दे रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति की बेटी ने खुले पत्र में कहा, “आप अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अग्रदूत प्रतीत होते हैं, आपको पता होना चाहिए कि FoE में सिर्फ किसी की प्रशंसा करना शामिल नहीं है, बल्कि आलोचना को शालीनता से सहन करने की क्षमता भी शामिल है। लेकिन ऐसा लगता है कि आप हमारे संविधान द्वारा प्रदत्त सबसे महत्वपूर्ण अधिकारों में से एक, जो कांग्रेस के मूल मूल्यों में से एक है, के बारे में अपने फॉलोवर्स को समझा नहीं पाएँ हैं। आपका पसंदीदा नारा ‘नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान’ भी आपके अपने समर्थकों के कानों पर नहीं पड़ता है क्योंकि वे आपकी आलोचना करने करने की हिम्मत करने वाले किसी भी व्यक्ति पर अपनी सारी ‘नफ़रत’ लगा देते हैं।”

वहीं मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “जब से मेरे पिता पर किताब आई है… कुछ कांग्रेस नेता इसके खिलाफ बोलने लगे। वह मुझे बुरी तरह ट्रोल कर रहे हैं। कुछ दिन पहले, जयपुर लिटफेस्ट के मौके पर, मैंने एक साक्षात्कार में एक बयान दिया था, जहाँ मुझसे कांग्रेस के बारे में मेरे विचार पूछे गए थे। मैंने कहा था- मैं कांग्रेसी हूँ। राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेसका अभी भी बहुत महत्व है। लेकिन कांग्रेस को गांधी-नेहरू परिवार के नेतृत्व से परे देखना चाहिए…तब से सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया। मुझ पर हर तरह की गालियाँ बरसाई गईं, मेरे पिता को घसीटा गया। मैंने इस संबंध में राहुल गाँधी से शिकायत की लेकिन उन्होंने कोई प्रतिक्रिया तक नहीं दी इसलिए मैंने खुला पत्र लिखा।”

नूपुर शर्मा पर लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन करने पर 117 रिटायर्ड जज-नौकरशाहों-सैन्य अधिकारियों का खुला पत्र, CJI को भेजा

नूपुर विवाद शुरू होते ही जिस की शंका को व्यक्त किया जा रहा था हर बीतते दिन शंका सत्यापित होती जा रही है। विवाद इस पर नहीं है कि नूपुर ने पैगम्बर का अपमान किया, बल्कि इस बात का है कि हमारी इस्लामिक किताबों में लिखी जिस बात को परदे में समझ रहे थे, वह हिन्दुओं को भी मालूम है। कट्टरपंथियों को शायद यह भी नहीं मालूम कि हत्याएं करवाकर जितना डर बैठाने के लिए नूपुर विवाद को जिन्दा रखेंगे उतना ही इस्लाम के लिए घातक होगा। हर कट्टरपंथी मौलानाओं को समझ जानी चाहिए। जिसका शंखनाथ चीन से हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट की जिस टिप्पणी को कट्टरपंथी, छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेता/पार्टियां और गंगा-जमुनी तहजीब जैसे ढोंगी नारे लगाने वाले सिरमौर समझे बैठे थे, वही टिप्पणी उन जजों के भविष्य को अँधेरे में डालने जा रहा है। 
नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों जस्टिस सूर्यकान्त और जस्टिस जेबी पारदीवाला की विवादित टिप्पणी पर रार थमता नहीं दिख रहा है। 15 सेवानिवृत्त जजों, 77 रिटायर्ड नौकरशाहों और 25 पूर्व सैन्य अधिकारियों ने खुला पत्र जारी कर के नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट के दोनों जजों की टिप्पणी को ‘दुर्भाग्यपूर्ण और गलत उदाहरण पेश करने वाला’ करार दिया है। नूपुर शर्मा पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के इन दोनों जजों ने विवादित टिप्पणी की थी।

पत्र में लिखा है कि हम एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते ये विश्वास रखते हैं कि किसी भी देश का लोकतंत्र तभी तक अक्षुण्ण रहेगा, जब तक उसकी सारी संस्थाएँ संविधान के हिसाब से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती रहेंगी। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट के दो जजों द्वारा की गई ताज़ा टिप्पणी ‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लंघन है और हमें इस पर बयान जारी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने लिखा कि इन टिप्पणियों से देश-विदेश में लोगो को हैरानी हुई है।

पत्र में लिखा है, “जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला द्वारा की गई टिप्पणियाँ, जो कि जजमेंट का हिस्सा नहीं हैं – किसी भी तरह से न्यायिक उपयुक्तता और निष्पक्षता के दायरे में नहीं आती। ऐसे अपमानजनक तरीके से कानून का उल्लंघन न्यायपालिका के इतिहास में आज तक नहीं हुआ। इन बयानों या याचिका से कोई लेनादेना नहीं था। नूपुर शर्मा को न्यायपालिका तक पहुँच से मना कर दिया गया और ये संविधान की भावना के साथ-साथ प्रस्तावना का भी उल्लंघन है।”

पत्र में आगे लिखा है कि जजों का ये बयान कि देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए सिर्फ और सिर्फ नूपुर शर्मा जिम्मेदार हैं – इसका कोई औचित्य नहीं बनता। सेवानिवृत्त जजों, अधिकारियों और सैन्य अधिकारियों ने लिखा कि ये सब कह कर जजों ने एक तरह से उदयपुर में सिर कलम किए जाने की क्रूर घटना के अपराधियों को दोषमुक्त करार दिया है। पत्र में लिखा है कि देश की दूसरी संस्थाओं को नोटिस दिए बिना उन पर टिप्पणी चिंताजनक और सतर्क करने वाला है।

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पत्र में आगे लिखा है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की न्यायपालिका के इतिहास पर यर टिप्पणियाँ धब्बे की तरह हैं। इस पर आपत्ति जताई गई है कि याचिकाकर्ता को बिना किसी सुनवाई के दोषी ठहरा दिया गे और न्याय देने से इनकार कर दिया गया, जो किसी लोकतांत्रिक समाज की प्रक्रिया नहीं हो सकती। साथ ही याद दिलाया गया है कि एक ही अपराध के लिए कई सज़ा का प्रावधान नहीं है, इसीलिए नूपुर शर्मा FIRs को ट्रांसफर कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँची थीं।