NSA अजित डोभाल से मीटिंग के 2 दिन बाद UAE ने छोड़ा OPEC


मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने 65 साल से अधिक पुराने तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक (OPEC)(Organization of the Petroleum Exporting Countries) और ओपेक+ से बाहर निकलने का फैसला किया है। UAE 1 मई 2026 से आधिकारिक तौर पर इस समूह का हिस्सा नहीं रहेगा। यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक तेल सप्लाई पहले से दबाव में है और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्ते प्रभावित हैं।

इस फैसले से जुड़ी एक और अहम बात जिसे लेकर चर्चा है वो है भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल की विदेश यात्रा। अपनी 25-26 अप्रैल 2026 की यात्रा के दौरान अजीत डोभाल ने अबू धाबी में UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद जाएद से मुलाकात की थी। इस यात्रा के दौरान उनकी कुछ अन्य अहम मीटिंग भी हुईं। इसके 2 दिन बाद ही 28 अप्रैल को UAE ने OPEC छोड़ने का ऐलान कर दिया।

ऐसे में UAE का यह कदम सिर्फ एक संगठन से बाहर निकलना नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा राजनीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। इससे तेल की कीमतों, सप्लाई और वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका है। वहीं, भारत जैसे बड़े आयातक देशों के लिए इसमें मौके भी छिपे हुए हैं।

OPEC क्या है और क्यों बना था?

ओपेक (OPEC) यानी ऑर्गनाइजेशन ऑफ द पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (Organization of the Petroleum Exporting Countries) एक ऐसा इंटर गवर्नमेंटल ऑर्गेनाइजेशन है जिसे 1960 में पाँच देशों ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर बनाया था।

उस समय तेल बाजार पर पश्चिमी कंपनियों का नियंत्रण था और तेल उत्पादक देशों को उचित कीमत नहीं मिल रही थी। ऐसे में इन देशों ने मिलकर एक ऐसा समूह बनाया जिसका उद्देश्य तेल उत्पादन को नियंत्रित करना, कीमतों को स्थिर रखना और अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना था।

समय के साथ यह संगठन काफी शक्तिशाली हो गया और वैश्विक तेल बाजार में इसका बड़ा प्रभाव हो गया। बाद में ओपेक+ बना, जिसमें रूस जैसे बड़े गैर-ओपेक देश भी शामिल हुए, जिससे इसका प्रभाव और बढ़ गया।

कब जुड़ा UAE और क्या रही उसकी भूमिका?

UAE दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है और इसकी उत्पादन क्षमता काफी मजबूत मानी जाती है। UAE 1971 में ओपेक का सदस्य बना, हालाँकि अबू धाबी 1967 से ही इस समूह से जुड़ा हुआ था।

ओपेक के भीतर UAE को एक भरोसेमंद और अनुशासित सदस्य के रूप में देखा जाता था, जो संगठन के फैसलों का पालन करता था। इसके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता भी थी, यानी जरूरत पड़ने पर यह उत्पादन बढ़ाकर बाजार में संतुलन बना सकता था। इसी वजह से इसे स्विंग प्रोड्यूसर के रूप में भी देखा जाता था। ऐसे में उसका बाहर निकलना ओपेक के लिए एक बड़ा नुकसान माना जा रहा है।

UAE ने ओपेक क्यों छोड़ा?

UAE ने अपने बयान में कहा है कि यह फैसला उसके राष्ट्रीय हित और लंबी अवधि की रणनीति को ध्यान में रखकर लिया गया है। दरअसल पिछले कुछ समय से UAE और सऊदी अरब के बीच तेल उत्पादन को लेकर मतभेद बढ़ रहे थे।

सऊदी अरब चाहता था कि उत्पादन सीमित रखा जाए ताकि कीमतें ऊँची बनी रहें जबकि UAE ज्यादा उत्पादन करना चाहता था ताकि वह अपने संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर सके।

UAE ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भारी निवेश किया है और वह इन निवेशों का लाभ उठाना चाहता है। इसके अलावा UAE की अर्थव्यवस्था अब केवल तेल पर निर्भर नहीं रही है। उसने पर्यटन, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भी तेजी से विकास किया है, जिससे वह ज्यादा स्वतंत्र आर्थिक फैसले लेने की स्थिति में है।

ईरान युद्ध के दौरान क्षेत्रीय सहयोग को लेकर असंतोष भी एक कारण माना जा रहा है, जिससे UAE ने अपने रास्ते अलग करने का फैसला लिया। UAE के बाहर निकलने के बाद ओपेक में अब कुल 11 सदस्य देश रह जाएँगे।

इनमें सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, वेनेजुएला, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और कांगो गणराज्य शामिल हैं। इससे पहले कतर 2019 में और अंगोला 2024 में इस संगठन को छोड़ चुके हैं। लगातार देशों के बाहर निकालने से यह साफ पता चलता है कि ओपेक की एकजुटता कमजोर हो रही है और भविष्य में इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता हैं।

UAE क्या हासिल करना चाहता है?

UAE का मुख्य उद्देश्य अधिक स्वतंत्रता के साथ अपने तेल संसाधनों का अधिकतम उपयोग करना है। वह अब ओपेक के उत्पादन कोटा से मुक्त होकर अपनी क्षमता के अनुसार उत्पादन बढ़ाना चाहता है।
इसके जरिए वह वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना और ज्यादा मुनाफा कमाना चाहता है। साथ ही, UAE खुद को एक स्वतंत्र ऊर्जा शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जो बाजार की परिस्थितियों के अनुसार तेजी से फैसले ले सके। यह कदम उसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकता है।

OPEC पर इसका क्या असर पड़ेगा?

UAE के बाहर निकलने से ओपेक को कई स्तरों पर नुकसान हो सकता है। सबसे पहले संगठन की कुल उत्पादन क्षमता में कमी आएगी, जिससे उसकी बाजार पर पकड़ कमजोर होगी।
दूसरा, तेल की कीमतों को नियंत्रित करना ओपेक के लिए और मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि उसके पास अब कम स्पेयर कैपेसिटी होगी। तीसरा, इससे संगठन के भीतर पहले से मौजूद मतभेद और बढ़ सकते हैं और अन्य देश भी बाहर निकलने के बारे में सोच सकते हैं।
इसके अलावा वैश्विक बाजार में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है, क्योंकि एक कमजोर ओपेक सप्लाई और डिमांड के बीच संतुलन बनाए रखने में पहले जितना सक्षम नहीं रहेगा। इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।

वैश्विक तेल बाजार पर क्या असर होगा?

इस फैसले का असर तुरंत नहीं दिखेगा, खासकर तब तक जब तक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पूरी तरह से खुल नहीं जाता। लेकिन लंबे समय में इसका असर जरूर पड़ेगा। UAE के ज्यादा उत्पादन करने से वैश्विक सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
हालाँकि इसके साथ ही बाजार में अस्थिरता भी बढ़ सकती है, क्योंकि ओपेक की पकड़ कमजोर होगी और तालमेल कम हो जाएगा जिसका असर आने वाले समय में देखने को मिलेंगे।

भारत को फायदा होगा या नुकसान?

भारत के लिए यह स्थिति ज्यादातर मामलों में फायदेमंद मानी जा रही है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल आयात से पूरा करता है और उसमें से एक बड़ा हिस्सा ओपेक देशों से आता है।
UAE भारत का एक अहम सप्लायर है, इसलिए उसके ज्यादा उत्पादन करने से भारत को सस्ता तेल मिल सकता है। इससे भारत का आयात बिल कम होगा और महंगाई पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी।
इसके अलावा, भारत और UAE के बीच ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है। अब भारत सीधे UAE के साथ लंबी अवधि के समझौते कर सकता है, जो पहले ओपेक के नियमों के कारण सीमित थे।
कुछ जोखिम भी बने हुए हैं। अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है या स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगर ब्लॉक रहता है, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है।
UAE का ओपेक से बाहर निकलना वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। यह दिखाता है कि अब देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए पारंपरिक संगठनों से अलग होने में हिचक नहीं रहे हैं।
इससे जहाँ एक ओर ओपेक की ताकत कमजोर हो सकती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा और अस्थिरता बढ़ सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक अवसर भी है, जहाँ वे सस्ते और स्थिर ऊर्जा स्रोत हासिल कर सकते हैं।

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