देश के लगभग सभी राज्यों में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर फैल रही है। हर राज्य अपनी आवश्यकता के अनुसार धारा 144, रात का कर्फ़्यू, लॉकडाउन या सीमित लॉकडाउन की घोषणा कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने सबसे पहले इस तरह की घोषणा की और उसके बाद मध्य प्रदेश और दिल्ली ने भी सीमित कर्फ़्यू की घोषणा की। संक्रमण के फैलने की तेज़ी को देखते हुए नागरिक भी सचेत हो रहे हैं और संक्रमण से बचने के उपाय कर रहे हैं। यह अलग बात है कि बिना मास्क के बाहर निकलने वाले लोग अब भी दिखाई दे रहे हैं।दिल्ली में लॉकडाउन की घोषणा के बाद लोग भारी मात्रा में बाहर आए और शराब की दुकानों पर भीड़ लग गई। ऐसी भीड़ के वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। त्रासदी यह है कि इस कठिन समय में शराब की दुकानों पर होने वाली भीड़ और वहाँ बोली जाने वाली बातें ही नागरिकों के लिए थोड़ी देर के लिए ही सही, दुःख भूलने का कारण बन रही है। शराब ख़रीदने वालों में से कई लोग अपनी गंभीर बातों से लोगों को हँसा देते हैं।दिल्ली की जनता इस मुश्किल समय से जूझने की कोशिश कर ही रही थी और जब लोगों को लग रहा था कि पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष मज़दूरों का पलायन शायद देखने को न मिले तब तक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक वीडियो जारी कर दिया, जिसमें उन्होंने मज़दूरों से अपील करते हुए ‘मैं हूँ ना’ के शाहरुख़ खान स्टाइल में कहा: सरकार आपका पूरा ख़याल रखेगी। मैं हूँ ना। मुझ पर भरोसा रखिए।
क्या कारण है कि लोग केजरीवाल पर भरोसा नहीं कर रहे? केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को इस पर गंभीर चिंतन करने की जरुरत है, जो असंभव लगता है। क्योकि जिस पार्टी की नींव ही झूठ और मुफ्त की रेवड़ियां बांट सत्ता हथियाने की हो उस विश्वास करना मुश्किल है। पिछले लॉक डाउन उपरांत एक टीवी चैनल पर राज्य सभा सांसद संजय सिंह ने कहा था कि "हमने 5000-5000 रूपए तक जनता को बांटे, ताकि अपनी जरुरत की चीजें खरीद सके। जबकि प्राप्त सूचनाओं के अनुसार बांटे 2000 रूपए। उसके बाद अपने लेख में यह प्रश्न किया था कि "जब पार्टी ने 5000 रूपए दिए और जनता तक पहुंचे मात्र 2000 रूपए, फिर 3000 रूपए कहाँ गए?" इसका मतलब है करोड़ों का घोटाला। जो पार्टी संकट की इस घडी में भी तिजोरी भरने से बाज़ नहीं आ रही, सामान्य दिनों में कितना घोटाला कर रही होगी, समझा जा सकता है। जिस दिन संजय सिंह ने 5000 रूपए बाँटने की बात बोली थी, उस दिन तत्कालीन भाजपा दिल्ली अध्यक्ष मनोज तिवारी भी उसी चर्चा में शामिल थे। जिस पर दिल्ली भाजपा ने भी अपनी आंखें मूंद ली।
लगा उनकी इस अपील से जैसे जादू हो गया। शाम होते-होते लोगों ने आनंद बिहार बस अड्डे के फ़ोटो और वीडियो शेयर करने शुरू कर दिए जिसमें बस अड्डे पर दिल्ली से बाहर जाने की कोशिश करने वालों की भारी भीड़ दिखाई दे रही थी। समझ में नहीं आया कि जब सरकार द्वारा लगाया गया लॉकडाउन बहुत कम समय के लिए एक सामान्य कदम था तो यह वीडियो जारी करने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी? क्या मुख्यमंत्री केजरीवाल को दिल्ली की जनता पर भरोसा नहीं है कि उन्हें सरकार द्वारा उठाया गया सामान्य कदम समझ में नहीं आएगा? या फिर पिछले साल उनके और उनकी सरकार द्वारा जो कुछ किया गया उसे जनता भुला नहीं पाई है?
दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार और उसके मुखिया अरविंद केजरीवाल की आम लोगों के नजर में साख की पोल सोमवार (19 अप्रैल 2020) की शाम होते-होते खुल गई। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन का ऐलान करते हुए कहा था कि वे हाथ जोड़ कर प्रवासी मजदूरों से विनती करते हैं कि ये एक छोटा सा लॉकडाउन है जो मात्र 6 दिन ही चलेगा, इसलिए वे दिल्ली को छोड़ कर कहीं और न जाएँ।
आनंद विहार बस टर्मिनल पर मजदूरों की भारी भीड़ जुटी हुई है। वहाँ हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर लॉकडाउन की घोषणा के साथ ही इकट्ठा होने शुरू हो गए थे। इनमें से अधिकतर यूपी, बिहार और झारखंड के हैं। सभी अपने घर वापस लौटना चाहते हैं।
हम यदि पिछले दस दिनों में मुख्यमंत्री केजरीवाल के बयान देखें तो उनकी वजह से कई विषय पर केवल भ्रम ही फैला है। उन्होंने बार-बार कहा कि दिल्ली के अस्पतालों में बेड की कमी नहीं है। उनकी यह बात उस ऐप के आँकड़ों पर आधारित है जो दिल्ली सरकार ने जारी किया है। पर यहाँ सच्चाई ऐप द्वारा दिखाए जा रहे आँकड़ों से भिन्न है। लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों में बेड वैसे ही नहीं हैं पर फ़ोन करने पर प्राइवेट अस्पताल भी बेड ख़ाली न होने का दावा कर रहे हैं। फिर केजरीवाल जी ने दिल्ली में ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर तीन दिन के अंदर ही दो बार भ्रामक बातें की। उन्होंने पहले कहा कि दिल्ली में ऑक्सीजन का पूरा स्टॉक है और किसी तरह की दिक्कत होने नहीं दी जाएगी। फिर उन्होंने बताया कि ऑक्सीजन की कमी है।
प्रवासी मजदूरों ने कहा कि दिल्ली की AAP सरकार को कर्फ्यू की घोषणा से पहले उन्हें समय देना चाहिए था, ताकि वो अपने घर लौट सकें। मजदूरों ने कहा कि वो दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग हैं, ऐसे में अब उनके जीवन-यापन पर संकट आ खड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि जहाँ बस से वापस जाने के लिए मात्र 200 रुपए लगते थे, वहाँ अब 3000-4000 रुपए लग रहे हैं। प्रवासियों ने पूछा कि अब वो वापस कैसे जाएँगे?
केजरीवाल ने लॉकडाउन की घोषणा के साथ भरोसा दिलाया था कि सरकार प्रवासियों का ख्याल रखेगी। लेकिन, जिस तरह घर वापसी की होड़ लगी है वह देखकर तो लगता है कि मजदूर पिछले साल के अनुभवों को नहीं भूले हैं, जब आप पर ही अफवाह फैलाकर उन्हें घर से निकलने को मजबूर करने के आरोप लगे थे।
भ्रामक बयान देना अरविंद केजरीवाल के लिए नई बात नहीं है। प्रवासी मज़दूरों में भ्रम की स्थिति पैदा करके उन्हें बसों में भरकर उत्तर प्रदेश के बॉर्डर पर छोड़ने वाली बात को अभी मात्र एक वर्ष ही हुए हैं। उन्हीं दिनों मज़दूरों के लिए भोजन उपलब्ध कराने के दिल्ली सरकार के दावों पर कई हलकों में बहस भी हुई थी और उन्हें झूठा भी बताया गया था। सबको याद है कि कैसे सरकार के परिवहन विभाग ने कथित तौर पर मैसेज वायरल करवा मज़दूरों को भागने के लिए विवश कर दिया था।
मुख्यमंत्री केजरीवाल के भ्रामक बयानों से बनने वाली अनिश्चित भविष्य की तस्वीर और सरकार द्वारा मज़दूरों के हितों की रक्षा के लिए ईमानदार कोशिश न करने की आशंका से प्रवासी मज़दूरों का पलायन पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी होने का ख़तरा बना हुआ है। समस्या यह है कि एक राज्य से शुरू होने वाले ऐसे पलायन का असर अन्य राज्यों में रहने वाले प्रवासी मज़दूरों पर भी हो सकता है। ऐसे में आवश्यकता है उस विश्वसनीय बयान की जो मज़दूरों में विश्वास जगाए रखे और उन्हें पलायन से रोके।
No comments:
Post a Comment