उत्तर प्रदेश : किसान आएं स्वागत होगा, कानून के साथ खिलवाड़ करेंगे तो....क्योंकि ये दिल्ली नहीं लखनऊ है : योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री

हाल ही में भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा था कि दिल्ली की तरह हम लखनऊ का भी घेराव करेंगे, इस मसले पर अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रतिक्रिया दी है, योगी ने कहा, किसान आएं स्वागत होगा, अगर कानून से कोई खिलवाड़ करेगा तो दूसरी तरह स्वागत होगा, क्योंकि यह दिल्ली नहीं लखनऊ है, मुख्यमंत्री योगी ने यह बातें समाचार चैनल आजतक के कार्यक्रम ‘पंचायत’ में कही। 

दरअसल एंकर अंजना ओम कश्यप ने मुख्यमंत्री योगी से पूछा, राकेश टिकैत कह रहे हैं कि लखनऊ को दिल्ली बना देंगे, योगी ने इसका जवाब देते हुए कहा, हमें दिल्ली और लखनऊ में अंतर् महसूस करना होगा, लखनऊ प्रदेश की राजधानी है, दिल्ली देश की राजधानी है, हम सबका स्वागत करना जानते हैं, योगी ने कहा, किसान आएगा, किसान का स्वागत होगा। कानून के साथ कोई खिलवाड़ करेगा तो उस तरह से भी स्वागत होगा।

योगी ने कहा, जो कहते हैं हम लखनऊ को दिल्ली बना देंगे उन्हें अंतर् मालूम होगा कि लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है, देश की राजधानी नहीं है, प्रदेश की राजधानी में किस प्रकार की कानून व्यवस्था रहती है, उनको जानकारी होनी चाहिए।

अब देखना यह है कि योगी के इस जवाब के बाद टिकैत और इसके समर्थक कांग्रेस, वामपंथी, आम आदमी पार्टी, समाजवादी आदि पार्टियां क्या रुख अपनाते हैं। वैसे योगी अक्सर कहते हैं कि मै एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला रखता हूँ। दूसरे, मुख्यमंत्री योगी ने उत्तर प्रदेश को अराजकताओं और अपराध मुक्त करने का बीड़ा उठाया हुआ है। 

पिछले कृषि कानून के विरोध में लगभग आठ महीनें से कुछ किसान दिल्ली में कब्जा करके बैठे हैं, काफी लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, अभी तक इन तथाकथित किसानों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने कोई ठोस एक्शन नहीं लिया है, किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा था कि हमने जिस तरह से दिल्ली को घेर रखा है, वैसे ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का भी घेराव करेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री योगी ने संकेत दे दिया है कि लखनऊ का घेराव करना आसान नहीं है। 

किसान आंदोलन के राजनीतिज्ञ होने का प्रमाण 

किसान आंदोलनकारी आज तक यह नहीं समझ पाए कि इस आंदोलन को समर्थन देने वाले किसी भी नेता अथवा पार्टी को किसानों और कृषि कानूनों से सरोकार नहीं, वह तो केवल मोदी विरोध की लहर बनाने के लिए इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा को सत्ता से दूर करने बंगाल गए, बदले में क्या मिला, मुख्यमंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब राकेश तो क्या किसी भी किसान नेता से बात करने में संकोच कर रही है, प्रमाण सबके सामने है। 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कुछ दिन पूर्व पांच दिनों से दिल्ली दौरे पर थीं और विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात कर बीजेपी के खिलाफ मोर्चाबंदी की तैयारी में जुटी थीं। इस दौरान भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता राकेश टिकैत कार्यकर्ताओं के साथ ममता बनर्जी के आने का इंतजार कर रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि ममता बनर्जी धरना स्थल पर उनसे मुलाकात करेंगी, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। ममता बनर्जी दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे किसानों से मिले बिना ही पश्चिम बंगाल रवाना हो गईं।

जब राकेश टिकैत से ममता बनर्जी के नहीं आने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बहाना बनाते हुए कहा कि उन्हें ममता बनर्जी के आने की कोई जानकारी नहीं थी। अपना बचाव करते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि  उन्हें मीडियाकर्मियों से उनके यहां आने की सूचना मिली थी। उन्होंने ममता को यहां आने का न्योता नहीं दिया था। सूत्रों के मुताबिक ममता बनर्जी किसान नेताओं से मिलने की इच्छुक नहीं थीं और ना ही उनके कार्यक्रम में ऐसा कोई प्लान था। लेकिन चर्चा थी कि शुक्रवार (30 जुलाई, 2021) को ममता यूपी गेट पहुंंचकर बीकेयू नेता राकेश टिकैत से मुलाकात कर सकती हैं।

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अय्याशजीवियों और देह व्यापार का अड्डा बना टिकरी बॉर्डर

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मोदी विरोधियों के संरक्षण में चल रहे किसान आंदोलन की सच्चाई वैसे तो कई 

जिस तरह से ममता बनर्जी ने किसान नेताओं की अनदेखी की है, उससे लगता है कि ममता बनर्जी को किसान आंदोलन की सच्चाई पता है। यह आंदोलन सिर्फ पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को देखते हुए जारी रखा गया है। इसके बाद इसका कोई अस्तित्व नहीं है। पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म हो चुका है और 2024 के आम चुनाव में काफी वक्त है। ऐसे में ममता बनर्जी ने राकेश टिकैत और अन्य किसान नेताओं को ज्यादा भाव देना उचित नहीं समझा। हालांकि मीडिया के जरिए किसानों से मिलने की खबर फैलाकर राजनीतिक संदेश देने में कामयाब रही, लेकिन राकेश टिकैत इंतजार करते रह गए। 

पहले किसानों के नाम पर खालिस्तानी एजेंडा इंप्लीमेंट किया जा रहा था

और अब किसान के नाम पर जाती के सम्मान का कार्ड खेला जा रहा है,

मुझे नहीं पता आपमें से कितनों को मुजफ्फरनगर वाला जाट नरसंहार याद है या नहीं, किंतु मुझे भली प्रकार याद है,

तब देश में कांग्रेस की सरकार थी चौधरी अजीत सिंह कांग्रेस के सहयोगी थे और सरकार में सम्मिलित भी थे , तब शांतिदूतों द्वारा एक जाट लड़की से छेड़खानी का विरोध करने पर लड़की के दोनों भाइयों को शांतिदूतों की भीड़ द्वारा दौड़ाकर चक्की के पाटों से कुचलकर मारा गया था, दोनों लड़कों की स्थिति ऐसी थी कि चेहरा तक पहचानना संभव नहीं था,

तब प्रदेश में समाजवादी सरकार थी आजम खान की तूती बोला करती थी,

तब जाटों द्वारा एक महापंचायत का आवाहन किया गया और उस आह्वान पर महापंचायत में सम्मिलित होने के बाद वहां  से लौटते समय शांतिदूतों की भीड़ द्वारा घात लगाकर जाटों पर आक्रमण कर दिया गया और उनका नरसंहार हुआ, शव नहर में फेंक दिए गए, कहते हैं कि अभी तक 18 लोग का कोई आता पता नहीं चला है, 

और तब जब इसका विरोध किया गया तब समाजवादी सरकार ने पुलिसिया कार्यवाही और झूठे मुकदमों द्वारा दमन पीड़ित जाट समुदाय का ही किया, उस घटना का नेटेरिव कुछ ऐसा बनाया गया जैसे पीड़ित जाट ही आक्रमणकारी रहे हो और हत्यारा समुदाय ही पीड़ित हो,

उस घटना के बाद कई बडे नेता  सब मुजफ्फरनगर पहुंचे थे, किंतु आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वह सब जाटों से मिलने नहीं केवल शांतिदूत समुदाय से मिलने गए थे, और उन्हीं को राहत पैकेज व् सहानुभूति देकर वापस लौट गए,

जाटों ने सोचा कि उनके नेता चौधरी अजीत सिंह तो कांग्रेस के साथ सत्ता में है और अजीत सिंह के सुपुत्र जयंत चौधरी तब सांसद हुआ करते थे, तब जाटों ने चौधरी अजीत सिंह जयंत चौधरी टिकैत परिवार सब का आव्हान किया, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इनमें से कोई भी उस समय जाटों के संग खड़ा होने नहीं आया दंगे चलते रहे पीड़ित जाट अपने नेता चौधरी अजीत सिंह को फोन मिलाते रहे परंतु उन्होंने तो मुजफ्फरनगर का दौरा करना तक उचित नहीं समझा,

और तब केवल एक पार्टी और उसके स्थानीय नेता थे जो जाटों के संग उनका समर्थन कर रहे थे व् उनकी आवाज मीडिया में उठाई, और जमीन पर उतरे, उनके नाम थे संजीव बालियान, संगीत सोम, सुरेश राणा , हालांकि इसकी कीमत इन लोगों ने अपने ऊपर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट झेलकर चुकाई परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि वह भाजपा और उसके नेता ही थे जो उस समय जाटों के साथ खड़े हुए थे, ना की चौधरी अजीत सिंह या जयंत चौधरी या टिकैत परिवार जो आज गणतंत्र दिवस पर अंजाम दिए अपने कुकर्मों को ढकने के लिए जाति का कार्ड खेलने बैठे हैं।

रोचक बात यह है कि दिल्ली पुलिस में जाट समुदाय की संख्या सर्वाधिक है और दिल्ली पुलिस के उन्ही पुलिस कर्मियों पर इसी टिकैत ने लोगों को बुलवाकर उन्हें भड़काकर हमले करवाये थे, जिसका परिणाम है कि 400 दिल्ली पुलिसकर्मी घायल बेड पर पड़े हैं, यानी कि स्वयं जाटों पर हमला करवाने वाला आज उसी जाट समुदाय का कार्ड खेलकर स्वयं को उस कद के नेता के रूप में स्थापित करना चाहता है जो करने हेतु वह आज तक प्रयासरत था

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