कांग्रेस जवाब दे: फ़िरोज़ जहांगीर खान का परिवार कब और कैसे हिन्दू बन गए? मुगलों के दिल्ली दीवान गयासुद्दीन और नेहरू परिवार का सम्बन्ध?

साभार 
डी एस आर्य, चेयरमैन, उगता भारत, गाज़ियाबाद 
सोनिया गाँधी के पुत्र राहुल गाँधी के पिता का नाम राजीव गाँधी। 
राजीव के पिता का नाम फिरोज जहांगीर खान। जो निश्चित रूप से हिंदू नहीं था। सर्वविदित है। तो कौन सी नस्ल हुई। पहचान करो।
परिवार और अंधभक्त जवाहरलाल, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी की समाधि पर पहुँच सकते हैं, लेकिन बहु(सोनिया), पोता(राहुल) और पोती(प्रियंका) अपने ससुर-दादा की कब्र पर कभी सजदा करने का साहस नहीं कर पाए, क्यों? अगर इन्होने अपने ससुर-दादा के पद-चिन्हों पर चलने का प्रयास किया होता, कांग्रेस का इतना बुरा हाल नहीं होता। कई वर्ष पूर्व भारत विश्व में ऊँचा स्थान पा चूका होता। 
फ्रेंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस ने 1555 में सटीक भविष्यवाणी की थी कि हिन्द(भारत) का 1947 में विभाजन होगा, फिर आज़ादी मिलेगी लेकिन फिर गुलाम बनेगा। बीच-बीच में आज़ादी की तरफ बढ़ेगा, लेकिन वास्तविक स्वतन्त्रता 2014 में अधेड़ उम्र के नेता में नई पार्टी के सत्ता में आने पर मिलेगी। जिसे Organiser Weekly में विस्तार से पढ़ा जा सकता है, बाजार में मिलने वाली जरुरत से अधिक सम्पादित किताबे नहीं। वास्तव में आज़ादी मिलने बाद के भारत आधुनिक मुगलों का गुलाम बना हुआ था।  
स्वतंत्र भारत में सबसे पहले घोटाले को उजागर कर फिरोज ने नेहरू के पसीने छुड़वा दिए 
संक्षेप संसद में अपने ससुर के पसीने छुड़ाने वाले राहुल और प्रियंका के दादा फ़िरोज़ खान पर रोशनी डालते हैं: 1952 में रायबरेली से पहले निर्वाचित सांसद चुने जाने के साथ ही फिरोज गांधी और जवाहर लाल नेहरू के रिश्तों में खटास आनी शुरू हो गई थी। कहा जाता है कि फिरोज गांधी राजनीति में बहुत ईमानदार और सक्रियता से काम करते थे इसलिए वह सरकर की आलोचना करने में पीछे नहीं रहते थे। इसकी वजह से उनके ससुर और देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी असहज होना पड़ता था।  
इसको लेकर दोनों के बीच संबंध कई बार तल्‍ख भी रहे लेकिन फिरोज गांधी का रवैया लगातार सरकार के प्रति आलोचनात्मक बना रहा। कहा जाता है कि फिरोज नेहरू सरकार की आर्थिक नीतियों और बड़े उद्योगपतियों के प्रति झुकाव को लेकर नाराज रहते थे। कहा जाता है कि आजाद भारत में सरकार का पहला घोटाला सामने लाने का श्रेय भी फिरोज गांधी को जाता है जिन्होंने दिसंबर 1955 में एक बैंक और इंश्योरेंश कंपनी के चेयरमैन राम किशन डालमिया के फ्रॉड को उजागर किया। जिन्होंने बैंकों के पैसे का उपयोग निजी कंपनियों में निवेश के लिए किया था। 
इसके बाद 1958 में उन्होंने संसद में हरिदास मूंदडा के एलआईसी में किए गए घोटाले को उठाया। उन्होंने ही देश की राष्ट्रीय इंश्योरेंस कंपनी में हुए इस बड़े घोटाले का पर्दाफाश किया था। उन्होंने सरकार की आर्थिक अनियिमितताओं को भी सामने लाना शुरू कर दिया। इस घोटाले को लेकर फिरोज गांधी का रुख इतना मुखर था कि विरोधी सांसदों से ज्यादा उनकी आवाज संसद में सुनी जाती थी। उनके इस विरोध ने जवाहर लाल नेहरू की पाक साफ छवि को भी नुकसान पहुंचाया। यह फिरोज गांधी ही ‌थे जिनके आवाज उठाने के कारण नेहरू सरकार के वित्त मंत्री टीटी कृष्‍णमाचारी को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके बाद ही फिरोज की आवाज शांत नहीं हुई और वो हर वाजिब मौके पर सरकार की आलोचना करने से नहीं चूकते थे।

खैर, बात सिर्फ यहीं समाप्त नहीं होती, वास्तविकता जानने के लिए इतिहास के उन पृष्ठों को खोलना होगा, जिसे परिवार भक्तों ने काली कोठरी में डाल जनता को कश्मीरी पंडित बताने का दुस्साहस किया है। इसके अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू के पिता का नाम मोतीलाल। मोतीलाल के पिता का नाम गयासुद्दीन ।

वह गयासुद्दीन जो अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के शासनकाल में दिल्ली का दीवान होता था। जब 1857 में बहादुर शाह जफर से शासन सत्ता अंग्रेजों ने छीन ली तो उनका दीवान गयासुद्दीन कश्मीर की तरफ भाग गया और बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार करके देश निकासा देते हुए रंगून भेज दिया गया।

जब गयासुद्दीन का पीछा करते हुए अंग्रेजों की सीआईडी कश्मीर पहुंची, तो  जानकारी होने पर गयासुद्दीन ने कश्मीर से भागकर आगरा आ गया। उसकी जानकारी सीआईडी को मिली तो सीआईडी आगरा पहुंच गई। लेकिन उससे पहले गयासुद्दीन को जानकारी हो गई इसलिए उसने आगरा छोड़ दिया। और ट्रेन में इलाहाबाद जाने के लिए सपरिवार  बैठा हुआ था। संदिग्ध होने के नाते उससे उसका नाम पूछा गया तो उसने सोची-समझी रणनीति के तहत तपाक से अपना नाम तुरंत पंडित गंगाधर बता दिया जिससे उसको गयासुद्दीन नाम से ना पहचाना जाए ।

बताया भी तो क्या बताया पंडित गंगाधर यानी कि हिंदुओं में सबसे उच्च जाति जो मानी जाती है वर्ण व्यवस्था के अनुसार भी जिसके प्रति लोगों की श्रद्धा होती है। बनना ही है तो वही बना जाए और फिर सीआईडी द्वारा छोड़ दिया और इलाहाबाद बस गए।

मोतीलाल ने वकालत इलाहाबाद में हाईकोर्ट में शुरु की। प्रारंभ में अच्छी वकालत नहीं चली। एक मुसलमान वकील मुबारक अली जो उस समय एक विख्यात वकील थे उनसे मित्रता की। मोतीलाल की शादी कश्मीर की मुसलमानी से हुई थी। जो बहुत खूबसूरत थी। मुबारक अली एक मुसलमान होने के नाते  शाम को रोज  रेड एरिया में जाता था। इस कमजोरी को मोतीलाल ने पहचान लिया था और मित्रता करके घर पर आना जाना व मुबारक अली को बुलाना प्रारंभ किया। मोतीलाल ने अपनी सहमति से मुबारक अली के साथ अपनी पत्नी के अवैध संबंध स्थापित कराए, जिससे जवाहरलाल पैदा हुआ। उसके पितृत्व को लेकर के मोतीलाल और मुबारक अली विवाद में हुआ लेकिन मुबारक अली ने मोतीलाल का नाम ही पिता के रूप में दर्ज कराया और जवाहरलाल की शिक्षा और पालन-पोषण का सारा खर्चा दिया, और मुबारक अली एडवोकेट ने अपनी एक बिल्डिंग मोतीलाल को उपहार स्वरूप दी जो पुरानी बिल्डिंग आज भी आनंद भवन में देखी जा सकती है। बाद में मोतीलाल ने एक और नई बिल्डिंग बनवाई वह भी आनंद भवन के पास ही है उसी प्रांगण में है दोनों को आज भी देखा जा सकता है।

अब इन लोगों की नस्ल को पहचानने के बाद आप क्या इनसे यह आशा रखोगे कि आप के पक्ष में बोलेंगे।

सोनिया कौन है? राजीव से शादी करने से पहले कौन थी? अर्थात क्या करती थी? राजीव से शादी क्यों की गई थी? क्या यह उसकी क्लास फेलो थी? ये तथ्य किसी से छुपे है क्या?

अरविंद घोष की पुस्तक को पढ़ो। इतिहास के इन तथ्यों की जानकारी आपको मिल जाएगी। यह मैं नहीं कह रहा अरविंद घोष के अलावा अन्य लोगों ने भी इस बात पर लिखा है।

गूगल फेल है यह बताने के लिए की  गंगाधर नाम का कोई दीवान, वह भी अंतिम दीवान दिल्ली का रहा हो। आरटीआई से डाल कर पूछ लो।

 मुगल सल्तनत हो और भला हिंदू दीवान हो ऐसा हो ही नहीं सकता।

इनकी निष्ठा राष्ट्र के साथ हो सकती है?

राहुल का डीएनए टेस्ट और फारुख अब्दुल्ला का डीएनए टेस्ट करवा दो निश्चित हो जाएगा।

कश्मीर में कौन सी नहर थी जिसके किनारे जाकर के बसे  हो और इनका नाम वहां से नेहरू हो गया हो ।

झूठ को इस देश में इस तरीके से प्रचारित किया गया व सत्य पर पर्दा इतने डाल दिए गए वह आज तक उजागर ही नहीं हो पाई। अब भी बहुत से साथी इस पर संदेह कर सकते हैं और उन्हीं पुरानी घिसी पिटी बातों पर ही विश्वास कर सकते हैं।

मान के योग्य साथियों चतुर्वेदी जी व शोभित शर्मा जी व अन्य विद्वत जनों से निवेदन करूंगा इतिहास को उसके सही तथ्यों के साथ प्रस्तुत करने  का प्रयास करेंगे।विपरीत टिप्पणी करने वाले उन साथियों से निवेदन करना चाहूंगा कि विपरीत टिप्पणी करने से पहले अरविंद घोष की पुस्तक पढ़ लेंगे।

कांग्रेस नेतृत्व मुद्दा विहीन हो चुका है।

यह देश आज तक नेहरू की गलत नीतियों का खामियाजा भुगत रहा है।

उपरोक्त के अतिरिक्त जब जम्मू कश्मीर के राजा हरी सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को  भारत में विलय का प्रस्ताव दिया नेहरू ने मना किया। सरदार वल्लभभाई पटेल ने कार्यवाही करके पाकिस्तान की सेना को रोका।नेहरू ने कहा कि यह मेरे प्रांत का मामला है आप इसमें हस्तक्षेप न करें सरदार जी। पाकिस्तान की सेना हिंदुस्तान की सेना है जहां जिस लाइन पर खड़ी है वही रोक दिया जाए हम इस मैटर को यू एन ओ से डिसाइड करा लेंगे। जिसको आज पीओके कहते हो यह सब नेहरू की देन । आज तक भारतवर्ष का कितना बड़ा नुकसान जन और धन को लेकर हो चुका है परंतु यह कांग्रेसी हैं कि जो बेशर्म है बे लिहाज है।इस पीओके के ऊपर या जम्मू कश्मीर के ऊपर या  बलूचिस्तान के ऊपर कल कोई युद्ध होता है और वह युद्ध विश्व युद्ध में परिवर्तित होता है( जिसकी संभावना है प्रबल है )तो इसके लिए नेहरू की गलत नीतियां ही जिम्मेदार होंगी

तत्कालीन राजा हरि सिंह के खिलाफ वर्ष 1943 में नेहरू ने अपने भाई शेख अब्दुल्लाह को भड़काया। और 1947 में सरदार बल्लभ भाई पटेल को इसीलिए राजा की सहायता करने से रोका था कि कि राजा हरि सिंह को पीटने दीजिए ।कमजोर होने दीजिए।जम्मू कश्मीर में शेख अब्दुल्ला को नेहरू राज्य सत्ता सौंपना चाहते थे।

अब यह सर्व विदित हो चुका है कि शेख अब्दुल्लाह, मोहम्मद अली जिन्ना और जवाहरलाल नेहरू तीनो भाई भाई थे। और तीनों ने मिलकर इस देश का बंटवारा 3 रियासतों में किया था । तीनों अलग-अलग तीनों रियासतों के मालिक बने थे।

कांग्रेस नेतृत्व बोलने लायक नहीं है। यदि कांग्रेस नेतृत्व में जरा भी नैतिक साहस है तो उपरोक्त बातों का जवाब भारत की जनता को चाहिए।

कांग्रेस के  लोग मर्यादा हीन और खोखले हो चुके हैं।

भारत की जनता अब इनका विश्वास नहीं करती है।

कांग्रेस के लोग और वामपंथी देश के गद्दार हैं।

क्योंकि ये चाइना का समर्थन करते हैं। पाकिस्तान का समर्थन करते हैं ।देश विरोधी शक्तियों का समर्थन करते हैं। उन से हाथ मिलाते हैं। उनके डिनर खाते हैं।

कहां तक लिखे इन कांग्रेसियों के बारे में।

कैसे एक दूसरे के करीब आए थे इंदिरा और फिरोज, पढ़िए 11 अनसुने किस्से

अमर उजाला(13 सितम्बर 2016) के अनुसार कांग्रेस के पूर्व सांसद और इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी का 13 सितम्बर जन्मदिवस है लेकिन उनकी पहचान सिर्फ इतनी भर नहीं है। आजाद भारत में फिरोज गांधी ऐसे पहले सांसद रहे जिन्होंने संसद और उसके बाहर अपनी ही पार्टी की सरकार की जमकर मुखालफत की वो भी तब जब इसके मुखिया उनके ससुर जवाहर लाल नेहरू ही थे। आइए आपको बताते हैं फिरोज गांधी के कुछ ऐसे ही अनसुने किस्सों के बारे में।

पांच भाई बहनों में सबसे बड़े फिरोज गांधी का असली नाम फिरोज घांदी था। उनके पिता जहांगीर घांदी गुजरात के भरूच के रहने वाले एक पारसी थे (हालांकि कुछ इतिहासकार उनके मुस्लिम होने का दावा भी करते हैं)। पिता की मौत के बाद फिरोज अपनी मां रत्तीमई फरदून के साथ भरूच से पहले मुंबई और फिर इलाहाबाद आकर रहने लगे। बताया जाता है कि यहां उनकी मौसी डा. शीरीन कमिसएरिएट रहती थीं, जो सिटी लेडी डफरिन हॉस्पिटल में एक प्रख्यात सर्जन थीं।

इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने विद्या मंदिर हाईस्कूल में एडमिशन लिया और यहां से स्कूली शिक्षा पूरी कर इविंग क्रिश्चियन कालेज से अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के साथ साथ उन्होंने आजादी के आंदोलन में भी भाग लेना शुरू कर दिया। 1930 में उन्होंने कई आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई। यहीं उनकी मुलाकात इंदिरा गांधी उर्फ इंदिरा प्रियदर्शनी से हुई।

फिरोज गांधी के सरनेम को लेकर इतिहासकारों में हमेशा ही विवाद रहा है। कहा जाता है‌ कि आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी से प्रभावित होकर अपना सरनेम घांदी से गांधी कर लिया था। जबकि किस्सा ये भी है कि इंदिरा गांधी से शादी के बाद जब पंडित जवाहर लाल नेहरू नाराज हुए तो महात्मा गांधी ने उन्हें अपना सरनेम गांधी दे दिया था जो आज तक गांधी परिवार के साथ चला आ रहा है। 

इंदिरा और फिरोज गांधी के प्रेम संबंध और शादी को लेकर भी बहुत किस्से प्रचलित हैं। कहा जाता है कि जब इंदिरा की मां कमला नेहरू टीबी की गंभीर बीमारी से जूझ रहीं थी तब फिरोज गांधी ने उनकी बहुत सेवा की थी। जब स्विटजरलैंड में कमला नेहरू की मौत हुई तब उनके साथ फिरोज गांधी वहीं मौजूद थे। इससे पूर्व एक बार एक आंदोलन के दौरान जब कमला नेहरू बेहोश होकर गिरीं तो फिरोज गांधी उन्हें अपनी बाजुओं में उठाकर ले गए थे। यह देख इंदिरा फिरोज से  काफी प्रभावित हुईं। 

इसी बीच दोनों एक दूसरे के नजदीक आए तो 1933 में 21 साल के फिरोज गांधी ने 16 साल की इंदिरा के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया। लेकिन इंदिरा और उनकी मां कमला नेहरू ने इसे खारिज कर दिया। बात आई गई हो गई और फिरोज फिर नेहरू परिवार के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में जुट गए। इसी बीच एक बार फिर इंदिरा और फिरोज की नजदीकियां बढ़ी और दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया। शुरूआत ना नुकुर के बाद जवाहर लाल नेहरू इस रिश्ते के लिए तैयार हो गए और मार्च 1942 में हिंदू रीति रिवाज से दोनों की शादी कर दी गई। लेकिन तब तक कमला नेहरू दुनिया छोड़ चुकी थीं।

शादी के बाद फिरोज ने पत्नी इंदिरा और ससुर ‌जवाहर लाल नेहरू के साथ और सक्रियता से आजादी के आंदोलन में भाग लेना शुरू कर दिया। इस कारण फिरोज को अगस्त 1942 में जेल भी जाना पड़ा। सालभर तक वह इलाहाबाद जेल में रहे। जेल से छूटने के बाद वह फिर आंदोलन में जुट गए। इसी बीच इंदिरा ने 1944 में राजीव और 1946 में संजय गांधी को जन्म दिया। (विस्तार से अमर उजाला(13 सितम्बर 2016) पढ़िए)

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