दीपावली पर “पटाखों” पर बैन लगाना अदालत ने फैशन बना लिया है

 

सुभाष चंद्र 

जब से दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल सरकार आयी है, देखा जा रहा है कि हिन्दुओं के पवित्र त्यौहार दीपावली के आते आते “प्रदूषण” पर विधवा विलाप सुप्रीम कोर्ट में शुरू हो जाता है।  दिवाली के पर्व को बर्बाद करने के लिए ही पराली जलाने जैसी तमाम योजनाएं शुरू हो जाती हैं केजरीवाल की सरकार और फिर सुप्रीम कोर्ट सबसे पहला हमला “पटाखों” पर करते हैं 

यह तमाशा हर साल होता है और फिर  दीपावली के कुछ ही दिन के बाद “प्रदूषण” स्वतः नियंत्रण में आ जाता है बिना किसी विशेष प्रयास के लेकिन दीपावली के पर्व के रंग में भंग डालने में सुप्रीम कोर्ट कोई कोर कसर नहीं छोड़ती जबकि इन दिनों से कोहरा गिरना हो जाता है, इन पटाखा विरोधियों द्वारा "प्रदुषण" का शोर मचाने से आज की युवा पीढ़ी और मीडिया कोहरे का नाम ही भूल गए। एक बार तो ऐसी याचिका दायर की गई थी जिसमें याची 6 महीने ऐसे डेढ़ साल के 3 बच्चों को बनाया गया था जिन्हे नाक साफ़ करने की समझ भी नहीं थी और सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई कर हाय तौबा मचा दी थी

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दीपावली के कथित प्रदूषण के लिए ऐसा ढोल पीटा जाता है कि सांसों पर पहरा लग गया जी, इतने बच्चे बीमार हो गए, इतने बूढ़े अस्पतालों में भर्ती हो गए इत्यादि इत्यादि जबकि साल के बारह महीने लोग बीमार होते हैं प्रदूषण समेत अनेक कारणों से लेकिन दीपावली पर हमला केवल किया जाता है “पटाखों” पर। क्या केजरीवाल सरकार, अदालत और मीडिया एक ऐसा दिन बताए, जिस दिन किसी प्राइवेट डॉक्टर से लेकर हॉस्पिटल में एक भी मरीज न जाता हो?

एक अध्ययन के अनुसार प्रदूषण मुख्यतः 4 कारणों से होता है :- 51% प्रदूषण Industrial Pollution से होता है; 27% मोटर गाड़ियों से; 17% फसलों के जलाने से (पराली से) और 5% अन्य कारणों से 

अब आप समझ लीजिए कि जो 5% प्रदूषण अन्य कारणों से होता है, उसमें “पटाखे” भी शामिल हैं और शायद इसमें से मात्र 2% का योगदान पटाखे जलाने से होता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश इस मूल समस्या पर ध्यान नहीं देते। क्या सारा प्रदूषण पटाखों से ही होता है? 

दिल्ली में केजरीवाल सरकार आने से पूर्व करवाचौथ से हिन्दू आतिशबाज़ी शुरू कर देते थे, कोई "प्रदुषण" का शोर मचता था, क्योकि उस समय की सरकारें श्राद्ध शुरू होते ही सक्रीय हो जाती थी। लेकिन केजरीवाल सरकार अपनी नाकामी हिन्दू त्यौहारों पर थोप अपने आपको जान-हितैषी बताने का स्वांग करती रहती है। अगर पटाखों से "प्रदुषण" होता है, फिर चुनावों में जो आतिशबाज़ी की जाती है, उस पर क्यों नहीं पाबन्दी लगाई जाती?  

जब 27% प्रदूषण मोटर गाड़ियों से होता है तो सुप्रीम कोर्ट के जजों को अपनी अपनी गाड़ियों में आने की बजाय सरकार से विशेष “बस सर्विस” शुरू करने के लिए कहना चाहिए और सभी को उस बस में आना चाहिए 

दीपावली को बर्बाद करने के लिए “Bollywood” के निर्लज्ज कलाकार भी लाइन लगा कर प्रचार में लग जाते हैं कि पटाखे मत जलाओ। जबकि सुप्रीम कोर्ट, केजरीवाल और ये Bollywood के डांगर कभी बकरीद पर बकरे काटने को बैन करने की बात करने की हिम्मत कभी नहीं करते क्योंकि इनमें शक्ति केवल हिन्दुओं को कुचलने के लिए ही होती है 

लोग तो पटाखे फिर भी जलाते हैं, कितने लोगों को जेल में डालोगे अपने अपने घरों में देख लीजिए कि क्या आपके बच्चे पटाखे नहीं जलाते लेकिन कोई मीडिया वाला उसका वीडियो जारी करने की हिम्मत नहीं करता

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