ब्रिटेन, यूरोप के बाद अमेरिका भी Islamophobia देखेगा - अमेरिका से अबकी बार चुनाव के बारे में Confusing Signals मिल रहे हैं -

सुभाष चन्द्र

अमेरिकी प्रशासन की भाषा भारत के लिए बदलती रहती है। कोई कुछ बोलता है तो कोई ऐसी बातें कह देता है जैसे भारत से रिश्ते बिगाड़ने को आतुर हैं कल मैंने अमेरिकी संगठन “अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग” (USCIRF) के बारे में लिखा था जो हमेशा भारत को मुस्लिमों को लेकर टकराव के मूड में रहता है और करीब ऐसा ही नजरिया अमेरिका का भी रहता है वह भी अन्य देशों के साथ मिलकर भारत को मुस्लिम विरोधी साबित करने में लगा रहता है बिना इस बात की पड़ताल किए कि मुस्लिम संगठन भारत में क्या कर रहे हैं

इतना ही नहीं ईरान और भारत के चाबहार पोर्ट को लेकर अमेरिकी सरकार ने भारत को आर्थिक प्रतिबंधों की धमकी तक दे दी ऐसे में भारत कैसे आंख बंद करके अमेरिका के पीछे चल सकता है

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दूसरी तरफ अमेरिका में आज स्थिति यह है कि अमेरिकी मुस्लिम अमेरिका के इज़रायल को समर्थन देने से और फिलिस्तीन एवं हमास के विरोध से खासे नाराज़ हैं और सड़कों पर हैं वर्ष के अंत में होने वाले चुनाव में अमेरिकी मुस्लिमों का नजरिया क्या रहता है, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता बाइडन की Democratic Party का यदि मुस्लिम समर्थन नहीं करेंगे तो ट्रंप अगर चुनाव लड़ते हैं तो मुस्लिम Republican Party को भी  किसी हाल में वोट नहीं देंगे समस्या यह है अमेरिका में कि वहां केवल दो दी दल हैं, भारत की तरह अनेक “सेकुलर ढक्कन पार्टियां” नहीं हैं जो मुस्लिमों के तलवे चाट सकें

पिछले चुनाव में चीन ने बहुत बड़ा खेला किया था जिसकी वजह से ट्रंप हारा था उस चुनाव से पहले “अश्वेत” लोगों को भड़काया गया था और मीडिया का रोल भारत के मीडिया की तरह काफी हद तक एकतरफा था अबकी मुस्लिमों को किस तरफ खींच कर ले जाया जाता है कह नहीं सकते या उन्हें वोट न डालने की सलाह दी जाती है यानी NOTA न होते हुए भी NOTA करेंगे घर बैठ कर

कल White House के सुरक्षा संचार सलाहकार जॉन किर्बी ने भारत की तारीफ़ करते हुए कहा कि दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र अमेरिका विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का मुरीद हो गया है; दुनिया में ऐसे देश बहुत कम हैं जहां भारत जैसा जीवंत लोकतंत्र है; भारत के साथ हमारे संबंध बहुत करीबी हैं और यह बहुत जीवंत, सक्रिय भागीदारी है

इसके अलावा कमला हैरिस को लगता है भारतीय मूल के वोटरों को रिझाने के लिए कहा कि अमेरिका में निर्वाचित पदों पर भारतीय मूल के अमेरिकियों की संख्या उनकी बढ़ती आबादी के मुकाबले कम है और कहा कि भारतवंशियों को राजनीति में ज्यादा सक्रिय होना चाहिए

सवाल यह है कि जैसा किर्बी ने कहा कि भारत अमेरिकी संबंध बहुत करीबी और जीवंत हैं, फिर हर समय किसी न किसी बात को लेकर खास कर मुस्लिमों को लेकर उटपटांग विलाप क्यों होता है जबकि अमेरिका चीन और पाकिस्तान के खिलाफ कुछ नहीं बोलता इतना ही नहीं, ऐसे संबंधों के क्या मायने है जो अमेरिका जब मर्जी प्रतिबंधों की धमकी दे देता है यह व्यवहार परिपक़्व नहीं माना जा सकता अमेरिका भारत के CAA का विरोध करता है लेकिन ईरान से आने वाले ईसाइयों के लिए खुद ऐसा कानून बनाता है

वैसे हर देश के नागरिक अपनी सोच के अनुसार वोट देते हैं लेकिन फिर वे अपने वतन को भी ध्यान में रखते हैं और भारतीय अमेरिकी भी ऐसा कर सकते हैं जबकि अनेक देशों से आकर रह रहे मुस्लिम अमेरिका में केवल इस्लाम को ध्यान में रखकर वोट करेंगे आज जो हालत ब्रिटेन और यूरोप की है जहां कई राज्यों में मुस्लिम कब्ज़ा करते जा रहे हैं, उससे अमेरिका को भी सावधान हो जाना चाहिए

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