कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ राज्यपाल द्वारा मुकदमा चलाने की अनुमति दिए जाने के बाद कांग्रेस की नियमित बयानबाज़ी शुरू हो गई। मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार को अस्थिर करने की साजिश है और इधर दिल्ली का सुरजेवाला Oxford की अंग्रेजी में कह रहा है “Political Vendetta by PM Modi; "act of shameless unconstitutionality" by the Governor, who is hell-bent on bulldozing the law and the Constitution to carry further BJP’s conspiracy. "In a brazen political conspiracy hatched in the .corridors of PMO and the Home Ministry in Delhi”
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यह मामला शुरू हुआ जब एक याचिका राज्यपाल के सामने दाखिल की गई प्रदीप कुमार, TJ Abraham advocate activist और स्नेहमयी कृष्णा द्वारा जिसमे MUDA (Mysore Urban Development Authority) द्वारा सिद्धारमैया की पत्नी को उनकी अधिग्रहण की गई जमीन के एवज में गलत तरीके से कहीं ज्यादा कीमत की Compensatory Land दी गई। अधिग्रहण की गई भूमि के लिए 50:50 के अनुपात में जमीन दी गई यानी 50% Developed land और 50% दूसरी। उनकी पत्नी पार्वती को ऐसी जगह जमीन दे गई जहां कीमत बहुत ज्यादा थी - भाजपा का आरोप है कि 3000 से 4000 करोड़ का घपला है।
राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने 26 जुलाई, 2024 को CM सिद्धारमैया को नोटिस जारी कर एक हफ्ते में जवाब मांगा था लेकिन उन्होंने कैबिनेट मीटिंग बुला कर राज्यपाल को कहा कि अपना नोटिस वापस लें और मुकदमा चलाने की मंजूरी भी। उपमुख्यमंत्री शिवकुमार कह रहे हैं कि अब्राहम तो क्रिमिनल background का व्यक्ति है।
अब मुकदमा चलाने की मंजूरी दिए जाने के खिलाफ सिद्धारमैया ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की है और केस लड़ने वाले एकमात्र कांग्रेस के वकील हैं अभिषेक मनु सिंघवी।
यह मामला राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र का बना दिया जाएगा कि क्या राज्यपाल को ऐसे मामलों में बिना मंत्रिमंडल की सिफारिश के फैसला लेने का अधिकार है या नहीं और यदि नहीं है तो क्या कैबिनेट इस पर अपनी संतुति देगी जब मामला मुख्यमंत्री से जुड़ा हो? यह अधिकार क्षेत्र का मामला फिर संविधान से जोड़ कर देखा जाएगा और फिर सिंघवी इसे सुप्रीम कोर्ट ले जाएगा जहां संविधान पीठ गठित होगी और जब तक फैसला नहीं हो जाता, तब तक के लिए राज्यपाल के आदेश पर रोक लग जाएगी। फिर मामला कम से कम 5 साल के लिए ठंडे बस्ते में जम जाएगा और तब तक अगले चुनाव हो जाएंगे।
और फिर कर्नाटक में यही आरोप प्रत्यारोप चलते रहेंगे। सिद्धारमैया सरकार पहले ही कर्ज जाल में फंसी हुई है और जनकल्याण की योजनाएं बंद हो रही है। मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का नतीजा, जनता को भी खिलाई रेवड़ियां और खुद भी खाईं लेकिन अब धरे गए राज्यपाल के हाथों।
जब से मोदी सत्ता में आए हैं 2014 से, तब से अक्सर विपक्ष के मुख्यमंत्री राज्यपालों से टकराव में ही रहते हैं, कुछ हैं केजरीवाल और ममता जैसे जिनकी किसी से भी नहीं बनती लेकिन अन्य भी उलझे रहते हैं।


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