आज कल सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसले सियासत से प्रेरित लग रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय ओका और जस्टिस मसीह की बेंच ने 26 सितम्बर को सेंथिल बालाजी को नौकरी के बदले रिश्वत लेने के 67.75 करोड़ के घपले में जमानत देते हुए माना कि उसे अभी इस स्टेज पर नहीं कह सकते कि बालाजी के खिलाफ Prima Facie PMLA का कोई केस नहीं है।
बेंच ने कहा कि PMLA के सेक्शन 45(1) (iii) की Stringent शर्तों में किसी को आप Unreasonable समय के लिए जेल में नहीं रख सकते लेकिन यह Unreasonable समय के परिभाषा कहीं नहीं है। ये शर्तें इस सेक्शन में हैं -
The accused must not be released on bail or their own bond unless the Public Prosecutor has been given the opportunity to oppose the application.
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लेखक चर्चित YouTuber |
The Court must be satisfied that there are reasonable grounds for believing that the accused is not guilty of the offense.
The Special Court can direct that a person under the age of 16, a woman, or someone who is sick or infirm be released on bail.
इसमें कुछ भी stringent नहीं है बल्कि सब कुछ कोर्ट पर छोड़ा गया है किसी को जमानत दे या न दे।
इसके बाद कोर्ट ने एक सवाल उठाया कि यदि किसी आरोपी का मुकदमा चलने के बाद Clean Acquittal हो जाए तो उसे undertrial के रूप में जेल में बिताए समय के लिए सरकार से मुआवजा मिलना चाहिए। इस तरह के बरी होने में वह केस शामिल नहीं हैं जिनमे गवाह मुकर जाएं या bonafide दोषपूर्ण जांच की गई हो। ये कोर्ट का फैसला नहीं है बल्कि Observation हैं।
यह सवाल गैर-जरूरी था जब आप सेंथिल की जमानत पर सुनवाई कर रहे थे और उसे निर्दोष भी नहीं मान रहे। फिर आपने Clean Acquittal को ऐसे मामले में क्यों उठाया? यानी कोर्ट ने Out of Syllabus sawal उठा दिया।
किसी भी आरोपी को जांच एजेंसी अपने आप तो जेल में नहीं रख सकती। उसे गिरफ्तार करने के बाद कोर्ट में पेश करना पड़ता है और जब कोर्ट संतुष्ट होता है तब ही उसे कोर्ट remand पर और फिर न्यायिक हिरासत में भेजती है और इस तरह किसी को जेल में रखने के लिए यदि जांच एजेंसी दोषी कही जा सकती हैं तो कोर्ट भी बराबर के दोषी होते हैं बल्कि ज्यादा दोषी होते हैं। तो यदि मुआवजा देने की बात है तो वह कोर्ट को भी देना चाहिए। कोर्ट के दोष का जुर्माना सरकार क्यों भरे क्योंकि कोर्ट सरकार के अधीन नहीं हैं।
यदि मुकदमों के फैसले 20 साल बाद होंगे और आरोपी बरी किए जाएं तो न्याय व्यवस्था को और अदालतों को दोषी मानना ही उचित होगा।
सेंथिल की गिरफ़्तारी 14 जून, 2023 को हुई थी और हाई कोर्ट ने 19 अक्टूबर को उसकी जमानत अर्जी ख़ारिज की थी। उसके बाद 28 नवंबर, 2023 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेला त्रिवेदी और जस्टिस एस सी शर्मा की बेंच ने सेंथिल की Health Grounds पर जमानत अर्जी ख़ारिज करते हुए कहा था कि उसका इलाज दवाओं से जेल में भी हो सकता है। तो कहने का तात्पर्य है कि वह अबकी बार 26 सितंबर को जमानत मिलने तक अगर जेल में रहा है तो ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सब जिम्मेदार हैं।
जस्टिस ओका और जस्टिस मसीह की बेंच ने किसी भी आरोपी के Clean Acquittal की बात करते हुए सेंथिल के खिलाफ आरोपों को इतना गंभीर भी माना कि उसे जमानत के लिए 25 लाख रुपए का बेल बांड देने के लिए कहा और साथ ही इतनी ही राशि के 2 sureties भी देने को कहा क्योंकि कोर्ट ने माना कि वह गवाहों और records के साथ छेड़छाड़ कर सकता है।
सेंथिल का ऐसे केस पर बेल देते हुए कोर्ट द्वारा Clean Acquittal की बात करना ऐसा है जैसे ‘बात न चीत, कोरी में लट्ठम लट्ठा’।
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