सुप्रीम कोर्ट ने EVM के खिलाफ याचिका करने वाले पर 25 लाख का जुर्माना क्यों नहीं लगाया; याचिका ख़ारिज करना ही काफी नहीं है; कोर्ट का समय बर्बाद होने का मतलब Taxpayer के पैसे की बर्बादी है; देखिए वीडियो

सुभाष चन्द्र

EVM के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में बेइज्जत होने के बाद विपक्ष सड़क पर हंगामा कर क्या साबित करना चाहता है? और जो मीडिया इस हंगामे को समर्थन देता है तो ऐसे मीडिया को गुलाम से बड़ा कोई शब्द हो तो उससे अलंकृत करना चाहिए। बैलेट पेपर को वापस लाकर विपक्ष क्या बूथकैप्चरिंग जैसे आपराधिक तरीकों से चुनाव जीतना चाहता है? बैलेट पेपर से देश का सबसे पहला चुनाव हुआ था, क्या निष्पक्ष हुआ था? बिलकुल नहीं। उत्तर प्रदेश के रामपुर से जवाहरलाल नेहरू के लाडले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को हिन्दू महासभा के विशन सेठ ने 6000+ वोटों से हारा दिया था, जो नेहरू से बर्दाश्त नहीं होने पर तुरंत उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लब पंत को चुनाव परिणाम को बदलने का आदेश दिया। जो इतिहास में दर्ज है। 'बूथकैप्चरिंग का मास्टरमाइंड जवाहर लाल नेहरू' शीर्षक से सोशल मीडिया पर बहुत लेख है। मौलाना आज़ाद को 3000+ वोटों से जीत दिलवाने का मतलब 9000+ बैलेट की हेराफेरी।           

अपने 26 अप्रैल, 2024 के लेख में मैंने एक मेघालय हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार की अपील खारिज सुप्रीम कोर्ट में ख़ारिज होने की चर्चा की थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका को Frivolous कह कर ख़ारिज करते हुए 5 लाख का जुर्माना लगाते हुए चेतावनी दी थी कि भविष्य में ऐसी Frivolous याचिकाएं दायर न की जाएं। इसका मतलब हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने “ब्रह्मवाक्य” समझ लिया जिसके खिलाफ केंद्र को अपील करने का भी अधिकार नहीं दिया

सुप्रीम कोर्ट में EVM के खिलाफ 40 से ज्यादा याचिकाएं ख़ारिज होने के बाद तो किसी भी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट को विचार करना ही नहीं चाहिए और याचिका दायर करने वालों पर भारी जुर्माना लगाना चाहिए क्योंकि ऐसी याचिकाएं Frivolous के सिवाय कुछ नहीं होती जिनसे कोर्ट का समय बर्बाद होता है और Taxpayer के पैसे की बर्बादी होती है। प्रशांत भूषण की EVM और VVPAT से मिलान की याचिका भी एक ऐसी ही Frivolous याचिका थी क्योंकि उसमे भूषण ने खुद कहा था कि गड़बड़ी नहीं हुई है लेकिन हो सकती है। फिर भी कोर्ट ने सुनवाई की और याचिका ख़ारिज की।

 

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कल एक KAPal की EVM की जगह बैलट पेपर से चुनाव कराने की मांग करने वाली याचिका पर जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए उसे फटकार लगाते हुए कहा कि जब आप जीत जाते हो तो चुप रहते हो और जब हार जाते हो तो EVM पर ठीकरा फोड़ते हो। 

यह याचिकाकर्ता कोई छोटा मोटा व्यक्ति नहीं है। उसने कोर्ट में बताया वह एक ऐसी संस्था का अध्यक्ष है जिसने 3 लाख से अधिक अनाथ और 40 लाख विधवाओं को बचाया है  और वह 150 देशों की यात्रा कर चुका है। जाहिर है अपने पैसे के दम तो वह यह सब नहीं कर रहा होगा और किसी NGO के नाम पर सरकार से पैसा लेकर काम कर रहा होगा मगर राजनीति तो उसका पेशा नहीं हो सकता। 

पाल ने कहा उसकी इस याचिका को 18 दलों का समर्थन और एलन मस्क भी कह चुके हैं कि EVM में गड़बड़ हो सकती है। लेकिन उसे पता नहीं एक दिन पहले मास्क ने भारत के इलेक्शन में वोटों की गिनती एक दिन में करने की तारीफ की है जबकि कैलिफोर्निया में गिनती अभी भी चल रही है। अब सवाल यह उठता है कि 18 दलों ने क्या उसे वकालतनामा दिया याचिका दायर करने के लिए और कितना पैसा दिया। पता नहीं किस वकील को खड़ा किया कोर्ट में पाल ने

अवलोकन करें :-

नेहरु थे भारत में पहली बूथ केप्चरिंग का मास्टर माइंड
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार जवाहर लाल नेहरू देश में हुए प्रथम आम चुनाव में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से

EVM के खिलाफ 40 याचिकाएं ख़ारिज होने के बाद भी याचिका दायर करने वाले KAPal जैसी मोटी आसामी पर सुप्रीम कोर्ट को कम से कम 25 लाख का जुर्माना लगाना चाहिए था

पता नहीं ऐसा क्यों नहीं करता सुप्रीम कोर्ट जबकि मोदी सरकार पर हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ अपील करने पर ही 5 लाख का जुर्माना लगा दिया। EVM पर इतनी याचिकाएं खारिज होने पर क्या नए मुद्दे उठ जाते हैं जिन पर कोर्ट सुनवाई को तैयार हो जाता है

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