यह सत्य है भारत के समस्त विपक्ष ने भारत विरोधी विदेशी शक्तियों से मिलकर कोशिश की थी कि येन केन प्रकारेण मोदी को हटा दें लेकिन वो हटा नहीं और मोदी के खिलाफ जैसा प्रचार किया गया, ट्रंप के खिलाफ भी वैसा ही प्रचार करके कोशिश की गई कि उसे आने से रोक दिया जाए लेकिन वह भी नहीं हो सका। अब मोदी और ट्रंप के आपसी घनिष्ठ निजी संबंधों के चलते यह आशा की जा रही है कि दोनों देशों के बीच संबंध और प्रगाढ़ होंगे। जहां मोदी India First की नीति पर चलते हैं, वहीँ ट्रंप ने भी “America First” को प्राथमिकता दी है।
ट्रंप के शपथ ग्रहण में विपक्षी दल के (Democrats) पूर्व राष्ट्रपति क्लिंटन, ओबामा और जो बिडेन मौजूद थे जबकि हमारे यहां मोदी के शपथ ग्रहण में विपक्षी दल के नेता शामिल होने से परहेज़ ही नहीं करते बल्कि कुछ तो उन्हें बधाई देना भी उचित नहीं समझते। यह फर्क है दोनों देशों के लोकतंत्र में।
ट्रंप की कुछ बातों पर विचार करते हैं। पहला तो उन्होंने WHO से अमेरिका के अलग होने का ऐलान किया है और पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका को अलग किया है। पेरिस समझौते से अलग होने की बात समझ नहीं आती जबकि WHO को ट्रंप एक बेकार संस्था समझते हैं जो शायद सही है क्योंकि सबसे ज्यादा योगदान उसे अमेरिका देता है और वह Covid समय में चीन की गोद में बैठा रहा। वर्ष 2022-23 में ही अमेरिका ने WHO को 15% यानी 128.4 करोड़ डॉलर का योगदान दिया था।
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मेरा ख्याल है ट्रंप शायद रूस की शर्त को मान लेंगे और यूकेन का पास कोई विकल्प नहीं है क्योंकि उसे पता है जल्दी ही ट्रंप उसे अमेरिका से मिलने वाले हथियारों की मदद बंद कर देंगे और फिर पूरा यूक्रेन हारने से बेहतर है कुछ क्षेत्र रूस को देकर शांति मोल ले ली जाए।
वैसे मेरे विचार में अब वैश्विक शांति के लिए और वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए अमेरिका और रूस को साथ आ जाना चाहिए जिससे चीन की विस्तारवादी नीति पर लगाम लगाई जा सकेगी।
बहुत लोग कह देते है कि अगर बर्लिन वाल गिर सकती है तो पाकिस्तान भारत एक साथ क्यों नहीं आ सकते? वह संभव नहीं है क्योंकि पाकिस्तान के बीज में नफरत और आतंक भरा है। लेकिन अमेरिका और रूस एक साथ आ सकते हैं क्योंकि चीन अमेरिका का तो विरोधी है ही, उसे मौका मिलेगा तो रूस को भी छोड़ सकता है।
ट्रंप ने जन्मजात नागरिकता बंद करने के जो आदेश दिए हैं, वे सैद्धांतिक रूप से गलत नहीं है क्योंकि इस नागरिकता का दुरुपयोग हो रहा है। ऐसी नागरिकता का प्रावधान अमेरिका के संविधान में है। भारत की तरह अमेरिका भी घुसपैठ का शिकार है और घुसपैठ करने वाले इस नागरिकता का गलत फायदा उठा रहे हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी के शासित 22 राज्यों ने ट्रंप के जन्मजात नागरिकता के आदेश का विरोध किया है और उस पर रोक लगाने के लिए उनके अटॉर्नी जनरलों ने मुकदमा दायर किया है।
भारत और अमेरिका के विपक्ष में “घुसपैठियों” के लिए एक जैसा विशेष प्रेम है।
ट्रंप से आशा की जाती है कि वह Deep State से विदेशों को दिए जाने वाले पैसे के बारे एक श्वेत पत्र जारी करे। उधर ट्रूडो धमकी दे रहा है कि हम पर कर लगाया तो हम जवाबी कार्रवाई करेंगे।

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