ताहिर हुसैन की अंतरिम जमानत पर, फिर रायता फैला दिया सुप्रीम कोर्ट ने;जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अगर ताहिर ने फिर दिल्ली को आग लगा दी तो क्या आप जिम्मेदारी लेंगे?

जस्टिस पंकज मित्तल, आरोपित ताहिर हुसैन और जस्टिस अमानुल्लाह )
सुभाष चन्द्र

जनवरी 22 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस पंकज मित्तल ने ताहिर हुसैन के अंतरिम जमानत पर विपरीत फैसले देकर एक बार फिर रायता फैला दिया। ऐसा रायता 15 अक्टूबर, 2022 को हिज़ाब मामले में भी फैलाया गया था जिस पर अभी तक 3 जजों की बेंच नहीं बनाई गई गई है 

मजे की बात है ताहिर हुसैन ने अंतरिम जमानत की याचिका दायर की जब दिल्ली हाई कोर्ट ने जमानत देने से मना कर दिया लेकिन याचिका की प्रति दिल्ली पुलिस को नहीं दी गई जो देना अनिवार्य होता है। जनवरी 21 को कोर्ट ने आदेश दिया पुलिस को याचिका देने के लिए लेकिन सवाल यह उठता है कि ऐसे में सुनवाई शुरू कैसे कर दी गई। ताहिर हुसैन ओवैसी की पार्टी से दिल्ली विधानसभा का चुनाव लड़ रहा है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस मित्तल ने हुसैन की याचिका खारिज कर दी। वहीं, जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि हुसैन को अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए। जस्टिस अमानुल्लाह द्वारा असहमति जताए जाने के बाद जस्टिस मित्तल ने कहा, “चूँकि हमारी राय अलग-अलग है, इसलिए रजिस्ट्री को इस मामले को तीसरे न्यायाधीश के गठन के लिए CJI के समक्ष रखना चाहिए।”

न्यायमूर्ति मित्तल ने कहा, “अगर चुनाव लड़ने के लिए अंतरिम जमानत दी जाती है तो इससे भानुमती का पिटारा खुल जाएगा। चूँकि देश में साल भर चुनाव होते रहते हैं, इसलिए हर कैदी यह दलील लेकर आएगा कि वह चुनाव में भाग लेना चाहता है और इसलिए उसे अंतरिम जमानत चाहिए। इससे मुकदमेबाजी के द्वार खुल जाएँगे और इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।”

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जस्टिस मित्तल ने यह भी कहा कि हुसैन के खिलाफ गंभीर आरोप हैं और इस बात की बहुत अधिक आशंका है कि अगर उन्हें जेल से बाहर आकर प्रचार करने की अनुमति दी जाती है तो वे गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने दोहराया कि चुनाव प्रचार करने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। इस बात का फैसला अदालत के विवेक पर निर्भर करता है कि अंतरिम जमानत दी जानी चाहिए या नहीं।

सोमवार 20 जनवरी को जस्टिस पंकज मित्तल ने ताहिर हुसैन की याचिका सुनते हुए टिप्पणी की थी कि “गंभीर मामलों में आरोपितों के चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए”। टिप्पणी गंभीर थी लेकिन इन जुबानी बातों का कोई लाभ नहीं होता। ताहिर हुसैन 24 फरवरी, 2020 के दंगों में मुख्य आरोपी है जिसमें 50 लोग मारे गए थे।

आज एक तरफ जस्टिस पंकज मित्तल ने जहां अंतरिम जमानत देने से मना कर दिया तो दूसरी तरफ जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने पुलिस की क्लास लगाते हुए कहा कि आप केस को 5 साल में ख़त्म क्यों नहीं कर सके केवल कुछ ही गवाहों को examine कर सके हम अपनी आंखे बंद नहीं कर सकते “What for is Article 21 of the constitution on right to personal liberty”. 

दूसरी तरफ जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि “ताहिर हुसैन के लिए चुनाव प्रचार करने के लिए  कोई मौलिक अधिकार नहीं है वो भारतीय नागरिक है और नागरिक के तौर पर उसके अधिकारों की respect होनी चाहिए लेकिन वह 11 मामलों में नामजद है and his bonafides as a citizen gets diluted”.

सोमवार की सुनवाई में ताहिर के वकील सिद्धार्थ अग्रवाल ने जब कहा कि वह तो दंगे के समय मौजूद ही नहीं था, तो जस्टिस पंकज मित्तल ने कहा कि चार्जशीट पढ़िए, और जब वकील ने ताहिर के घटना स्थल पर मौजूद होने का वाक्य पढ़ना छोड़ दिया तो जस्टिस मित्तल ने उन्हें टोकने हुए कहा कि “पूरा भाग पढ़िए, इसके अनुसार आपकी वहां मौजूदगी है”

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने पुलिस के वकील से कहा था कि “आप बताइये कि जब उसे 11 में से 9 मामलों में जमानत मिल चुकी है और उसकी नियमित जमानत पर विचार किया जा सकता है तो अंतरिम जमानत पर क्यों नहीं? 

सारी बातों को निचोड़ यह निकलता है कि शायद जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ताहिर हुसैन को किसी भी तरह जमानत देना चाहते थे और उसका कारण मज़हब भी हो सकता है वो पूछ रहे हैं कि 5 साल में केस ख़त्म क्यों नहीं हुआ तो जनाब ऐसे मामलों की लिस्ट बहुत लंबी जो सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्टों में 10-10 साल से लटके हुए हैं

आप जमानत देने से पहले यह तो सोच लेते कि ताहिर के कथित तौर पर किए गए दंगों में 50 लोग मारे गए थे आप यह बताइए कि क्या मरने वालों का कोई Right to personal liberty और right to life नहीं था अगर जमानत पर आप उसे right to personal liberty के नाम पर  छोड़ते है और फिर वह दंगे कर लोगों की हत्या करता है तो क्या आप उसकी जिम्मेदारी लेंगे 

आज(जनवरी 22) की खबर थी कि कल दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर भी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए बोले कि पुलिस की दलीलें अंतहीन नहीं चल सकती कौन क्या कह सकता है, उनकी मंशा क्या रही होगी? 

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