सुप्रीम कोर्ट का समाज को गर्त में धकेलने वाला एक शर्मनाक फैसला; मृत नाबालिग बच्ची से बलात्कार को भी अपराध नहीं माना

सुभाष चन्द्र

दिसंबर के अंत में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता की पीठ ने 9 साल की बच्ची की हत्या के बाद उसके साथ किए गए बलात्कार के आरोप से आरोपी को बरी कर दिया अपने निर्णय में जजों ने कहा कि "नेक्रोफीलिया" कानून के अनुसार रेप की श्रेणी में नहीं आता इस शब्द "नेक्रोफीलिया" का अर्थ है “शवों के प्रति यौन आकर्षण और/या उनके साथ यौन क्रियाओं में संलग्न होना”

हाई कोर्ट ने कहा कि रेप का प्रावधान उन पीड़ितों पर लागू होता है जो जीवित हों मृत महिला के साथ संभोग रेप नहीं है हालांकि यह आतंकित करने वाला कृत्य माना जा सकता है।  

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हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि “यह हमारे संज्ञान में लाया गया है कि अधिकांश सरकारी और निजी अस्पतालों में, विशेष रूप से युवा महिलाओं के शवगृह में रखवाली के लिए नियुक्त परिचारक शवों के साथ संभोग करते हैं इसलिए राज्य सरकार के लिए यह सुनिश्चित करने का समय आ गया है कि ऐसा अपराध न हो, जिससे महिला के शव की गरिमा बनी रहे हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बारे में कानून बनाने को कहा

यानी आप इस कृत्य को अपराध कह भी रहे हैं लेकिन उसके लिए सजा नहीं देना चाहते?

महान जजों ने कहा कि “ Trial court has erred in law by acknowledging the fundamental truth that necrophilia constitutes the fragrant infringement  upon the rights of deceased, who are entitled to dignified funeral”

मुझे समझ नहीं आता कि ट्रायल कोर्ट ने गलती कैसे की क्योंकि मृत बच्ची को Dignified अंतिम संस्कार तो मिला ही नहीं जब उसके साथ आरोपियों ने दुष्कर्म कर दिया 

इस निर्णय के खिलाफ छत्तीसगढ़ सरकार सुप्रीम कोर्ट गई और जस्टिस सुधांशु धुलिया और जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने हाई कोर्ट के निर्णय को उचित ठहरा दिया जजों ने कहा कि  "नेक्रोफीलिया" को कानून में अपराध नहीं माना गया और इस मुद्दे की जांच करना और जरूरी होना कानून में बदलाव का काम है इसलिए हम हाई कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकते

यानी सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार पर ठीकरा फोड़ दिया कि आप कानून बनाइये और वर्तमान कानून में हम कुछ नहीं कर सकते 

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलील नहीं मानी कि IPC के section 375 में यह रेप की श्रेणी में आता है सेक्शन में A man is said to commit "rape" अगर वह 7 में से एक भी श्रेणी के अनुसार अपराध करता और 7वीं शर्त कहती है कि यदि महिला सेक्स के लिए अपनी सहमति न दे 

आप कानून को कैसे भी तोड़ मरोड़ लीजिए या अदालतों ने पहले जो भी निर्णय दिए हों, उनसे मुझे सरोकार नहीं है लेकिन 100 बात की एक बात है कि मृत महिला तो सहमति दे ही नहीं सकती और इसलिए उसके साथ किया गया sex बलात्कार ही कहलायेगा

सुप्रीम कोर्ट आज सरकार को कानून बनाने की सलाह दे रहा है जबकि जब से संविधान लागू हुआ है, कोर्ट ने कितने ही कानूनों की व्याख्या अपने तरीके से करके नए कानून बना दिए वर्तमान में PMLA 2002 ही देख लो, रोज नई व्याख्या करके अपराधियों को बचा रहे हैं सुप्रीम कोर्ट समेत सभी कोर्ट

संविधान में कहीं कॉलेजियम का जिक्र नहीं था लेकिन आपने वह कानून स्वयं बना दिया और अभी थोड़े दिन पहले संविधान के  जिस अनुच्छेद 105(2) में साफ़ लिखा है कि सांसदों को रिश्वत के आरोपों में Immunity प्राप्त है, उस कानून को सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिया और कहा कि सांसदों को संसद में भी रिश्वत के लेन देन से कोई Immunity नहीं है 

जितने कानून सुप्रीम कोर्ट और High Courts ने बदले हैं, उनका संग्रह संविधान से बड़ा संविधान बना सकता है कानून अपनी मर्जी से बनाना एक आदत बन गई है सुप्रीम कोर्ट की समाज और देश जाए भाड़ में

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