कांग्रेस ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पर ही दोष मढ़ दिया कि उन्हें भ्रम हुआ है कि जो पैसा बांग्लादेश को गया, उसे भारत को दिया बता दिया। लेकिन एलन मस्क की रिपोर्ट में साफ़ था कि 21 मिलियन डॉलर भारत को आया और 29 मिलियन डॉलर बांग्लादेश को गया।
दरअसल फरवरी 22 को इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में भारत आए पैसे को बांग्लादेश का पैसा बता दिया और तब से कांग्रेसी उस पर ही चौड़े हो गए, आज Washington Post ने भी कहा है कि भारत को पैसा देने की सूचना गलत है और कांग्रेस की जैसे बांछे खिल गई कि अमेरिकी अख़बार ने भी कह दिया कि कोई पैसा नहीं आया। ये Washington Post और कई अमेरिकी अख़बार चीन से फंडिंग लेते हैं।
यानी एक बार फिर जो विदेशी अख़बार कह रहा है या इंडियन एक्सप्रेस बिना किसी सबूत के कह रहा है, बस उसे ब्रह्म वाक्य मान लिया कांग्रेस ने और मोदी सरकार से एक White Paper लाने की मांग कर रहे हैं।लेखक
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अगर कोई पैसा न आया होता तो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त Shahabuddin Yaqoob Quraishi और इंटरनेशनल फाउंडेशन फॉर इलेक्टोरल सिस्टम (IFES) के बीच 2012 में MOU क्यों साइन हुआ? इस IFES का संबंध जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से था। बस यही काफी है साबित करने के लिए कि अमेरिका से पैसा 2012 से ही आ रहा था और 2024 में 182 करोड़ आया।
ये पैसा आता था Consortium for Elections and Political Process Strengthening (CEPPS) | Archive - U.S. Agency for International Development जिससे महुआ मोइत्रा के भी संबंध बताये जाते हैं। 182 करोड़ का माला उठने के बाद इस संगठन के वेबसाइट अब भारत में बंद दिखाई जा रही है। कांग्रेस ने हिंडनबर्ग पर भरोसा कर अडानी और भारत की अर्थव्यवस्था को चोट दी लेकिन अब वह भी अपनी दुकान बंद कर चुका है और अभी न जाने कितनी दुकान और बंद होंगी। अमेरिका में लोग नौकरी से या तो निकाले जा रहे हैं और छोड़ कर भाग रहे हैं।
White पेपर आ गया तो पूरा मुंह काला हो जाएगा कांग्रेस का और ये White Paper आना चाहिए अमेरिका से और रूस से जिससे पता चलेगा कि भारत में कितने नेता और मंत्री KGB से सैलरी लेते थे।
अनेक लोग और संस्थाएं हैं जिन्हें पैसा मिला दुष्प्रचार करने के लिए। मेरी नज़र में यह पैसा चंद्रचूड़ और उसके गिरोह के जजों को भी गया होगा जिन्होंने Electoral Bonds को ठीक चुनाव से पहले रद्द किया। एक साल से रिज़र्व किया गया AMU का फैसला नहीं सुनाया जबकि इलेक्टोरल बांड्स पर फैसला चुनावों को प्रभावित करने के लिए दिया। और उस पैसे की सीढ़ी प्रशांत भूषण समेत दिग्गज वकील रहे होंगे।
भारत के वामपंथी न्यूज़ पोर्टल The Print, Caravan, Quint, Scroll और The Wire खास लाभार्थी हो सकते हैं। सैम पित्रोडा, प्रशांत भूषण, हर्ष मंदर, अरुंधति रॉय, योगेंद्र यादव, सबा नकवी, राणा अय्यूब, रविश कुमार, ध्रुव राठी, पुण्य प्रसून वाजपेयी, अभिसार शर्मा, अरफ़ा खानम और न जाने कितने दलाल पत्रकार इस पैसे के कांड में शामिल हो सकते हैं।
मोदी सरकार ने कहा है कि अमेरिका से मदद लेने वालों की जानकारी मांगी जाएगी।
वैसे आज जो यह मामला उठा है उसका किसी को एक वर्ष पहले आभास भी नहीं था लेकिन पिछले वर्ष मोदी जी के लोकसभा में कहा था कि इको सिस्टम चलाने वालों उनकी ही भाषा में जवाब दिया जायेगा। लगता है अब वह जवाब देने का समय आ गया है। कांग्रेस की राहुल पनौती का भी नंबर लग सकता है।
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