शिया वक़्फ़ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिज़वी जो इस्लाम त्याग कर हिंदू हो गए, को अप्रैल 21 को हरिद्वार की अदालत ने 2021 की धर्म संसद में दी गई कथित “Hate Speech” के मामले में दोष मुक्त कर दिया।
Chief Judicial Magistrate Avinash Srivastava acquitted Tyagi observing that :-
“For an offence under Section 153A of the IPC, it is not sufficient for just one individual to feel hurt. Nor is causing offence an essential ingredient of the offence under this section. While hurting religious sentiments through spoken words may be punishable under Section 298 IPC, it is essential that such words be uttered in the hearing or presence of the person allegedly offended — which is not the case here.”
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लेखक चर्चित YouTuber |
17 से 19 दिसंबर, 2021 को हरिद्वार में हुई धर्म संसद में उन पर इस्लाम और पैग़म्बर मुहम्मद के लिए अपशब्द बोलने का आरोप लगाया गया था और 2 जनवरी, 2022 को FIR दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। 13 सितंबर, 2022 को उन्हें जमानत मिली और आज करीब ढाई साल बाद उन्हें आरोपों से बड़ी किया गया। CJM अविनाश श्रीवास्तव ने उन पर लगे आरोपों को नकार दिया।
अब प्रश्न यह उठता है कि जितेंद्र त्यागी को 9 महीने जेल में रखने के लिए कौन जिम्मेदार है? उन पर दिए गए निर्णय से साफ़ है कि उन्होंने जो कुछ भी कहा, वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में रह कर ही कहा। सुप्रीम कोर्ट उस समय खासा सक्रिय था और उसने सवाल किया था कि आरोपी अब तक गिरफ्तार क्यों नहीं हुए?
जितेंद्र त्यागी ने यह भी आरोप लगाया था कि जेल में उन्हें जहर देकर मारने की कोशिश की गई थी और बड़े बड़े वकीलों को लगाया गया था जिससे उन्हें जमानत न मिल सके। यह केवल इसलिए किया गया क्योंकि उन्होंने इस्लाम त्याग कर सनातन धर्म को अपना लिया था। उनके परिवार के लोग इस्लाम को ही मान रहे थे, इसलिए उन्होंने अपनी वसीयत में उन्हें उनका अंतिम संस्कार करने से भी मना कर दिया था। अंतिम संस्कार के लिए उन्होंने जिम्मेदारी अपने मित्रों को दी थी कि वे उनका अंतिम संस्कार सनातन परंपरा से करें।
वक़्फ़ संशोधन कानून पर उन्होंने कहा है कि यह एक अच्छा कानून है और किसी को नुकसान नहीं देगा। बंगाल की हिंसा पर उन्होंने कहा कि यह शाहीन बाग़ को दोहराया जा रहा है जिसमें CAA और NRC लागू न होने के लिए हिंसा की गई थी।
जितेंद्र त्यागी वही वसीम रिज़वी हैं जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कुरान की 26 आयतों पर प्रतिबंध लगाने के लिए याचिका दायर की थी लेकिन पारसी जज RF Nariman ने याचिका बिना कोई कारण दिए खारिज करते हुए उन पर 50,000 का जुर्माना ठोक दिया था।
वसीम पर जुर्माना ठोकने से पहले कोर्ट को Calcutta High Court में 124 आयतों के खिलाफ हुई गवईयों का संज्ञान लेना था। फैसला चाहे जो कुछ भी आया हो। लेकिन Calcutta High Court ने याचिकाकर्ता पर कोई जुर्माना नहीं लगाया था, यानि केस में बहुत दम था। दूसरे, दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट के मेट्रोपोलिटन जज Z S Lohat ने 31 जुलाई 1986 को कुरान की 24 आयतों के खिलाफ फैसला दिया था।
अवलोकन करें:-
अभी वक़्फ़ पर बहस में चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को कहा था कि - “माफ़ कीजिए मेहता जी, हम यहां किसी धर्म के आधार पर न्याय नहीं करते, जब हम इस बेंच पर बैठते हैं तो अपना धर्म भूल जाते हैं, हम पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष हैं और हमारे लिए हर पक्ष बराबर होता है”।
अगर ऐसा ही होता तो जितेंद्र त्यागी गिरफ्तार न होते और उदयनिधि स्टालिन सनातन धर्म को मलेरिया डेंगू और सनातन को ख़त्म करने की बात करने वाला गिरफ्तार होता लेकिन आपने ऐसा नहीं होने दिया। अगर आप सच में धर्मनिरपेक्ष होते तो तत्कालीन चीफ जस्टिस JS Khehar ट्रिपल तलाक का केस सुनने से पहले न कहते कि यदि यह इस्लाम का विषय है तो हम दखल नहीं देंगे और उन्होंने ट्रिपल तलाक को वैध करार दिया। कितने ही मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट धर्मनिरपेक्ष न होकर हिंदू विरोधी और मुस्लिमों का पक्ष लेता दिखाई देता है।
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