सुप्रीम कोर्ट के ऐसे निर्णय समाज को प्रदूषित ही करेंगे; महिला ने माना उसके बच्चे का पिता उसका पति नहीं, कोई और है, फिर भी कोर्ट ने पति को ही बच्चे का पिता कहा

सुभाष चन्द्र

जनवरी, 2025 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस भुइया की पीठ ने Indian Evidence Act के सेक्शन 112 का सहारा लेते हुए निर्णय दिया कि एक महिला का पति ही उसके बच्चे का पिता माना जाएगा बेशक महिला ने स्वीकार किया कि बच्चा उसके पति से नहीं किसी और व्यक्ति से पैदा हुआ है।  आपको भी यह निर्णय सुनकर क्रोध भी आएगा और हंसी भी आएगी 

ऐसे मामले समाज में बढ़ सकते हैं क्योंकि जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने एक निर्णय में महिलाओं को “Sexual Autonomy” दे दी थी जिसका मतलब था कि महिला अपने पति से साथ शादीशुदा होते हुए भी किसी अन्य व्यक्ति के साथ काम संबंध बना सकती है

Indian Evidence Act का सेक्शन 112 कहता है -

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“It states that if a child is born during the continuance of a valid marriage between their mother and another man, or within 280 days after its dissolution, the mother remaining unmarried, it is considered conclusive proof that the child is the legitimate son of that man.”

लेकिन जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया, उसमे तो महिला ने स्वयं माना कि उसके बच्चे का पिता उसका पति नहीं कोई और है जिससे बच्चे का जन्म 2001 में हुआ तब तक महिला अपने पति के साथ रहती थी और उसका तलाक 2006 में हुआ केवल इस आधार पर निर्णय दिया गया कि दोनों साथ रहते थे और एक दूसरे से संबंध रख सकते थे लेकिन साथ रह कर भी दूरी हो सकती है जिससे sexual relation जरूरी नहीं माने जा सकते

महिला ने तलाक के बाद उस व्यक्ति का नाम बच्चे के पिता के रूप में जन्मप्रमाणपत्र में दर्ज करने को कहा जिसे मुंसिफ और हाई कोर्ट ने मना कर दिया 2015 में बच्चे ने अपने जैविक पिता से गुजारा भत्ते की मांग की और DNA टेस्ट की भी मांग की लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने महिला के पति को ही बच्चे का कानूनी पिता घोषित कर दिया जिसका मतलब यह हुआ कि महिला पति ही बच्चे को गुजारा भत्ता देगा चाहे वह उसका पिता नहीं भी था और चाहे उसका तलाक ही क्यों न हो गया हो

सुप्रीम कोर्ट ने DNA के लिए कहा कि ➖

“"When there is sufficient evidence to presume legitimacy, courts cannot mandate DNA test to establish paternity, as it would violate the privacy of the man whom the wife has allegedly identified as the child's father."

यहां तो DNA की जरूरत ही नहीं थी क्योंकि महिला ने स्वयं उस व्यक्ति को अपने बच्चे का जैविक पिता स्वीकार किया था फिर ऐसे मामलों में DNA टेस्ट ही एकमात्र रास्ता रहता है जबकि बच्चे के पिता के बारे में कोई शंका हो 

सुप्रीम कोर्ट को याद रखना चाहिए था कि नारायण दत्त तिवारी को भी DNA टेस्ट के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिए थे लेकिन DNA सैंपल देने के बाद उन्होंने शेखर को अपना पुत्र स्वीकार कर लिया था

पति पत्नी की accessibility ही एकमात्र पैमाना नहीं है तय करने के लिए कि पति ही बच्चे का पिता है संबंध तो महिला किसी के साथ कभी भी कहीं भी बना सकती है चाहे दिन में या रात में बाहर जाकर जब उसे वैसे भी चंद्रचूड़ ने sexual autonomy दे दी जिसके चलते कौन किसका पिता है यह केवल महिला ही बता सकती है

जो निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने दिया वह समाज को प्रदूषित करने वाला था और निंदनीय है जो पति पत्नी की बीच सौहार्द और विश्वास को कम करने का काम करेगा क्या पता इन जजों के परिवारों में ऐसे मामले चल रहे हों जो इतने खुले निर्णय देते हैं

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