कौन सी ऐसी संस्था है जिस पर सुप्रीम कोर्ट निगरानी नहीं चाहता पर खुद की “स्वतंत्रता अक्षुण्ण" रखना चाहता है

सुभाष चन्द्र 

“एक देश एक चुनाव” के लिए गठित संसदीय समिति के सामने कल पूर्व चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ और जे एस खेहर ने पेश होकर अपने विचार रखते हुए कहा कि एक देश एक चुनाव संवैधानिक प्रक्रिया है। इसके लिए संसद में पेश किए गए बिल के प्रावधानों पर उन्होंने चिंता जताई।

यह चिंता जताते हुए उन्होंने जो कहा, उसे पढ़ कर मुझे कुछ हंसी आ गई।

चंद्रचूड़, खेहर के अलावा पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई भी ऐसी चिंता जाता चुके हैं। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक में चुनाव आयोग को दी गई शक्तियों के जरिए चुनाव आयोग को “व्यापक छूट” देना सही नहीं है।

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चंद्रचूड़ और खेहर ने कहा कि चुनावों के संचालन के लिए एक “निगरानी तंत्र” होना चाहिए। वैसे विपक्ष के आरोप को नकारते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून  संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। उनकी आपत्ति विधेयक की धारा 82A(5) थी जिसमें चुनाव आयोग को विधानसभा चुनाव कराने के लिए व्यापक छूट दी गई है।

जस्टिस खेहर ने कहा कि संसद या केंद्रीय मंत्रिपरिषद को विधानसभा चुनाव कराने के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए जैसा संविधान के 129वें संशोधन विधेयक की धारा 82A(5) के तहत प्रावधान किया गया है। वर्तमान स्वरुप में यह धारा कहती है कि यदि चुनाव आयोग की यह राय है कि किसी विधानसभा का चुनाव लोकसभा के साथ नहीं कराया जा सकता तो वह राष्ट्रपति को ऐसा घोषित करने की सिफारिश कर सकता है और उस विधानसभा के चुनाव बाद में कराया जाए। 

11 जुलाई को ही सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची पुनिरीक्षण पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग के काम को संविधान के अनुसार सही बताया था और कहा था कि मतदाता सूची में बदलाव करना आयोग का काम है। लेकिन चंद्रचूड़, खेहर और गोगोई का कहना कि चुनावों के संचालन पर “निगरानी तंत्र” होना चाहिए के बेहूदा विचार है और संसदीय समिति को इस पर संज्ञान नहीं लेना चाहिए।

इन पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के विचार न्यायपालिका के विचार ही माने जाने चाहिए जो सभी संथाओं पर निगरानी तंत्र चाहती है लेकिन खुद के कार्यो पर किसी निगरानी तंत्र जरूरी नहीं समझती जिसकी सर्वाधिक आवश्यकता है। न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखना चाहती है और बाकि सभी को अपने सामने मतमस्तक देखना चाहती है। 

न्यायपालिका समझती है कि NJAC में एक मंत्री होने से उसकी स्वतंत्रता खतरे में पड़ गई और इसलिए जजों की नियुक्ति में किसी का दखल नहीं चाहती लेकिन CBI डायरेक्टर की नियुक्ति में चीफ जस्टिस पैनल में होना चाहिए।  एक बेंच ने ED को PMLA में मिली शक्तियों को सही कहा गया लेकिन 3 साल से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट नई नई व्याख्या देकर PMLA कानून और ED को पंगु कर रहे हैं।

न्यायपालिका ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए भी कॉलेजियम बना दिया था जिसमें बिना कारण चीफ जस्टिस को सदस्य बना दिया गया। सरकार ने वह फैसला पलट दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो CBI के काम की समीक्षा करेगा जबकि उसका success rate 74-76 % है। अपना रेट देखिए कितने केस लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना ने ऑक्सीजन सप्लाई पर भी निगरानी की। लेकिन केजरीवाल की चोरी पर चुप रहे।

कोई ऐसा कानून नहीं बना पिछले 11 साल में जिसके खिलाफ आपने सुनवाई न की हो। कृषि कानूनों पर रोक लगा कर समिति गठित कर दी और उसकी रिपोर्ट पर 8 महीने सोते रहे।

आपके नज़रिए में हिन्दू विरोध और कथित राजनीतिक सेकुलरिज्म की झलक दिखाई देती है। 

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के कामकाज के लिए ही एक “निगरानी तंत्र” बनाया जाना चाहिए, उसके हर फैसले का फोरेंसिक ऑडिट होना चाहिए।

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