चाहे कोई सुप्रीम कोर्ट में जज हो या रिटायर हो जाए, किसी की जुबान पर कोई कंट्रोल नहीं होता, जिसके मन में जो आता है, कुर्सी पर बैठ कर वह करता है और रिटायर होने के बाद भी प्रवचनकर्ता बन जाता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि न्यायपालिका की, खासकर सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों की थाह पाना संभव नहीं है जिसके जज धरती के भगवान से अपने को बड़ा समझते हैं।
सर्वशक्तिमान है सुप्रीम कोर्ट, यह जानते हुए भी कुछ दिन पहले हाल ही में रिटायर हुए चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा एक संवैधानिक संस्था को “असीमित शक्तियां” देना लोकतंत्र के लिए चिंता की बात है, वह चुनाव आयोग को शक्तियां देने की बात कर रहे थे। जबकि एक अन्य रिटायर हुए जज अभय एस ओका ने कहा है कि सरकार कोई भी हो दमन करती है और भारत में मौलिक अधिकार खतरे में हैं।
![]() |
| लेखक चर्चित YouTuber |
संजीव खन्ना को अपनी “असीमित शक्तियां” याद नहीं है कि कैसे उन्होंने केजरीवाल को बचा लिया। उसे जमानत दी चुनाव प्रचार के लिए जबकि उसने जमानत मांगी नहीं और फिर 12 जुलाई, 2024 को उसे नियमित जमानत दे कर उसकी गिरफ़्तारी की वैधता को 3 जजों की बेंच को भेजने के आर्डर कर दिए लेकिन वह बेंच आज एक साल बाद भी नहीं बनी जबकि 3 चीफ जस्टिस बदल गए। ये है सुप्रीम कोर्ट के हाथ में असीमित शक्ति।
सुप्रीम कोर्ट की असीमित शक्ति इतनी है कि वह अन्य संवैधानिक संस्थाओं की काम रोक सकता है। लोकपाल के काम को रोका और अब चुनाव आयोग की SIR को रोकने की धमकी दी है।
यह सुप्रीम कोर्ट है या “तानाशाहों” की फ़ौज
एक महीना पहले अगस्त 19 को चीफ जस्टिस बीआर गवई दिल्ली के महरौली स्थित ASI को आशिक अल्लाह दरगाह और चिल्लागाह बाबा फरीद की मरम्मत करके आदेश देते है जबकि ASI ने कहा कि ट्रस्ट ने नियमों के खिलाफ जा कर वहां गैर कानूनी बदलाव किए है।
परंतु उसी “अल्पसंख्यक” बौद्ध गवई ने भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति को ठीक करने के लिए ASI को आदेश देने से मना कर दिया क्योंकि वह हिंदू बहुसंख्यक समाज के भगवान को नीचा दिखाना चाहते थे कि अपने भगवान से मांगो। ये शब्द ऐसे ही कहे गए जैसे आतंकियों ने पहलगाम में कहे थे कि जाकर अपने मोदी को बता दो। गवई साहेब आपकी बात विष्णु भगवान से सुन ली है।
अवलोकन करें:-
यही “अल्पसंख्यक” बौद्ध गवई हैं जिन्होंने एक ईसाई अल्पसंख्यक पादरी Edwin Pigarez की एक नाबालिग लड़की से बार बार बलात्कार करने के अपराध में हाई कोर्ट द्वारा दी गई 20 साल की सजा को अपील पर फैसला होने तक के लिए निलंबित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट को बच्चियों के बलात्कार के लिए जिम्मेदार क्यों न माना जाए?
सुप्रीम कोर्ट ने बिना संविधान के किसी प्रावधान एक गैर कानूनी कॉलेजियम देश पर थोपा हुआ है इसलिए साबित होता है कि सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों की थाह पाना संभव नहीं है।

No comments:
Post a Comment