सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे के माहेश्वरी और जस्टिस अगस्टीन मसीह की पीठ ने एक ही दिन में अरावली हिल्स और कुलदीप सेंगर के बारे में जैसे निर्णय दिए उनसे साफ़ प्रतीत होता है कि सुप्रीम कोर्ट जनता के विद्रोह के दबाव में आ गया और एक संदेश आम जनता को दे दिया कि अगर हमसे अपने मत अनुसार निर्णय चाहिए तो आंदोलन करो। अब कल को रोहिंग्या भी हिंसक प्रदर्शन करे तो कोई बड़ी बात नहीं है सूर्यकांत जी उनके लिए रेड कारपेट बिछा दें।अरावली हिल्स के मामले तो जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने चीफ जस्टिस गवई, जस्टिस के वी चंद्रन और जस्टिस एन वी अंजारिया के 20 नवंबर के निर्णय पर रोक लगा कर एक तरह साफ़ कह दिया कि उन्होंने “गलत निर्णय” दिया। इसके लिए चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने जनता के प्रदर्शनों पर स्वतः संज्ञान लेकर नए सिरे से सुनवाई की और आगे खनन पर रोक लगा दी जो केंद्र सरकार पहले ही लगा चुकी है। गवई की बेंच ने कहा कि 100 मीटर से ऊपर की पहाड़ी ही अरवली हिल्स का हिस्सा होंगी और सिर्फ 8.7% पहाड़ ही हैं।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
मजे की बात है कि सेंगर के केस में सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि "every finest judges are prone to errors” and judicial scrutiny is a part of the system. लेकिन अरावली हिल्स के केस में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में ही गलती मान ली। अब आगे भी उसमे गलती होगी या सेंगर के केस में हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा कर गलती है तो फिर उसका Judicial scrutiny कौन करेगा।
सेंगर को तो जमानत दी गई थी और सजा निलंबित हुई थी, फिर वो क्यों hue and cry करेगा, वह तो पीड़िता पक्ष की तरफ से सड़को पर की गई थी जिसके दबाव में सूर्यकांत आ गए। मैंने सेंगर की बेटी का इंटरव्यू देखा और उसकी बातें सुनकर आश्चर्य हुआ कि पीड़िता ने रेप का समय अपने बयानों में 3 बार बदला, एक बार दिन के 2 बजे बताया, फिर शाम के 6 बजे और तीसरी बार रात के आठ बजे। AIIMS की मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता को बालिग बताया गया था लेकिन फिर भी केस का पोक्सो एक्ट में ट्रायल किया गया और सजा दी गई।
समस्या यह है कि हाई कोर्ट ने सेंगर की अपील 7 साल के लटका रखी है। अगर निर्णय सुना दिया होता तो तो देखा जा सकता था कि क्या ट्रायल कोर्ट ने रेप का समय 3 बार बदलने पर कैसे संज्ञान लिया और कैसे नाबालिग मानकर सजा सुनाई।
जिस तरह सड़कों पर हाई कोर्ट के निर्णय का विरोध किया गया और महमूद प्राचा का पीड़िता का वकील होना पूरी तरह प्रमाणित करता है कि इस मामले को राजनीतिक रंग दे दिया गया है। महमूद प्राचा टीवी चैनल्स में आकर हिंदुओं और भाजपा के खिलाफ जहर उगलता है और राममंदिर के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी पलटने के लिए कोर्ट गया था जिसे Frivolous मानकर उसकी याचिका ख़ारिज हुई थी और एक लाख रुपए का दंड भी लगा था।

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