अविमुक्तेश्वरानंद किसी आदर योग्य शब्दों का अधिकारी नहीं रहा - एक “गालीबाज” हो गया है “संत का चोला ओढ़े हुए। वह कहता है शंकराचार्य करोड़ों हिंदुओं का प्रतिनिधि होता है और उसका अपमान मतलब करोड़ों सनातनियों का अपमान है। लेकिन उसका अपमान मुझ जैसे सनातनी का किसी भी तरह अपमान नहीं है।
योगी जी का अपमान करते हुए जो उसने कहा वह अत्यंत निंदनीय है। ऐसा लगता है इस कालनेमि को किसी रावण ने नहीं भेजा बल्कि हो सकता है किसी लंकिनी ने भेजा हो और लक्ष्य है हिंदुओं में विघटन करना और राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस में विघ्न डालना और तब तक इसका रोना धोना चलता रहेगा।
![]() |
| लेखक चर्चित YouTuber |
अविमुक्तेश्वरानंद हरामखोर उस व्यक्ति गिरधर (जगद्गुरु के बचपन का नाम) को गाली बक रहा है जिसकी आंखों की ज्योति मात्र 2 माह की आयु में चली गई लेकिन आज वह 22 भाषाएं जानते हैं; 240 पुस्तकें लिखी हैं उन्होंने और 50 पेपर प्रकाशित हुए हैं उनके 4 महाकाव्यों की रचना की है। 5 वर्ष के आयु में गिरधर को भगवत गीता कंठस्थ हो गई थी और 700 verses और उनके नंबर उन्हें 15 दिन में कंठस्थ हो गए थे। 1955 में यानी 5 साल की आयु में भगवत गीता का पाठ सुनाया था।
ऐसे तपस्वी को अंधा कह कर अविमुक्तेश्वरानंद ने उन्हें गुरु बनने के योग्य नहीं माना। सच तो यह है कि ये पाखंडी स्वयं नेत्रहीन है तन से नहीं है तो मन से है लेकिन अपने अहंकार में जगद्गुरु का अपमान करते हुए भूल गया कि उनका एक श्राप से यह मिट्टी में मिल सकता है और हो सकता उसके मुंह से जो जगद्गुरु के लिए अपशब्द निकले हैं वे ही उसके पतन का कारण बन जाएं।
ये तो चोरी से बना शंकराचार्य है लेकिन सभी शंकराचार्यों को स्थापित करने वाले आदि शंकराचार्य ने कहा था कि - “जिस व्यक्ति ने परम सत्य का साक्षात्कार कर लिया है, वही गुरु बनने के योग्य है— चाहे वह चांडाल हो या ब्राह्मण” और जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी तो हैं ही ब्राह्मण।
और सुनो मुर्खानंद पाखंडी अहंकार में डूबे हुए अविमुक्तेश्वरानंद, वैदिक ऋषि अष्टावक्र जो किशोरावस्था में चक्रवर्ती सम्राट राजा जनक के गुरु बने, उन्हें 8 तरह की शारीरिक विकलांगता थी लेकिन उनका राजा जनक के साथ संवाद “अष्टावक्र गीता या अष्टावक्र संहिता के नाम से जाना जाता है। अष्टावक्र ने राजा जनक को वैराग्य का ज्ञान दिया। लेकिन तुम तो ऐसे ुंझे हो मोह माया में कि अपनी पालकी से उतर कर 50 मीटर भी नहीं चल सकते जबकि आदि शंकराचार्य ने पैदल ही सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया।
तुम योग का उपहास उड़ाते हो जबकि तुम्हे पता भी नहीं उनका त्याग क्या है? वो सच में योगी है और तुम्हारे जैसे मानसिक रोगी उनसे टकरा कर चूर हो जाएंगे। योगी अपने तप से आज के मुकाम पर पहुंचे है और जो संयासी होता है वो ही सफल राजा होता है लेकिन तुम्हारे जैसा राजसी सुविधाएं चाहने वाला तो संयासी हो ही नहीं सकता। तुम हर किसी को कोसते हो लेकिन फिर भी तुम्हे हम “दुर्वासा” नहीं कह सकते क्योंकि वो बहुत बड़े ऋषि थे और तुम उनके सामने कहीं नहीं ठहरते। तुम संयासी/संत समाज के नाम पर कलंक हो।

No comments:
Post a Comment