नेहरू लियाकत समझौता रद्द करने का उपाय सोचा जाए; अंतरिम प्रधानमंत्री नेहरू के पापों की कोई सीमा नहीं थी

सुभाष चन्द्र

भारत के धर्म के आधार पर विभाजन के अनुसार मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए था और हिंदुओं को भारत आ जाना चाहिए था।  क्योंकि पाकिस्तान मुसलमानों की मांग पर बनाया गया था, इसलिए आज मुसलमानों को यह कहने का अधिकार नहीं है कि वे भी हिंदुस्तान में बराबर के हकदार हैं 

लेकिन गांधी और नेहरू ने बड़ी कुटिलता से मुसलमानों को भारत में रहने दिया उसी दिन उन दोनों ने दूसरा पाकिस्तान बनाने के षड्यंत्र की बुनियाद रख दी और आज उस बुनियाद पर इमारत खड़ी हो गई है

नेहरू को 2 सितंबर, 1946 को (विभाजन से पहले) Viceroy की Executive Council में Vice President बनाया गया de facto प्रधानमंत्री की हैसियत से काम करने के लिए जिसका काम सत्ता हस्तांतरण की देखभाल करना, विदेश नीति को बनाना और डिप्लोमेटिक संबंधों को बनाना था लेकिन नेहरू ने अंतरिम प्रधानमंत्री होते हुए ही विदेश मामलों में ग़दर मचा कर सर्वनाश कर दिया

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भारत के चुनाव 1951 में हुए और इसलिए नेहरू सरकार को देश विरोधी कार्य करने का कोई अधिकार नहीं था क्योंकि उन्हें जनता की अनुमति नहीं थी लेकिन फिर भी उसने किए नेहरू ने तो कश्मीर काट कर पाकिस्तान को दे दिया, तिब्बत काट कर चीन को दे दिया और UNO की स्थाई सीट एवं वीटो पावर चीन को दे दी RSS पर बैन भी अंतरिम प्रधानमंत्री होते हुए लगाया जो कोर्ट में पिट गया

नेहरू ने 8,अप्रैल 1950 को पाकिस्तान के कार्यवाहक प्रधानमंत्री लियाकत अली के साथ (भारत का विभाजन करने के बाद) एक समझौता करके एक बार फिर भारत के लिए सर्वनाश कर दिया। उस समझौते का उद्देश्य था

- To guarantee the rights of minorities in both countries and to reduce communal tensions.

-Key provisions: The pact included clauses on protecting minority rights, the return of abducted women and property, and the freedom of minorities to return to their homes

भारत ने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की ऐसे रक्षा की कि उनकी संख्या आज 20 करोड़ से ज्यादा हो गई लेकिन पाकिस्तान अल्पसंख्यक हिंदुओं को गाजर मूली की तरह काट कर 22% से 2% पर ले आया

इसलिए कानूनी दृष्टि ने नेहरू को Elected Prime Minister न होते हुए ऐसा समझौता करने का कोई अधिकार नहीं था 1960 में नेहरू की जब Indus Water Treaty पर भारत ने रोक लगा दी तो लियाकत अली के साथ समझौते को भी रद्द किया जा सकता है इस समझौते के साइन होने तक तकनीकी रूप से मुसलमानों को वोट देने का भी अधिकार नहीं था और क्योंकि 1951 में चुनाव होने थे, नेहरू ने मुसलमानों को वोटर बनाने के लिए वह समझौता किया लियाकत अली से समझौते के वक्त नेहरू Elected PM नहीं था जबकि सिंधु जल समझौते से समय वो Elected PM था और अगर 1960 का समझौता रोका जा सकता है तो 1950 के समझौते को रोकने के भी उपाय तलाशने चाहिए

अब सवाल यह उठेगा कि 1950 के समझौते के समय के लोग तो इस वक्त होंगे नहीं तो समझौता रद्द करने का असर उन पर तो होगा नहीं ऐसी स्थिति में उनके वंशजों को इस समझौते के लाभ से वंचित किया जाना चाहिए किसी संविधान विशेषज्ञ को यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाना चाहिए

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