16 साल से सुप्रीम कोर्ट में लटका हुआ आंध्र प्रदेश का मुसलमानों को दिया हुआ 4% आरक्षण का मामला

सुभाष चन्द्र 

जस्टिस सूर्यकांत ने चीफ जस्टिस बनने के बाद कई आदेश/बयान दिए जिसकी सराहना की जा रही है और और करनी भी चाहिए ट्रेड यूनियन आंदोलन को इंडसट्रीज़ को बंद होने का कारण बताना, रोहिंग्या को रेड कारपेट न देना का बयान, व्हाट्सप्प को निर्देश कि या भारत के कानून को मानों या देश छोड़ जाओ, UGC पर कहना कि यदि हम दखल नहीं देंगे तो समाज पर गंभीर खतरा पैदा होगा और प्रशांत किशोर को बैरंग लौटाना कुछ ऐसे विषय हैं जिन्हें लोगों ने पसंद किया है। 

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चर्चित YouTuber
 
कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है तो उससे अपेक्षाएं भी बढ़ जाती हैं और वह आदमी कभी कुछ गलती कर दे तो समाज उसे बख्शता भी नहीं है मैं आजकल में चर्चित एक नेता का नाम नहीं लूंगा जिसने समाज और देश की सेवा में अपना जीवन लगा दिया लेकिन एक गलती (जो उसकी थी भी नहीं) के लिए लोग उसे फांसी लगाने के लिए आमादा हो गए 

चीफ जस्टिस सूर्यकांत से भी अपेक्षाएं बहुत हैं लेकिन उनका कार्यकाल असीमित नहीं है एक वर्ष बाद 9 फरवरी को रिटायर हो जाएंगे इसलिए मैं केवल एक आवेदन करना चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट में जो वर्षों से मुक़दमे जंग खा रहे हैं, उन्हें निपटाने के लिए कोई रणनीति बनाएं

ऐसे मुकदमों में एक है आंध्र प्रदेश में 2004 में लाया गया मुसलमानों के लिए 5% आरक्षण मुख्यमंत्री Y. S. Rajasekhara Reddy ने मुसलमानों को BC-E मानकर आरक्षण दिया जिसे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया उसके बाद अध्यादेश लाया गया जिसे विधानसभा से पारित करा कर कानून बनाया गया लेकिन उसे भी हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया यह 5% आरक्षण क्योंकि राज्य में 50% को पार करता था इसलिए रेड्डी ने उसे 4% कर दिया

2005 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि Prima Facie यह आरक्षण धार्मिक आधार पर लगता है और रोक लगा दी थी

यह मामला हाई कोर्ट में कई लोग व्यक्तिगत तौर पर ले गए जिसमें प्रमुख थे वकील K. Kondala Rao and others जिन्होंने 2007 के मुस्लिम रिजर्वेशन एक्ट को हाई कोर्ट में चुनौती दी चुनौती का आधार था कि आरक्षण धार्मिक आधार पर होने के कारण संवैधानिक नहीं है

फरवरी 2010 में हाई कोर्ट ने मुस्लिमों को आरक्षण देने वाले कानून को खारिज कर दिया लेकिन राज्य सरकार हाई कोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई सरकार का शुरू से मत रहा कि मुसलमानों की 15 जातियों को उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन की वजह से आरक्षण दिया गया है  (15 specific Muslim sub-groups (communities) categorized as socially and economically backward) ये आरक्षण फर्जी था क्योंकि मुस्लिमों में कोई जातिप्रथा नहीं होती और आर्थिक पिछड़ापन तो हर समुदाय में होता है और इसलिए यह पूरी तरह धार्मिक आधार पर ही था जिसका कोई प्रावधान संविधान में नहीं है

सुप्रीम कोर्ट के Chief Justice K. G.Balakrishnan,Justice J.M.Panchal और Justice B. S. Chauhan की पीठ ने 25 मार्च, 2010 को अपने अंतरिम आदेश में न तो कानून पर रोक लगाई, न वैध करार दिया और न ख़ारिज किया लेकिन 4% आरक्षण को तब तक जारी रखने के आदेश दे दिए जब तक संविधान पीठ उस पर निर्णय न ले ले

वह संविधान पीठ 2026 तक 16 वर्ष बाद भी नहीं बनी है और मुसलमानों के लिए आरक्षण जारी है सोचिए अगर संविधान पीठ ने आरक्षण को अवैध कह दिया तो जो 2004 से अब तक मुस्लिम आरक्षण का लाभ उठा कर जो नौकरी पाए होंगे, उन्हें कैसे निकाला जाएगा

इसलिए इस मुकदमे को और ऐसे अन्य 15-20 वर्षो से लंबित मुकदमों को समयबद्ध तरीके से निपटाना आवश्यक है और यही अपेक्षा है चीफ जस्टिस सूर्यकांत से कि वे इस पर ध्यान देंगे और कॉलेजियम को भी समाप्त करने के लिए कदम उठाएंगे जो उन्होंने आश्वासन दिया था

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